सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८६ सर्वार्थसिद्धौ [ ८।३ § ७३५ -
त्यक्त्वा षष्ठीसम्बन्धमुपैति 'कर्मणो योग्यान्' इति । 'पुद्गल'वचनं कर्मणस्तादात्म्यख्यापनार्थम्¹ ।
तेनात्मगुणोऽदृष्टो निराकृतो भवति; तस्य संसारहेतुत्वानुपपत्तेः । 'आदत्ते' इति हेतुहेतुमद्भाव-
ख्यापनार्थम् । अतो मिथ्यादर्शनाद्यावेशादार्द्रीकृतस्यात्मनः सर्वतो योगविशेषात्तेषां सूक्ष्मैकक्षेत्राव-
गाहिनामनन्तानन्तप्रदेशानां पुद्गलानां कर्मभावयोग्यानामविभागेनोपश्लेषो बन्ध इत्याख्यायते ।
५ यथा भाजनविशेषे² प्रक्षिप्तानां विविधरसबीजपुष्पफलानां मदिराभावेन परिणामस्तथा पुद्गला-
नामप्यात्मनि स्थितानां योगकषायवशात्कर्मभावेन परिणामो वेदितव्यः । 'सः'वचनमन्यनि-
वृत्त्यर्थम् । स एष बन्धो नान्योऽस्तीति । तेन गुणगुणिबन्धो निर्वाततो भवति । कर्मादिसाधनो
'बन्ध'-शब्दो व्याख्येयः ।
§ ७३५. आह किमयं बन्ध एकरूप एव, आहोस्वित्प्रकारा अप्यस्य सन्तीत्यत इदमुच्यते—
१० प्रकृतिस्थित्यनुभवप्रदेशास्तद्विधयः ॥३॥
§ ७३६. प्रकृतिः स्वभावः । निम्बस्य का प्रकृतिः । तिक्तता । गुडस्य का प्रकृतिः । मधु-
रता । तथा ज्ञानावरणस्य का प्रकृतिः । अर्थानवगमः । दर्शनावरणस्य का प्रकृतिः । अर्थानालो-
कनम् । वेद्यस्य सदसल्लक्षणस्य सुखदुःखसंवेदनम् । दर्शनमोहस्य तत्त्वार्थाश्रद्धानम् । चारित्रमोह-
दिया है। इससे अदृष्ट आत्माका गुण है इस बातका निराकरण हो जाता है, क्योंकि उसे आत्मा-
१५ का गुण मानने पर वह संसारका कारण नहीं बन सकता। सूत्रमें 'आदत्ते' पद हेतुहेतुमद्भावका
ख्यापन करनेके लिए दिया है। इससे मिथ्यादर्शन आदिके अभिनिवेशवश गीले किये गये आत्मा-
के सब अवस्थाओंमें योग विशेषसे उन सूक्ष्म, एक क्षेत्रावगाही अनन्तानन्त कर्मभावको प्राप्त होने
योग्य पुद्गलोंका उपश्लेष होना बन्ध है यह कहा गया है। जिस प्रकार पात्रविशेषमें प्रक्षिप्त हुए
विविध रसवाले बीज, फल और फलोंका मदिरा रूपसे परिणमन होता है उसी प्रकार आत्मामें
२० स्थित हुए पुद्गलोंका भी योग और कषायके निमित्तसे कर्मरूपसे परिणमन जानना चाहिए ।
सूत्रमें 'सः' पद अन्यका निराकरण करनेके लिए दिया है कि यह ही बन्ध है अन्य नहीं । इससे
गुणगुणीबन्धका निराकरण हो जाता है। यहां 'बन्ध' शब्दका कर्मादि साधनमें व्याख्यान कर
लेना चाहिए।
विशेषार्थ—इस सूत्रमें मुख्यरूपसे बन्धकी व्याख्या की गयी है। जीव द्रव्यका स्वतन्त्र
२५ अस्तित्व होते हुए भी अनादि कालसे वह कर्मोंके अधीन हो रहा है जिससे उसे नर नारक आदि
नाना गतियोंमें परिभ्रमण करना पड़ता है। प्रश्न यह है कि जीव कर्मोंके अधीन क्यों होता है
और उन कर्मोंका स्वरूप क्या है ? प्रकृत सूत्रमें इन दोनों प्रश्नोंका समर्पक उत्तर दिया गया है।
सूत्रमें बतलाया गया है कि कर्मोंके कारण जीव कषायाविष्ट होता है और इससे उसके कर्मके
योग्य पुद्गलोंका उपश्लेष होता है। यही बन्ध है। इससे दो बातें फलित होती हैं। प्रथम तो
३० यह कि कर्मके निमित्तसे जीवमें अशुद्धता आती है और इस अशुद्धताके कारण कर्मका बन्ध होता
है और दूसरी यह कि जीव और कर्मका यह बन्ध परम्परासे अनादि है। इस प्रकार बन्ध क्या
है और वह किस कारणसे होता है यह बात इस सूत्रसे जानी जाती है।
§ ७३५. यह बन्ध क्या एक है या इसके भेद हैं यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
उसके प्रकृति, स्थिति, अनुभव और प्रदेश ये चार भेद हैं ॥३॥
३५ § ७३६. प्रकृतिका अर्थ स्वभाव है। जिस प्रकार नीमकी क्या प्रकृति है ? कड़ुआपन ।
गुड़ की क्या प्रकृति है ? मीठापन । उसी प्रकार ज्ञानावरण कर्मकी क्या प्रकृति है ? अर्थका
ज्ञान न होना । दर्शनावरण कर्मकी क्या प्रकृति है ? अर्थका आलोकन नहीं होना । सुख-दुखका
१. -नार्थम् । अत आत्म-आ० । २. -शेषे क्षिप्ता-मु० ।