सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
- ७।२२ ६ ७०५ ] सप्तमोऽध्यायः २७३
वा यथाशक्ति । संयममविनाशयन्नतीतत्यतिथिः । अथवा नास्य तिथिरस्तीत्यतिथिः अनियतकाला-
गमन इत्यर्थः । अतिथये संविभागोऽतिथिसंविभागः । स चतुर्विधः; भिक्षोपकरणौषधप्रतिश्रय-
भेदात् । मोक्षार्थमभ्युद्यतायातिथये संयमपरायणाय शुद्धाय शुद्धचेतसा निरवद्या भिक्षा देया ।
धर्मोपकरणानि च सम्यग्दर्शनाद्युपबृंहणानि दातव्यानि । औषधमपि योग्यमुपयोजनीयम् । प्रति-
श्रयश्च परमधर्मश्रद्धया प्रतिपादियितव्य इति । 'च'शब्दो वक्ष्यमाणगृहस्थधर्मसमुच्चयार्थः । ५
§ ७०४. कः पुनरसौ-
मारणान्तिक सल्येखना जोषिता ॥ २२ ॥
§ ७०५. स्वपरिणामोपात्तस्यायुष इन्द्रियाणां बलानां च कारणवशात्संक्षयो मरणम् । 'अन्त'-
ग्रहणं तद्भवमरणप्रतिपत्त्यर्थम् । मरणमन्तो मरणान्तः । स प्रयोजनमस्येति मारणान्तिकी ।
सम्यक्कायकषायलेखना सल्लेखना । कायस्य बाह्यस्याभ्यन्तराणां च कषायाणां तत्कारणहापन- १०
क्रमेण सम्यग्लेखना सल्लेखना । तां मारणान्तिकीं सल्लेखनां जोषिता सेविता गृहीत्यभि-
संबध्यते । ननु च विस्पष्टार्थं सेवितेत्येवं वक्तव्यम् । न; अर्थविशेषोपपत्तेः । न केवलमिह सेवनं
परिगृह्यते । किं तर्हि । प्रीत्यर्थोऽपि । यस्मादसत्यां प्रीतौ बलान्न सल्लेखना कार्यते । सत्यां हि
संयमका विनाश न हो इस विधिसे जो आता है वह अतिथि है या जिसके आनेकी कोई
तिथि नहीं उसे अतिथि कहते हैं। तात्पर्य यह है कि जिसके आनेका कोई काल निश्चित नहीं है १५
उसे अतिथि कहते हैं। इस अतिथिके लिए विभाग करना अतिथिसंविभाग है। वह चार प्रकारका
है-भिक्षा, उपकरण, औषध और प्रतिश्रय अर्थात् रहनेका स्थान । जो मोक्षके लिए बद्धकक्ष
है, संयमके पालन करनेमें तत्पर है और शुद्ध है उस अतिथिके लिए शुद्ध मनसे निर्दोष भिक्षा
देनी चाहिए । सम्यग्दर्शन आदिके बढ़ानेवाले धर्मोपकरण देने चाहिए । योग्य औषधकी योजना
करनी चाहिए तथा परम धर्ममें श्रद्धापूर्वक निवास-स्थान भी देना चाहिए । सूत्रमें जो 'च' शब्द है २०
वह आगे कहे जानेवाले गृहस्थधर्मके संग्रह करनेके लिए दिया है ।
§ ७०४. वह और कौन-सा गृहस्थ धर्म है-
तथा वह मारणान्तिक संलेखनाका प्रीतिपूर्वक सेवन करनेवाला होता है ॥२२॥
§ ७०५. अपने परिणामोंसे प्राप्त हुई आयुका, इन्द्रियोंका और मन, वचन, काय इन तीन
बलोंका कारण विशेषके मिलने पर नाश होना मरण है। उसी भवके मरणका ज्ञान करानेके लिए २५
सूत्रमें मरण शब्दके साथ अन्त पदको ग्रहण किया है। मरण यही अन्त मरणान्त है और जिसका
यह मरणान्त ही प्रयोजन है वह मारणान्तिकी कहलाती है। अच्छे प्रकारसे काय और कषायका
लेखन करना अर्थात् कृष करना सल्लेखना है। अर्थात् बाहरी शरीरका और भीतरी कषायोंका,
उत्तरोत्तर काय और कषायको पुष्ट करनेवाले कारणोंको घटाते हुए, भले प्रकारसे लेखन करना
अर्थात् कृष करना सल्लेखना है। मरणके अन्तमें होने वाली इस सल्लेखनाको प्रीतिपूर्वक सेवन ३०
करनेवाला गृहस्थ होता है यह इस सूत्रका तात्पर्य है। शंका- सहज तरीकेसे अर्थका स्पष्टीकरण
हो इसके लिए सूत्रमें 'जोषिता' इसके स्थानमें 'सेविता' कहना ठीक है ? समाधान - नहीं क्योंकि
'जोषिता' क्रियाके रखनेसे उससे अर्थ-विशेष ध्वनित हो जाता है। यहाँ केवल 'सेवन करना' अर्थ
नहीं लिया गया है किन्तु प्रीति रूप अर्थ भी लिया गया है, क्योंकि प्रीतिके न रहने पर बलपूर्वक
सल्लेखना नहीं करायी जाती । किन्तु प्रीतिके रहने पर जीव स्वयं ही सल्लेखना करता है। तात्पर्य ३५
यह है कि 'प्रीतिपूर्वक सेवन करना' यह अर्थ 'जोषिता' क्रियासे निकल आता है 'सेविता' से नहीं,
अतः सूत्रमें 'जोषिता' क्रिया रखी है। शंका- चूंकि सल्लेखनामें अपने अभिप्रायसे आयु आदिका
१. -हापनया क्रमे-आ०, दि० १, ता० ।
३५
[Header] २७४ सर्वार्थसिद्धौ [ ७।२२ § ७०६ –
प्रीतौ स्वयमेव करोति । स्यान्मतमात्मवधः प्राप्नोति; स्वाभिसन्धिपूर्वकायुरादिनिवृत्तेः । नैष
दोषः; अप्रमत्तत्वात् । 'प्रमत्तयोगात्प्राणव्यपरोपणं हिंसा' इत्युक्तम् । न चास्य प्रमादयोगोऽस्ति ।
कुतः ? रागाद्यभावात् । रागद्वेषमोहाविष्टस्य हि विषशस्त्राद्युपकरणप्रयोगवशादात्मानं घ्नतः
स्वघातो भवति । न सल्लेखनां प्रतिपन्नस्य रागादयः सन्ति ततो नात्मवधदोषः । उक्तं च—
“रागादीणमणुप्पा अहिंसगत्तं ति¹ देसिदं समये ।
तेसिं चे उप्पत्ती हिंसेति जिणेहि णिद्दिट्ठा ॥”
किं च मरणस्यानिष्टत्वात्तथा वणिजो विविधपण्यदानादानसंचयपरस्य स्वगृहविनाशोऽनिष्टः ।
तद्विनाशकारणे च कुतश्चिदुपस्थिते यथाशक्ति² परिहरति । दुष्परिहारे च पण्यविनाशो यथा न
भवति तथा यतते । एवं गृहस्थोऽपि व्रतशीलपण्यसंचये प्रवर्तमानः तदाश्रयस्य न पातमभिवाञ्छति ।
तदुपप्लवकारणे चोपस्थिते स्वगुणाविरोधेन परिहरति । दुष्परिहारे च यथा स्वगुणविनाशो
न भवति तथा प्रयतत इति कथमात्मवधो भवेत् ।
§ ७०६. अत्राह, 'निःशल्यो व्रती' इत्युक्तं तत्र च तृतीयं शल्यं मिथ्यादर्शनम् । ततः
सम्यग्दृष्टिना व्रतिनां³ निःशल्येन भवितव्यमित्युक्तम् । तत्सम्यग्दर्शनं किं सापवादं निरपवादमिति ।
उच्यते—कस्यचिन्मोहनीयावस्थाविशेषात्कदाचिदिमे भवन्त्यपवादाः—
त्याग किया जाता है इसलिए यह आत्मघात हुआ ? समाधान—यह कोई दोष नहीं है क्योंकि
सल्लेखनामें प्रमादका अभाव है । 'प्रमत्तयोगसे प्राणोंका वध करना हिंसा है' यह पहले कहा जा
चुका है । परन्तु इसके प्रमाद नहीं है, क्योंकि इसके रागादिक नहीं पाये जाते । राग, द्वेष और
मोहसे युक्त होकर जो विष और शस्त्र आदि उपकरणोंका प्रयोग करके उनसे अपना घात करता
है उसे आत्मघातका दोष प्राप्त होता है । परन्तु सल्लेखनाको प्राप्त हुए जीवके रागादिक तो हैं
नहीं इसलिए इसे आत्मघातका दोष नहीं प्राप्त होता । कहा भी है—
“शास्त्रमें यह उपदेश है कि रागादिका नहीं उत्पन्न होना अहिंसा है । तथा जिनदेवने
उनकी उत्पत्तिको हिंसा कहा है ॥”
दूसरे मरण किसी को भी इष्ट नहीं है । जैसे नाना प्रकारकी विक्रेय वस्तुओंके देन, लेन और
संचयमें लगे हुए किसी व्यापारीको अपने घरका नाश होना इष्ट नहीं है । फिर भी परिस्थिति-
वश उसके विनाशके कारण आ उपस्थित हों तो यथाशक्ति वह उनको दूर करता है । इतने पर
भी यदि वे दूर न हो सकें तो जिससे विक्रेय वस्तुओंका नाश न हो ऐसा प्रयत्न करता है उसी
प्रकार पण्यस्थानीय व्रत और शीलके संचयमें जुटा हुआ गृहस्थ भी उनके आधारभूत आयु आदि-
का पतन नहीं चाहता । यदा कदाचित् उनके विनाशके कारण उत्पन्न हो जाँय तो जिससे अपने
गुणोंमें बाधा नहीं पड़े इस प्रकार उनको दूर करनेका प्रयत्न करता है । इतने पर भी यदि वे दूर
न हों तो जिससे अपने गुणोंका नाश न हो इस प्रकार प्रयत्न करता है इसलिए इसके आत्मघात
नामका दोष कैसे हो सकता है अर्थात् नहीं हो सकता है ।
§ ७०६. यहाँ पर शंकाकार कहता है कि व्रती निःशल्य होता है ऐसा कहा है और वहाँ
तीसरी शल्य मिथ्यादर्शन है । इसलिए सम्यग्दृष्टि व्रतीको निःशल्य होना चाहिए यह उसका
अभिप्राय है, तो अब यह बतलाइए कि वह सम्यग्दर्शन सापवाद होता है या निरपवाद होता है ?
अब इसका समाधान करते हैं—किसी जीवके मोहनीयकी अवस्था विशेषके कारण ये अपवाद
होते हैं—
१. त्ति भासिदं स-मु० । २. -शक्ति च परि -मु० । ३. व्रतिना भवि-आ०, दि०, १, दि० २ ।
– ७।२५ § ७१० ] सप्तमोऽध्यायः २७५
शङ्काकाङ्क्षाविचिकित्सान्यदृष्टिप्रशंसासंस्तवाः सम्यग्दृष्टेरतिचाराः ॥ २३ ॥
§ ७०७. निःशङ्कितत्वादयो व्याख्याताः 'दर्शनविशुद्धिः' इत्यत्र । तत्प्रतिपक्षभूताः शङ्कादयो
वेदितव्याः । अथ प्रशंसासंस्तवयोः को विशेषः । मनसा मिथ्यादृष्टेर्ज्ञानचारित्रगुणोद्भावनं प्रशंसा,
भूताभूतगुणोद्भाववचनं संस्तव इत्ययमनयोर्भेदः । ननु च सम्यग्दर्शनमष्टाङ्गमुक्तं तस्यातिचारै-
रप्यष्टाभिर्भवितव्यम् । नैष दोषः; व्रतशीलेषु पञ्च पञ्चातिचारा इत्युत्तरत्र विवक्षुणाचार्येण ५
प्रशंसासंस्तवयोरितरानतिचारानन्तर्भाव्य पञ्चैवातिचारा उक्ताः ।
§ ७०८. आह, सम्यग्दृष्टेरतिचारा उक्ताः । किमेवं व्रतशीलेष्वपि भवन्तीति । ओमित्युक्त्वा
तदतिचारसंख्यानिर्देशार्थमाह—
व्रतशीलेषु पञ्च पञ्च यथाक्रमम् ॥ २४ ॥
§ ७०९. व्रतानि च शीलानि च व्रतशीलानि तेषु व्रतशीलेषु । शीलग्रहणमनर्थकम्; १०
व्रतग्रहणेनैव सिद्धेः । नानर्थकम्; विशेषज्ञापनार्थं व्रतपरिरक्षणार्थं शीलमिति दिग्विरत्यादीनीह
'शील'ग्रहणेन गृह्यन्ते ।
§ ७१०. अगार्यधिकारादगारिणो व्रतशीलेषु पञ्च पञ्चातिचारा वक्ष्यमाणा यथाक्रमं
वेदितव्याः । तद्यथा—आद्यस्य तावदहिंसाव्रतस्य—
बन्धवधच्छेदातिभारारोपणान्नपाननिरोधाः ॥ २५ ॥ १५
शंका, कांक्षा, विचिकित्सा, अन्यदृष्टिप्रशंसा और अन्यदृष्टिसंस्तव ये सम्यग्दृष्टि के पांच
अतिचार हैं ॥२३॥
§ ७०७. 'दर्शनविशुद्धिः' इत्यादि सूत्रका व्याख्यान करते समय निःशंकितत्व आदिका
व्याख्यान किया । ये शंकादिक उनके प्रतिपक्षभूत जानना चाहिए । शंका—प्रशंसा और संस्तवमें
क्या अन्तर है ? समाधान—मिथ्यादृष्टिके ज्ञान और चारित्र गुणोंका मनसे उद्भावन करना प्रशंसा २०
है और मिथ्यादृष्टिमें जो गुण हैं या जो गुण नहीं हैं इन दोनोंका सद्भाव बतलाते हुए कथन करना
संस्तव है, इस प्रकार यह दोनोंमें अन्तर है । शंका—सम्यग्दर्शनके आठ अंग कहे हैं, इसलिए
उसके अतिचार भी आठ ही होने चाहिए । समाधान—यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि आगे आचार्य
व्रतों और शीलोंके पाँच-पाँच अतिचार कहनेवाले हैं इसलिए अन्यदृष्टिप्रशंसा और अन्यदृष्टिसंस्तव
इन दो अतिचारोंमें शेष अतिचारोंका अन्तर्भाव करके सम्यग्दृष्टिके पांच ही अतिचार कहे हैं । २५
§ ७०८. सम्यग्दृष्टिके अतिचार कहे, क्या इसी प्रकार व्रत और शीलोंके भी अतिचार होते
हैं ? हां, यह कह कर अब उन अतिचारोंकी संख्याका निर्देश करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
व्रतों और शीलोंमें पांच पांच अतिचार हैं जो क्रमसे इस प्रकार हैं ॥२४॥
§ ७०९. शील और व्रत इन शब्दोंका कर्मधारय समास होकर व्रतशील पद बना है । उनमें
अर्थात् व्रत-शीलोंमें । शंका—सूत्रमें शील पदका ग्रहण करना निष्फल है, क्योंकि व्रत पदके ग्रहण ३०
करनेसे ही उसकी सिद्धि हो जाती है ? समाधान—सूत्रमें शील पदका ग्रहण करना निष्फल नहीं
है, क्योंकि विशेषका ज्ञान करानेके लिए और व्रतोंकी रक्षा करनेके लिए शील है इसलिए यहाँ
शील पदके ग्रहण करनेसे दिग्विरति आदि लिये जाते हैं ।
§ ७१०. यहाँ गृहस्थका प्रकरण है, इसलिए गृहस्थके व्रतों और शीलोंके आगे कहे जाने-
वाले क्रमसे पाँच पाँच अतिचार जानने चाहिए जो निम्न प्रकार हैं । उसमें भी पहले प्रथम अहिंसा ३५
व्रतके अतिचार बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
बन्ध, वध, छेद, अतिभारका आरोपण और अन्नपानका निरोध ये अहिंसा अणुव्रतके पांच
अतिचार हैं ॥२५॥
२७६ सर्वार्थसिद्धौ [ ७।२६ § ७११ -
§ ७११. अभिमतदेशगतिनिरोधहेतुर्बन्धः । दण्डकशावेत्रादिभिरभिघातः प्राणिनां वधः,
न प्राणव्यपरोपणम्; ततः प्रागेवास्य विनिवृत्तत्वात् । कर्णनासिकादीनामवयवानामपनयनं छेदः ।
न्याय्यभारादतिरिक्तवाहनमतिभारारोपणम् । गवादीनां क्षुत्पिपासाबाधाकरणमन्नपाननिरोधः ।
एते पञ्चाहिंसाणुव्रतस्यातिचाराः ।
मिथ्योपदेशरहोभ्याख्यानकूटलेखक्रियान्यासापहारसाकारमन्त्रभेदाः ॥ २६ ॥
§ ७१२. अभ्युदयनिःश्रेयसार्थेषु क्रियाविशेषेषु अन्यस्यान्यथा प्रवर्तनमतिसंधानं वा
मिथ्योपदेशः। यत्स्त्रीपुंसाभ्यामेकान्तेऽनुष्ठितस्य क्रियाविशेषस्य प्रकाशनं तद्रहोभ्याख्यानं वेदितव्यम् ।
अन्येनानुक्तं मननुष्ठितं यत्किंचित्परप्रयोगवशादेव तेनोक्तमनुष्ठितमिति वञ्चनानिमित्तं लेखनं
कूटलेखक्रिया । हिरण्यादेर्द्रव्यस्य निक्षेप्तुर्विस्मृतसंख्यस्याल्पसंख्येयमाददानस्यैवमित्यनुज्ञावचनं
न्यासापहारः । अर्थप्रकरणाङ्गविकारभ्रूविक्षेपादिभिः पराकूतमुपलभ्य तदाविष्करणमसूयादि-
निमित्तं यत्तत्साकारमन्त्रभेद इति कथ्यते । त एते सत्याणुव्रतस्य पञ्चातिचारा बोद्धव्याः ।
स्तेनप्रयोगतदाहृतादानविरुद्धराज्यातिक्रमहीनाधिकमानोन्मानप्रतिरूपक-
व्यवहाराः ॥ २७ ॥
§ ७१३. मुष्णन्तं स्वयमेव वा प्रयुङ्क्तेऽन्येन वा प्रयोजयति प्रयुक्तमनुमन्यते वा यतः स
स्तेनप्रयोगः । अप्रयुक्तेनाननुमतेन च चौरेणानीतस्य ग्रहणं तदाहृतादानम् । उचितन्यायादन्येन
प्रकारेण दानग्रहणमतिक्रमः विरुद्धं राज्यं विरुद्धराज्यं विरुद्धराज्येऽतिक्रमः विरुद्धराज्यातिक्रमः ।
§ ७११. किसीको अपने इष्ट स्थानमें जानेसे रोकनेके कारणको बन्ध कहते हैं। डंडा, चाबुक
और बेंत आदिसे प्राणियोंको मारना वध है। यहाँ वधका अर्थ प्राणोंका वियोग करना नहीं लिया
है क्योंकि अतिचारके पहले ही हिंसाका त्याग कर दिया जाता है। कान और नाक आदि अवयवों
का छेदना छेद है। उचित भारसे अतिरिक्त भारका लादना अतिभारारोपण है। गौ आदिको भूख-
प्यासके लगने पर अन्नपानका रोकना अन्नपाननिरोध है। ये पाँच अहिंसाणु व्रतके अतिचार हैं।
मिथ्योपदेश, रहोभ्याख्यान, कूटलेखक्रिया, न्यासापहार और साकारमंत्रभेद ये सत्याणुव्रतके
पाँच अतिचार हैं ॥२६॥
§ ७१२. अभ्युदय और मोक्षकी कारणभूत क्रियाओंमें किसी दूसरेको विपरीत मार्गसे लगा
देना या मिथ्या वचनों द्वारा दूसरोंको ठगना मिथ्योपदेश है। स्त्री और पुरुष द्वारा एकान्तमें
किये गये आचरण विशेषका प्रकट कर देना रहोभ्याख्यान है। दूसरेने न तो कुछ कहा और न
कुछ किया तो भी अन्य किसीकी प्रेरणासे उसने ऐसा कहा है और ऐसा किया है इस प्रकार छलसे
लिखना कूटलेखक्रिया है। धरोहरमें चाँदी आदिको रखनेवाला कोई उसकी संख्या भूलकर यदि
उसे कमती लेने लगा तो 'ठीक है' इस प्रकार स्वीकार करना न्यासापहार है। अर्थवश, प्रकरण-
वश, शरीरके विकारवश या भ्रूक्षेप आदिके कारण दूसरेके अभिप्रायको जान कर डाहसे उसका
प्रकट कर देना साकारमंत्रभेद है। इस प्रकार ये सत्याणुव्रतके पाँच अतिचार जानने चाहिए।
स्तेनप्रयोग, स्तेन आहृतादान, विरुद्धराज्यातिक्रम, हीनाधिक मानोन्मान और प्रतिरूपक-
व्यवहार ये अचौर्य अणुव्रतके पाँच अतिचार हैं ॥२७॥
§ ७१३. किसीको चोरीके लिए स्वयं प्रेरित करना, या दूसरेके द्वारा प्रेरणा दिलाना या
प्रयुक्त हुए की अनुमोदना करना स्तेनप्रयोग है। अपने द्वारा अप्रयुक्त और असम्मत चोरके द्वारा
लायी हुई वस्तुका ले लेना तदाहृतादान है। यहाँ न्यायमार्गको छोड़ कर अन्य प्रकारसे वस्तु ली
१. -नुक्तं यत्किं मु० । २. -भ्रूनिक्षेपणादि -मु० ।
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- ७।२९ § ७१४ ] सप्तमोऽध्यायः २७७
तत्र ह्यल्पमूल्यलभ्यानि महार्घ्याणि द्रव्याणीति प्रयत्नः । प्रस्थादि मानम्, तुलाद्युन्मानम् । एतेन
न्यूनेनान्यस्मै देयमधिकानेनात्मनो ग्राह्यमित्येवमादिकूटप्रयोगो हीनाधिकमानोन्मानम् । कृत्रिमैर्हिरण्या-
दिभिर्वञ्चनापूर्वको व्यवहारः प्रतिरूपकव्यवहारः । त एते पञ्चादत्तादानाणुव्रतस्यातिचाराः ।
परविवाहकरणेत्वरिकापरिगृहीतापरिगृहीतागमनानङ्गक्रीडाकाम-
तीव्राभिनिवेशाः ॥ २८ ॥ ५
§ ७१४. कन्यादानं विवाहः । परस्य विवाहः परविवाहः । परविवाहस्य करणं परविवाह-
करणम् । परपुरुषानिति गच्छतीत्येवं शीला¹ इत्वरी । कुत्सिता इत्वरी कुत्सायां क इत्वरिका । या
एकपुरुषभर्तृका सा परिगृहीता । या गणिकात्वेन पुंश्चलीत्वेन वा परपुरुषगमनशीला अस्वामिका
