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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 338, कुल 558 में से

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पृष्ठ 338

त्युपसर्जनीभूतमनर्पितमित्युच्यते । अर्पितं चानर्पितं चार्पितार्पिते । ताभ्यां सिद्धेरर्पितार्पित-
सिद्धेर्नास्ति विरोधः । तद्यथा—एकस्य देवदत्तस्य पिता पुत्रो भ्राता १ भागिनेय इत्येवमादयः
संबन्धा जनकत्वजन्यत्वादिनिमित्ता न विरुध्यन्ते; अर्पणाभेदात् । पुत्रापेक्षया पिता, पित्रापेक्षया
पुत्र इत्येवमादिः । तथा द्रव्यमपि सामान्यार्पण्या नित्यम्, विशेषापेणयानित्यमिति नास्ति
विरोधः । तौ च सामान्यविशेषौ कथंचिद् भेदाभेदाभ्यां व्यवहारहेतू भवतः ।
§ ५८९. अत्राहं, सतोऽनेकनयव्यवहारतन्त्रत्वात् उपपन्ना भेदसंघातेभ्यः सतां २स्कन्धात्मनो-
त्पत्तिः । इदं तु संदिग्धम्, किं संघातः संयोगादेव द्वयणुकादिलक्षणो भवति, उत कश्चिद्विशेषोऽव-
ध्रियत इति । उच्यते, 'सति संयोगे बन्धादेकत्वपरिणामात्मकात्संघातो निष्पद्यते । यद्येवमिद-
मुच्यतां, कुतो ३ नु खलु पुद्गलजात्यपरित्यागे ४ संयोगे च सति भवति केषांचिद् बन्धोऽन्येषां च
१०. नेति । उच्यते, यस्मात्तेषां पुद्गलात्माविशेषेऽप्यनन्तपर्यायाणां परस्परविलक्षणपरिणामादाहित-
सामर्थ्याद्भवन्प्रतीतः—
स्निग्धरूक्षत्वादू बन्धः ॥३३॥
§ ५९०. बाह्याभ्यन्तरकारणवशात् स्नेहपर्यायाविर्भावात् स्निह्यते ५ स्मेति स्निग्धः । तथा
रूक्षणारूक्षः । स्निग्धश्च रूक्षश्च स्निग्धरूक्षौ । तयोर्भावः स्निग्धरूक्षत्वम् । स्निग्धत्वं चिक्कणगुण-
१५ जिसकी प्रधानता नहीं रहती वह अनर्पित कहलाता है । तात्पर्य यह है कि किसी वस्तु या धर्मके
रहते हुए भी उसकी विवक्षा नहीं होती इसलिए जो गौण हो जाता है वह अनर्पित कहलाता है ।
इन दोनोंका 'अर्पितं च अनर्पितं च' इस प्रकार द्वन्द्व समास है। इन दोनोंकी अपेक्षा एक वस्तुमें
परस्पर विरोधी दो धर्मोंकी सिद्धि होती है इसलिए कोई विरोध नहीं है। खुलासा इस प्रकार है—
जैसे देवदत्तके पिता, पुत्र, भाई और भान्जे इसी प्रकार और भी जनकत्व और जन्यत्व आदिके
२० निमित्तसे होने वाले सम्बन्ध विरोधको प्राप्त नहीं होते । जब जिस धर्मकी प्रधानता होती है उस
समय उसमें वह धर्म माना जाता है । उदाहरणार्थ—पुत्रकी अपेक्षा वह पिता है और पिताकी
अपेक्षा वह पुत्र है आदि । उसी प्रकार द्रव्य भी सामान्यकी अपेक्षा नित्य है और विशेषकी अपेक्षा
अनित्य है इसलिए कोई विरोध नहीं है । वे सामान्य और विशेष कथंचित् भेद और अभेदकी
अपेक्षा ही व्यवहारके कारण होते हैं।
२५ § ५८९. शंका—सत् अनेक प्रकारके नयके व्यवहारके आधीन होनेसे भेद, संघात और
भेद-संघातसे स्कन्धोंकी उत्पत्ति भले ही बन जावे परन्तु यह संदिग्ध है कि द्वयणुक आदि लक्षण-
वाला संघात संयोगसे ही होता है या उसमें और कोई विशेषता है ? समाधान—संयोगके होनेपर
एकत्व परिणमन रूप बन्धसे संघातकी उत्पत्ति होती है। शंका—यदि ऐसा है तो यह बतलाइए कि
सब पुद्गलजातिके होकर भी उनका संयोग होनेपर किन्हींका बन्ध होता है और किन्होंका नहीं
३० होता, इसका क्या कारण है ? समाधान—चूंकि वे सब जातिसे पुद्गल हैं तो भी उनकी जो
अनन्त पर्यायें हैं उनका परस्पर विलक्षण परिणमन होता है, इसलिए उससे जो सामर्थ्य उत्पन्न
होती है उससे ऐसा प्रतीत होता है कि—
स्निग्धत्व और रूक्षत्वसे बन्ध होता है ॥३३॥
§ ५९०. बाह्य और आभ्यन्तर कारणसे जो स्नेह पर्याय उत्पन्न होती है उससे पुद्गल
३५ स्निग्ध कहलाता है । इसकी व्युत्पत्ति 'स्निह्यते स्मेति स्निग्धः' होगी । तथा रूखापनके कारण
१. भ्राता माता भाग-मु० । २. स्कन्धानामेवोत्प-दि० १, दि०, २, आ० । ३. -कुतोऽत्र खलु दि० १,
दि० २ । ४. -त्यागे सति मु० । ५. -ह्यतेऽस्मिन्निति मु० ।