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सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

रत्रायतपरिमण्डलादीनामित्थंलक्षणम् । अतोऽन्यन्मेघादीनां संस्थानमनेकविधमित्यमिदमिति निरू-
पणभावादनित्थंलक्षणम् । भेदाः षोढा; उत्करचूर्णखण्डचूर्णिकाप्रतराणुचटनविकल्पात् । तत्रोत्करः
काष्ठादीनां करपत्रादिभिरुत्करणम् । चूर्णो यवगोधूमादीनां सक्तुकणिकादिः । खण्डो घटादीनां
कपालशर्करादिः । चूर्णिका माषमुद्गादीनाम् । प्रतरोऽभ्रपटलादीनाम् । अणुचटनं सन्तप्तायः-
पिण्डादिषु अयोगनादिभिरभिहन्यमानेषु स्फुलिङ्गनिर्गमः । तमो दृष्टिप्रतिबन्धकारणं प्रकाश-
विरोधि । छाया प्रकाशावरणनिमित्ता । सा द्वेधा, वर्णादिविकारपरिणता प्रतिबिम्बमात्रात्मिका
चेति । आतप आदित्यादिनिमित्त उष्णप्रकाशलक्षणः । उद्योतश्चन्द्रमणिखद्योतादिप्रभवः प्रकाशः ।
त एते शब्दादयः पुद्गलद्रव्यविकाराः । त एषां सन्तीति शब्दबन्धसौक्ष्म्यस्थौल्यसंस्थानभेदतमश्छा-
यातपोद्योतवन्तः पुद्गला इत्यभिसंबध्यते । 'च'शब्देन नोदनाभिघातादयः पुद्गलपरिणामा आगमे
प्रसिद्धाः समुच्चीयन्ते ।
§ ५७३. उक्तानां पुद्गलानां भेदप्रदर्शनार्थमाह—
अणवः स्कन्धाश्च ॥२५॥
§ ५७४. प्रदेशमात्रभाविस्पर्शादिपर्यायप्रसवसामर्थ्येनाण्यन्ते शब्द्यन्त इत्यणवः । सौक्ष्म्यादा-
त्मादय आत्ममध्या आत्मान्ताश्च ॥ उक्तं च—
त्रिकोण, चतुष्कोण, आयत और परिमण्डल आदि ये सब इत्थंलक्षण संस्थान हैं । तथा इससे
अतिरिक्त मेघ आदिके आकार जो कि अनेक प्रकारके हैं और जिनके विषयमें यह इस प्रकारका
है यह नहीं कहा जा सकता वह अनित्थंलक्षण संस्थान है। भेदके छह भेद हैं—उत्कर, चूर्ण, खण्ड,
चूर्णिका, प्रतर और अणुचटन । करौंत आदिसे जो लकड़ी आदिको चीरा जाता है वह उत्कर
नामका भेद है। जौ और गेहूँ आदिका जो सत्तू और कनक आदि बनता है वह चूर्ण नामका भेद
है । घट आदिके जो कपाल और शर्करा आदि टुकड़े होते हैं वह खण्ड नामका भेद है। उड़द और
मूंग आदिका जो खण्ड किया जाता है वह चूर्णिका नामका भेद है। मेघके जो अलग अलग पटल
आदि होते हैं वह प्रतर नामका भेद है । तपाये हुए लोहेके गोले आदिको घन आदिसे पीटने पर
जो फुलंगे निकलते हैं वह अणुचटन नामका भेद है। जिससे दृष्टिमें प्रतिबन्ध होता है और जो
प्रकाशका विरोधी है वह तम कहलाता है। प्रकाशको रोकनेवाले पदार्थोंके निमित्तसे जो पैदा होती
है वह छाया कहलाती है । उसके दो भेद हैं—एक तो वर्णादिके विकार रूपसे परिणत हुई और
दूसरी प्रतिबिम्बरूप । जो सूर्यके निमित्तसे उष्ण प्रकाश होता है उसे आतप कहते हैं। तथा चन्द्र
मणि और जुगनू आदिके निमित्तसे जो प्रकाश पैदा होता है उसे उद्योत कहते हैं। ये सब शब्दादिक
पुद्गल द्रव्यके विकार (पर्याय) हैं। इसीलिए सूत्रमें पुद्गलको इन शब्द, बन्ध, सौक्ष्म्य, स्थौल्य,
संस्थान, भेद, तम, छाया, आतप और उद्योतवाला कहा है । सूत्रमें दिये हुए 'च' शब्द से नोदन
अभिघात आदिक जो पुद्गलकी पर्यायें आगममें प्रसिद्ध हैं उनका संग्रह करना चाहिए।
§ ५७३. अब पूर्वोक्त पुद्गलोंके भेदोंका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
पुद्गल के दो भेद हैं—अणु और स्कन्ध ॥ २५ ॥
§ ५७४. एक प्रदेशमें होनेवाले स्पर्शादि पर्यायको उत्पन्न करनेकी सामर्थ्य रूपसे जो
'अण्यन्ते' अर्थात् कहे जाते हैं वे अणु कहलाते हैं। तात्पर्य यह है कि अणु एकप्रदेशी होनेसे सबसे
छोटा होता है इसलिए वह अणु कहलाता है। यह इतना सूक्ष्म होता है जिससे वही आदि है, वही
मध्य है और वही अन्त है। कहा भी है—

  • ५।२६ § ५७६ ] पञ्चमोऽध्यायः २२१
    "अत्तादि अत्तमज्झं अत्तंतं णेव इंदिये गेज्झं ।
    जं दव्वं अविभागी तं परमाणुं विआणाहि ।"
    स्थूलभावेन ग्रहणनिक्षेपणादिव्यापारस्कन्धनात्स्कन्धा इति संज्ञायन्ते । रूढौ क्रिया क्वचि-
    त्सती उपलक्षणत्वेनाश्रीयते इति ग्रहणादिव्यापारारोग्येष्वपि द्वयणुकादिषु स्कन्धाख्या प्रवर्तते ।
    अनन्तभेदा अपि पुद्गला अणुजात्या स्कन्धजात्या च द्वैविध्यमापद्यमानाः सर्वे गृह्यन्त इति ५
    तज्जात्याधारानन्तभेदसंसूचनार्थं बहुवचनं क्रियते । अणवः स्कन्धा इति भेदाभिधानं पूर्वोक्तसूत्रद्वय-
    भेदसंबन्धनार्थम् । स्पर्शरसगन्धवर्णवन्तोऽणवः । स्कन्धाः पुनः शब्दबन्धसौक्ष्म्यस्थौल्यसंस्थानभेद-
    तमश्छायातपोद्योतवन्तश्च स्पर्शादिमन्तश्चेति ।
    § ५७५. आह, किमेषां पुद्गलानामणुस्कन्धलक्षणः परिणामोऽनादिरुत आदिमानित्युच्यते ।
    स खलूत्पत्तिमत्त्वादादिमान्प्रतिज्ञायते । यद्येवं तस्मादभिधीयतां कस्मान्निमित्तादुत्पद्यन्त इति । तत्र १०
    स्कन्धानां तावदुत्पत्तिहेतुप्रतिपादनार्थमुच्यते—
    भेदसंघातेभ्य उत्पद्यन्ते ॥२६॥
    § ५७६. संघातानां द्वितयनिमित्तवशाद्विदारणं भेदः । पृथग्भूतानामेकत्वापत्तिः संघातः ।
    ननु च द्वित्वाद् द्विवचनेन भवितव्यम् । बहुवचननिर्देशस्त्रितयसंग्रहार्थः । भेदात्संघाताद् भेदसंघा-
    ताभ्यां च उत्पद्यन्त इति । तद्यथा—द्वयोः परमाण्वोः संघाताद् द्विप्रदेशः स्कन्ध उत्पद्यते । १५
    'जिसका आदि, मध्य और अन्त एक है, और जिसे इन्द्रियां नहीं ग्रहण कर सकतीं ऐसा
    जो विभाग रहित द्रव्य है उसे परमाणु समझो ।'
    जिनमें स्थूल रूपसे पकड़ना, रखना आदि व्यापारका स्कन्धन अर्थात् संघटना होती है वे
    स्कन्ध कहे जाते हैं। रूढ़िमें क्रिया कहीं पर होती है, सर्वत्र नहीं। फिर भी उपलक्षणरूपसे वह ली
    जाती है, इसलिए ग्रहण आदि व्यापारके अयोग्य द्वयणुक आदिकमें भी स्कन्ध संज्ञा प्रवृत्त होती २०
    है। पुद्गलोंके अनन्त भेद हैं तो भी वे सब अणुजाति और स्कन्धजातिके भेदसे दो प्रकारके हैं।
    इस प्रकार पुद्गलोंकी इन दोनों जातियोंके आधारभूत अनन्त भेदोंके सूचन करनेके लिए सूत्रमें
    बहुवचनका निर्देश किया है। यद्यपि सूत्रमें अणु और स्कन्ध इन दोनों पदोंको समसित रखा जा
    सकता था तब भी ऐसा न करके 'अणवः स्कन्धाः' इस प्रकार भेद रूपसे जो कथन किया है वह
    इस सूत्रसे पहले कहे गये दो सूत्रोंके साथ अलग अलग सम्बन्ध बतलानेके लिए किया है। २५
    जिससे यह ज्ञात हो कि अणु स्पर्श, रस, गन्ध और वर्णवाले हैं परन्तु स्कन्ध शब्द, बन्ध, सौक्ष्म्य,
    स्थौल्य, संस्थान, भेद, छाया, आतप और उद्योतवाले हैं तथा स्पर्शादिवाले भी हैं।
    § ५७५. इन पुद्गलोंका अणु और स्कन्धरूप परिणाम होना अनादि है या सादि ? वह
    उत्पन्न होता इसलिए सादि है। यदि ऐसा है तो उस निमित्तका कथन करो जिससे अणु और
    स्कन्ध ये भेद उत्पन्न होते हैं ? इसलिए पहले स्कन्धोंकी उत्पत्तिके हेतुका कथन करनेके लिए ३०
    आगेका सूत्र कहते हैं—
    भेदसे, संघातसे तथा भेद और संघात दोनोंसे स्कन्ध उत्पन्न होते हैं ।।२६।।
    § ५७६. अन्तरंग और बहिरंग इन दोनों प्रकारके निमित्तोंसे संघातोंके विदारण करनेको
    भेद कहते हैं। तथा पृथग्भूत हुए पदार्थोंके एकरूप हो जानेको संघात कहते हैं। शंका—भेद और
    संघात दो हैं इसलिए सूत्रमें द्विवचन होना चाहिए ? समाधान—तीनका संग्रह करनेके लिए सूत्रमें ३५
    बहुवचनका निर्देश किया है। जिससे यह अर्थ सम्पन्न होता है कि भेदसे, संघातसे तथा भेद और
    १. तृतीय-मु० ।

२२२ सर्वार्थसिद्धौ [ ५।२७ § ५७७ –

द्विप्रदेशस्याणोश्च त्रयाणां वा अणूनां संघातात्त्रिप्रदेशः । द्वयोर्द्विप्रदेशयोस्त्रिप्रदेशस्याणोश्च
चतुर्णां वा अणूनां संघाताचतुःप्रदेशः । एवं संख्येयासंख्येयानन्तानामनन्तानन्तानां च
संघातात्तावत्प्रदेशः। एषामेव भेदात्तावद्² द्विप्रदेशपर्यन्ताः स्कन्धा उत्पद्यन्ते । एवं भेदसंघाताभ्या-
मेकसमयिकाभ्यां द्विप्रदेशादयः स्कन्धा उत्पद्यन्ते । अन्यतो भेदेनान्यस्य संघातेनेति । एवं स्कन्धा-
नामुत्पत्तिहेतुरुक्तः।
§ ५७७. अणोरुत्पत्तिहेतुप्रदर्शनार्थमाह—
भेदादणुः ॥२७॥
§ ५७८. "सिद्धे ³ विधिरारभ्यमाणो नियमार्थो भवति ।” अणोरुत्पत्तिर्भेदादेव, न संघाता-
न्नापि भेदसंघाताभ्यामिति ।
§ ५७९. आह, संघातादेव स्कन्धानामात्मलाभे सिद्धे भेदसंघातग्रहणमनर्थकमिति तद्ग्रहण-
प्रयोजनप्रतिपादनार्थमिदमुच्यते—
भेदसंघाताभ्यां चाक्षुषः ॥२८॥
§ ५८०. अनन्तानन्तपरमाणुसमुदयनिष्पाद्योऽपि कश्चिच्चाक्षुषः कश्चिदचाक्षुषः । तत्र
योऽचाक्षुषः स कथं चाक्षुषो भवतीति चेदुच्यते—भेदसंघाताभ्यां चाक्षुषः । न भेदादिति । कात्रोप-
संघात इन दोनोंसे स्कन्ध उत्पन्न होते हैं। खुलासा इस प्रकार है—दो परमाणुओंके संघातसे दो
प्रदेशवाला स्कन्ध उत्पन्न होता है। दो प्रदेशवाले स्कन्ध और अणुके संघातसे या तीन अणुओंके
संघातसे तीन प्रदेशवाला स्कन्ध उत्पन्न होता है। दो प्रदेशवाले दो स्कन्धोंके संघातसे, तीन
प्रदेशवाले स्कन्ध और अणुके संघातसे या चार अणुओंके संघातसे चार प्रदेशवाला स्कन्ध उत्पन्न
होता है। इस प्रकार संख्यात, असंख्यात, अनन्त और अनन्तानन्त अणुओंके संघातसे उतने उतने
प्रदेशोंवाले स्कन्ध उत्पन्न होते हैं। तथा इन्हीं संख्यात आदि परमाणुवाले स्कन्धोंके भेदसे दो
प्रदेशवाले स्कन्ध तक स्कन्ध उत्पन्न होते हैं। इसी प्रकार एक समयमें होनेवाले भेद और संघात
इन दोनोंसे दो प्रदेशवाले आदि स्कन्ध उत्पन्न होते हैं। तात्पर्य यह है कि जब अन्य स्कन्धसे
भेद होता है और अन्यका संघात, तब एक साथ भेद और संघात इन दोनोंसे भी स्कन्धकी उत्पत्ति
होती है। इस प्रकार स्कन्धोंकी उत्पत्तिका कारण कहा।
§ ५७७. अब अणुकी उत्पत्तिके हेतुको दिखलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
भेदसे अणु उत्पन्न होता है ॥२७॥
§ ५७८. कोई विधि सिद्ध हो, फिर भी यदि उसका आरम्भ किया जाता है तो वह नियम
के लिए होती है। तात्पर्य यह है कि अणु भेदसे होता है यद्यपि यह सिद्ध है फिर भी 'भेदादणुः'
इस सूत्रके निर्माण करनेसे यह नियम फलित होता है कि अणुकी उत्पत्ति भेदसे ही होती है। न
संघातसे होती है और न भेद और संघात इन दोनोंसे ही होती है।
§ ५७९. जब संघातसे ही स्कन्धोंकी उत्पत्ति होती है तब सूत्रमें भेद और संघात इन दोनों
पदोंका ग्रहण करना निष्फल है ? अतः इन दोनों पदोंके ग्रहण करनेका क्या प्रयोजन है इसका
कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
भेद और संघातसे चाक्षुष स्कन्ध बनता है ॥२८॥
§ ५८०. अनन्तानन्त परमाणुओंके समुदायसे निष्पन्न होकर भी कोई स्कन्ध चाक्षुष होता
है और कोई अचाक्षुष । उसमें जो अचाक्षुष स्कन्ध है वह चाक्षुष कैसे होता है इसी बातके बतलाने


१. –ख्येयानन्तानां च संघा–ता०, ना० । २. भेदाद्द्विप्रदे–ता०, आ०, दि० १, दि० २ । ३. ‘सिद्धे सत्यारम्भो नियमार्थः’ न्यायसंग्रहः ।

– ५।३० § ५८४ ] पञ्चमोऽध्यायः २२३
पत्तिरिति चेत् । ब्रूमः; सूक्ष्मपरिणामस्य स्कन्धस्य भेदे सौक्ष्म्यापरित्यागादचाक्षुषत्वमेव । सौक्ष्म्य-
परिणतः पुनरपरः सत्यपि तद्भेदेऽन्यसंघातान्तरसंयोगात्सौक्ष्म्यपरिणामोपरमे स्थौल्योत्पत्तौ
चाक्षुषो भवति ।
§ ५८१. आह, धर्मादीनां द्रव्याणां विशेषलक्षणान्युक्तानि, सामान्यलक्षणं नोक्तम्, तद्वक्त-
व्यम् । उच्यते—
सद् द्रव्यलक्षणम् ॥२९॥
§ ५८२. यत्सत्तद् द्रव्यमित्यर्थः ।
§ ५८३. यद्येवं तदेव तावद्वक्तव्यं किं सत् । इत्यत आह—
उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सत् ॥३०॥
§ ५८४. चेतनस्याचेतनस्य वा द्रव्यस्य स्वां जातिमजहत उभयनिमित्तवशाद् भावान्तरा- १०
वाप्तिरूपादनमुत्पादः मृत्पिण्डस्य घटपर्यायवत् । तथा पूर्वभावविगमनं व्ययः । यथा घटोत्पत्तौ
पिण्डाकृतेः । अनादिपारिणामिकस्वभावेन व्ययोदयाभावाद् ध्रुवति स्थिरीभवतीति ध्रुवः । ध्रुवस्य
भावः कर्म वा ध्रौव्यम् । यथा मृत्पिण्डघटाद्यवस्थासु मृदाद्यन्वयः । तैरुत्पादव्ययध्रौव्यैर्युक्तं २
उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सदिति । आह, भेदे सति युक्तशब्दो दृष्टः । यथा दण्डेन युक्तो देवदत्त इति ।
तथा सति तेषां त्रयाणां तैर्युक्तस्य द्रव्यस्य चाभावः प्राप्नोति । नैष दोषः; अभेदेऽपि कथंचिद् भेद- १५
लिए यह कहा है कि भेद और संघातसे चाक्षुष स्कन्ध होता है, केवल भेदसे नहीं, यह इस सूत्रका
अभिप्राय है । शंका—इसका क्या कारण है ? समाधान—आगे उसी कारणको बतलाते हैं—सूक्ष्म-
परिणामवाले स्कन्धका भेद होनेपर वह अपनी सूक्ष्मताको नहीं छोड़ता इसलिए उसमें अचाक्षुषपना
ही रहता है । एक दूसरा सूक्ष्मपरिणामवाला स्कन्ध है जिसका यद्यपि भेद हुआ तथापि उसका
दूसरे संघातसे संयोग हो गया अतः सूक्ष्मपना निकलकर उसमें स्थूलपनेकी उत्पत्ति हो जाती है २०
और इसलिए वह चाक्षुष हो जाता है ।
§ ५८१. धर्मादिक द्रव्यके विशेष लक्षण कहे, सामान्य लक्षण नहीं कहा, जो कहना चाहिए
इसलिए सूत्र द्वारा सामान्य लक्षण कहते हैं—
द्रव्यका लक्षण सत् है ॥२९॥
§ ५८२. जो सत् है वह द्रव्य है यह इस सूत्रका भाव है। २५
§ ५८३. यदि ऐसा है तो यही कहिए कि सत् क्या है ? इसलिए आगेका सूत्र कहते हैं—
जो उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य इन तीनोंसे युक्त अर्थात् इन तीनोंरूप है वह सत् है ॥३०॥
§ ५८४. द्रव्य दो हैं—चेतन और अचेतन । वे अपनी जातिको तो कभी नहीं छोड़ते फिर
भी उनमें अन्तरंग और बहिरंग निमित्तके वशसे प्रति समय जो नवीन अवस्थाकी प्राप्ति होती है
उसे उत्पाद कहते हैं। जैसे मिट्टीके पिण्डकी घट पर्याय । तथा पूर्व अवस्थाके त्यागको व्यय कहते ३०
हैं । जैसे घटकी उत्पत्ति होनेपर पिण्डरूप आकारका त्याग तथा जो अनादिकालीन पारिणामिक
स्वभाव है उसका व्यय और उदय नहीं होता किन्तु वह 'ध्रुवति' अर्थात् स्थिर रहता है इसलिए
उसे ध्रुव कहते हैं। तथा इस ध्रुवका भाव या कर्म ध्रौव्य कहलाता है। जैसे मिट्टीके पिण्ड
और घटादि अवस्थाओंमें मिट्टीका अन्वय बना रहता है। इस प्रकार इन उत्पाद, व्यय और
ध्रौव्यसे जो युक्त है वह सत् है । शंका—भेदके रहते हुए युक्त शब्द देखा जाता है। जैसे दण्डसे ३५
युक्त देवदत्त । यहाँ दण्ड और देवदत्तमें भेद है । प्रकृतमें भी यदि ऐसा मान लिया जाय तो उन
१. –जहत निमित्त-आ०, दि० १, दि० २ । २. -ध्रौव्यैर्युक्तं सदिति मु० ।

नयापेक्षया युक्तशब्दो दृष्टः । यथा सारयुक्तः स्तम्भ इति । तथा सति तेषामविनाभावात्सद्द्व्यपदेशो
युक्तः । समाधिवचनो वा युक्तशब्दः । युक्तः समाहितस्तदात्मक इत्यर्थः । उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं
सत् उत्पादव्ययध्रौव्यात्मकमिति यावत् । एतदुक्तं भवति-उत्पादादीनि^१ द्रव्यस्य लक्षणानि ।
द्रव्यं लक्ष्यम्^२ । तत्र पर्यायार्थिकनयापेक्षया परस्परतो द्रव्याच्चार्थान्तरभावः । द्रव्यार्थिकनयापेक्षया
व्यतिरेकेणानुपलब्धेरनर्थान्तरभावः । इति लक्ष्यलक्षणभावसिद्धिः ।
तीनोंका और उन तीनोंसे युक्त द्रव्यका अभाव प्राप्त होता है । समाधान-यह कोई दोष नहीं है;
क्योंकि अभेदमें भी कथंचित् भेदग्राही नयकी अपेक्षा युक्त शब्दका प्रयोग देखा जाता है । जैसे सार
युक्त स्तम्भ । ऐसी हालतमें उन तीनोंका परस्पर अविनाभाव सम्बन्ध होनेसे यहाँ युक्त शब्दका
प्रयोग करना युक्त है । अथवा यह युक्त शब्द समाधिवाची है । भाव यह है कि युक्त, समाहित और
तदात्मक ये तीनों एकार्थवाची शब्द हैं । जिससे 'सत् उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यसे युक्त है' इसका
भाव 'सत् उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यात्मक है' यह होता है । उक्त कथनका तात्पर्य यह है कि उत्पाद
आदि द्रव्यके लक्षण हैं और द्रव्य लक्ष्य है । यदि इनका पर्यायार्थिक नयकी अपेक्षा विचार करते हैं
तो ये आपसमें और द्रव्यसे पृथक् पृथक् हैं और यदि द्रव्यार्थिक नयकी अपेक्षा विचार करते हैं तो
ये पृथक्-पृथक् उपलब्ध नहीं होनेसे अभिन्न हैं । इस प्रकार इनमें और द्रव्यमें लक्ष्य-लक्षणभावकी
सिद्धि होती है ।
विशेषार्थ-यहाँ द्रव्यका लक्षण उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य स्वभाव बतलाया है । अपनी
जातिका त्याग किये बिना नवीन पर्यायकी प्राप्ति उत्पाद है, पूर्व पर्यायका त्याग व्यय है, और
अनादि पारिणामिक स्वाभावरूप अन्वयका बना रहना ध्रौव्य है । उदाहरणार्थ-कोयला जलकर
राख हो जाता है, इसमें पुद्गलकी कोयला रूप पर्यायका व्यय होता है और क्षार रूप पर्यायका
उत्पाद होता है किन्तु दोनों अवस्थाओंमें पुद्गल द्रव्यका अस्तित्व बना रहता है । पुद्गलपनेका
कभी भी नाश नहीं होता यही उसकी ध्रौव्यता है । आशय यह है कि प्रत्येक पदार्थ परिवर्तनशील
है और उसमें यह परिवर्तन प्रति समय होता रहता है जैसे दूध कुछ समय बाद दही रूपसे परिणम
जाता है और फिर दहीका मट्ठा बना लिया जाता है, यहाँ यद्यपि दूधसे दही और दहीसे मट्ठा ये
तीन भिन्न-भिन्न अवस्थाएँ हुई हैं पर हैं ये तीनों एक गोरसकी ही । इसी प्रकार प्रत्येक द्रव्यमें
अवस्था भेदके होनेपर भी उसका अन्वय पाया जाता है इसलिए वह उत्पाद, व्यय और ध्रौव्ययुक्त
सिद्ध होता है । यह प्रत्येक द्रव्यका सामान्य स्वभाव है । अब प्रश्न यह होता है कि प्रत्येक द्रव्य
एक साथ तीनरूप कैसे हो सकता है । कदाचित् कालभेदसे उसे उत्पाद और व्ययरूप मान भी
लिया जाय क्योंकि जिसका उत्पाद होता है उसका कालान्तरमें नाश अवश्य होता है । तथापि
वह ऐसी अवस्थामें ध्रौव्यरूप नहीं हो सकता, क्योंकि जिसका उत्पाद और व्यय होता है उसे
ध्रौव्य स्वभाव माननेमें विरोध आता है । समाधान यह है कि अवस्थाभेदसे द्रव्यमें ये तीनों धर्म
माने गये हैं । जिस समय द्रव्यकी पूर्व अवस्था नाशको प्राप्त होती है उसी समय उसकी नयी
अवस्था उत्पन्न होती है फिर भी उसका त्रैकालिक अन्वय स्वभाव बना रहता है । इसी बातको
आचार्य समन्तभद्रने इन शब्दोंमें व्यक्त किया है-'घटका इच्छुक उसका नाश होने पर दुखी होता
है, मुकुटका इच्छुक उसका उत्पाद होनेपर हर्षित होता है और स्वर्णका इच्छुक न दुखी होता है
न हर्षित होता है, वह मध्यस्थ रहता है । एक ही समयमें यह शोक, प्रमोद और मध्यस्थभाव
बिना कारणके नहीं हो सकता इससे प्रत्येक द्रव्य उत्पाद, व्यय और ध्रौव्ययुत है यह सिद्ध
होता है ।
१. -दादीनि त्रीणि द्रव्य -मु० । २. लक्ष्यम् । तत्पर्या-मु०, आ०, दि० १ ।

  • ५।३१ § ५८८ ] पञ्चमोऽध्यायः २२५

§ ५८५. आह 'नित्यावस्थितान्यरूपणि' इत्युक्तं तत्र न ज्ञायते किं नित्यमित्यत आह—
तद्भावाव्ययं नित्यम् ॥३१॥
§ ५८६. 'तद्भावः' इत्युच्यते । कस्तद्भावः । प्रत्यभिज्ञानहेतुता । तदेवेदमिति स्मरणं
प्रत्यभिज्ञानम् । तदकस्मान्न भवतीति योऽस्य हेतुः स १तद्भावः। भवनं भावः । तस्य भावस्तद्भावः ।
येनात्मना प्राग्दृष्टं वस्तु तेनैवात्मना 'पुनरपि भावात्तदेवेदमिति प्रत्यभिज्ञायते । यद्यत्यन्तैनिरोधो-
ऽभिनवप्रादुर्भावमात्रमेव वा स्यात्ततः स्मरणानुपपत्तिः । तदधीनो लोकसंव्यवहारो विरुध्येत ।
ततस्तद्भावेनाव्ययं३ तद्भावाव्ययं नित्यमिति निश्चीयते । तत् तु कथंचिद्वेदितव्यम् । सर्वथा
नित्यत्वे अन्यथाभावाभावात्संसारतद्विनिवृत्तिकारणप्रक्रियाविरोधः स्यात् ।
§ ५८७. ननु इदमेव विरुद्धं तदेव नित्यं तदेवानित्यमिति । यदि नित्यं व्ययोदयाभावाद-
नित्यताव्याघातः । अथानित्यमेव स्थित्यभावान्नित्यताव्याघात इति । नैतद्विरुद्धम् । कुतः ।
अर्पितानर्पितसिद्धेः ॥३२॥
§ ५८८. अनेकान्तात्मकस्य वस्तुनः प्रयोजनवशाद्यस्य कस्यचिद्धर्मस्य विवक्षया४ प्रापितं
प्राधान्यमर्पितमुपनीतमिति यावत् । तद्विपरीतमर्पितम् । प्रयोजनाभावात् सतोऽप्यविवक्षा भवती-
§ ५८५. 'नित्यावस्थितान्यरूपणि' यह सूत्र कह आये हैं। वहाँ यह नहीं ज्ञात होता कि
नित्य क्या है इसलिए आगेका सूत्र कहते हैं—
उसके भावसे ( अपनी जातिसे ) च्युत न होना नित्य है ॥३१॥
§ ५८६. अब तद्भाव इस पदका खुलासा करते हैं। शंका—'तद्भाव' क्या वस्तु है ?
समाधान—जो प्रत्यभिज्ञानका कारण है वह तद्भाव है, 'वही यह है' इस प्रकारके स्मरणको प्रत्य-
भिज्ञान कहते हैं। वह अकस्मात् तो होता नहीं, इसलिए जो इसका कारण है वही तद्भाव है।
इसकी निरुक्ति 'भवनं भावः' तस्य भावः तद्भावः' इस प्रकार होती है। तात्पर्य यह है कि पहले
जिस रूप वस्तुको देखा है उसी रूप उसके पुनः होनेसे 'वही यह है' इस प्रकारका प्रत्यभिज्ञान
होता है। यदि पूर्व वस्तुका सर्वथा नाश हो जाय या सर्वथा नयी वस्तुका उत्पाद माना जाय तो
इससे स्मरणकी उत्पत्ति नहीं हो सकती और स्मरणकी उत्पत्ति न हो सकनेसे स्मरणके आधीन
जितना लोकसंव्यवहार चालू है वह सब विरोधको प्राप्त होता है। इसलिए जिस वस्तुका जो भाव
है उस रूपसे च्युत न होना तद्भावाव्यय अर्थात् नित्य है ऐसा निश्चित होता है। परन्तु इसे
कथंचित् जानना चाहिए। यदि सर्वथा नित्यता मान ली जाय तो परिणमनका सर्वथा अभाव प्राप्त
होता है और ऐसा होनेसे संसार और इसकी निवृत्तिके कारण रूप प्रक्रियाका विरोध प्राप्त
होता है।
§ ५८७. शंका—उसीको नित्य कहना और उसीको अनित्य कहना यह विरुद्ध है। यदि
नित्य है तो उसका व्यय और उत्पाद न होनेसे उसमें अनित्यता नहीं बनती। और यदि अनित्य है
तो स्थितिका अभाव होनेसे नित्यताका व्याघात होता है ? समाधान—नित्यता और अनित्यताका
एक साथ रहना विरुद्ध नहीं है, क्योंकि—
मुख्यता और गौणताकी अपेक्षा एक वस्तुमें विरोधी मालूम पड़नेवाले दो धर्मोंकी सिद्धि
होती है ॥३२॥
§ ५८८. वस्तु अनेकान्तात्मक है। प्रयोजनके अनुसार उसके किसी एक धर्मको विवक्षासे
जब प्रधानता प्राप्त होती है तो वह अर्पित या उपनीत कहलाता है और प्रयोजनके अभावमें


१. तद्भावः । तस्य मु० । २. -त्यन्तविरोधो मु० । ३. -नाव्ययं नित्य-मु० । ४. विवक्षाया- आ०,
दि० १, दि० २ ।
२९

त्युपसर्जनीभूतमनर्पितमित्युच्यते । अर्पितं चानर्पितं चार्पितार्पिते । ताभ्यां सिद्धेरर्पितार्पित-
सिद्धेर्नास्ति विरोधः । तद्यथा—एकस्य देवदत्तस्य पिता पुत्रो भ्राता १ भागिनेय इत्येवमादयः
संबन्धा जनकत्वजन्यत्वादिनिमित्ता न विरुध्यन्ते; अर्पणाभेदात् । पुत्रापेक्षया पिता, पित्रापेक्षया
पुत्र इत्येवमादिः । तथा द्रव्यमपि सामान्यार्पण्या नित्यम्, विशेषापेणयानित्यमिति नास्ति
विरोधः । तौ च सामान्यविशेषौ कथंचिद् भेदाभेदाभ्यां व्यवहारहेतू भवतः ।
§ ५८९. अत्राहं, सतोऽनेकनयव्यवहारतन्त्रत्वात् उपपन्ना भेदसंघातेभ्यः सतां २स्कन्धात्मनो-
त्पत्तिः । इदं तु संदिग्धम्, किं संघातः संयोगादेव द्वयणुकादिलक्षणो भवति, उत कश्चिद्विशेषोऽव-
ध्रियत इति । उच्यते, 'सति संयोगे बन्धादेकत्वपरिणामात्मकात्संघातो निष्पद्यते । यद्येवमिद-
मुच्यतां, कुतो ३ नु खलु पुद्गलजात्यपरित्यागे ४ संयोगे च सति भवति केषांचिद् बन्धोऽन्येषां च
१०. नेति । उच्यते, यस्मात्तेषां पुद्गलात्माविशेषेऽप्यनन्तपर्यायाणां परस्परविलक्षणपरिणामादाहित-
सामर्थ्याद्भवन्प्रतीतः—
स्निग्धरूक्षत्वादू बन्धः ॥३३॥
§ ५९०. बाह्याभ्यन्तरकारणवशात् स्नेहपर्यायाविर्भावात् स्निह्यते ५ स्मेति स्निग्धः । तथा
रूक्षणारूक्षः । स्निग्धश्च रूक्षश्च स्निग्धरूक्षौ । तयोर्भावः स्निग्धरूक्षत्वम् । स्निग्धत्वं चिक्कणगुण-
१५ जिसकी प्रधानता नहीं रहती वह अनर्पित कहलाता है । तात्पर्य यह है कि किसी वस्तु या धर्मके
रहते हुए भी उसकी विवक्षा नहीं होती इसलिए जो गौण हो जाता है वह अनर्पित कहलाता है ।
इन दोनोंका 'अर्पितं च अनर्पितं च' इस प्रकार द्वन्द्व समास है। इन दोनोंकी अपेक्षा एक वस्तुमें
परस्पर विरोधी दो धर्मोंकी सिद्धि होती है इसलिए कोई विरोध नहीं है। खुलासा इस प्रकार है—
जैसे देवदत्तके पिता, पुत्र, भाई और भान्जे इसी प्रकार और भी जनकत्व और जन्यत्व आदिके
२० निमित्तसे होने वाले सम्बन्ध विरोधको प्राप्त नहीं होते । जब जिस धर्मकी प्रधानता होती है उस
समय उसमें वह धर्म माना जाता है । उदाहरणार्थ—पुत्रकी अपेक्षा वह पिता है और पिताकी
अपेक्षा वह पुत्र है आदि । उसी प्रकार द्रव्य भी सामान्यकी अपेक्षा नित्य है और विशेषकी अपेक्षा
अनित्य है इसलिए कोई विरोध नहीं है । वे सामान्य और विशेष कथंचित् भेद और अभेदकी
अपेक्षा ही व्यवहारके कारण होते हैं।
२५ § ५८९. शंका—सत् अनेक प्रकारके नयके व्यवहारके आधीन होनेसे भेद, संघात और
भेद-संघातसे स्कन्धोंकी उत्पत्ति भले ही बन जावे परन्तु यह संदिग्ध है कि द्वयणुक आदि लक्षण-
वाला संघात संयोगसे ही होता है या उसमें और कोई विशेषता है ? समाधान—संयोगके होनेपर
एकत्व परिणमन रूप बन्धसे संघातकी उत्पत्ति होती है। शंका—यदि ऐसा है तो यह बतलाइए कि
सब पुद्गलजातिके होकर भी उनका संयोग होनेपर किन्हींका बन्ध होता है और किन्होंका नहीं
३० होता, इसका क्या कारण है ? समाधान—चूंकि वे सब जातिसे पुद्गल हैं तो भी उनकी जो
अनन्त पर्यायें हैं उनका परस्पर विलक्षण परिणमन होता है, इसलिए उससे जो सामर्थ्य उत्पन्न
होती है उससे ऐसा प्रतीत होता है कि—
स्निग्धत्व और रूक्षत्वसे बन्ध होता है ॥३३॥
§ ५९०. बाह्य और आभ्यन्तर कारणसे जो स्नेह पर्याय उत्पन्न होती है उससे पुद्गल
३५ स्निग्ध कहलाता है । इसकी व्युत्पत्ति 'स्निह्यते स्मेति स्निग्धः' होगी । तथा रूखापनके कारण
१. भ्राता माता भाग-मु० । २. स्कन्धानामेवोत्प-दि० १, दि०, २, आ० । ३. -कुतोऽत्र खलु दि० १,
दि० २ । ४. -त्यागे सति मु० । ५. -ह्यतेऽस्मिन्निति मु० ।

लक्षणः पर्यायः । तद्विपरीतपरिणामो रूक्षत्वम् । 'स्निग्धरूक्षत्वात्' इति हेतुनिर्देशः । तत्कृतो
बन्धो द्व्यणुकादिपरिणामः । द्वयोः स्निग्धरूक्षयोरण्वोः परस्परश्लेषलक्षणे बन्धे सति द्व्यणुक-
स्कन्धो भवति । एवं संख्येयासंख्येयानन्तप्रदेशः स्कन्धो योज्यः । तत्र स्नेहगुण एकद्वित्रिचतुः-
संख्येयासंख्येयानन्तविकल्पः । तथा रूक्षगुणोऽपि । तद्गुणाः परमाणवः सन्ति । यथा तोयाजागो-
महिष्युष्ट्रीक्षीरघृतेषु स्नेहगुणः प्रकर्षाप्रकर्षेण प्रवर्तते । पांशुकणिकाशर्करादिषु च रूक्षगुणो दृष्टः ।
तथा परमाणुष्वपि स्निग्धरूक्षगुणयोर्वृत्तिः प्रकर्षाप्रकर्षेणानुमीयते ।
§ ५९१. स्निग्धरूक्षत्वगुणनिमित्ते बन्धे अविशेषेण प्रसक्ते अनिष्टगुणनिवृत्त्यर्थमाह—
न जघन्यगुणानाम् ॥३४॥
§ ५९२. जघन्यो निकृष्टः । गुणो भागः । जघन्यो गुणो येषां ते जघन्यगुणाः । तेषां जघन्य-
गुणानां नास्ति बन्धः । तद्यथा—एकगुणस्निग्धस्यैकगुणस्निग्धेन द्व्यादिसंख्येयासंख्येयानन्तगुण-
स्निग्धेन वा नास्ति बन्धः । तस्यैवैकगुणस्निग्धस्य एकगुणरूक्षेण द्व्यादिसंख्येयासंख्येयानन्तगुण-
रूक्षेण वा नास्ति बन्धः । तथा एकगुणरूक्षस्यापि योज्यमिति ।
§ ५९३. एतौ जघन्यगुणस्निग्धरूक्षौ वर्जयित्वा अन्येषां स्निग्धानां रूक्षाणां च परस्परेण
बन्धो भवतीत्यविशेषेण प्रसङ्गे तत्रापि प्रतिषेधविषयख्यापनार्थमाह—
पुद्गल रूक्ष कहा जाता है । स्निग्ध पुद्गलका धर्म स्निग्धत्व है और रूक्ष पुद्गलका धर्म रूक्षत्व
है । पुद्गलकी चिकने गुणरूप जो पर्याय है वह स्निग्धत्व है और इससे जो विपरीत परिणमन है
वह रूक्षत्व है । सूत्रमें 'स्निग्धरूक्षत्वात्' इस प्रकार हेतुपरक निर्देश किया है । तात्पर्य यह है कि
द्व्यणुक आदि लक्षणवाला जो बन्ध होता है वह इनका कार्य है । स्निग्ध और रूक्ष गुणवाले दो
परमाणुओंका परस्पर संश्लेषलक्षण बन्ध होनेपर द्व्यणुक नामका स्कन्ध बनता है । इसी प्रकार
संख्यात, असंख्यात और अनन्त प्रदेशवाले स्कन्ध उत्पन्न होते हैं । स्निग्ध गुणके एक, दो, तीन,
चार, संख्यात, असंख्यात और अनन्त भेद हैं। इसी प्रकार रूक्ष गुणके भी एक, दो, तीन, चार,
संख्यात, असंख्यात और अनन्त भेद हैं। और इन गुणवाले परमाणु होते हैं। जिस प्रकार जल
तथा बकरी, गाय, भैंस, और ऊँटके दूध और घीमें उत्तरोत्तर अधिक रूपसे स्नेह गुण रहता है
तथा पांशु, कणिका और शर्करा आदिमें उत्तरोत्तर न्यूनरूपसे रूक्ष गुण रहता है उसी प्रकार
परमाणुओंमें भी न्यूनाधिकरूपसे स्निग्ध और रूक्ष गुणका अनुमान होता है ।
§ ५९१. स्निग्धत्व और रूक्षत्व गुणके निमित्तसे सामान्यसे बन्धके प्राप्त होनेपर बन्धमें
अप्रयोजनीय गुणके निराकरण करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
जघन्य गुणवाले पुद्गलोंका बन्ध नहीं होता ॥३४॥
§ ५९२. यहाँ जघन्य शब्दका अर्थ निकृष्ट है और गुण शब्दका अर्थ भाग है। जिनमें जघन्य
गुण होता है अर्थात् जिनका शक्त्यंश निकृष्ट होता है वे जघन्य गुणवाले कहलाते हैं। उन जघन्य
गुणवालोंका बन्ध नहीं होता । यथा—एक स्निग्ध शक्त्यंशवालेका एक स्निग्ध शक्त्यंशवालेके
साथ या दो से लेकर संख्यात, असंख्यात और अनन्त शक्त्यंशवालोंके साथ बन्ध नहीं होता ।
उसी प्रकार एक स्निग्ध शक्त्यंशवालेका एक रूक्ष शक्त्यंशवालेके साथ या दोसे लेकर संख्यात,
असंख्यात और अनन्त रूक्षशक्त्यंशवालोंके साथ बन्ध नहीं होता । उसी प्रकार एक रूक्ष शक्त्यंश-
वालेकी भी योजना करनी चाहिए ।
§ ५९३. इन जघन्य स्निग्ध और रूक्ष शक्त्यंशवालोंके सिवा अन्य स्निग्ध और रूक्ष
पुद्गलोंका परस्पर बन्ध सामान्य रीतिसे प्राप्त हुआ इसलिए इनमें भी जो बन्धयोग्य नहीं हैं उनका
खुलासा करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—

२२८ सर्वार्थसिद्धौ [ ५।३५ § ५९४ –
गुणसाम्ये सदृशानाम् ॥३५॥
§ ५९४. 'सदृश'ग्रहणं तुल्यजातीयसंप्रत्ययार्थम् । 'गुणसाम्य'ग्रहणं तुल्यभागसंप्रत्ययार्थम् ।
एतदुक्तं भवति–द्विगुणस्निग्धानां द्विगुणरूक्षैः त्रिगुणस्निग्धानां द्विगुणरूक्षैः द्विगुणस्निग्धानां
द्विगुणस्निग्धैः द्विगुणरूक्षाणां द्विगुणरूक्षैश्चेत्येवमादिषु नास्ति बन्ध इति । यद्येवं 'सदृश'ग्रहणं
किमर्थम् । गुणवैषम्ये सदृशानामपि बन्धप्रतिपत्त्यर्थं 'सदृश'ग्रहणं क्रियते ।
§ ५९५. अतो विषमगुणानां तुल्यजातीयानामतुल्यजातीयानां चानियमेन बन्धप्रसक्तौ १
इष्टार्थसंप्रत्ययार्थमिदमुच्यते—
द्व्यधिकादिगुणानां तु ॥३६॥
§ ५९६. द्वाभ्यां गुणाभ्यामधिको द्व्यधिकः । कः पुनरसौ । चतुर्गुणः । 'आदि'शब्दः
प्रकारार्थः । कः पुनरसौ प्रकारः । द्व्यधिकता । तेन पञ्चगुणादीनां संप्रत्ययो न भवति । तेन
द्व्यधिकादिगुणानां तुल्यजातीयानामतुल्यजातीयानां च बन्ध उक्तो भवति नेतरेषाम् । तद्यथा—
द्विगुणस्निग्धस्य परमाणोरेकगुणस्निग्धेन द्विगुणस्निग्धेन त्रिगुणस्निग्धेन वा नास्ति बन्धः ।
चतुर्गुणस्निग्धेन पुनरस्ति बन्धः । तस्यैव पुनर्द्विगुणस्निग्धस्य पञ्चगुणस्निग्धेन षट्सप्ताष्टसंख्येया-
नन्तगुणस्निग्धेन वा बन्धो नास्ति । एवं त्रिगुणस्निग्धस्य पञ्चगुणस्निग्धेन बन्धोऽस्ति । शेषैः
पूर्वोत्तरैर्न भवति । चतुर्गुणस्निग्धस्य षड्गुणस्निग्धेनास्ति बन्धः । शेषैः पूर्वोत्तरैर्नास्ति । एवं शेषेष्वपि
समान शक्त्यंश होने पर तुल्यजातिवालोंका बन्ध नहीं होता ॥३५॥
§ ५९४. तुल्य जातिवालोंका ज्ञान करानेके लिए सदृश पदका ग्रहण किया है । तुल्य
शक्त्यंशोंका ज्ञान करानेके लिए 'गुणसाम्य' पदका ग्रहण किया है । तात्पर्य यह है कि दो स्निग्ध
शक्त्यंशवालोंका दो रूक्ष शक्त्यंशवालोंके साथ, तीन स्निग्ध शक्त्यंशवालोंका तीन रूक्ष शक्त्यंश-
वालोंके साथ, दो स्निग्ध शक्त्यंशवालोंका दो स्निग्ध शक्त्यंशवालोंके साथ, दो रूक्ष शक्त्यंशवालोंका
दो रूक्ष शक्त्यंशवालोंके साथ बन्ध नहीं होता । इसी प्रकार अन्यत्र भी जानना चाहिए । शंका—
यदि ऐसा है तो सूत्रमें 'सदृश' पद किसलिए ग्रहण किया है ? समाधान—शक्त्यंशोंकी असमानताके
रहते हुए बन्ध होता है इस बातका ज्ञान करानेके लिए सूत्रमें सदृश पदको ग्रहण किया है ।
§ ५९५. इस उपर्युक्त कथनसे समानजातीय या असमानजातीय विषम शक्त्यंशवालोंका
अनियमसे बन्ध प्राप्त हुआ अतः इष्ट अर्थका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
दो अधिक आदि शक्त्यंशवालोंका तो बन्ध होता है ॥३६॥
§ ५९६. जिसमें दो शक्त्यंश अधिक हों उसे द्व्यधिक कहते हैं । शंका—वह द्व्यधिक कौन
हुआ ? समाधान—चार शक्त्यंशवाला । सूत्रमें आदि शब्द प्रकारवाची है । शंका—वह प्रकार रूप
अर्थ क्या है ? समाधान—द्व्यधिकपना । इससे पाँच शक्त्यंश आदिका ज्ञान नहीं होता । तथा इससे
यह भी तात्पर्य निकल आता है कि समानजातीय या असमानजातीय दो अधिक आदि शक्त्यंशवालों-
का बन्ध होता है दूसरोंका नहीं । जैसे दो स्निग्ध शक्त्यंशवाले परमाणुका एक स्निग्ध शक्त्यंशवाले
परमाणुके साथ, दो स्निग्ध शक्त्यंशवाले परमाणुके साथ और तीन स्निग्ध शक्त्यंशवाले परमाणु-
के साथ बन्ध नहीं होता । हाँ, चार स्निग्ध शक्त्यंशवाले परमाणुके साथ अवश्य बन्ध होता है ।
तथा उसी दो स्निग्ध शक्त्यंशवाले परमाणुका पाँच स्निग्ध शक्त्यंशवाले परमाणुके साथ, इसी
प्रकार छह, सात, आठ, संख्यात, असंख्यात और अनन्त स्निग्ध शक्त्यंशवाले परमाणुके साथ बन्ध
नहीं होता । इसी प्रकार तीन स्निग्ध शक्त्यंशवाले परमाणुका पाँच स्निग्ध शक्त्यंशवाले परमाणुके
साथ बन्ध होता है । किन्तु आगे-पीछेके शेष स्निग्ध शक्त्यंशवाले परमाणुके साथ बन्ध नहीं होता ।
१. –सक्तौ विशिष्टा मु० ।
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वाले पर- १५(Marginal१५` at end)

  • Line 16:
    माणुके साथ अवश्य बन्ध होता है । उसी दो रूक्ष शक्त्यंशवाले परमाणुका आगेके पांच आदि
  • Line 17:
    रूक्ष शक्त्यंशवाले परमाणुओंके साथ बन्ध नहीं होता । इसी प्रकार तीन आदि रूक्ष .शक्त्यंशवाले (Wait, .शक्त्यंशवाले or रूक्ष शक्त्यंशवाले? Line 17 has रूक्ष शक्त्यंशवाले.)
  • Line 18:
    परमाणुओंका भी दो अधिक शक्त्यंशवाले परमाणुओंके साथ बन्ध जान लेना चाहिए । समान
  • Line 19:
    जातीय परमाणुओंमें बन्धका जो क्रम बतलाया है विजातीय परमाणुओंमें भी बन्धका वही क्रम
  • Line 20:
    जानना चाहिए । कहा भी है—'स्निग्धका दो अधिक शक्त्यंशवाले स्निग्धके साथ बन्ध होता है । २० (Marginal २० at end)
  • Line 21:
    रूक्षका दो अधिक शक्त्यंशवाले रूक्षके साथ बन्ध होता है । तथा स्निग्धका रूक्षके साथ सम या
  • Line 22:
    `विषम गुणोंके होनेपर इसी नियमसे बन्ध होता है । किन्तु जघन्य शक्त्यंश

२३० सर्वार्थसिद्धौ [ ५।३७ § ५९८ –
ग्धरूक्षस्य चतुर्गुणादिस्निग्धरूक्षः पारिणामिको भवति । ततः पूर्वावस्थाप्रच्यवनपूर्वकं तार्तीयिकम-
वस्थान्तरं प्रादुर्भवतीत्येकत्वमुपपद्यते । इतरथा हि शुक्लकृष्णतन्तुवत् संयोगे सत्यप्यपारिणामि-
कत्वात्सर्वं विविक्तरूपेणैवावतिष्ठेत । उक्तेन विधिना बन्धे पुनः सति ज्ञानावरणादीनां कर्मणां
त्रिंशत्सागरोपमकोटीकोट्यादिस्थितिरुपपन्ना भवति ।
५ विशेषार्थ—यहाँ एक परमाणुका अन्य परमाणुसे बन्ध कैसे होता है इसका विचार
किया गया है। रूक्ष और स्निग्ध ये विरोधी गुण हैं। जिसमें स्निग्ध गुण होता है उसमें
रूक्ष गुण नहीं होता और जिसमें रूक्ष गुण होता है उसमें स्निग्ध गुण नहीं होता । ये गुण
ही बन्धके कारण होते हैं। किन्तु इसका अभिप्राय यह नहीं कि रूक्ष और स्निग्ध गुणका
सद्भावमात्र बन्धका कारण है क्योंकि ऐसा माननेपर एक भी पुद्गल परमाणु बन्धके बिना
१० नहीं रह सकता, इसलिए यहाँपर विधिनिषेध-द्वारा बतलाया गया है कि किन पुद्गल पर-
माणुओंका परस्परमें बन्ध होता है और किनका नहीं होता है। जो स्निग्ध और रूक्ष गुण
जघन्य शक्त्यंश लिये हुए होते हैं उन पुद्गल-परमाणुओंका बन्ध नहीं होता । इसी प्रकार गुणकी
समानताके होनेपर सदृशोंका बन्ध नहीं होता किन्तु द्व्यधिक गुणवाले पुद्गलपरमाणुका ही
द्व्यहीन गुणवाले पुद्गलपरमाणुके साथ होता है। ऐसा बन्ध स्निग्ध परमाणुका स्निग्ध परमाणुके
१५ साथ, रूक्ष परमाणुका रूक्ष परमाणुके साथ और स्निग्ध परमाणुका रूक्ष परमाणुके साथ होता है
यह नियम है। इसके अनुसार निम्न व्यवस्था फलित होती है—
क्रमांक | गुणांश | सदृशबन्ध | विसदृशबन्ध
१ | जघन्य + जघन्य | नहीं | नहीं
२ | जघन्य + एकादि अधिक | नहीं | नहीं
२० ३ | जघन्येतर + समजघन्येतर | नहीं | नहीं
४ | जघन्येतर + एकाधिकजघन्येतर | नहीं | नहीं
५ | जघन्येतर + द्व्यधिकजघन्येतर | है | है
६ | जघन्येतर + त्र्यादिअधिकजघन्येतर | नहीं | नहीं

  • तत्त्वार्थसूत्रमें निर्दिष्ट यह बन्ध-व्यवस्था प्रवचनसारका अनुसरण करती है। प्रवचनसारमें
    २५ भी इसी प्रकारसे बन्ध व्यवस्थाका निर्देश किया गया है किन्तु षट्खण्डागमके वर्गणाखण्डमें कही
    गयी बन्ध व्यवस्था इससे कुछ भिन्न है जिसका ठीक तरहसे परिज्ञान होनेके लिए आगे कोष्ठक
    दिया जाता है—
    क्रमांक | गुणांश | सदृशबन्ध | विसदृशबन्ध
    १ | जघन्य + जघन्य | नहीं | नहीं
    ३० २ | जघन्य + एकादिअधिक | नहीं | नहीं
    ३ | जघन्येतर + समजघन्येतर | नहीं | है
    ४ | जघन्येतर + एकाधिक जघन्येतर | नहीं | है
    ५ | जघन्येतर + द्व्यधिक जघन्येतर | है | है
    ६ | जघन्येतर + त्र्यादि अधिकजघन्येतर | नहीं | है
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§ ५९९. 'उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सत्' इति द्रव्यलक्षणमुक्तं पुनरपरेण प्रकारेण द्रव्यलक्षण-
प्रतिपादनार्थमाह—
गुणपर्ययवद् द्रव्यम् ॥३८॥
§ ६००. गुणाश्च पर्ययाश्च गुणपर्ययाः । तेऽस्य सन्तीति गुणपर्ययवद् द्रव्यम् । अत्र मतोरु-
त्पत्तावुक्त एव समाधिः । कथंचिद् भेदोपपत्तेरिति । के गुणाः के पर्ययाः । अन्वयिनो गुणा ५
व्यतिरेकिणः पर्ययाः । उभयैरुपेतं द्रव्यमिति । उक्तं च—
"गुण इदि दव्वविहाणं दव्वविकारो हि पज्जवो भणिदो ।
तेहि अणुणं दव्वं अजुदपसिद्धं हवे णिच्चं ॥" इति ॥
एतदुक्तं भवति, द्रव्यं द्रव्यान्तराद् येन विशिष्यते स गुणः । तेन हि तद् द्रव्यं विधीयते ।
असति तस्मिन् द्रव्यसंकरप्रसङ्गः स्यात् । तद्यथा—जीवः पुद्गलादिभ्यो ज्ञानादिभिर्गुणैर्विशिष्यते, १०
पुद्गलादयश्च रूपादिभिः । ततश्चाविशेषे संकरः स्यात् । ततः सामान्यापेक्षया अन्वयिनो ज्ञाना-
दयो जीवस्य गुणाः पुद्गलादीनां च रूपादयः । तेषां विकारा विशेषात्मना भिद्यमानाः पर्ययाः ।
घटज्ञानं पटज्ञानं क्रोधो मानो गन्धो वर्णस्तीव्रो मन्द इत्येवमादयः । तेभ्योऽन्यत्वं कथंचिदपद्य-
मानः समुदायो द्रव्यव्यपदेशभाक् । यदि हि सर्वथा समुदायोऽनर्थान्तरभूत एव स्यात् सर्वाभावः
स्यात् । तद्यथा—परस्परविलक्षणानां समुदाये सति एकानर्थान्तरभावात् समुदायस्य सर्वाभावः १५
परस्परतोऽर्थान्तरभूतत्वात् । यदिदं रूपं तस्मादर्थान्तरभूता रसादयः । ततः समुदायोऽनर्थान्तर-
§ ५९९. 'उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सत्' इस प्रकार द्रव्यका लक्षण कहा किन्तु अब अन्य
प्रकारसे द्रव्यके लक्षणका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
गुण और पर्यायवाला द्रव्य है ॥३८॥
§ ६००. जिसमें गुण और पर्याय दोनों हैं वह गुण पर्यायवाला कहलाता है और वही द्रव्य २०
है । यहाँ 'मतुप्' प्रत्ययका प्रयोग कैसे बनता है इस विषयमें पहले समाधान कर आये हैं । तात्पर्य
यह है कि द्रव्यका गुण और पर्यायोंसे कथंचित् भेद है इसलिए यहाँ 'मतुप्' प्रत्ययका प्रयोग बन
जाता है । शंका—गुण किन्हें कहते हैं और पर्याय किन्हें कहते हैं ? समाधान—गुण अन्वयी होते
हैं और पर्याय व्यतिरेकी । तथा इन दोनोंसे युक्त द्रव्य होता है । कहा भी है—'द्रव्यमें भेद करने-
वाले धर्मको गुण और द्रव्यके विकारको पर्याय कहते हैं। द्रव्य इन दोनोंसे युक्त होता है । तथा २५
वह अयुतसिद्ध और नित्य होता है।' तात्पर्य यह है कि जिससे एक द्रव्य दूसरे द्रव्यसे जुदा होता
है वह गुण है । इसी गुणके द्वारा उस द्रव्यका अस्तित्व सिद्ध होता है । यदि भेदक गुण न हो तो
द्रव्योंमें सांकर्य हो जाय । खुलासा इस प्रकार है—
जीव द्रव्य पुद्गलादिक द्रव्योंसे ज्ञानादि गुणोंके द्वारा भेदको प्राप्त होता है और पुद्गलादिक
द्रव्य भी अपने रूपादि गुणोंके द्वारा भेदको प्राप्त होते हैं। यदि ज्ञानादि गुणोंके कारण विशेषता न ३०
मानी जाय तो सांकर्य प्राप्त होता है । इसलिए सामान्यकी अपेक्षा जो अन्वयी ज्ञानादि हैं वे जीवके
गुण हैं और रूपादिक पुद्गलादिकके गुण हैं । तथा इनके विकार विशेषरूपसे भेदको प्राप्त होते हैं
इसलिए वे पर्याय कहलाते हैं । जैसे घटज्ञान, पटज्ञान, क्रोध, मान, गन्ध, वर्ण, तीव्र और मन्द
आदिक । तथा जो इनसे कथंचित् भिन्न है और समुदाय रूप है वह द्रव्य कहलाता है । यदि
समुदायको सर्वथा अभिन्न मान लिया जाय तो सबका अभाव प्राप्त होता है । खुलासा इस प्रकार ३५
है—परस्पर विलक्षण धर्मोंका समुदाय होनेपर यदि उसे एक और अभिन्न माना जाय तो समुदाय-
का और सबका अभाव प्राप्त होता है, क्योंकि वे धर्म परस्पर भिन्न हैं । जो यह रूप है उससे
१. -प्रसंगात् । तद्य-ता०, ना० ।

२३२ सर्वार्थसिद्धौ [ ५।३९ § ६०१ -
भूतः । यश्च रसादिभ्योऽर्थान्तरभूताद्रूपादनर्थान्तरभूतः समुदायः स कथं रसादिभ्योऽर्थान्तरभूतो
न भवेत् । ततश्च रूपमात्रं समुदायः प्रसक्तः । न चैकं रूपं समुदायो भवितुमर्हति । ततः समु-
दायाभावः । समुदायाभावाच्च तदनर्थान्तरभूतानां समुदायिनामप्यभाव इति सर्वाभावः । एवं
रसादिष्वपि योज्यम् । तस्मात्समुदायमिच्छता कथंचिदर्थान्तरभाव एषितव्यः ।
५ § ६०१. उक्तानां द्रव्याणां लक्षणनिर्देशात्तद्विषय एव द्रव्याध्यवसाये प्रसक्ते अनुक्तद्रव्यसं-
सूचनार्थमिदमाह—
कालश्च ॥३९॥
§ ६०२. किम् । 'द्रव्यम्' इति वाक्यशेषः । कुतः । तल्लक्षणोपेतत्वात् । द्विविधं लक्षण-
मुक्तम्—'उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सत्' 'गुणपर्ययवद् द्रव्यम्' इति च । तदुभयं लक्षणं कालस्य
१० रसादिक भिन्न हैं । अब यदि इनका समुदाय अभिन्न माना जाता है तो रसादिकसे भिन्न जो रूप
है और उससे अभिन्न जो समुदाय है वह रसादिकसे भिन्न कैसे नहीं होगा अर्थात् अवश्य होगा ।
और इस प्रकार समुदाय रूपमात्र प्राप्त होता है । परन्तु एक रूप गुण समुदाय हो नहीं सकता इस-
लिए समुदायका अभाव प्राप्त होता है और समुदायका अभाव हो जानेसे उससे अभिन्न समुदा-
यियोंका भी अभाव होता है इस प्रकार समुदाय और समुदायी सबका अभाव हो जाता है। जिस प्रकार
१५ रूपकी अपेक्षा कथन किया उसी प्रकार रसादिककी अपेक्षा भी कथन करना चाहिए । इसलिए
यदि समुदाय स्वीकार किया जाता है तो वह कथंचित् अभिन्न ही मानना चाहिए ।
विशेषार्थ—पहले उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यसे युक्त द्रव्य होता है यह कह आये हैं । यहां
प्रकारान्तरसे द्रव्यका लक्षण कहा गया है । इसमें द्रव्यको गुणपर्यायवाला बतलाया गया है । बात
यह है कि प्रत्येक द्रव्य अनन्तगुणोंका और क्रमसे होनेवाली उनकी पर्यायोंका पिण्डमात्र है । सर्वत्र
२० गुणोंको अन्वयी और पर्यायोंको व्यतिरेकी बतलाया है। इसका अर्थ यह है कि जिनसे धारामें
एकरूपता बनी रहती है वे गुण कहलाते हैं और जिनसे उसमें भेद प्रतीत होता है वे पर्याय कहलाते
हैं । जीवमें ज्ञानादिक की धाराका, पुद्गलमें रूप रसादिककी धाराका, धर्मद्रव्यमें गतिहेतुत्वकी
धाराका, अधर्मद्रव्यमें स्थितिहेतुत्वकी धाराका, आकाशमें अवगाहन हेतुत्वकी धाराका और काल
द्रव्यमें वर्तनाका कभी विच्छेद नहीं होता इसलिए वे ज्ञानादिक उस उस द्रव्यके गुण हैं किन्तु वे
२५ गुण सदाकाल एकरूप नहीं रहते । जो नित्य द्रव्योंके गुण हैं उन्हें यदि छोड़ भी दिया जाय तो भी
जीव और पुद्गलोंके गुणोंमें प्रतिसमय स्पष्टतया परिणाम लक्षित होता है । उदाहरणार्थ-जीवका
ज्ञानगुण संसार अवस्थामें कभी मतिज्ञानरूप होता है और कभी श्रुतज्ञान रूप । इसीलिए ये मति-
ज्ञानादि ज्ञानगुणकी पर्याय हैं। इसी प्रकार अन्य गुणोंमें भी जान लेना चाहिए । द्रव्य सदा इन
गुणरूप पर्यायों में रहता है इसलिए वह गुणपर्यायवाला कहा गया । फिर भी गुण और पर्यायको
३० द्रव्यसे सर्वथा भिन्न न जानना चाहिए । वे दोनों मिलकर द्रव्यकी आत्मा हैं इसका अभिप्राय यह
है कि गुण और पर्यायको छोड़कर द्रव्य कोई स्वतन्त्र वस्तु नहीं ।
§ ६०१. पूर्वोक्त द्रव्योंके लक्षणका निर्देश करनेसे यह प्राप्त हुआ कि जो उस लक्षणका
विषय है वही द्रव्य है, अतः अभी तक जिस द्रव्यका कथन नहीं किया उसकी सूचना करनेके लिए
आगेका सूत्र कहते हैं—
३५ काल भी द्रव्य है ॥३९॥
§ ६०२. शंका—क्या है ? समाधान—'द्रव्य है' इतना वाक्य शेष है । शंका—काल द्रव्य
क्यों है ? समाधान—क्योंकि इसमें द्रव्यका लक्षण पाया जाता है । जो उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यसे
युक्त है वह सत् है तथा जो गुण और पर्यायवाला है वह द्रव्य है । इस प्रकार द्रव्यका दो प्रकारसे
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विद्यते । तद्यथा—ध्रौव्यं तावत्कालस्य स्वप्रत्ययं स्वभावव्यवस्थानात् । व्ययोदयौ परप्रत्ययौ,
अगुरुलघुगुणवृद्धिहान्यपेक्षया स्वप्रत्ययौ च । तथा गुणा अपि कालस्य साधारणासाधारणरूपाः
सन्ति । तत्रासाधारणो वर्तनाहेतुत्वम्, साधारणाश्चाचेतनत्वामूर्तत्वसूक्ष्मत्वागुरुलघुत्वादयः । पर्या-
याश्च व्ययोत्पादलक्षणा योज्याः । तस्माद् द्विप्रकारलक्षणोपेतत्वादाकाशादिवत्कालस्य द्रव्यत्वं
सिद्धम् । तस्यास्तित्वलिङ्गं धर्मादिवद् व्याख्यातम् 'वर्तनालक्षणः कालः' इति¹। ननु किमर्थमयं
कालः पृथगुच्यते । यत्रैव धर्मादय उक्तास्तत्रैवायमपि वक्तव्यः 'अजीवकाया धर्माधर्माकाशकाल-
पुद्गलाः' इति । नैवं शङ्क्यम्; तत्रोद्देशे सति कायत्वमस्य स्यात् । नेष्यते च मुख्योपचारप्रदेश-
प्रचयकल्पनाभावात् । धर्मादीनां तावन्मुख्यप्रदेशप्रचय उक्तः 'असंख्येयाः प्रदेशाः' इत्येवमादिना ।
अणोरप्येकप्रदेशस्य पूर्वोत्तरभावे²प्रज्ञापननयापेक्षयोपचारकल्पनया प्रदेशप्रचय उक्तः । कालस्य
पुनर्द्वेधापि प्रदेशप्रचयकल्पना नास्तीत्यकायत्वम् । अपि च तत्र पाठे 'निष्क्रियाणि च' इत्यत्र धर्मा-
दीनामाकाशान्तानां निष्क्रियत्वे प्रतिपादिते इतरेषां जीवपुद्गलानां³ सक्रियत्वप्राप्तिकवत्कालस्यापि
सक्रियत्वं स्यात् । अथाकाशात्प्राक्काल उद्दिश्येत⁴ । तन्न; 'आ आकाशादेकद्रव्याणि' इत्येकद्रव्यत्व-
मस्य स्यात् । तस्मात्पृथगिह कालोद्देशः क्रियते । अनेकद्रव्यत्वे सति किमस्य प्रमाणम् । लोका-
काशस्य यावन्तः प्रदेशास्तावन्तः कालाणवो निष्क्रिया एकैकाकाशप्रदेशे एकैकवृत्त्या लोकं व्याप्य
व्यवस्थिताः । उक्तं च—
लक्षण कहा है। वे दोनों ही लक्षण कालमें पाये जाते हैं। खुलासा इस प्रकार है—कालमें ध्रुवता
स्वनििमत्तक है, क्योंकि वह अपने स्वभावमें सदा स्थित है। व्यय और उत्पाद परनिमित्तक हैं,
और अगुरुलघु गुणकी हानि और वृद्धिकी अपेक्षा स्वनििमत्तक भी हैं। तथा कालके साधारण और
असाधारण रूप दो प्रकारके गुण भी हैं। उनमेंसे असाधारण गुण वर्तनाहेतुत्व है और साधारण
गुण अचेतनत्व, अमूर्तत्व, सूक्ष्मत्व और अगुरुलघुत्व आदिक हैं। इसी प्रकार व्यय और उत्पादरूप
पर्याय भी घटित कर लेना चाहिए। इसलिए कालमें जब द्रव्यके दोनों लक्षण पाये जाते हैं तो वह
आकाशके समान स्वतन्त्र द्रव्य है यह सिद्ध होता है। धर्मादिक द्रव्यके समान इसके अस्तित्वके कारण
का व्याख्यान किया ही है कि कालका लक्षण वर्तना है। शंका—काल द्रव्यको अलगसे क्यों कहा ?
जहां धर्मादिक द्रव्योंका कथन किया है वहीं पर इसका कथन करना था जिससे प्रथम सूत्रका रूप
निम्न होता—'अजीवकाया धर्माधर्माकाशकालपुद्गलाः' । समाधान—इस प्रकार शंका करना ठीक
नहीं है; क्योंकि वहां पर यदि इसका कथन करते तो इसे कायपना प्राप्त होता । परन्तु काल द्रव्य
कायवान् नहीं कहा है, क्योंकि इसमें मुख्य और उपचार दोनों प्रकारसे प्रदेशप्रचयकी कल्पनाका
अभाव है । धर्मादिक द्रव्योंका तो 'असंख्येयाः प्रदेशाः' इत्यादिक सूत्र-द्वारा मुख्यरूपसे प्रदेशप्रचय
कहा है । उसी प्रकार एक प्रदेशवाले अणुका भी पूर्वोत्तरभाव प्रज्ञापन नयकी अपेक्षा उपचार-
कल्पनासे प्रदेशप्रचय कहा है परन्तु कालके दोनों प्रकारसे प्रदेशप्रचयकी कल्पना नहीं बनती
इसलिए वह अकाय है । दूसरे यदि प्रथम सूत्र में कालका पाठ रखते हैं तो 'निष्क्रियाणि च'
यहाँपर धर्मसे लेकर आकाश तक के द्रव्योंको निष्क्रिय कहनेपर जैसे जीव और पुद्गलोंको
सक्रियत्व प्राप्त होता है वैसे ही काल द्रव्यको भी सक्रियत्व प्राप्त होता है । शंका—इस दोषको दूर
करनेके लिए आकाशसे पहले कालको रख दिया जाय ? समाधान—यह कहना ठीक नहीं है
क्योंकि 'आकाश तक एक द्रव्य है' इस सूत्र वचनके अनुसार यदि कालको आकाशके पहले रखते
हैं तो उसे एक द्रव्यत्व प्राप्त होता है । ये सब दोष न रहें इसलिए कालका अलगसे कथन किया
है । शंका—काल अनेक द्रव्य हैं इसमें क्या प्रमाण है ? समाधान—लोकाकाशके जितने प्रदेश हैं
१. इति । किमर्थ-मु० । २. -त्तरप्रज्ञा-मु० । ३. -पुद्गलादीनां मु० । ४. -श्यते । आ आका-आ०,
दि० १, दि० २, ता० ।
३०

२३४ सर्वार्थसिद्धौ [ ५।३९ § ६०२ –

“लोगागासपदेसे एक्केक्के जे द्विया हु एक्कक्का ।
रयणाणं रासीविव ते कालाणू मुणेयव्वा ॥”
रूपादिगुणविरहादमूर्ताः ।
उतने कालाणु हैं और वे निष्क्रिय हैं। तात्पर्य यह है कि लोकाकाशके एक-एक प्रदेशपर एक-एक
कालाणु अवस्थित है। कहा भी है—'लोकाकाशके एक-एक प्रदेश पर जो रत्नोंकी राशिके समान
अवस्थित हैं उन्हें कालाणु जानो।' ये कालाणु रूपादि गुणोंसे रहित होनेके कारण अमूर्त हैं।
**विशेषार्थ—**पहले पांच द्रव्योंके अस्तित्वकी चर्चा कर आये हैं। यहाँ छठा द्रव्य काल है
इसका विचार किया जा रहा है। काल द्रव्य है या नहीं इस विषयमें श्वेताम्बर परम्परामें दो मत
मिलते हैं। एक मत तो कालको द्रव्यरूपसे स्वीकार करता है और दूसरा मत कालको स्वतन्त्र
द्रव्य नहीं मानता। इस दूसरे मतके अनुसार सूर्यादिके निमित्तसे जो दिन-रात, घड़ी-घण्टा, पल-
विपल आदि रूप काल अनुभवमें आता है वह सब पुद्गल द्रव्यकी पर्याय है। किन्तु विचारणीय
प्रश्न यह है कि इन जीव पुद्गल आदि द्रव्योंका परिणमन किसके निमित्तसे होता है ? यदि कहा
जाय कि उत्पन्न होना, व्यय होना और ध्रुव रहना यह प्रत्येक द्रव्यका स्वभाव है। इसके लिए
अन्य निमित्तके माननेकी क्या आवश्यकता ? तो इस प्रश्नपर यह तर्क होता है कि यदि इस तरह
सर्वथा स्वभावसे ही प्रत्येक द्रव्यका परिणमन माना जाता है तो गति, स्थिति और अवगाहको भी
सर्वथा स्वभावसे मान लेनेमें क्या आपत्ति है। और ऐसी हालतमें केवल जीव और पुद्गल ये दो
द्रव्य ही अवशिष्ट रहते हैं, शेष द्रव्योंका अभाव प्राप्त होता है, इतना ही क्यों, जीव और पुद्गल-
का तथा पुद्गल और पुद्गलका बन्ध भी सर्वथा स्वाभाविक मानना पड़ता है। निमित्त-नैमित्तिक
भावके माननेकी कोई आवश्यकता ही नहीं रहती और ऐसी अवस्थामें मुक्त जीव भी स्वभावसे
बँधने लगेगा तथा संसारी जीव भी बिना प्रयत्नके कभी भी मुक्त हो जायगा। यदि कहा जाय कि
गति, स्थिति आदि कार्य हैं और जितने भी कार्य होते हैं वे निमित्त और उपादान इन दो के
मिलने पर ही होते हैं, इसलिए गति, स्थिति और अवगाहन रूप कार्योंके निमित्तरूपसे धर्म, अधर्म
और आकाश द्रव्यका अस्तित्व स्वीकार किया जाता है तो प्रत्येक द्रव्यके परिणमनरूपसे काल
द्रव्यके अस्तित्वके स्वीकार करनेमें क्या हानि है अर्थात् कुछ भी नहीं। इस प्रकार विचार करनेपर
काल द्रव्यका अस्तित्व सिद्ध होता है।
फिर भी यह काल द्रव्य जीव आदि अन्य द्रव्योंके समान न तो असंख्यातप्रदेशी है और न
अनन्तप्रदेशी है किन्तु लोकाकाशके जितने प्रदेश हैं उतने काल द्रव्य हैं और प्रत्येक कालद्रव्य
लोकाकाशके एक-एक प्रदेश पर अवस्थित है। खुलासा इस प्रकार है—
प्रचय दो प्रकारका है—तिर्यक्प्रचय और ऊर्ध्वप्रचय। प्रदेशोंके प्रचयको तिर्यक्प्रचय कहते
हैं और कालनिमित्तक पर्यायप्रचयको ऊर्ध्वप्रचय कहते हैं। आकाश अवस्थित अनन्तप्रदेशवाला
होनेसे, धर्म और अधर्म अवस्थित असंख्यात प्रदेशवाला होनेसे, जीव असंख्यात प्रदेशवाला होनेसे
और पुद्गल बन्धकी अपेक्षा अनेक प्रदेशरूप शक्तिसे युक्त होनेके कारण इनका प्रदेशप्रचय बन
जाता है, किन्तु कालद्रव्य शक्ति और व्यक्ति दोनों रूपसे एक प्रदेशरूप होनेके कारण उसमें प्रदेश-
प्रचय नहीं बनता। ऊर्ध्वप्रचय सब द्रव्योंका होता है किन्तु इतनी विशेषता है कि अन्य पांच
द्रव्योंमें समयनिमित्तक पर्यायप्रचयरूप ऊर्ध्वप्रचय होता है और कालद्रव्यमें मात्र समयप्रचयरूप
ऊर्ध्वप्रचय होता है, क्योंकि अन्य द्रव्योंके परिणमनमें काल द्रव्य निमित्त है और काल द्रव्यके
अपने परिणमनमें अन्य कोई निमित्त नहीं है। वही निमित्त है और वही उपादान है। जिस प्रकार
वह अन्य द्रव्योंके परिणमनमें निमित्त होता है उसी प्रकार अपने परिणमनमें भी निमित्त होता

  • ५।४० § ६०४ ] पञ्चमोऽध्यायः - २३५
    § ६०३. वर्तनालक्षणस्य मुख्यस्य कालस्य प्रमाणमुक्तम् । परिणामादिगम्यस्य व्यवहार-
    कालस्य किं प्रमाणमित्यत इदमुच्यते—
    सोऽनन्तसमयः ॥४०॥
    § ६०४. साम्प्रतिकस्यैकसमयिकत्वेऽपि अतीता अनागताश्च समया अनन्ता इति कृत्वा
    'अनन्तसमयः' इत्युच्यते । अथवा मुख्यस्यैव कालस्य प्रमाणावधारणार्थमिदमुच्यते । अनन्तपर्याय-
    वर्तनाहेतुत्वादेकोऽपि कालाणुरनन्त इत्युपचर्यते । समयः पुनः परमनिरुद्धः कालांशस्तत्प्रचयविशेष
    आवलिकादिरवगन्तव्यः ।
    है । किन्तु जिस प्रकार अन्य द्रव्य अपने-अपने उपादानके अनुसार परिणमन करते हैं उसी प्रकार
    काल द्रव्य भी अपने उपादान के अनुसार परिणमन करता है ।
    इस प्रकार यद्यपि उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यरूपसे तथा गुण और पर्यायरूपसे काल द्रव्यके
    अस्तित्वकी सिद्धि हो जाती है पर वह अखण्ड एकप्रदेशी है यह सिद्ध नहीं होता, इसलिए आगे
    इसी बातका विचार करते हैं—
    एक पुद्गल परमाणु मन्दगतिसे एक आकाश प्रदेशसे दूसरे आकाश प्रदेश पर जाता है
    और इसमें कुछ समय भी लगता है । यदि विचार कर देखा जाय तो ज्ञात होगा कि यह समय ही
    काल द्रव्यकी पर्याय है जो कि अतिसूक्ष्म होनेसे निरंश है। यदि कालद्रव्यको लोकाकाशके बराबर
    अखण्ड और एक माना जाता है तो इस अखण्ड समय पर्यायकी निष्पत्ति नहीं होती, क्योंकि
    पुद्गल परमाणु जब एक कालाणुको छोड़कर दूसरे कालाणुके प्रति गमन करता है तब वहाँ दोनों
    कालाणु पृथक्-पृथक् होनेसे समयका भेद बन जाता है। और यदि एक अखण्ड लोकके बराबर
    कालद्रव्य होवे तो समय पर्यायकी सिद्धि किस तरह हो सकती है? यदि कहा जाय कि कालद्रव्य
    लोकप्रमाण असंख्यात प्रदेशी है, उसके एक प्रदेशसे दूसरे प्रदेशके प्रति जानेपर समय पर्यायकी
    सिद्धि हो जायगी तो इसका समाधान यह है कि ऐसा मानने पर एक अखण्डद्रव्यके एक प्रदेशसे
    दूसरे प्रदेशपर जाने पर समय पर्यायका भेद नहीं बनता । इसलिए समय पर्यायमें भेद सिद्ध करने-
    के लिए काल द्रव्यको अणुरूपमें स्वीकार कर लिया गया है। इस प्रकार काल द्रव्य क्या है और
    वह एक प्रदेशी कैसे है इस बातका विचार किया ।
    § ६०३. वर्तना लक्षणवाले मुख्य कालका प्रमाण कहा। परन्तु परिणाम आदिके द्वारा
    जानने योग्य व्यवहार कालका क्या प्रमाण है ? इस बातका ज्ञान करानेके लिए अब आगेका सूत्र
    कहते हैं—
    वह अनन्त समयवाला है ॥४०॥
    § ६०४. यद्यपि वर्तमान काल एक समय वाला है तो भी अतीत और अनागत अनन्त
    समय हैं ऐसा मानकर कालको अनन्त समयवाला कहा है। अथवा मुख्य कालका निश्चय करनेके
    लिए यह सूत्र कहा है । तात्पर्य यह है कि अनन्त पर्यायें वर्तना गुणके निमित्तसे होती हैं इसलिए
    एक कालाणुको भी उपचारसे अनन्त कहा है। परन्तु समय अत्यन्त सूक्ष्म कालांश है और उसके
    समुदायको आवलि आदि जानना चाहिए ।
    विशेषार्थ—समय शब्द द्रव्य और पर्याय दोनों अर्थोंमें व्यवहृत होता है । यहाँ पर्यायरूप
    अर्थ लिया गया है। इससे व्यवहार काल और निश्चय काल दोनोंकी सिद्धि होती है। एक-एक
    समयका समुच्चय होकर जो आवलि, पल आदि कालका व्यवहार होता है वह व्यवहारकाल है
    और यह समय-पर्याय बिना पर्यायीके नहीं हो सकती, इससे निश्चय कालका ज्ञान होता है यह
    उक्त कथनका तात्पर्य है।
    १. -निकृष्टः कालां-दि० १ ।

२३६ | सर्वार्थसिद्धौ | [ ५।४१ § ६०५ -
§ ६०५. आह गुणपर्ययवद् द्रव्यमित्युक्तं तत्र के गुणा इत्यत्रोच्यते—
द्रव्याश्रया निर्गुणा गुणाः ॥४१॥
§ ६०६. द्रव्यमाश्रयो येषां ते द्रव्याश्रयाः । निष्क्रान्ता गुणेभ्यो निर्गुणाः । एवमुभयलक्षणो-
पेता गुणा इति । ‘निर्गुणाः' इति विशेषणं द्व्यणुकादिनिवृत्त्यर्थम् । तान्यपि हि कारणभूतपरमाणु-
द्रव्याश्रयाणि गुणवन्ति तु तस्मात् ‘निर्गुणाः' इति विशेषणात्तानि निर्वर्त्तितानि भवन्ति । ननु
पर्याया अपि घटसंस्थानादयो द्रव्याश्रया निर्गुणाश्च, तेषामपि गुणत्वं प्राप्नोति । 'द्रव्याश्रयाः' इति
वचनात् ‘नित्यं द्रव्यमाश्रित्य वर्तन्ते¹ ये' ते गुणा इति ²विशेषात्पर्याया निर्वर्तिता भवन्ति । ते हि
कादाचित्का इति ।
§ ६०५. 'गुण और पर्यायवाला द्रव्य है' यह पहले कह आये हैं। अब गुण क्या है यह
बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
जो निरन्तर द्रव्यमें रहते हैं और गुणरहित हैं वे गुण हैं ॥४१॥
§ ६०६. जिनके रहनेका आश्रय द्रव्य है वे द्रव्याश्रय कहलाते हैं और जो गुणोंसे रहित हैं
वे निर्गुण कहे जाते हैं। इस प्रकार इन दोनों लक्षणोंसे युक्त गुण होते हैं। सूत्रमें 'निर्गुणाः' यह
विशेषण द्व्यणुक आदिके निराकरण करनेके लिए दिया है। वे भी अपने कारणभूत परमाणु द्रव्य-
के आश्रयसे रहते हैं और गुणवाले हैं, इसलिए 'निर्गुणाः' इस विशेषणसे उनका निषेध किया गया
है। शंका—घटसंस्थान आदि जितनी पर्याय हैं वे सब द्रव्यके आश्रयसे रहती हैं और निर्गुण होती
हैं अतः गुणके उक्त लक्षणके अनुसार उन्हें भी गुणत्व प्राप्त होता है ? समाधान—सूत्रमें जो
'द्रव्याश्रयाः' विशेषण है उसका यह अभिप्राय है कि जो सदा द्रव्यके आश्रयसे रहते हैं वे गुण हैं।
इस प्रकार 'सदा' विशेषण लगानेसे पर्यायोंका निषेध हो जाता है अर्थात् गुणका लक्षण पर्यायोंमें
नहीं जाता है; क्योंकि पर्याय कादाचित्क होती हैं।
विशेषार्थ—पहले गुण और पर्यायवाला द्रव्य है यह कह आये हैं। यहाँ गुणके स्वरूपका
विचार किया गया है। जब कि द्रव्यको गुण और पर्यायवाला बतलाया है तब इसीसे स्पष्ट है कि
गुण द्रव्यके आश्रयसे रहते हैं अर्थात् द्रव्य आधार है और गुण आधेय है। पर इससे आधार और
आधेयमें दही और कुण्डके समान सर्वथा भेदपक्षका ग्रहण नहीं करना चाहिए क्योंकि गुण द्रव्यके
आश्रयसे रहते हुए भी वे उससे कथंचित् अभिन्न हैं जैसे-तैल तिलके सब अवयवोंमें व्याप्त होकर
रहता है वैसे ही प्रत्येक गुण द्रव्यके सभी अवयवोंमें समान रूपसे व्याप्त होकर रहता है, पर इससे
द्व्यणुक आदिमें भी यह लक्षण घटित हो जाता है क्योंकि द्व्यणुक आदि भी अपने आधारभूत
परमाणु द्रव्यके आश्रयसे रहते हैं। अतएव जो स्वयं विशेष रहित हों वे गुण हैं यह कहा है। ऐसा
नियम है कि जैसे द्रव्यमें गुण पाये जाते हैं वैसे गुणमें अन्य गुण नहीं रहते। अतएव गुण स्वयं
विशेष रहित रहते हैं, इस प्रकार यद्यपि जो द्रव्यके आश्रयसे रहते हैं और स्वयं विशेष रहित हैं
वे गुण हैं, गुणका इतना लक्षण फलित हो जाता है पर यह पर्यायोंमें भी पाया जाता है। क्योंकि
वे भी द्रव्यके आश्रयसे रहती हैं और स्वयं विशेषरहित होती हैं। इसलिए इस अतिव्याप्ति दोषका
निराकरण करनेके लिए जो द्रव्यके आश्रयसे रहते हैं इसका अर्थ-जो द्रव्यके आश्रयसे सदा रहते
हैं, इतना समझना चाहिए। इस प्रकार गुणोंके स्वरूपका विचार किया। गुणका एक नाम विशेष
भी है। जिनके निमित्तसे एक द्रव्य अन्य द्रव्यसे भेद को प्राप्त हों वे विशेष अर्थात् गुण हैं यह उक्त
कथनका तात्पर्य है। ऐसे गुण प्रत्येक द्रव्यमें अनन्त होते हैं। उनमें कुछ सामान्य होते हैं और कुछ
विशेष। जो एकाधिक द्रव्योंमें उपलब्ध होते हैं वे सामान्यगुण कहलाते हैं और जो प्रत्येक द्रव्यकी
विशेषताको व्यक्त करते हैं वे विशेषगुण कहलाते हैं।
१. -र्तन्ते गुणा मु० । २. विशेषणत्वात्पर्यायाश्च निव-मु० ।

  • ५।४२ § ६०८ ] पञ्चमोऽध्यायः २३७
    § ६०७. असकृत् 'परिणाम' शब्द उक्तः । तस्य कोऽर्थ इति प्रश्ने उत्तरमाह—
    तद्भावः परिणामः ॥४२॥
    § ६०८. अथवा गुणा द्रव्यादर्थान्तरभूता इति केषांचिद्दर्शनं तत्किं भवतोऽभिमतम् । न;
    इत्याह—यद्यपि कथंचिद् व्यपदेशादिभेदहेत्वपेक्षया द्रव्यादन्ये, तथापि तदव्यतिरेकात्तत्परिणामाच्च
    नान्ये । यद्येवं स उच्यतां कः परिणाम इति । तन्निश्चयार्थमिदमुच्यते—धर्मादीनि द्रव्याणि येना- ५
    त्मना भवन्ति स तद्भावस्तत्त्वं परिणाम इति आख्यायते । स द्विविधोऽनादिरादिमांश्च । तत्रा-
    नादिर्धर्मादीनां गत्युपग्रहादिः सामान्यापेक्षया । स एवादिमांश्च भवति विशेषापेक्षया इति ।
    इति तत्त्वार्थवृत्तौ सर्वार्थसिद्धिसंज्ञिकायां पञ्चमोऽध्यायः ।
    § ६०७. परिणाम शब्दका अनेक बार उल्लेख किया; परन्तु उसका क्या तात्पर्य है ऐसा
    प्रश्न होनेपर अगले सूत्र द्वारा इसीका उत्तर देते हैं— १०
    उसका होना अर्थात् प्रति समय बदलते रहना परिणाम है ॥४२॥
    § ६०८. अथवा गुण द्रव्यसे अलग हैं यह किन्हींका मत है । वह क्या आपके (जैन) मतमें
    स्वीकार है ? नहीं, इसलिए कहते हैं कि संज्ञा आदिके निमित्तसे प्राप्त होनेवाले भेदके कारण गुण
    द्रव्यसे कथंचित् भिन्न हैं तो भी वे द्रव्यसे भिन्न नहीं पाये जाते हैं और द्रव्यके परिणाम हैं इसलिए
    भिन्न नहीं भी हैं। यदि ऐसा है तो वह बात कहिए जिससे परिणामका स्वरूप ज्ञात हो । बस १५
    इसी बातका निश्चय करनेके लिए कहते हैं—धर्मादिक द्रव्य जिस रूपसे होते हैं वह तद्भाव या
    तत्त्व है और इसे ही परिणाम कहते हैं । वह दो प्रकारका है—अनादि और सादि । उनमें-से
    धर्मादिक द्रव्यके जो गत्युपग्रहादिक होते हैं वे सामान्यकी अपेक्षा अनादि हैं और विशेषकी अपेक्षा
    सादि हैं।
    इस प्रकार सर्वार्थसिद्धि नामक तत्त्वार्थवृत्तिमें पाँचवाँ अध्याय समाप्त हुआ । २०
    १. हेतुत्वापेक्ष-मु० ।

अथ षष्ठोऽध्यायः
§ ६०९. आहे, अजीवपदार्थो व्याख्यातः । इदानीं तदनन्तरोद्देशभागास्रवपदार्थो व्याख्येय
इति तत्तत्प्रसिद्ध्यर्थमिदमुच्यते—
कायवाङ्मनःकर्म योगः ॥१॥
५ § ६१०. कायादयः शब्दा व्याख्यातार्थाः । कर्म क्रिया इत्यनर्थान्तरम् । कायवाङ्मनसां
कर्म कायवाङ्मनःकर्म योग इत्याख्यायते । आत्मप्रदेशपरिस्पन्दो योगः । स निमित्तभेदात्त्रिधा
भिद्यते । काययोगो वाग्योगो मनोयोग इति । तद्यथा—वीर्यान्तरायक्षयोपशमसद्भावे सति
औदारिकादिसप्तविधकायवर्गणान्यतमालम्बनापेक्ष आत्मप्रदेशपरिस्पन्दः काययोगः । शरीरनाम-
कर्मोदयापादितवाग्वर्गणालम्बने सति वीर्यान्तरायमत्यक्षराद्यावरणक्षयोपशमापादिताभ्यन्तर-
१० वाग्लब्धिसंनिधौ वाक्परिणामाभिमुख्यस्यात्मनः प्रदेशपरिस्पन्दो वाग्योगः । अभ्यन्तरवीर्यान्तरायनो-
इन्द्रियावरणक्षयोपशमात्मकमनोलब्धिसंनिधाने बाह्यनिमित्तमनोवर्गणालम्बने च सति मनःपरि-
णामाभिमुख्यस्यात्मप्रदेशपरिस्पन्दो मनोयोगः । क्षयेऽपि त्रिविधवर्गणापेक्षः सयोगकेवलिन
आत्मप्रदेशपरिस्पन्दो योगो वेदितव्यः ।
§ ६०९. जीव और अजीवका व्याख्यान किया । अब उसके बाद आस्रव पदार्थका
१५ व्याख्यान क्रम प्राप्त है । अतः उसे स्पष्ट करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
काय, वचन और मनकी क्रिया योग है ॥१॥
§ ६१०. काय आदि शब्दोंका व्याख्यान पहले कर आये हैं। कर्म और क्रिया ये एकार्थवाची
नाम हैं । काय, वचन और मनकी क्रियाको योग कहते हैं यह इसका तात्पर्य है । आत्माके
प्रदेशोंका परिस्पन्द-हलन चलन योग है । वह निमित्तोंके भेदसे तीन प्रकारका है-काययोग,
२० वचनयोग और मनोयोग । खुलासा इस प्रकार है-वीर्यान्तराय कर्मके क्षयोपशमके होनेपर
औदारिक आदि सात प्रकारकी कायवर्गणाओंमें-से किसो एक प्रकारकी वर्गणाओंके आलम्बनसे
होनेवाला आत्मप्रदेश परिस्पन्द काययोग कहलाता है । शरीर नामकर्मके उदयसे प्राप्त
हुई वचन-वर्गणाओंका आलम्बन होनेपर तथा वीर्यान्तराय और मत्यक्षरादि आवरणके
क्षयोपशमसे प्राप्त हुई भीतरी वचनलब्धिके मिलनेपर वचनरूप पर्यायके सन्मुख हुए आत्माके
२५ होनेवाला प्रदेश-परिस्पन्द वचनयोग कहलाता है । वीर्यान्तराय और नो इन्द्रियावरणके
क्षयोपशमरूप आन्तरिक मनोलब्धिके होनेपर तथा बाहरी निमित्तभूत मनोवर्गणाओंका
आलम्बन मिलनेपर मनरूप पर्यायके सन्मुख हुए आत्माके होनेवाला प्रदेश-परिस्पन्द मनोयोग
कहलाता है । वीर्यान्तराय और ज्ञानावरण कर्मके क्षय हो जानेपर भी सयोगकेवलीके जो
तीन प्रकारकी वर्गणाओंकी अपेक्षा आत्मप्रदेश-परिस्पन्द होता है वह भी योग है ऐसा जानना
३० चाहिए ।
१. अथाजीवप- मु० । आह जीवाजीवप-ता०, ना० । इत्यजीवप-दि० २ । २. आत्मनः प्रदे-आ०,
दि० १, दि. २ ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

अध्याय ७-८: अणुव्रत, महाव्रत एवं अष्टविध कर्म-प्रकृति बन्ध विचार

  • ६१३ § ६१४ ] षष्ठोऽध्यायः २३९

§ ६११. आह, १अभ्युपेतः आहितत्रैविध्यक्रियो योग इति । प्रकृत इदानीं निर्दिश्यतां
किंलक्षण आस्रव इत्युच्यते । योऽयं योगशब्दाभिधेयः संसारिणः पुरुषस्य—
स आस्रवः ॥ २ ॥
§ ६१२. यथा सरस्सलिलावाहिद्वारं तदास्रवकारणत्वाद् आस्रव इत्याख्यायते तथा योग-
प्रणालिकया आत्मनः कर्म आस्रवतीति योग आस्रव इति व्यपदेशमर्हति ।
§ ६१३. आह कर्म द्विविधं पुण्यं पापं चेति । तस्य किमविशेषेण योग आस्रवहेतुराहोस्विदस्ति
कश्चित्प्रतिविशेष इत्यत्रोच्यते—
शुभः पुण्यस्याशुभः पापस्य ॥ ३ ॥
§ ६१४. कः शुभो योगः को वा अशुभः । प्राणातिपातादत्तादानमैथुनादिरशुभः काययोगः ।
अनृतभाषणपरुषासभ्यवचनादिरशुभो वाग्योगः । वधचिन्तनेर्ष्यासूयादिरशुभो मनोयोगः । ततो
विपरीतः शुभः । कथं योगस्य शुभाशुभत्वम् । शुभपरिणामनिर्वृत्तो योगः शुभः । अशुभपरिणामनि-
वृंत्तश्चाशुभः । न पुनः शुभाशुभकर्मकारणत्वेन । यद्येवमुच्यते शुभयोग एव न स्यात् शुभयोगस्यापि
ज्ञानावरणादिबन्धहेतुत्वाभ्युपगमात् । पुनात्यात्मानं पूयतेऽनेनेति वा पुण्यम् । तत्तद्भेद्यादि । पाति
रक्षति आत्मानं शुभादिति पापम्³ । तदसद्भेद्यादि ।
§ ६११. यह तो जाना कि तीन प्रकारकी क्रिया योग है। अब यह बतलाइए कि आस्रवका
क्या लक्षण है ? संसारी जीवके जो यह योग शब्दका वाच्य कहा है—
वही आस्रव है ॥ २ ॥
§ ६१२. जिस प्रकार तालाबमें जल लानेका दरवाजा जलके आनेका कारण होनेसे आस्रव
कहलाता है उसी प्रकार आत्माके साथ बँधनेके लिए कर्म योगरूपी नालीके द्वारा आते हैं इसलिए
योग आस्रव संज्ञाको प्राप्त होता है ।
§ ६१३. कर्म दो प्रकारका है—पुण्य और पाप, इसलिए क्या योग सामान्यरूपसे उनके
आस्रवका कारण है या कोई विशेषता है ? इसी बातके बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
शुभयोग पुण्यका और अशुभयोग पापका आस्रव है ॥ ३ ॥
§ ६१४. शंका—शुभ योग क्या है और अशुभ योग क्या है ? समाधान—हिंसा, चोरी.
और मैथुन आदिक अशुभ काययोग है। असत्य वचन, कठोर वचन और असभ्य वचन आदि
अशुभ वचनयोग है। मारनेका विचार, ईर्ष्या और डाह आदि अशुभ मनोयोग है। तथा इनसे
विपरीत शुभकाय योग, शुभ वचनयोग और शुभ मनोयोग है। शंका—योगके शुभ और अशुभ ये भेद
किस कारणसे हैं ? समाधान—जो योग शुभ परिणामोंके निमित्तसे होता है वह शुभ योग है और जो
योग अशुभ परिणामोंके निमित्तसे होता है वह अशुभ योग है। शायद कोई यह माने कि शुभ और
अशुभ कर्मका कारण होनेसे शुभ और अशुभ योग होता है सो बात नहीं है; क्योंकि यदि इस
प्रकार इनका लक्षण कहा जाता है तो शुभयोग ही नहीं हो सकता, क्योंकि शुभयोगको भी
ज्ञानावरणादि कर्मोंके बन्धका कारण माना है। इसलिए शुभ और अशुभ योगका जो लक्षण यहाँ
पर किया है वही सही है। जो आत्माको पवित्र करता है या जिससे आत्मा पवित्र होता है वह
पुण्य है। जैसे सातावेदनीय आदि तथा जो आत्माको शुभसे बचाता है वह पाप है; जैसे असाता
वेदनीय आदि ।
१. अभ्युपगत आहि-मु० । २. आस्रवणहेतु-मु०, ता०, ना० । ३. पापम् । असद्भे-मु० ।