सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- ६१३ § ६१४ ] षष्ठोऽध्यायः २३९
§ ६११. आह, १अभ्युपेतः आहितत्रैविध्यक्रियो योग इति । प्रकृत इदानीं निर्दिश्यतां
किंलक्षण आस्रव इत्युच्यते । योऽयं योगशब्दाभिधेयः संसारिणः पुरुषस्य—
स आस्रवः ॥ २ ॥
§ ६१२. यथा सरस्सलिलावाहिद्वारं तदास्रवकारणत्वाद् आस्रव इत्याख्यायते तथा योग-
प्रणालिकया आत्मनः कर्म आस्रवतीति योग आस्रव इति व्यपदेशमर्हति ।
§ ६१३. आह कर्म द्विविधं पुण्यं पापं चेति । तस्य किमविशेषेण योग आस्रवहेतुराहोस्विदस्ति
कश्चित्प्रतिविशेष इत्यत्रोच्यते—
शुभः पुण्यस्याशुभः पापस्य ॥ ३ ॥
§ ६१४. कः शुभो योगः को वा अशुभः । प्राणातिपातादत्तादानमैथुनादिरशुभः काययोगः ।
अनृतभाषणपरुषासभ्यवचनादिरशुभो वाग्योगः । वधचिन्तनेर्ष्यासूयादिरशुभो मनोयोगः । ततो
विपरीतः शुभः । कथं योगस्य शुभाशुभत्वम् । शुभपरिणामनिर्वृत्तो योगः शुभः । अशुभपरिणामनि-
वृंत्तश्चाशुभः । न पुनः शुभाशुभकर्मकारणत्वेन । यद्येवमुच्यते शुभयोग एव न स्यात् शुभयोगस्यापि
ज्ञानावरणादिबन्धहेतुत्वाभ्युपगमात् । पुनात्यात्मानं पूयतेऽनेनेति वा पुण्यम् । तत्तद्भेद्यादि । पाति
रक्षति आत्मानं शुभादिति पापम्³ । तदसद्भेद्यादि ।
§ ६११. यह तो जाना कि तीन प्रकारकी क्रिया योग है। अब यह बतलाइए कि आस्रवका
क्या लक्षण है ? संसारी जीवके जो यह योग शब्दका वाच्य कहा है—
वही आस्रव है ॥ २ ॥
§ ६१२. जिस प्रकार तालाबमें जल लानेका दरवाजा जलके आनेका कारण होनेसे आस्रव
कहलाता है उसी प्रकार आत्माके साथ बँधनेके लिए कर्म योगरूपी नालीके द्वारा आते हैं इसलिए
योग आस्रव संज्ञाको प्राप्त होता है ।
§ ६१३. कर्म दो प्रकारका है—पुण्य और पाप, इसलिए क्या योग सामान्यरूपसे उनके
आस्रवका कारण है या कोई विशेषता है ? इसी बातके बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
शुभयोग पुण्यका और अशुभयोग पापका आस्रव है ॥ ३ ॥
§ ६१४. शंका—शुभ योग क्या है और अशुभ योग क्या है ? समाधान—हिंसा, चोरी.
और मैथुन आदिक अशुभ काययोग है। असत्य वचन, कठोर वचन और असभ्य वचन आदि
अशुभ वचनयोग है। मारनेका विचार, ईर्ष्या और डाह आदि अशुभ मनोयोग है। तथा इनसे
विपरीत शुभकाय योग, शुभ वचनयोग और शुभ मनोयोग है। शंका—योगके शुभ और अशुभ ये भेद
किस कारणसे हैं ? समाधान—जो योग शुभ परिणामोंके निमित्तसे होता है वह शुभ योग है और जो
योग अशुभ परिणामोंके निमित्तसे होता है वह अशुभ योग है। शायद कोई यह माने कि शुभ और
अशुभ कर्मका कारण होनेसे शुभ और अशुभ योग होता है सो बात नहीं है; क्योंकि यदि इस
प्रकार इनका लक्षण कहा जाता है तो शुभयोग ही नहीं हो सकता, क्योंकि शुभयोगको भी
ज्ञानावरणादि कर्मोंके बन्धका कारण माना है। इसलिए शुभ और अशुभ योगका जो लक्षण यहाँ
पर किया है वही सही है। जो आत्माको पवित्र करता है या जिससे आत्मा पवित्र होता है वह
पुण्य है। जैसे सातावेदनीय आदि तथा जो आत्माको शुभसे बचाता है वह पाप है; जैसे असाता
वेदनीय आदि ।
१. अभ्युपगत आहि-मु० । २. आस्रवणहेतु-मु०, ता०, ना० । ३. पापम् । असद्भे-मु० ।