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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 346, कुल 558 में से

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पृष्ठ 346

२३४ सर्वार्थसिद्धौ [ ५।३९ § ६०२ –

“लोगागासपदेसे एक्केक्के जे द्विया हु एक्कक्का ।
रयणाणं रासीविव ते कालाणू मुणेयव्वा ॥”
रूपादिगुणविरहादमूर्ताः ।
उतने कालाणु हैं और वे निष्क्रिय हैं। तात्पर्य यह है कि लोकाकाशके एक-एक प्रदेशपर एक-एक
कालाणु अवस्थित है। कहा भी है—'लोकाकाशके एक-एक प्रदेश पर जो रत्नोंकी राशिके समान
अवस्थित हैं उन्हें कालाणु जानो।' ये कालाणु रूपादि गुणोंसे रहित होनेके कारण अमूर्त हैं।
**विशेषार्थ—**पहले पांच द्रव्योंके अस्तित्वकी चर्चा कर आये हैं। यहाँ छठा द्रव्य काल है
इसका विचार किया जा रहा है। काल द्रव्य है या नहीं इस विषयमें श्वेताम्बर परम्परामें दो मत
मिलते हैं। एक मत तो कालको द्रव्यरूपसे स्वीकार करता है और दूसरा मत कालको स्वतन्त्र
द्रव्य नहीं मानता। इस दूसरे मतके अनुसार सूर्यादिके निमित्तसे जो दिन-रात, घड़ी-घण्टा, पल-
विपल आदि रूप काल अनुभवमें आता है वह सब पुद्गल द्रव्यकी पर्याय है। किन्तु विचारणीय
प्रश्न यह है कि इन जीव पुद्गल आदि द्रव्योंका परिणमन किसके निमित्तसे होता है ? यदि कहा
जाय कि उत्पन्न होना, व्यय होना और ध्रुव रहना यह प्रत्येक द्रव्यका स्वभाव है। इसके लिए
अन्य निमित्तके माननेकी क्या आवश्यकता ? तो इस प्रश्नपर यह तर्क होता है कि यदि इस तरह
सर्वथा स्वभावसे ही प्रत्येक द्रव्यका परिणमन माना जाता है तो गति, स्थिति और अवगाहको भी
सर्वथा स्वभावसे मान लेनेमें क्या आपत्ति है। और ऐसी हालतमें केवल जीव और पुद्गल ये दो
द्रव्य ही अवशिष्ट रहते हैं, शेष द्रव्योंका अभाव प्राप्त होता है, इतना ही क्यों, जीव और पुद्गल-
का तथा पुद्गल और पुद्गलका बन्ध भी सर्वथा स्वाभाविक मानना पड़ता है। निमित्त-नैमित्तिक
भावके माननेकी कोई आवश्यकता ही नहीं रहती और ऐसी अवस्थामें मुक्त जीव भी स्वभावसे
बँधने लगेगा तथा संसारी जीव भी बिना प्रयत्नके कभी भी मुक्त हो जायगा। यदि कहा जाय कि
गति, स्थिति आदि कार्य हैं और जितने भी कार्य होते हैं वे निमित्त और उपादान इन दो के
मिलने पर ही होते हैं, इसलिए गति, स्थिति और अवगाहन रूप कार्योंके निमित्तरूपसे धर्म, अधर्म
और आकाश द्रव्यका अस्तित्व स्वीकार किया जाता है तो प्रत्येक द्रव्यके परिणमनरूपसे काल
द्रव्यके अस्तित्वके स्वीकार करनेमें क्या हानि है अर्थात् कुछ भी नहीं। इस प्रकार विचार करनेपर
काल द्रव्यका अस्तित्व सिद्ध होता है।
फिर भी यह काल द्रव्य जीव आदि अन्य द्रव्योंके समान न तो असंख्यातप्रदेशी है और न
अनन्तप्रदेशी है किन्तु लोकाकाशके जितने प्रदेश हैं उतने काल द्रव्य हैं और प्रत्येक कालद्रव्य
लोकाकाशके एक-एक प्रदेश पर अवस्थित है। खुलासा इस प्रकार है—
प्रचय दो प्रकारका है—तिर्यक्प्रचय और ऊर्ध्वप्रचय। प्रदेशोंके प्रचयको तिर्यक्प्रचय कहते
हैं और कालनिमित्तक पर्यायप्रचयको ऊर्ध्वप्रचय कहते हैं। आकाश अवस्थित अनन्तप्रदेशवाला
होनेसे, धर्म और अधर्म अवस्थित असंख्यात प्रदेशवाला होनेसे, जीव असंख्यात प्रदेशवाला होनेसे
और पुद्गल बन्धकी अपेक्षा अनेक प्रदेशरूप शक्तिसे युक्त होनेके कारण इनका प्रदेशप्रचय बन
जाता है, किन्तु कालद्रव्य शक्ति और व्यक्ति दोनों रूपसे एक प्रदेशरूप होनेके कारण उसमें प्रदेश-
प्रचय नहीं बनता। ऊर्ध्वप्रचय सब द्रव्योंका होता है किन्तु इतनी विशेषता है कि अन्य पांच
द्रव्योंमें समयनिमित्तक पर्यायप्रचयरूप ऊर्ध्वप्रचय होता है और कालद्रव्यमें मात्र समयप्रचयरूप
ऊर्ध्वप्रचय होता है, क्योंकि अन्य द्रव्योंके परिणमनमें काल द्रव्य निमित्त है और काल द्रव्यके
अपने परिणमनमें अन्य कोई निमित्त नहीं है। वही निमित्त है और वही उपादान है। जिस प्रकार
वह अन्य द्रव्योंके परिणमनमें निमित्त होता है उसी प्रकार अपने परिणमनमें भी निमित्त होता