सा अपरिगृहीता । परिगृहीता चापरिगृहीता च परिगृहीतापरिगृहीते । इत्वरिके च ते परिगृहीता-
परिगृहीते च इत्वरिकापरिगृहीतापरिगृहीते, तयोर्गमने इत्वरिकापरिगृहीतापरिगृहीतागमने । अङ्गं १०
प्रजननं योनिश्च ततोऽन्यत्र क्रीडा अनङ्गक्रीडा । कामस्य प्रवृद्धः परिणामः कामतीव्राभिनिवेशः ।
त एते पञ्च स्वदारसंतोषव्रतस्यातिचाराः ।
क्षेत्रवास्तुहिरण्यसुवर्णधनधान्यदासीदासकुप्यप्रमाणातिक्रमाः ॥ २९ ॥
गयी है इसलिए अतिचार है । विरुद्ध जो राज्य वह विरुद्धराज्य है । राज्यमें किसी प्रकारका विरोध
होने पर मर्यादाका न पालना विरुद्धराज्यातिक्रम है । यदि वहाँ अल्प मूल्यमें वस्तुएँ मिल गयीं तो १५
उन्हें महँगा बेचनेका प्रयत्न करना विरुद्धराज्यातिक्रम है । मानपदसे प्रस्थ आदि मापनेके बाट लिये
जाते हैं और उन्मानपदसे तराजू आदि तौलनेके बाट लिये जाते हैं । कमती माप-तौलसे दूसरेको
देना और बढ़ती माप-तौलसे स्वयं लेना इत्यादि कुटिलतासे लेन-देन करना हीनाधिकमानोन्मान
है । बनावटी चाँदी आदिसे कपटपूर्वक व्यवहार करना प्रतिरूपक व्यवहार है । इस प्रकार ये
अदत्तादान अणुव्रतके पाँच अतिचार हैं । २०
परविवाहकरण, इत्वरिकापरिगृहीतागमन, इत्वारिका-अपरिगृहीतागमन, अनङ्गक्रीड़ा और
कामतीव्राभिनिवेश ये स्वदारसन्तोष अणुव्रतके पाँच अतिचार हैं ॥२८॥
§ ७१४. कन्याका ग्रहण करना विवाह है । किसी अन्यका विवाह परविवाह है और इसका
करना परविवाह-करण है । जिसका स्वभाव अन्य पुरुषोंके पास जाना-आना है वह इत्वरी कह-
लाती है । इत्वरी अर्थात् अभिसारिका । इसमें भी जो अत्यन्त आचरट होती है वह इत्वरिका २५
कहलाती है । यहाँ कुत्सित अर्थमें 'क' प्रत्यय होकर इत्वरिका शब्द बना है । जिसका कोई एक
पुरुष भर्ता है वह परिगृहीता कहलाती है । तथा जो वेश्या या व्यभिचारिणी होनेसे दूसरे पुरुषोंके
पास जाती-आती रहती है और जिसका कोई पुरुष स्वामी नहीं है वह अपरिगृहीता कहलाती है ।
परिगृहीता इत्वरिकाका गमन करना इत्वरिकापरिगृहीतागमन है और अपरिगृहीता इत्वरिकाका
गमन करना इत्वरिकाअपरिगृहीतागमन है । यहाँ अंग शब्दका अर्थ प्रजनन और योनि है । ३०
तथा इनके सिवा अन्यत्र क्रीडा करना अनंगक्रीडा है । कामविषयक बढ़ा हुआ परिणाम काम-
तीव्राभिनिवेश है । ये स्वदारसन्तोष अणुव्रतके पाँच अतिचार हैं ।
क्षेत्र और वास्तुके प्रमाणका अतिक्रम, हिरण्य और सुवर्णके प्रमाणका अतिक्रम, धन और
धान्यके प्रमाणका अतिक्रम, दासी और दासके प्रमाणका अतिक्रम तथा कुप्यके प्रमाणका अतिक्रम
ये परिग्रहपरिमाण अणुव्रतके पाँच अतिचार हैं ॥२९॥ ३५
१. शीला इत्वरी कुत्सा-मु०, ता० ।
§ ७१५. क्षेत्रं सस्याधिकरणम् । वास्तु आगारम् । हिरण्यं रूप्यादिव्यवहारतन्त्रम् । सुवर्णं
प्रतीतम् । धनं गवादि । धान्यं व्रीह्यादि । दासीदासं भृत्यस्त्रीपुंसवर्गः । कुप्यं क्षौमकार्पासकौशे-
यचन्दनादि । क्षेत्रं च वास्तु च क्षेत्रवास्तु, हिरण्यं च सुवर्णं च हिरण्यसुवर्णम्, धनं च धान्यं च
धनधान्यम्, दासी च दासश्च दासीदासम् । क्षेत्रवास्तु च हिरण्यसुवर्णं च धनधान्यं च दासीदासं
च कुप्यं च क्षेत्रवास्तुहिरण्यसुवर्णधनधान्यदासीदासकुप्यानि । एतावानेव परिग्रहो मम नान्य इति
परिच्छिन्नाणुप्रमाणात्क्षेत्रवास्त्वादिविषयादतिरेका अतिलोभवशात्प्रमाणातिक्रमा इति प्रत्याख्या-
यन्ते । त एते परिग्रहपरिमाणव्रतस्यातिचाराः ।
§ ७१६. उक्ता व्रतानामतिचाराः शीलानामतिचारा वक्ष्यन्ते । तद्यथा—
ऊर्ध्वाधस्तिर्यग्व्यतिक्रमक्षेत्रवृद्धिस्मृत्यन्तराधानानि ॥ ३० ॥
§ ७१७. परिमितस्य दिगवधेरतिलङ्घनमतिक्रमः । स समासतस्त्रिविधः—ऊर्ध्वातिक्रमः
अधोऽतिक्रमस्तिर्यग्गतिक्रमश्चेति । तत्र पर्वताद्यारोहणादूर्ध्वातिक्रमः । कूपावतरणादेरधोऽतिक्रमः ।
बिलप्रवेशादेस्तिर्यग्गतिक्रमः । परिगृहीताया दिशो लोभावेषादाधिक्याभिसन्धिः क्षेत्रवृद्धिः । स
एषोऽतिक्रमः प्रमादान्मोहाद् ³व्यासङ्गाद्वा भवतीत्यवसेयः । अननुस्मरणं स्म
- ७।३४ § ७२१ ] सप्तमोऽध्यायः २७९
एवं कुर्विति नियोगः प्रेष्यप्रयोगः । व्यापारकरान्पुरुषान्प्रत्युत्कासिकादिकरणं शब्दानुपातः ।
स्वविग्रहदर्शनं रूपानुपातः । लोष्टादिनिपातः पुद्गलक्षेपः । त एते देशविरमणस्य पञ्चातिचाराः ।
कन्दर्पकौत्कुच्यमौखर्यासमीक्ष्याधिकरणोपभोगपरिभोगानर्थक्यानि ॥३२॥
§ ७१९. रागोद्रेकात्प्रहासमिश्रोऽशिष्टवाक्प्रयोगः कन्दर्पः । तदेवोभयं परत्र दुष्टकायकर्म- ५
प्रयुक्तं कौत्कुच्यम् । धाष्टर्यप्रायं१ यत्किंचनानर्थकं बहुप्रलापित्वं२ मौखर्यम् । असमीक्ष्य प्रयोजन-
माधिक्येन करणमसमीक्ष्याधिकरणम् । यावताऽर्थेनोपभोगपरिभोगौ सोऽर्थस्ततोऽन्यस्याधिक्य-
मानर्थक्यम् । त एते पञ्चानर्थदण्डविरतेरतिचाराः ।
योगदुष्प्रणिधानानादरस्मृत्यनुपस्थानानि ॥ ३३ ॥
§ ७२०. योगो व्याख्यातस्त्रिविधः । तस्य दुष्टं३ प्रणिधानं योगदुष्प्रणिधानम्—कायदुष्प्रणि-
धानं वाग्दुष्प्रणिधानं मनोदुष्प्रणिधानमिति । अनादरोऽनुत्साहः । अनैकाग्र्यं स्मृत्यनुपस्थानम् । त १०
एते पञ्च सामायिकस्यातिक्रमाः ।
अप्रत्यवेक्षिताप्रमार्जितोत्सर्गादानसंस्तरोपक्रमणानादरस्मृत्यनुपस्थानानि ॥ ३४ ॥
§ ७२१. जन्तवः सन्ति न सन्ति वेति प्रत्यवेक्षणं चक्षुर्व्यापारः । मृदुनोपकरणेन यत्क्रियते
प्रयोजनं तत्प्रमार्जितम् । तदुभयं प्रतिषेधविशिष्टमुत्सर्गादिभिस्त्रिभिरभिसंबध्यते४—अप्रत्यवेक्षिता-
की आज्ञा करना आनयन है । ऐसा करो इस प्रकार काममें लगाना प्रेष्यप्रयोग है। जो पुरुष १५
किसी उद्योगमें जुटे हैं उन्हें उद्देश्य कर खाँसना आदि शब्दानुपात है। उन्हीं पुरुषोंको अपने
शरीरको दिखलाना रूपानुरूपात है । ढेला आदिका फेंकना पुद्गलक्षेप है । इस प्रकार देशविरमण
व्रतके पाँच अतिचार हैं।
कन्दर्प, कौत्कुच्य, मौखर्य, असमीक्ष्याधिकरण और उपभोगपरिभोगानर्थक्य ये अनर्थदण्ड-
विरति व्रतके पाँच अतिचार हैं ॥३२॥ २०
§ ७१९. रागभावकी तीव्रतावश हास्यमिश्रित असभ्य वचन बोलना कन्दर्प है। परिहास
और असभ्यवचन इन दोनोंके साथ दूसरेके लिए शारीरिक कुचेष्टाएँ करना कौत्कुच्य है। धीठता-
को लिये हुए निःसार कुछ भी बहुत बकवास करना मौखर्य है । प्रयोजनका विचार किये बिना
मर्यादाके बाहर अधिक काम करना असमीक्ष्याधिकरण है। उपभोग परिभोगके लिए जितनी वस्तु-
की आवश्यकता है वह अर्थ है उससे अतिरिक्त अधिक वस्तु रखना उपभोगपरिभोगानर्थक्य है। २५
इस प्रकार ये अनर्थदण्डविरति व्रतके पाँच अतिचार हैं ।
काययोगदुष्प्रणिधान, वचनयोगदुष्प्रणिधान, मनोयोगदुष्प्रणिधान, अनादर और स्मृतिका
अनुपस्थान ये सामायिक व्रतके पाँच अतिचार हैं ॥३३॥
§ ७२०. तीन प्रकारके योगका व्याख्यान किया जा चुका है। उसका बुरी तरहसे चलते
रहना योगदुष्प्रणिधान है जो तीन प्रकारका है - कायदुष्प्रणिधान, वचनदुष्प्रणिधान और मनो- ३०
दुष्प्रणिधान । उत्साहका न होना अनुत्साह है और वही अनादर है। तथा एकाग्रताका न होना
स्मृत्यनुपस्थान है । इस प्रकार ये सामायिक व्रतके पाँच अतिचार हैं ।
अप्रत्यवेक्षित अप्रमार्जित भूमिमें उत्सर्ग, अप्रत्यवेक्षित अप्रमार्जित वस्तुका आदान, अप्रत्य-
वेक्षित अप्रमार्जित संस्तरका उपक्रमण, अनादर और स्मृतिका अनुपस्थान ये प्रोषधोपवास व्रतके
पाँच अतिचार हैं ॥३४॥ ३५
§ ७२१. जीव हैं या नहीं हैं इस प्रकार आँखसे देखना प्रत्यवेक्षण कहलाता है और कोमल
उपकरणसे जो प्रयोजन साधा जाता है वह प्रमार्जित कहलाता है । निषेधयुक्त इन दोनों पदोंका
१. -प्रायं बहु-आ., दि. १, दि. २ । २. -प्रलपितं मौ-मु. । ३. दुःप्रणि-मु. । ४. -दिभिरभि-मु. ।
२८० सर्वार्थसिद्धौ [ ७।३५ § ७२२ -
प्रमार्जितोत्सर्ग इत्येवमादि । तत्र अप्रत्यवेक्षिताप्रमार्जितायां १ भूमौ मूत्रपुरीषोत्सर्गः अप्रत्यवेक्षिताप्र-
मार्जितोत्सर्गः । अप्रत्यवेक्षिताप्रमार्जितस्यार्हदाचार्यपूजोपकरणस्य गन्धमाल्यधूपायदेरात्मपरिधाना-
र्थस्य च वस्त्रादेरादानमप्रत्यवेक्षिताप्रमार्जितादानम् । अप्रत्यवेक्षिताप्रमार्जितस्य प्रावरणादेः
संस्तरस्योपक्रमणं अप्रत्यवेक्षिताप्रमार्जितसंस्तरोपक्रमणम् । क्षुद्भ्यर्दितत्वादावश्यकेष्वनादरोऽनु-
त्साहः । स्मृत्यनुपस्थानं व्याख्यातम् । त एते पञ्च प्रोषधोपवासस्यातिचाराः ।
सचित्तसंबन्धसंमिश्राभिषवदुष्पक्वाहाराः ॥३५॥
§ ७२२. सह चित्तेन वर्तते इति सचित्तं चेतनावद् द्रव्यम् । तदुपश्लिष्टः संबन्धः ।
तद्व्यतिकीर्णः संमिश्रः । कथं पुनरस्य सचित्तादिषु प्रवृत्तिः २ । प्रमादसंमोहाभ्याम् । द्रवो वृष्यो
वाभिषवः । असम्यक्पक्वो दुष्पक्वः । एतैराहारो विशेष्यते—सचित्ताहारः संबन्धाहारः संमिश्रा-
हारोऽभिषवाहारो दुष्पक्वाहार इति । त एते पञ्च भोगोपभोगपरिसंख्यानस्यातिचाराः ।
सचित्तनिक्षेपापिधानपरव्यपदेशमात्सर्यकालातिक्रमाः ॥३६॥
§ ७२३. सचित्ते पद्मपत्रादौ निक्षेपः सचित्तनिक्षेपः । अपिधानमावरणम् । सचित्तेनैव
संबध्यते सचित्तापिधानमिति । अन्यदातृदेयार्पणं परव्यपदेशः । प्रयच्छतोऽप्यादराभावोऽन्यदातृ-
उत्सर्ग आदि अगले तीन पदोंसे सम्बन्ध होता है । यथा—अप्रत्यवेक्षिताप्रमार्जितोत्सर्ग आदि ।
बिना देखी और बिना प्रमार्जित भूमिमें मल मूत्रका त्याग करना अप्रत्यवेक्षिताप्रमार्जितोत्सर्ग है ।
अरहंत और आचार्यकी पूजाके उपकरण, गन्ध, माला और धूप आदिको तथा अपने ओढ़ने आदि-
के वस्त्रादि पदार्थोंको बिना देखे और बिना परिमार्जन किये हुए ले लेना अप्रत्यवेक्षिताप्रमार्जिता-
दान है । बिना देखे और बिना परिमार्जन किये हुए प्रावरण आदि संस्तरका बिछाना अप्रत्य-
वेक्षिताप्रमार्जितसंस्तरोपक्रमण है । भूखसे पीड़ित होनेके कारण आवश्यक कार्योंमें अनुत्साहित
होना अनादर है । स्मृत्यनुपस्थानका व्याख्यान पहले किया ही है । इस प्रकार ये प्रोषधोपवास
व्रतके पाँच अतिचार हैं ।
सचित्ताहार, सम्बन्धाहार, सम्मिश्राहार, अभिषवाहार और दुःपक्वाहार ये उपभोगपरि-
परिमाण व्रतके पाँच अतिचार हैं ॥३५॥
§ ७२२. जो चित्त सहित है वह सचित्त कहलाता है । सचित्तसे चेतना सहित द्रव्य लिया
जाता है । इससे सम्बन्धको प्राप्त हुआ द्रव्य सम्बन्धाहार है । और इससे मिश्रित द्रव्य सम्मिश्र
है । शंका—यह गृहस्थ सचित्तादिकमें प्रवृत्ति किस कारणसे करता है ? समाधान—प्रमाद और
सम्मोहके कारण । द्रव, वृष्य और अभिषव इनका एक अर्थ है । जो ठीक तरहसे नहीं पका है
वह दुःपक्व है । ये पाँचों शब्द आहारके विशेषण हैं या इनसे आहार पांच प्रकारका हो जाता
है । यथा—सचित्ताहार, सम्बन्धाहार, सम्मिश्राहार, अभिषवाहार और दुःपक्वाहार ये सब भोगोप-
भोग परिसंख्यान व्रतके पाँच अतिचार हैं ।
सचित्तनिक्षेप, सचित्तापिधान, परव्यपदेश, मात्सर्य और कालातिक्रम ये अतिथिसंविभाग
व्रतके पाँच अतिचार हैं ॥३६॥
§ ७२३. सचित्त कमलपत्र आदिमें रखना सचित्तनिक्षेप है । अपिधानका अर्थ ढांकना है ।
इस शब्दको भी सचित्त शब्दसे जोड़ लेना चाहिए जिससे सचित्त कमलपत्र आदिसे ढांकना यह
अर्थ फलित होता है । इस दानकी वस्तुका दाता अन्य है यह कहकर देना परव्यपदेश है । दान
१. -मार्जितभूमौ आ०, दि०, १, दि० २ । २. -त्तिः स्यात् । प्रमा-मु० ।
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- ७३७ § ७२७ ] सप्तमोऽध्यायः २८१
गुणासहनं वा मात्सर्यम् । अकाले भोजनं कालातिक्रमः । त एते पञ्चातिथिसंविभागशीला-
तिचाराः ।
जीवितमरणाशंसामित्रानुरागसुखानुबन्धनिदानानि ॥३७॥
§ ७२४. आशंसनमाशंसा आकाङ्क्षणमित्यर्थः । जीवितं च मरणं च जीवितमरणम्,
जीवितमरणस्याशंसे जीवितमरणाशंसे । पूर्वसुहृत्सहपांसुक्रीडनाद्यनुस्मरणं मित्रानुरागः । अनुभूत- ५
प्रीतिविशेषस्मृतिसमन्वाहारः सुखानुबन्धः । भोगाकाङ्क्षया नियतं दीयते चित्तं तस्मिंस्तेनेति वा
निदानम् । त एते पञ्च सल्लेखनाया अतिचाराः ।
§ ७२५. अत्राह, उक्तं भवता¹ तीर्थंकरत्वकारणकर्मसूत्रनिर्देशे 'शक्तिस्तस्त्यागतपसी' इति,
पुनश्चोक्तं शीलविधाने 'अतिथिसंविभाग' इति । तस्य दानस्य लक्षणमनिर्ज्ञातं तदुच्यतामित्यत
आह— १०
अनुग्रहार्थं स्वस्यातिसर्गो दानम् ॥३८॥
§ ७२६. स्वपरोपकारोऽनुग्रहः । स्वोपकारः पुण्यसंचयः, परोपकारः सम्यग्ज्ञानादिवृद्धिः ।
'स्व'शब्दो धनपर्यायवचनः । अनुग्रहार्थं स्वस्यातिसर्गस्त्यागो दानं वेदितव्यम् ।
§ ७२७. अत्राह—उक्तं दानं तत्किमविशिष्टफलमाहोस्विदस्ति कश्चित्प्रतिविशेष इत्यत
आह— १५
विधिद्रव्यदातृपात्रविशेषात्तद्विशेषः ॥३६॥
करते हुए भी आदरका न होना या दूसरे दाताके गुणोंको न सह सकना मात्सर्य है । भिक्षाकालके
सिवा दूसरा काल अकाल है और उसमें भोजन कराना कालातिक्रम है । ये सब अतिथिसंविभागके
शीलव्रतके पाँच अतिचार हैं ।
जीविताशंसा, मरणाशंसा, मित्रानुराग, सुखानुबन्ध और निदान ये सल्लेखनाके पाँच अति- २०
चार हैं ॥३७॥
§ ७२४. आशंसाका अर्थ चाहना है । जीनेकी चाह करना जीविताशंसा है और मरनेकी
चाह करना मरणाशंसा है । पहले मित्रोंके साथ पांसुक्रीड़न आदि नाना प्रकारकी क्रीड़ाएँ की रहीं
उनका स्मरण करना मित्रानुराग है । अनुभवमें आये हुए विविध सुखोंका पुनः-पुनः स्मरण
करना सुखानुबन्ध है । भोगाकांक्षासे जिसमें या जिसके कारण चित्त नियमसे दिया जाता है २५
वह निदान है । ये सब सल्लेखनाके पाँच अतिचार हैं ।
§ ७२५. तीर्थंकर पदके कारणभूत आस्रवके कारणोंका कथन करते समय शक्तिपूर्वक त्याग
और तप कहा; पुनः शीलोंका कथन करते समय अतिथिसंविभागव्रत कहा परन्तु दानका लक्षण
अभीतक ज्ञात नहीं हुआ इसलिए दानका स्वरूप बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
अनुग्रहके लिए अपनी वस्तुका त्याग करना दान है ॥३८॥ ३०
§ ७२६. स्वयं अपना और दूसरेका उपकार करना अनुग्रह है । दान देनेसे पुण्यका संचय
होता है यह अपना उपकार है तथा जिन्हें दान दिया जाता है उनके सम्यग्ज्ञान आदिकी वृद्धि
होती है यह परका उपकार है । सूत्रमें आये हुए स्वशब्दका अर्थ धन है । तात्पर्य यह है कि अनु-
ग्रहके लिए जो धनका अतिसर्ग अर्थात् त्याग किया जाता है वह दान है ।
§ ७२७. दानका स्वरूप कहा तब भी उसका फल एक-सा होता है या उसमें कुछ विशेषता ३५
है, यह बतलानेके लिए अब आगेका सूत्र कहते हैं—
विधि, देय, वस्तु, दाता और पात्रकी विशेषतासे उसकी विशेषता है ॥३९॥
१. भगवता मु०, ता० ।
३६
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२८२ सर्वार्थसिद्धौ [ ७।३९ § ७२८ –
§ ७२८. प्रतिग्रहादिक्रमो विधिः । विशेषो गुणकृतः । तस्य प्रत्येकमभिसंबन्धः क्रियते—
विधिविशेषो द्रव्यविशेषो दातृविशेषः पात्रविशेष इति । तत्र विधिविशेषः प्रतिग्रहादिष्वादरानादर-
कृतो भेदः तपःस्वाध्यायपरिवृद्धिहेतुत्वादिर्र्द्रव्यविशेषः । अनसूयाविषादादिर्दातृविशेषः । मोक्षकारण-
गुणसंयोगः पात्रविशेषः । ततश्च पुण्यफलविशेषः क्षित्यादिविशेषाद्¹ बीजफलविशेषवत् ।
५ इति तत्त्वार्थवृत्तौ सर्वार्थसिद्धिसंज्ञिकायां सप्तमोऽध्यायः समाप्तः ॥७॥
§ ७२८. प्रतिग्रह आदि करनेका जो क्रम है वह विधि है । विशेषता गुणसे आती है ।
इस विशेष शब्दको विधि आदि प्रत्येक शब्दके साथ जोड़ लेना चाहिए । यथा—विधिविशेष, द्रव्य-
विशेष, दाताविशेष और पात्रविशेष । प्रतिग्रह आदिकमें आदर और अनादर होनेसे जो भेद होता
है वह विधिविशेष है । जिससे तप और स्वाध्याय आदिकी वृद्धि होती है वह द्रव्यविशेष है । अन-
१० सूया और विषाद आदिका न होना दाताकी विशेषता है । तथा मोक्षके कारणभूत गुणोंसे युक्त
रहना पात्रकी विशेषता है । जैसे पृथिवी आदिमें विशेषता होनेसे उससे उत्पन्न हुए बीजमें विशे-
षता आ जाती है वैसे ही विधि आदिककी विशेषतासे दानसे प्राप्त होनेवाले पुण्य फलमें विशेषता
आ जाती है ।
इस प्रकार सर्वार्थसिद्धि नामक तत्त्वार्थवृत्तिमें सातवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥७॥
१५ १. क्षेत्रादि-मु. ।
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अथाष्टमोऽध्यायः
§ ७२९. व्याख्यात आस्रवपदार्थः । तदनन्तरोद्देशभागबन्धपदार्थ इदानीं व्याख्येयः । तस्मि-
न्न्याख्येये सति पूर्वं बन्धहेतूपन्यासः क्रियते; तत्पूर्वकत्वाद् बन्धस्येति—
मिथ्यादर्शनाविरतिप्रमादकषाययोगा बन्धहेतवः ॥१॥
§ ७३०. मिथ्यादर्शनादय उक्ताः । क्व । मिथ्यादर्शनं तावदुक्तम्, 'तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्-
दर्शनम्' इत्यत्र तत्प्रतिपक्षभूतम्, आस्रवविधाने च क्रियासु व्याख्यातं मिथ्यादर्शनक्रियेति । विर-
तिरुक्ता । तत्प्रतिपक्षभूता अविरतिर्ग्राह्या । आज्ञाव्यापादनक्रिया अनाकाङ्क्षाक्रियेत्यनयोः प्रमाद-
स्यान्तर्भावः । स च प्रमादः कुशलेष्वनादरः । कषायाः क्रोधादयः अनन्तानुबन्ध्यप्रत्याख्यानप्रत्या-
ख्यानसंज्वलनविकल्पाः प्रोक्ताः । क्व । 'इन्द्रियकषाया' इत्यत्रैव । योगाः कायादिविकल्पाः
प्रोक्ताः । क्व । 'कायवाङ्मनःकर्म योगः' इत्यत्र ।
§ ७३१. मिथ्यादर्शनं द्विविधम्; नैसर्गिकं परोपदेशपूर्वकं च । तत्र परोपदेशमन्तरेण
मिथ्यात्वकर्मोदयवशाद् यदाविर्भवति तत्त्वार्थाश्रद्धानलक्षणं तन्नैसर्गिकम् । परोपदेशनिमित्तं चतु-
र्विधम्; क्रियाक्रियावाद्यज्ञानिकवैनयिकविकल्पात् । अथवा पञ्चविधं मिथ्यादर्शनम्—एकान्त-
मिथ्यादर्शनं विपरीतमिथ्यादर्शनं संशयमिथ्यादर्शनं वैनयिकमिथ्यादर्शनम् अज्ञानिकमिथ्यादर्शनं
§ ७२९. आस्रव पदार्थका व्याख्यान किया अब उसके बाद कहे गये बन्ध पदार्थका व्याख्यान
करना चाहिए । उसका व्याख्यान करते हुए पहले बन्धके कारणोंका निर्देश करते हैं, क्योंकि बन्ध
तत्पूर्वक होता है—
मिथ्यादर्शन, अविरति, प्रमाद, कषाय और योग ये बन्धके हेतु हैं ॥१॥
§ ७३०. मिथ्यादर्शन आदिका व्याख्यान पहले किया जा चुका है । शंका—इनका व्याख्यान
पहले कहाँ किया है ? 'तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनम्' इस सूत्रमें सम्यग्दर्शनका व्याख्यान किया है ।
मिथ्यादर्शन उसका उलटा है, अतः इससे उसका भी व्याख्यान हो जाता है । या आस्रवका कथन
करते समय पच्चीस क्रियाओंमें मिथ्यादर्शनका व्याख्यान किया है । विरतिका व्याख्यान पहले
कर आये हैं । उसकी उलटी अविरति लेनी चाहिए । प्रमादका अन्तर्भाव आज्ञाव्यापादनक्रिया
और अनाकांक्षाक्रिया इन दोनोंमें हो जाता है । अच्छे कार्योंके करनेमें आदरभावका न होना यह
प्रमाद है । कषाय क्रोधादिक हैं जो अनन्तानुबन्धी, अप्रत्याख्यान, प्रत्याख्यान और संज्वलनके
भेदसे अनेक प्रकारके हैं । इनका भी पहले कथन कर आये हैं । शंका—कहाँ पर ? समाधान—
'इन्द्रियकषाया' इत्यादि सूत्रका व्याख्यान करते समय । तथा कायादिके भेदसे तीन प्रकारके योग-
का व्याख्यान भी पहले कर आये हैं । शंका—कहाँ पर ? समाधान—'कायवाङ्मनःकर्म योगः'
इस सूत्रमें ।
§ ७३१. मिथ्यादर्शन दो प्रकारका है—नैसर्गिक और परोपदेशपूर्वक । इनमेंसे जो परोप-
देशके बिना मिथ्यादर्शन कर्मके उदयसे जीवादि पदार्थोंका अश्रद्धानरूप भाव होता है वह नैसर्गिक
मिथ्या दर्शन है । तथा परोपदेशके निमित्तसे होनेवाला मिथ्यादर्शन चार प्रकारका है—क्रियावादी,
अक्रियावादी, अज्ञानी और वैनयिक । अथवा मिथ्यादर्शन पाँच प्रकारका है—एकान्त मिथ्यादर्शन,
१. श्रद्धानं इत्यत्र आ०, दि० १, दि० २ । २. -ज्ञानिवै-मु० । ३. अज्ञानमिथ्या-मु० ।
चेति । तत्र इदमेव इत्थमेवेति धर्मिधर्मयोरभिनिवेश एकान्तः । “पुरुष एवेदं सर्वम्१” इति वा
नित्य एव वा अनित्य एवेति । सग्रन्थो निर्ग्रन्थः, केवली कवलाहारी, स्त्री सिध्यतीत्येवमादिः
विपर्ययः । सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि किं मोक्षमार्गः स्याद्वा न वेत्यन्तरपक्षापरिग्रहः संशयः । सर्व-
देवतानां सर्वसमयानां च समदर्शनं वैनयिकम् । हिताहितपरीक्षाविरहोऽज्ञानिकत्वम् । उक्तं च—
५ “असिदिसदं २ किरियाणं अक्किरियाणं३ तह य होइ चुलसीदी ।
४सत्तट्ठमण्णाणीणं वेणइयाणं तु बत्तीसं ॥”
§ ७३२. अविरतिर्द्वादशविधा; षट्कायषट्करणविषयभेदात् । षोडश कषाया नव नोकषायो-
स्तेषामीषद्वेदो न भेद इति पञ्चविंशतिः कषायाः । चत्वारो मनोयोगाश्चत्वारो वाग्योगाः पञ्च
काययोगा इति त्रयोदशविकल्पो योगः । आहारककाययोगाहारकमिश्रकाययोगयोः प्रमत्तसंयते
१० संभवात्पञ्चदशापि५ भवन्ति । प्रमादोऽनेकविधैः; शुद्धयष्टकोत्तमक्षमादिविषयभेदात्६ । त एते पञ्च
बन्धहेतवः समस्ता व्यस्ताश्च भवन्ति । तद्यथा—मिथ्यादृष्टेः पञ्चापि समुदािता बन्धहेतवो भवन्ति ।
स सादनसम्यग्दृष्टिसम्यङ्मिथ्यादृष्ट्यसंयतसम्यग्दृष्टीनामविरत्यादयश्चत्वारः । संयतासंयतस्या-
विरतिविरतिमिश्रा प्रमादकषाययोगाश्च । प्रमत्तसंयतस्य प्रमादकषाययोगाः । अप्रमत्तादीनां
विपरीतमिथ्यादर्शन, संशयमिथ्यादर्शन, वैनयिकमिथ्यादर्शन और अज्ञानिक मिथ्यादर्शन ।
१५ यही है, इसी प्रकारका है इस प्रकार धर्म और धर्मीमें एकान्तरूप अभिप्राय रखना एकान्त
मिथ्यादर्शन है । जैसे यह सब जग परब्रह्म रूप ही है, या सब पदार्थ अनित्य ही हैं या नित्य ही
हैं । सग्रन्थको निर्ग्रन्थ मानना, केवलीको कवलाहारी मानना और स्त्री सिद्ध होती है इत्यादि
मानना विपर्यय मिथ्यादर्शन है। सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र ये तीनों मिलकर
क्या मोक्षमार्ग है या नहीं इस प्रकार किसी एक पक्षको स्वीकार नहीं करना संशय मिथ्यादर्शन
२० है। सब देवता और सब मतोंको एक समान मानना वैनयिक मिथ्यादर्शन है। हिताहितकी
परीक्षासे रहित होना अज्ञानिक मिथ्यादर्शन है। कहा भी है—“क्रियावादियोंके एकसौ अस्सी,
अक्रियावादियोंके चौरासी, अज्ञानियोंके सरसठ और वैनयिकोंके बत्तीस भेद हैं।
§ ७३२. छहकायके जीवोंकी दया न करनेसे और छह इन्द्रियोंके विषयभेदसे अविरति
बारह प्रकारकी होती है। सोलह कषाय और नौ नोकषाय ये पच्चीस कषाय हैं। यद्यपि कषायोंसे
२५ नोकषायोंमें थोड़ा भेद है पर वह यहाँ विवक्षित नहीं है, इसलिए सबको कषाय कहा है। चार
मनोयोग, चार वचनयोग और पाँच काययोग ये योगके तेरह भेद हैं। प्रमत्तसंयत गुणस्थानमें
आहारक ऋद्धिधारी मुनिके आहारककाययोग और आहारक मिश्रकाययोग भी सम्भव हैं इस
प्रकार योग पन्द्रह भी होते हैं। शुद्धयष्टक और उत्तम क्षमा आदि विषयक भेदसे प्रमाद अनेक
प्रकारका है। इस प्रकार ये मिथ्यादर्शन आदि पाँचों मिलकर या पृथक्-पृथक् बन्धके हेतु हैं।
३० स्पष्ट इस प्रकार है—मिथ्यादृष्टि जीवके पाँचों ही मिलकर बन्धके हेतु हैं। सासादनसम्यग्दृष्टि,
सम्यग्मिथ्यादृष्टि और अविरतसम्यग्दृष्टिके अविरति आदि चार बन्धके हेतु हैं। संयतासंयतके
विरति और अविरति ये दोनों मिश्ररूप तथा प्रमाद, कषाय और योग ये बन्धके हेतु हैं। प्रमत्त-
संयतके प्रमाद, कषाय और योग ये तीन बन्धके हेतु हैं। अप्रमत्तसंयत आदि चारके योग और
१. इति वा नित्यमेवेति मु०, दि० १, दि० २, आ० । २. गो० कर्म०, गा० ८७६ । ३. -याणं च
३५ होइ मु० । ४. सत्तच्छण्णा-मु० । ५. -पायाः ईषद्भे-दि० १, दि० २, आ० । ६. -दश भवन्ति आ०,
दि० १, दि० २ । ७. -नेकविधः पञ्चसमितित्रिगुप्तिशुद्धय-मु०, आ०, दि० १, दि० २ । ८. -भेदात् ।
शुद्धयष्टकस्यार्थः भावकायविनयेर्यापथभिक्षाप्रतिष्ठापनशयनासनवाक्यशुद्धयोऽष्टौ दशलक्षणो धर्मश्च । त एते
मु०, आ०, दि० १, दि० २ ।
- ८।२ § ७३४ ] अष्टमोऽध्यायः २८५
चतुर्णां योगकषायौ। उपशान्तकषायक्षीणकषायसयोगकेवलिनामेक एव योगः। अयोगकेवलिनो
न बन्धहेतुः।
§ ७३३. उक्ता बन्धहेतवः। इदानीं बन्धो वक्तव्य इत्यत आह—
सकषायत्वाज्जीवः कर्मणो योग्यान्पुद्गलानादत्ते स बन्धः ॥ २ ॥
§ ७३४. सह कषायेण वर्तत इति सकषायः। सकषायस्य भावः सकषायत्त्वम्। तस्मात्स- ५
कषायत्वादिति। पुनर्हेतुनिर्देशः¹ जठराग्न्याशयानुरूपाहारग्रहणवत्तीव्रमन्दमध्यमकषायाशयानुरूप-
स्थित्यनुभवविशेषप्रतिपत्त्यर्थम्²। अमूर्तिरहस्त आत्मा कथं कर्मादत्त इति चोदितः सन् ‘जीवः’
इत्याह। जीवनाज्जीवः प्राणधारणादायूःसंबन्धान्नायुर्विरहादिति। ‘कर्मयोग्यान्’ इति लघुनिर्देशा-
त्सिद्धे ‘कर्मणो योग्यान्’ इति पृथग्विभक्त्युच्चारणं वाक्यान्तरज्ञापनार्थम्। किं पुनस्तद्वा-
क्यान्तरम्। कर्मणो जीवः सकषायो भवतीत्येकं वाक्यम्। एतदुक्तं भवति—‘कर्मणः’ इति १०
हेतुनिर्देशः कर्मणो हेतोर्जीवः सकषायो भवति नाकर्मकस्य कषायलेपोऽस्ति। ततो जीवकर्मणोरना-
दिसंबन्ध इत्युक्तं भवति। तेनामूर्तो जीवो मूर्तेन कर्मणा कथं बध्यते इति चोद्यमपाकृतं भवति।
इतरथा हि बन्धस्यादिमत्त्वे आत्यन्तिकीं शुद्धिं दधतः सिद्धस्येव बन्धाभावः प्रसज्येत। द्वितीयं
वाक्यं ‘कर्मणो योग्यान् पुद्गलानादत्ते’ इति। अर्थवशाद्विभक्तिपरिणाम इति³ पूर्वहेतुसंबन्धं
कषाय ये दो बन्धके हेतु हैं। उपशान्तकषाय, क्षीणकषाय और सयोगकेवली इनके एक योग ही १५
बन्धका हेतु है। अयोगकेवलीके बन्धका हेतु नहीं है।
§ ७३३. बन्धके हेतु कहे। अब बन्धका कथन करना चाहिए इसलिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
कषाय सहित होनेसे जीव कर्मके योग्य पुद्गलोंको ग्रहण करता है वह बन्ध है ॥२॥
§ ७३४. कषायके साथ रहता है इसलिए सकषाय कहलाता है और सकषायका भाव २०
सकषायत्व है। इससे अर्थात् सकषाय होनेसे। यह हेतुनिर्देश है। जिस प्रकार जठराग्निके अनु-
रूप आहारका ग्रहण होता है उसी प्रकार तीव्र, मन्द और मध्यम कषायाशयके अनुरूप ही स्थिति
और अनुभाग होता है। इस प्रकार इस विशेषताका ज्ञान करानेके लिए सूत्रमें ‘सकषायत्वात्’ इस
पदद्वारा पुनः हेतुका निर्देश किया है। अमूर्ति और बिना हाथवाला आत्मा कर्मोंको कैसे ग्रहण
करता है इस प्रश्नका उत्तर देनेके अभिप्रायसे सूत्रमें ‘जीव’ पद कहा है। जीव शब्दका व्युत्पत्ति- २५
लभ्य अर्थ है—जीवनाज्जीवः—जो जीता है अर्थात् जो प्राणोंको धारण करता है, जिसके आयुका
सद्भाव है, आयुका अभाव नहीं है वह जीव है। सूत्रमें ‘कर्मयोग्यान्’ इस प्रकार लघु निर्देश
करनेसे काम चल जाता फिर भी ‘कर्मणो योग्यान्’ इस प्रकार पृथक् विभक्तिका उच्चारण वाक्या-
न्तरका ज्ञान करानेके लिए किया है। वह वाक्यान्तर क्या है? ‘कर्मणो जीवः सकषायो भवति’
यह एक वाक्य है। इसका यह अभिप्राय है कि ‘कर्मणः’ यह हेतुपरक निर्देश है। जिसका अर्थ है ३०
कि कर्मके कारण जीव कषायसहित होता है। कर्मरहित जीवके कषायका लेप नहीं होता। इससे
जीव और कर्मका अनादि सम्बन्ध है यह कथन निष्पन्न होता है। और इससे अमूर्त जीव मूर्त
कर्मके साथ कैसे बँधता है इस प्रश्नका निराकरण हो जाता है। अन्यथा बन्धको सादि मानने
पर आत्यन्तिक शुद्धिको धारण करनेवाले सिद्ध जीवके समान संसारी जीवके बन्धका अभाव
प्राप्त होता है। ‘कर्मणो योग्यान् पुद्गलानादत्ते’ यह दूसरा वाक्य है, क्योंकि, अर्थके अनुसार ३५
विभक्ति बदल जाती है इसलिए पहले जो हेत्वर्थमें विभक्ति थी वह अब ‘कर्मणो योग्यान्’ इस
प्रकार षष्ठी अर्थको प्राप्त होती है। सूत्रमें ‘पुद्गल’ पद कर्मके साथ तादात्म्य दिखलानेके लिए
१. -निर्देशः किमर्थम् ? जठ-मु०, दि० १ । २. -त्यर्थः । अहस्त आत्मा ता०, ना० । ३. पूर्वं हेतु-मु० ।
२८६ सर्वार्थसिद्धौ [ ८।३ § ७३५ -
त्यक्त्वा षष्ठीसम्बन्धमुपैति 'कर्मणो योग्यान्' इति । 'पुद्गल'वचनं कर्मणस्तादात्म्यख्यापनार्थम्¹ ।
तेनात्मगुणोऽदृष्टो निराकृतो भवति; तस्य संसारहेतुत्वानुपपत्तेः । 'आदत्ते' इति हेतुहेतुमद्भाव-
ख्यापनार्थम् । अतो मिथ्यादर्शनाद्यावेशादार्द्रीकृतस्यात्मनः सर्वतो योगविशेषात्तेषां सूक्ष्मैकक्षेत्राव-
गाहिनामनन्तानन्तप्रदेशानां पुद्गलानां कर्मभावयोग्यानामविभागेनोपश्लेषो बन्ध इत्याख्यायते ।
५ यथा भाजनविशेषे² प्रक्षिप्तानां विविधरसबीजपुष्पफलानां मदिराभावेन परिणामस्तथा पुद्गला-
नामप्यात्मनि स्थितानां योगकषायवशात्कर्मभावेन परिणामो वेदितव्यः । 'सः'वचनमन्यनि-
वृत्त्यर्थम् । स एष बन्धो नान्योऽस्तीति । तेन गुणगुणिबन्धो निर्वाततो भवति । कर्मादिसाधनो
'बन्ध'-शब्दो व्याख्येयः ।
§ ७३५. आह किमयं बन्ध एकरूप एव, आहोस्वित्प्रकारा अप्यस्य सन्तीत्यत इदमुच्यते—
१० प्रकृतिस्थित्यनुभवप्रदेशास्तद्विधयः ॥३॥
§ ७३६. प्रकृतिः स्वभावः । निम्बस्य का प्रकृतिः । तिक्तता । गुडस्य का प्रकृतिः । मधु-
रता । तथा ज्ञानावरणस्य का प्रकृतिः । अर्थानवगमः । दर्शनावरणस्य का प्रकृतिः । अर्थानालो-
कनम् । वेद्यस्य सदसल्लक्षणस्य सुखदुःखसंवेदनम् । दर्शनमोहस्य तत्त्वार्थाश्रद्धानम् । चारित्रमोह-
दिया है। इससे अदृष्ट आत्माका गुण है इस बातका निराकरण हो जाता है, क्योंकि उसे आत्मा-
१५ का गुण मानने पर वह संसारका कारण नहीं बन सकता। सूत्रमें 'आदत्ते' पद हेतुहेतुमद्भावका
ख्यापन करनेके लिए दिया है। इससे मिथ्यादर्शन आदिके अभिनिवेशवश गीले किये गये आत्मा-
के सब अवस्थाओंमें योग विशेषसे उन सूक्ष्म, एक क्षेत्रावगाही अनन्तानन्त कर्मभावको प्राप्त होने
योग्य पुद्गलोंका उपश्लेष होना बन्ध है यह कहा गया है। जिस प्रकार पात्रविशेषमें प्रक्षिप्त हुए
विविध रसवाले बीज, फल और फलोंका मदिरा रूपसे परिणमन होता है उसी प्रकार आत्मामें
२० स्थित हुए पुद्गलोंका भी योग और कषायके निमित्तसे कर्मरूपसे परिणमन जानना चाहिए ।
सूत्रमें 'सः' पद अन्यका निराकरण करनेके लिए दिया है कि यह ही बन्ध है अन्य नहीं । इससे
गुणगुणीबन्धका निराकरण हो जाता है। यहां 'बन्ध' शब्दका कर्मादि साधनमें व्याख्यान कर
लेना चाहिए।
विशेषार्थ—इस सूत्रमें मुख्यरूपसे बन्धकी व्याख्या की गयी है। जीव द्रव्यका स्वतन्त्र
२५ अस्तित्व होते हुए भी अनादि कालसे वह कर्मोंके अधीन हो रहा है जिससे उसे नर नारक आदि
नाना गतियोंमें परिभ्रमण करना पड़ता है। प्रश्न यह है कि जीव कर्मोंके अधीन क्यों होता है
और उन कर्मोंका स्वरूप क्या है ? प्रकृत सूत्रमें इन दोनों प्रश्नोंका समर्पक उत्तर दिया गया है।
सूत्रमें बतलाया गया है कि कर्मोंके कारण जीव कषायाविष्ट होता है और इससे उसके कर्मके
योग्य पुद्गलोंका उपश्लेष होता है। यही बन्ध है। इससे दो बातें फलित होती हैं। प्रथम तो
३० यह कि कर्मके निमित्तसे जीवमें अशुद्धता आती है और इस अशुद्धताके कारण कर्मका बन्ध होता
है और दूसरी यह कि जीव और कर्मका यह बन्ध परम्परासे अनादि है। इस प्रकार बन्ध क्या
है और वह किस कारणसे होता है यह बात इस सूत्रसे जानी जाती है।
§ ७३५. यह बन्ध क्या एक है या इसके भेद हैं यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
उसके प्रकृति, स्थिति, अनुभव और प्रदेश ये चार भेद हैं ॥३॥
३५ § ७३६. प्रकृतिका अर्थ स्वभाव है। जिस प्रकार नीमकी क्या प्रकृति है ? कड़ुआपन ।
गुड़ की क्या प्रकृति है ? मीठापन । उसी प्रकार ज्ञानावरण कर्मकी क्या प्रकृति है ? अर्थका
ज्ञान न होना । दर्शनावरण कर्मकी क्या प्रकृति है ? अर्थका आलोकन नहीं होना । सुख-दुखका
१. -नार्थम् । अत आत्म-आ० । २. -शेषे क्षिप्ता-मु० ।
– ८।३ § ७३६ ] अष्टमोऽध्यायः २८७
स्यासंयमः । आयुषो भवधारणम् । नाम्नो नारकादिनामकरणम् । गोत्रस्योच्चैर्नीचैःस्थानसंशब्द-
नम् । अन्तरायस्य दानादिविघ्नकरणम् । तदेवंलक्षणं कार्यं प्रक्रियते प्रभवत्यस्या इति प्रकृतिः ।
तत्स्वभावादप्रच्युतिः स्थितिः । यथा-अजागोमहिष्यादिक्षीराणां माधुर्यस्वभावादप्रच्युतिः
स्थितिः । तथा ज्ञानावरणादीनामर्थावगमादिस्वभावादप्रच्युतिः स्थितिः । तद्रसविशेषोऽनुभवः ।
यथा-अजागोमहिष्यादिक्षीराणां तीव्रमन्दादिभावेन रसविशेषः । तथा कर्मपुद्गलानां स्वगत-
सामर्थ्यविशेषोऽनुभवः । इयत्तावधारणं प्रदेशः । कर्मभावपरिणतपुद्गलस्कन्धानां परमाणुपरिच्छेदे-
नावधारणं प्रदेशः । ‘विधि’-शब्दः प्रकारवचनः । त एते प्रकृत्यादयश्चत्वारस्तस्य बन्धस्य प्रकाराः।
तत्र योगनिमित्तौ प्रकृतिप्रदेशौ । कषायनिमित्तौ स्थित्यनुभवौ । तत्प्रकर्षाप्रकर्षभेदात्तद्बन्धविचित्र-
भावः । तथा चोक्तम्—
“जोगा' पयडि-पएसा ठिदिअणुभागा कसायदो कुणदि ।
अपरिणदुच्छिण्णेसु य बंधट्ठिदिकारणं णत्थि ॥”
संवेदन कराना साता और असाता वेदनीयकी प्रकृति है। तत्त्वार्थका श्रद्धान न होने देना
दर्शनमोहकी प्रकृति है। असंयमभाव चारित्रमोहकी प्रकृति है। भवधारण आयु कर्मकी प्रकृति
है। नारक आदि नामकरण नामकर्मकी प्रकृति है। उच्च और नीच स्थानका संशब्दन गोत्र
कर्मकी प्रकृति है तथा दानादिमें विघ्न करना अन्तराय कर्मकी प्रकृति है। इस प्रकारका
कार्य किया जाता है अर्थात् जिससे होता है वह प्रकृति है। जिसका जो स्वभाव है उससे च्युत
न होना स्थिति है। जिस प्रकार बकरी, गाय और भैंस आदिके दूधका माधुर्यस्वभावसे
च्युत न होना स्थिति है उसी प्रकार ज्ञानावरण आदि कर्मोंका अर्थका ज्ञान न होने देना आदि
स्वभावसे च्युत न होना स्थिति है। इन कर्मोंके रसविशेषका नाम अनुभव है। जिस प्रकार बकरी,
गाय और भैंस आदिके दूधका अलग-अलग तीव्र मन्द आदि रसविशेष होता है उसी प्रकार कर्म
पुद्गलोंका अलग अलग स्वगत सामर्थ्यविशेष अनुभव है। तथा इयत्ताका अवधारण करना प्रदेश
है। अर्थात् कर्मरूपसे परिणत पुद्गलस्कन्धोंका परमाणुओंकी जानकारी करके निश्चय करना
प्रदेशबन्ध है। 'विधि' शब्द प्रकारवाची है। ये प्रकृति आदिक चार उस बन्धके प्रकार हैं। इनमें
से योगके निमित्तसे प्रकृतिबन्ध और प्रदेशबन्ध होता है तथा कषायके निमित्तसे स्थितिबन्ध और
अनुभवबन्ध होता है। योग और कषायमें जैसा प्रकर्षाप्रकर्षभेद होता है उसके अनुसार बन्ध भी
