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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 340, कुल 558 में से

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पृष्ठ 340

२२८ सर्वार्थसिद्धौ [ ५।३५ § ५९४ –
गुणसाम्ये सदृशानाम् ॥३५॥
§ ५९४. 'सदृश'ग्रहणं तुल्यजातीयसंप्रत्ययार्थम् । 'गुणसाम्य'ग्रहणं तुल्यभागसंप्रत्ययार्थम् ।
एतदुक्तं भवति–द्विगुणस्निग्धानां द्विगुणरूक्षैः त्रिगुणस्निग्धानां द्विगुणरूक्षैः द्विगुणस्निग्धानां
द्विगुणस्निग्धैः द्विगुणरूक्षाणां द्विगुणरूक्षैश्चेत्येवमादिषु नास्ति बन्ध इति । यद्येवं 'सदृश'ग्रहणं
किमर्थम् । गुणवैषम्ये सदृशानामपि बन्धप्रतिपत्त्यर्थं 'सदृश'ग्रहणं क्रियते ।
§ ५९५. अतो विषमगुणानां तुल्यजातीयानामतुल्यजातीयानां चानियमेन बन्धप्रसक्तौ १
इष्टार्थसंप्रत्ययार्थमिदमुच्यते—
द्व्यधिकादिगुणानां तु ॥३६॥
§ ५९६. द्वाभ्यां गुणाभ्यामधिको द्व्यधिकः । कः पुनरसौ । चतुर्गुणः । 'आदि'शब्दः
प्रकारार्थः । कः पुनरसौ प्रकारः । द्व्यधिकता । तेन पञ्चगुणादीनां संप्रत्ययो न भवति । तेन
द्व्यधिकादिगुणानां तुल्यजातीयानामतुल्यजातीयानां च बन्ध उक्तो भवति नेतरेषाम् । तद्यथा—
द्विगुणस्निग्धस्य परमाणोरेकगुणस्निग्धेन द्विगुणस्निग्धेन त्रिगुणस्निग्धेन वा नास्ति बन्धः ।
चतुर्गुणस्निग्धेन पुनरस्ति बन्धः । तस्यैव पुनर्द्विगुणस्निग्धस्य पञ्चगुणस्निग्धेन षट्सप्ताष्टसंख्येया-
नन्तगुणस्निग्धेन वा बन्धो नास्ति । एवं त्रिगुणस्निग्धस्य पञ्चगुणस्निग्धेन बन्धोऽस्ति । शेषैः
पूर्वोत्तरैर्न भवति । चतुर्गुणस्निग्धस्य षड्गुणस्निग्धेनास्ति बन्धः । शेषैः पूर्वोत्तरैर्नास्ति । एवं शेषेष्वपि
समान शक्त्यंश होने पर तुल्यजातिवालोंका बन्ध नहीं होता ॥३५॥
§ ५९४. तुल्य जातिवालोंका ज्ञान करानेके लिए सदृश पदका ग्रहण किया है । तुल्य
शक्त्यंशोंका ज्ञान करानेके लिए 'गुणसाम्य' पदका ग्रहण किया है । तात्पर्य यह है कि दो स्निग्ध
शक्त्यंशवालोंका दो रूक्ष शक्त्यंशवालोंके साथ, तीन स्निग्ध शक्त्यंशवालोंका तीन रूक्ष शक्त्यंश-
वालोंके साथ, दो स्निग्ध शक्त्यंशवालोंका दो स्निग्ध शक्त्यंशवालोंके साथ, दो रूक्ष शक्त्यंशवालोंका
दो रूक्ष शक्त्यंशवालोंके साथ बन्ध नहीं होता । इसी प्रकार अन्यत्र भी जानना चाहिए । शंका—
यदि ऐसा है तो सूत्रमें 'सदृश' पद किसलिए ग्रहण किया है ? समाधान—शक्त्यंशोंकी असमानताके
रहते हुए बन्ध होता है इस बातका ज्ञान करानेके लिए सूत्रमें सदृश पदको ग्रहण किया है ।
§ ५९५. इस उपर्युक्त कथनसे समानजातीय या असमानजातीय विषम शक्त्यंशवालोंका
अनियमसे बन्ध प्राप्त हुआ अतः इष्ट अर्थका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
दो अधिक आदि शक्त्यंशवालोंका तो बन्ध होता है ॥३६॥
§ ५९६. जिसमें दो शक्त्यंश अधिक हों उसे द्व्यधिक कहते हैं । शंका—वह द्व्यधिक कौन
हुआ ? समाधान—चार शक्त्यंशवाला । सूत्रमें आदि शब्द प्रकारवाची है । शंका—वह प्रकार रूप
अर्थ क्या है ? समाधान—द्व्यधिकपना । इससे पाँच शक्त्यंश आदिका ज्ञान नहीं होता । तथा इससे
यह भी तात्पर्य निकल आता है कि समानजातीय या असमानजातीय दो अधिक आदि शक्त्यंशवालों-
का बन्ध होता है दूसरोंका नहीं । जैसे दो स्निग्ध शक्त्यंशवाले परमाणुका एक स्निग्ध शक्त्यंशवाले
परमाणुके साथ, दो स्निग्ध शक्त्यंशवाले परमाणुके साथ और तीन स्निग्ध शक्त्यंशवाले परमाणु-
के साथ बन्ध नहीं होता । हाँ, चार स्निग्ध शक्त्यंशवाले परमाणुके साथ अवश्य बन्ध होता है ।
तथा उसी दो स्निग्ध शक्त्यंशवाले परमाणुका पाँच स्निग्ध शक्त्यंशवाले परमाणुके साथ, इसी
प्रकार छह, सात, आठ, संख्यात, असंख्यात और अनन्त स्निग्ध शक्त्यंशवाले परमाणुके साथ बन्ध
नहीं होता । इसी प्रकार तीन स्निग्ध शक्त्यंशवाले परमाणुका पाँच स्निग्ध शक्त्यंशवाले परमाणुके
साथ बन्ध होता है । किन्तु आगे-पीछेके शेष स्निग्ध शक्त्यंशवाले परमाणुके साथ बन्ध नहीं होता ।
१. –सक्तौ विशिष्टा मु० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri