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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 350, कुल 558 में से

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पृष्ठ 350

अथ षष्ठोऽध्यायः
§ ६०९. आहे, अजीवपदार्थो व्याख्यातः । इदानीं तदनन्तरोद्देशभागास्रवपदार्थो व्याख्येय
इति तत्तत्प्रसिद्ध्यर्थमिदमुच्यते—
कायवाङ्मनःकर्म योगः ॥१॥
५ § ६१०. कायादयः शब्दा व्याख्यातार्थाः । कर्म क्रिया इत्यनर्थान्तरम् । कायवाङ्मनसां
कर्म कायवाङ्मनःकर्म योग इत्याख्यायते । आत्मप्रदेशपरिस्पन्दो योगः । स निमित्तभेदात्त्रिधा
भिद्यते । काययोगो वाग्योगो मनोयोग इति । तद्यथा—वीर्यान्तरायक्षयोपशमसद्भावे सति
औदारिकादिसप्तविधकायवर्गणान्यतमालम्बनापेक्ष आत्मप्रदेशपरिस्पन्दः काययोगः । शरीरनाम-
कर्मोदयापादितवाग्वर्गणालम्बने सति वीर्यान्तरायमत्यक्षराद्यावरणक्षयोपशमापादिताभ्यन्तर-
१० वाग्लब्धिसंनिधौ वाक्परिणामाभिमुख्यस्यात्मनः प्रदेशपरिस्पन्दो वाग्योगः । अभ्यन्तरवीर्यान्तरायनो-
इन्द्रियावरणक्षयोपशमात्मकमनोलब्धिसंनिधाने बाह्यनिमित्तमनोवर्गणालम्बने च सति मनःपरि-
णामाभिमुख्यस्यात्मप्रदेशपरिस्पन्दो मनोयोगः । क्षयेऽपि त्रिविधवर्गणापेक्षः सयोगकेवलिन
आत्मप्रदेशपरिस्पन्दो योगो वेदितव्यः ।
§ ६०९. जीव और अजीवका व्याख्यान किया । अब उसके बाद आस्रव पदार्थका
१५ व्याख्यान क्रम प्राप्त है । अतः उसे स्पष्ट करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
काय, वचन और मनकी क्रिया योग है ॥१॥
§ ६१०. काय आदि शब्दोंका व्याख्यान पहले कर आये हैं। कर्म और क्रिया ये एकार्थवाची
नाम हैं । काय, वचन और मनकी क्रियाको योग कहते हैं यह इसका तात्पर्य है । आत्माके
प्रदेशोंका परिस्पन्द-हलन चलन योग है । वह निमित्तोंके भेदसे तीन प्रकारका है-काययोग,
२० वचनयोग और मनोयोग । खुलासा इस प्रकार है-वीर्यान्तराय कर्मके क्षयोपशमके होनेपर
औदारिक आदि सात प्रकारकी कायवर्गणाओंमें-से किसो एक प्रकारकी वर्गणाओंके आलम्बनसे
होनेवाला आत्मप्रदेश परिस्पन्द काययोग कहलाता है । शरीर नामकर्मके उदयसे प्राप्त
हुई वचन-वर्गणाओंका आलम्बन होनेपर तथा वीर्यान्तराय और मत्यक्षरादि आवरणके
क्षयोपशमसे प्राप्त हुई भीतरी वचनलब्धिके मिलनेपर वचनरूप पर्यायके सन्मुख हुए आत्माके
२५ होनेवाला प्रदेश-परिस्पन्द वचनयोग कहलाता है । वीर्यान्तराय और नो इन्द्रियावरणके
क्षयोपशमरूप आन्तरिक मनोलब्धिके होनेपर तथा बाहरी निमित्तभूत मनोवर्गणाओंका
आलम्बन मिलनेपर मनरूप पर्यायके सन्मुख हुए आत्माके होनेवाला प्रदेश-परिस्पन्द मनोयोग
कहलाता है । वीर्यान्तराय और ज्ञानावरण कर्मके क्षय हो जानेपर भी सयोगकेवलीके जो
तीन प्रकारकी वर्गणाओंकी अपेक्षा आत्मप्रदेश-परिस्पन्द होता है वह भी योग है ऐसा जानना
३० चाहिए ।
१. अथाजीवप- मु० । आह जीवाजीवप-ता०, ना० । इत्यजीवप-दि० २ । २. आत्मनः प्रदे-आ०,
दि० १, दि. २ ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri