सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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- ५।४० § ६०४ ] पञ्चमोऽध्यायः - २३५
§ ६०३. वर्तनालक्षणस्य मुख्यस्य कालस्य प्रमाणमुक्तम् । परिणामादिगम्यस्य व्यवहार-
कालस्य किं प्रमाणमित्यत इदमुच्यते—
सोऽनन्तसमयः ॥४०॥
§ ६०४. साम्प्रतिकस्यैकसमयिकत्वेऽपि अतीता अनागताश्च समया अनन्ता इति कृत्वा
'अनन्तसमयः' इत्युच्यते । अथवा मुख्यस्यैव कालस्य प्रमाणावधारणार्थमिदमुच्यते । अनन्तपर्याय-
वर्तनाहेतुत्वादेकोऽपि कालाणुरनन्त इत्युपचर्यते । समयः पुनः परमनिरुद्धः कालांशस्तत्प्रचयविशेष
आवलिकादिरवगन्तव्यः ।
है । किन्तु जिस प्रकार अन्य द्रव्य अपने-अपने उपादानके अनुसार परिणमन करते हैं उसी प्रकार
काल द्रव्य भी अपने उपादान के अनुसार परिणमन करता है ।
इस प्रकार यद्यपि उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यरूपसे तथा गुण और पर्यायरूपसे काल द्रव्यके
अस्तित्वकी सिद्धि हो जाती है पर वह अखण्ड एकप्रदेशी है यह सिद्ध नहीं होता, इसलिए आगे
इसी बातका विचार करते हैं—
एक पुद्गल परमाणु मन्दगतिसे एक आकाश प्रदेशसे दूसरे आकाश प्रदेश पर जाता है
और इसमें कुछ समय भी लगता है । यदि विचार कर देखा जाय तो ज्ञात होगा कि यह समय ही
काल द्रव्यकी पर्याय है जो कि अतिसूक्ष्म होनेसे निरंश है। यदि कालद्रव्यको लोकाकाशके बराबर
अखण्ड और एक माना जाता है तो इस अखण्ड समय पर्यायकी निष्पत्ति नहीं होती, क्योंकि
पुद्गल परमाणु जब एक कालाणुको छोड़कर दूसरे कालाणुके प्रति गमन करता है तब वहाँ दोनों
कालाणु पृथक्-पृथक् होनेसे समयका भेद बन जाता है। और यदि एक अखण्ड लोकके बराबर
कालद्रव्य होवे तो समय पर्यायकी सिद्धि किस तरह हो सकती है? यदि कहा जाय कि कालद्रव्य
लोकप्रमाण असंख्यात प्रदेशी है, उसके एक प्रदेशसे दूसरे प्रदेशके प्रति जानेपर समय पर्यायकी
सिद्धि हो जायगी तो इसका समाधान यह है कि ऐसा मानने पर एक अखण्डद्रव्यके एक प्रदेशसे
दूसरे प्रदेशपर जाने पर समय पर्यायका भेद नहीं बनता । इसलिए समय पर्यायमें भेद सिद्ध करने-
के लिए काल द्रव्यको अणुरूपमें स्वीकार कर लिया गया है। इस प्रकार काल द्रव्य क्या है और
वह एक प्रदेशी कैसे है इस बातका विचार किया ।
§ ६०३. वर्तना लक्षणवाले मुख्य कालका प्रमाण कहा। परन्तु परिणाम आदिके द्वारा
जानने योग्य व्यवहार कालका क्या प्रमाण है ? इस बातका ज्ञान करानेके लिए अब आगेका सूत्र
कहते हैं—
वह अनन्त समयवाला है ॥४०॥
§ ६०४. यद्यपि वर्तमान काल एक समय वाला है तो भी अतीत और अनागत अनन्त
समय हैं ऐसा मानकर कालको अनन्त समयवाला कहा है। अथवा मुख्य कालका निश्चय करनेके
लिए यह सूत्र कहा है । तात्पर्य यह है कि अनन्त पर्यायें वर्तना गुणके निमित्तसे होती हैं इसलिए
एक कालाणुको भी उपचारसे अनन्त कहा है। परन्तु समय अत्यन्त सूक्ष्म कालांश है और उसके
समुदायको आवलि आदि जानना चाहिए ।
विशेषार्थ—समय शब्द द्रव्य और पर्याय दोनों अर्थोंमें व्यवहृत होता है । यहाँ पर्यायरूप
अर्थ लिया गया है। इससे व्यवहार काल और निश्चय काल दोनोंकी सिद्धि होती है। एक-एक
समयका समुच्चय होकर जो आवलि, पल आदि कालका व्यवहार होता है वह व्यवहारकाल है
और यह समय-पर्याय बिना पर्यायीके नहीं हो सकती, इससे निश्चय कालका ज्ञान होता है यह
उक्त कथनका तात्पर्य है।
१. -निकृष्टः कालां-दि० १ ।