नाना प्रकारका होता है। कहा भी है- 'यह जीव योगसे प्रकृति और प्रदेश बन्धको तथा कषायसे
स्थिति और अनुभाग बन्धको करता है। किन्तु जो जीव योग और कषायरूपसे परिणत नहीं है
और जिनके योग और कषायका उच्छेद हो गया है उनके कर्मबन्धकी स्थितिका कारण नहीं पाया
जाता ।।'
विशेषार्थ- इस सूत्रमें बन्धके चार भेदोंका निर्देश किया है। साम्परायिक आस्रवसे जो भी
कर्म बँधता है उसे हम इन चार रूपोंमें देखते हैं। बँधे हुए कर्मका स्वभाव क्या है, स्थिति कितनी
है, अपने स्वभावानुसार वह न्यूनाधिक कितना काम करेगा और आत्मासे कितने प्रमाणमें व किस
रूपमें वह बन्धको प्राप्त होता है। यही वे चार प्रकार हैं। कर्मके इन चार प्रकारोंके मुख्य कारण
दो हैं-योग और कषाय । योगके निमित्तसे प्रकृतिबन्ध और प्रदेशबन्ध होता है तथा कषायके
निमित्तसे स्थितिबन्ध और अनुभागबन्ध होता है। इसका अर्थ है कि जहाँ योग और कषाय नहीं
है वहाँ कर्मबन्ध भी नहीं है। कषाय दसवें गुणस्थान तक पाया जाता है। ग्यारहवें गुणस्थानमें
जीव कषायरूपसे परिणत नहीं होता और बारहवें गुणस्थानमें उसका उच्छेद अर्थात् अभाव है,
१. मूला० २४४ । पंचसं० ४, ५०७ । गो० क०, गा० २५७ ।
§ ७३७. तत्राद्यस्य प्रकृतिबन्धस्य भेदप्रदर्शनार्थमाह—
आद्यो ज्ञानदर्शनावरणवेदनीयमोहनीयायुर्नामगोत्रान्तरायाः ॥४॥
§ ७३८. आद्यः प्रकृतिबन्धो ज्ञानावरणाद्यष्टविकल्पो वेदितव्यः । आवृणोत्याव्रियतेऽनेनेति
वा आवरणम् । तत्प्रत्येकमभिसंबध्यते—ज्ञानावरणं दर्शनावरणमिति । वेदयति वेद्यत इति वा
वेदनीयम् । मोहयति १मोह्यतेऽनेनेति वा मोहनीयम् । इत्यनेन नारकादिभवमित्यायुः । नमयत्या-
त्मानं नम्यतेऽनेनेति वा नाम । उच्चैर्नीचैश्च गीयते शब्द्यत इति वा गोत्रम् । दातृदेयादीनामन्तरं
मध्यमेतीत्यन्तरायः । एकेनात्मपरिणामेनादीयमानाः पुद्गला ज्ञानावरणाद्यनेकभेदं प्रतिपद्यन्ते
सकृदुपभुक्तान्नपरिणामरसरुधिरादिवत् ।
§ ७३९. आह, उक्तो मूलप्रकृतिबन्धोऽष्टविधः । इदानीमुत्तरप्रकृतिबन्धो वक्तव्य इत्यत
आह—
इसलिए इस जीवके स्थितिबन्ध और अनुभागबन्ध दसवें गुणस्थान तक ही होता है । आगे ग्यारहवें,
बारहवें और तेरहवें गुणस्थानमें यद्यपि सातावेदनीयका बन्ध होता है पर वहाँ कषाय न होनेसे
उसका प्रकृति और प्रदेशबन्ध ही होता है। यहाँ प्रश्न होता है कि यदि इन गुणस्थानोंमें साता-
वेदनीयका बिना स्थितिके बन्ध होता है तो उसका आत्माके साथ अवस्थान कैसे होगा और यदि
बिना अनुभागसे बन्ध होता है तो उसका विपाक सातारूप कैसे होगा ? समाधान यह है कि इन
गुणस्थानोंमें ईर्यापथ आस्रव होनेसे कर्म आते हैं और चले जाते हैं। उनका दो, तीन आदि समय
तक अवस्थान नहीं होता । इसलिए तो यहाँ स्थितिबन्धका निषेध किया है और अनुभाग भी
कषायके निमित्तसे प्राप्त होनेवाले अनुभागसे यहाँ प्राप्त होनेवाला अनुभाग अनन्तगुणा हीन होता
है, इसलिए यहाँ अनुभागबन्धका भी निषेध किया है। योग तेरहवें और कषाय दसवें गुणस्थान
तक होता है, इसलिए स्थिति और अनुभागबन्ध दसवें तक और प्रकृतिबन्ध और प्रदेशबन्ध
तेरहवें तक होते हैं। अयोगिकेवली गुणस्थानमें योगका अभाव है इसलिए वहाँ किसी प्रकारका भी
बन्ध नहीं होता । इस प्रकार यहाँ बन्धके भेद और उनके कारणोंका विचार किया ।
§ ७३७. अब प्रकृतिबन्धके भेद दिखलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
पहला अर्थात् प्रकृतिबन्ध ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय, मोहनीय, आयु, नाम, गोत्र
और अन्तरायरूप है ॥४॥
§ ७३८. आदिका प्रकृतिबन्ध ज्ञानावरणादि आठ प्रकारका जानना चाहिए । जो आवृत्त
करता है या जिसके द्वारा आवृत्त किया जाता है वह आवरण कहलाता है । वह प्रत्येकके साथ
सम्बन्धको प्राप्त होता है यथा-ज्ञानावरण और दर्शनावरण । जो वेदन कराता है या जिसके द्वारा
वेदा जाता है वह वेदनीय कर्म है। जो मोहित करता है या जिसके द्वारा मोहा जाता है वह मोहनीय
कर्म है। जिसके द्वारा नारक आदि भवको जाता है वह आयुकर्म है । जो आत्माको नमाता है या
जिसके द्वारा आत्मा नमता है वह नामकर्म है। जिसके द्वारा जीव उच्च नीच गीयते अर्थात् कहा
जाता है वह गोत्र कर्म है। जो दाता और देय आदिका अन्तर कराता है अर्थात् बीचमें आता है
वह गोत्र कर्म है। एक बार खाये गये अन्नका जिस प्रकार रस, रुधिर आदि रूपसे अनेक प्रकारका
परिणमन होता है उसी प्रकार एक आत्म-परिणामके द्वारा ग्रहण किये गये पुद्गल ज्ञानावरण
आदि अनेक भेदोंको प्राप्त होते हैं ।
§ ७३९. मूल प्रकृतिबन्ध आठ प्रकारका कहा। अब उत्तर प्रकृतिबन्धका कथन करते हैं—
१. मुह्यते इति मु० । २. - दुपयुक्ता-आ०, दि० १, दि० २, ता०, ना० ।
- ८।६ § ७४२ ] अष्टमोऽध्यायः २८९
पञ्चनवद्व्यष्टाविंशतिचतुर्द्विचत्वारिंशद्द्विपञ्चभेदा यथाक्रमम् ॥५॥
§ ७४०. द्वितीयग्रहणमिह कर्तव्यं द्वितीय उत्तरप्रकृतिबन्ध एवंविकल्प इति । न कर्तव्यम्;
पारिशेष्यात्सिद्धेः । आद्यो १मूलप्रकृतिबन्धोऽष्टविकल्प उक्तः । ततः पारिशेष्यादयमुत्तरप्रकृति-
विकल्पविधिर्भवति । 'भेद'शब्दः पञ्चादिभिर्यथाक्रममभिसंबध्यते—पञ्चभेदं ज्ञानावरणीयं
नवभेदं दर्शनावरणीयं द्विभेदं वेदनीयं अष्टाविंशतिभेदं मोहनीयं चतुर्भेदमायुः द्विचत्वारिंशद्भेदं ५
नाम द्विभेदं गोत्रं पञ्चभेदोऽन्तराय इति ।
§ ७४१. यदि ज्ञानावरणं पञ्चभेदं तत्प्रतिपत्तिरुच्यतामित्यत आह—
मतिश्रुतावधिमनःपर्ययकेवलानाम् ॥६॥
§ ७४२. मत्यादीनि ज्ञानानि व्याख्यातानि । तेषामावृतेरावरणभेदो भवतीति पञ्चोत्तर-
प्रकृतयो वेदितव्याः । अत्र चोद्यते—अभव्यस्य मनःपर्ययज्ञानशक्तिः केवलज्ञानशक्तिश्च स्याद्वा न १०
वा । यदि स्यात् तस्याभव्यत्वाभावः । अथ नास्ति तत्रावरणद्वयकल्पना व्यर्थेति । उच्यते—
आदेशवचनान्न दोषः । द्रव्यार्थादेशान्मनःपर्ययकेवलज्ञानशक्तिसंभवः । पर्यायार्थादेशात्तच्छक्त्य-
भावः । यद्येवं भव्याभव्यविकल्पो नोपपद्यते; उभयत्र तच्छक्तिसद्भावात् । न शक्तिभावाभावापेक्षया
भव्याभव्यविकल्प इत्युच्यते । कुतस्तर्हि । व्यक्तिसद्भावासद्भावापेक्षया । सम्यग्दर्शनादिभि²-
आठ मूल प्रकृतियोंके अनुक्रमसे पांच, नौ, दो, अट्ठाईस, चार, ब्यालीस, दो और पाँच १५
भेद हैं ॥५॥
§ ७४०. शंका—यहाँ द्वितीय पदका ग्रहण करना चाहिए, जिससे मालूम पड़े कि द्वितीय
उत्तर प्रकृतिबन्ध इतने प्रकारका है ? समाधान—नहीं करना चाहिए, क्योंकि पारिशेष्य न्यायसे
उसकी सिद्धि हो जाती है। आदिका मूल प्रकृतिबन्ध आठ प्रकारका कह आये हैं। इसलिए
पारिशेष्य न्यायसे ये उत्तर प्रकृतिबन्धके भेद समझने चाहिए । भेद शब्द पाँच आदि शब्दोंके २०
साथ यथाक्रमसे सम्बन्धको प्राप्त होता है । यथा—पाँच भेदवाला ज्ञानावरण, नौ भेदवाला
दर्शनावरण, दो भेदवाला वेदनीय, अट्ठाईस भेदवाला मोहनीय, चार भेदवाला आयु, ब्यालीस
भेदवाला नाम, दो भेदवाला गोत्र और पाँच भेदवाला अन्तराय ।
§ ७४१. यदि ज्ञानावरण कर्म पाँच प्रकारका है, तो उसका ज्ञान कराना है अतः आगेका
सूत्र कहते हैं— २५
मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्ययज्ञान और केवलज्ञान इनको आवरण करनेवाले
कर्म पाँच ज्ञानावरण हैं ॥६॥
§ ७४२. मति आदि ज्ञानोंका व्याख्यान कर आये हैं। उनका आवरण करनेसे आवरणोंमें
भेद होता है इसलिए ज्ञानावरण कर्मकी पाँच उत्तर प्रकृतियाँ जानना चाहिए । शंका—अभव्य
जीवके मनःपर्ययज्ञानशक्ति और केवलज्ञानशक्ति होती है या नहीं होती। यदि होती है तो उसके ३०
अभव्यपना नहीं बनता । यदि नहीं होती हैं तो उसके उक्त दो आवरण-कर्मोंकी कल्पना करना
व्यर्थ है ? समाधान—आदेश वचन होनेसे कोई दोष नहीं है । अभव्यके द्रव्यार्थिक नयकी अपेक्षा
मनःपर्ययज्ञान और केवलज्ञान शक्ति पायी जाती है पर पर्यायार्थिक नयकी अपेक्षा उसके उसका
अभाव है। शंका—यदि ऐसा है तो भव्याभव्य विकल्प नहीं बन सकता है क्योंकि दोनोंके मनः-
पर्ययज्ञान और केवलज्ञान शक्ति पायी जाती है ? समाधान—शक्तिके सद्भाव और असद्भावकी ३५
अपेक्षा भव्याभव्य विकल्प नहीं कहा गया है। शंका—तो किस आधारसे यह विकल्प कहा गया
है ? समाधान—व्यक्तिकी सद्भाव और असद्भावकी अपेक्षा यह विकल्प कहा गया है । जिसके
१. मूलः प्रकृ-मु० । २. -नादिव्यक्ति-आ०, दि० १, दि० २, ता० ।
३७
२९० सर्वार्थसिद्धौ [ ८।७ § ७४३ -
व्यक्तिर्यस्य भविष्यति स भव्यः । यस्य तु न भविष्यति सोऽभव्य इति । कनकेतरपाषाणवत् ।
§ ७४३. आह, उक्तो ज्ञानावरणोत्तरप्रकृतिविकल्पः । इदानीं दर्शनावरणस्य वक्तव्य इत्यत
आह—
चक्षुरचक्षुरवधिकेवलानां निद्रानिद्रानिद्राप्रचलाप्रचलाप्रचलास्त्यानगृद्ध्यश्च ॥७॥
§ ७४४. चक्षुरचक्षुरवधिकेवलानामिति दर्शनावरणापेक्षया भेदनिर्देशः—चक्षुर्दर्शनावरणम-
चक्षुर्दर्शनावरणमवधिदर्शनावरणं केवलदर्शनावरणमिति । मदखेदक्लमविनोदनार्थः स्वापो निद्रा ।
तस्या उपर्यु परि वृत्तिर्निद्रानिद्रा । या क्रियात्मानं प्रचलयति सा प्रचला शोकश्रममदादिप्रभवा
आसीनस्यापि नेत्रगात्रविक्रियासूचिका । सैव पुनःपुनरावर्तमाना¹ प्रचलाप्रचला । स्वप्ने² यया
वीर्यविशेषाविर्भावः सा स्त्यानगृद्धिः । स्त्यायतेरनेकार्थत्वात्स्वप्नार्थ इह गृह्यते, गृद्धेरपि दीप्तिः ।
कनक पाषाण और इतर पाषाणकी तरह सम्यग्दर्शनादि रूपसे व्यक्ति होगी वह भव्य है और
जिसके नहीं होगी वह अभव्य है।
विशेषार्थ—यहाँ ज्ञानावरण कर्मके पाँच उत्तर-भेदोंका निर्देश किया गया है। मूलमें ज्ञान
एक है। उसके ये पांच भेद आवरणकी विशेषतासे प्राप्त होते हैं। धवला टीकामें इस विषयका
स्पष्टीकरण करनेके लिए सूर्य और मेघपटलका उदाहरण दिया गया है। वहाँ बतलाया है कि जिस
प्रकार अति सघन मेघपटल सूर्यको आच्छादित करते हैं तो भी अतिमन्द सूर्य किरणें मेघपटलमेंसे
प्रस्फुटित होती रहती हैं उसी प्रकार केवलज्ञानावरण कर्मके आवृत होनेपर भी कुछ न कुछ ज्ञानांश
प्रस्फुटित होता रहता है और उसीको आवृत करनेसे चार उत्तर आवरण कर्म प्राप्त होते हैं। इस
प्रकार कुल ज्ञानावरण कर्म पाँच हैं जो भव्य और अभव्य दोनोंके पाये जाते हैं। शास्त्रमें भव्य और
अभव्य संज्ञा बन्ध विशेषकी अपेक्षा से दी गयी है। जीवके ये भेद इसी अपेक्षासे जानने चाहिए।
इन भेदोंका अन्य कोई निमित्त नहीं है। बन्ध दो प्रकारका होता है–एक बन्ध वह जो सन्तानकी
अपेक्षा अनादि अनन्त होता है और दूसरा वह जो अनादि सान्त होता हैं। जिन जीवोंके कर्मका
अनादि-अनन्त बन्ध होता है वे अभव्य कहलाते हैं और जिनके अनादिसान्त बन्ध होता है वे भव्य
माने गये हैं। इसलिए शक्ति सब जीवोंके एक-सी होकर भो उसके व्यक्त होनेमें अन्तर हो जाता है।
शास्त्रमें इस भेदको समझानेके लिए कनकपाषाण और अन्धापाषाण उदाहरण रूपसे उपस्थित
किये गये हैं सो इस दृष्टान्तसे भी उक्त कथनकी ही पुष्टि होती है। इस प्रकार ज्ञानावरण कर्मके
पाँच भेद क्यों हैं इस बातका खुलासा किया।
§ ७४३. ज्ञानावरण कर्मके उत्तर प्रकृतिविकल्प कहे। अब दर्शनावरण कर्मके कहने चाहिए
इसलिए आगेका सूत्र कहते हैं—
चक्षुदर्शन, अचक्षुदर्शन, अवधिदर्शन और केवलदर्शन इन चारोंके चार आवरण तथा निद्रा,
निद्रानिद्रा, प्रचला, प्रचला-प्रचला और स्त्यानगृद्धि ये पाँच निद्रादिक ऐसे नौ दर्शनावरण हैं ॥७॥
§ ७४४. चक्षु, अचक्षु, अवधि और केवलका दर्शनावरणकी अपेक्षा भेदनिर्देश किया है;
यथा-चक्षुर्दर्शनावरण, अचक्षुर्दर्शनावरण, अवधिदर्शनावरण और केवलदर्शनावरण। मद, खेद
और परिश्रमजन्य थकावटको दूर करनेके लिए नींद लेना निद्रा है। इसकी उत्तरोत्तर प्रवृत्ति होना
निद्रानिद्रा है। जो शोक, श्रम और मद आदिके कारण उत्पन्न हुई है और जो बैठे हुए प्राणीके भी
नेत्र, गात्रकी विक्रियाकी सूचक है ऐसी जो क्रिया आत्माको चलायमान करती है वह प्रचला है।
तथा उसकी पुनः-पुनः आवृत्ति होना प्रचलाप्रचला है। जिसके निमित्तसे स्वप्नमें वीर्यविशेषका
आविर्भाव होता है वह स्त्यानगृद्धि है। 'स्त्यायति' धातुके अनेक अर्थ हैं। उनमेंसे यहां स्वप्न अर्थ
१. -वर्त्यमाना आ०, दि०, १, दि० २ । २. स्वप्नेऽपि यया मु०, आ०, दि० १, दि० २ ।
- ८।९ § ७४७ ] अष्टमोऽध्यायः २९१
स्त्याने स्वप्ने गृद्ध्यति दीव्यते यदुदयादात्मा रौद्रं बहुकर्म करोति सा स्त्यानगृद्धिः । इह निद्रादि-
भिर्दर्शनावरणं सामानाधिकरण्येनाभिसंबध्यते—निद्रादर्शनावरणं निद्रानिद्रादर्शनावरणमित्यादि ।
§ ७४५. तृतीयस्याः प्रकृतेरुत्तरप्रकृतिप्रतिपादनार्थमाह—
सदसद्वेद्ये ॥८॥
§ ७४६. यदुदयाद्देवादिगतिषु शारीरमानससुखप्राप्तिस्तत्सद्वेद्यम् । प्रशस्तं वेद्यं सद्वेद्यमिति । ५
यत्फलं दुःखमनेकविधं तदसद्वेद्यम् । अप्रशस्तं वेद्यमसद्वेद्यमिति ।
§ ७४७. चतुर्थ्याः प्रकृतेरुत्तरप्रकृतिविकल्पनिदर्शनार्थमाह—
दर्शनचारित्रमोहनीयाकषायकषायवेदनीयाख्यास्त्रिद्विनवषोडशभेदाः सम्यक्त्व-
मिथ्यात्वतदुभयान्यकषायकषायौ हास्यरत्यरतिशोकभयजुगुप्सास्त्रीपुन्न-
पुंसकवेदा अनन्तानुबन्ध्यप्रत्याख्यानप्रत्याख्यानसंज्वलन- १०
विकल्पाश्चैकशः क्रोधमानमायालोभाः ॥९॥
लिया गया है और 'गृद्धि' दीप्यते जो स्वप्नमें प्रदीप्त होती है 'स्त्यानगृद्धि' का व्युत्पत्तिलभ्य अर्थ
है—स्त्याने स्वप्ने गृद्ध्यति धातुका दीप्ति अर्थ लिया गया है। अर्थात् जिसके उदयसे रौद्र बहु कर्म
करता है वह स्त्यानगृद्धि है। यहाँ निद्रादि पदोंके साथ दर्शनावरण पदका सामानाधिकरण रूपसे
सम्बन्ध होता है यथा—निद्रादर्शनावरण, निद्रानिद्रादर्शनावरण आदि । १५
विशेषार्थ—यहाँ दर्शनावरण कर्मके नौ भेद गिनाये हैं। दर्शनके कुल भेद चार हैं उनकी
अपेक्षा प्रारम्भके चार भेद गिनाये हैं। निद्रादिक सामान्य आवरण कर्म हैं पर संसारी जीवके पहले
दर्शनोपयोग होता है और ये निद्रादिक उस उपयोगमें बाधक हैं इसलिए इन निद्रा आदि पाँच कर्मों-
की दर्शनावरणके भेदोंमें परिगणना की जाती है। इससे दर्शनावरण कर्मके नौ भेद सिद्ध होते हैं।
§ ७४५. तृतीय प्रकृतिकी उत्तर प्रकृतिको बतलाने के लिए कहते हैं— २०
सद्वेद्य और असद्वेद्य ये दो वेदनीय हैं ॥८॥
§ ७४६. जिसके उदयसे देवादि गतियोंमें शरीर और मन सम्बन्धी सुखकी प्राप्ति होती है
वह सद्वेद्य है। प्रशस्त वेद्यका नाम सद्वेद्य है। जिसके फलस्वरूप अनेक प्रकारके दुख मिलते हैं वह
असद्वेद्य है। अप्रशस्त वेद्यका नाम असद्वेद्य है।
विशेषार्थ—यहाँ वेदनीय कर्मके दो भेद गिनाये हैं। यह जीवविपाकी कर्म है। जीवका २५
साता और असातारूप परिणाम इसके उदयके निमित्तसे होता है। अन्य बाह्य सामग्रीको इसका
फल कहा है पर वह उपचार कथन है। वस्तुतः बाह्य सामग्री साता और असाताके उदयमें
निमित्त है, इसलिए बाह्य सामग्रीकी प्राप्ति वेदनीय कर्मका फल नहीं माना जा सकता। देवगति,
नरकगति और भोगभूमिमें बाह्य सामग्रीकी प्राप्तिका कारण तत्तत्पर्यायकी लेश्या है और कर्मभूमिमें
बाह्य सामग्रीकी प्राप्तिके अनेक कारण हैं। इस प्रकार वेदनीय कर्मके दो भेद और उनका कार्य ३०
जानना चाहिए।
§ ७४७. अब चौथी मूल प्रकृतिके उत्तर प्रकृति विकल्प दिखलानेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
दर्शनमोहनीय, चारित्रमोहनीय, अकषायवेदनीय और कषाय वेदनीय इनके क्रमसे तीन,
दो, नौ और सोलह भेद हैं। सम्यक्त्व, मिथ्यात्व और तदुभय ये तीन दर्शनमोहनीय हैं, अकषाय- ३५
वेदनीय और कषायवेदनीय ये दो चारित्र मोहनीय हैं। हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा,
स्त्रीवेद, पुंवेद और नपुंसकवेद ये नौ अकषायवेदनीय हैं। तथा अनन्तानुबन्धी, अप्रत्याख्यान,
प्रत्याख्यान और संज्वलन ये प्रत्येक क्रोध, मान, माया और लोभके भेदसे सोलह कषायवेद-
नीय हैं ॥९॥
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
नं स शोकः।
Wait, in line 13: "यदुदयाद्देशादिष्वात्सुक्यं" - wait, look at the 3:
Is the 3 after 'यदुदयाद्' or after 'देशादिष्वात्सुक्यं'?
Let's look at line 13:
"यदुदया³देशादिष्वात्सुक्यं" or "यदुदयाद्देशादिष्वात्सुक्यं³"?
Look at the '३': it is directly above/after 'यदुदया': "यदुदया³देशादिष्वात्सुक्यं"!!
Wait, look at footnote 3: "३. -दयाद्विषयादि-मु०, ता०, ना० ।"
Yes! The variant is "-दयाद्विषयादि-" instead of "-दयाद्देशादि-"! So the footnote marker ३ is right between 'यदुदया' and 'देशादिष्वात्सुक्यं'!
Wait, is there a 'द्' before देशादि?
The text has: "यदुदया³देशादिष्वात्सुक्यं" or "यदुदयाद्³देशादिष्वात्सुक्यं"?
There is no 'द्'! It's printed "यदुदया³देशादिष्वात्सुक्यं" or "यदुदया³ देशादिष्वात्सुक्यं"!
Wait, let's look closely at line 1