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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 337, कुल 558 में से

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पृष्ठ 337
  • ५।३१ § ५८८ ] पञ्चमोऽध्यायः २२५

§ ५८५. आह 'नित्यावस्थितान्यरूपणि' इत्युक्तं तत्र न ज्ञायते किं नित्यमित्यत आह—
तद्भावाव्ययं नित्यम् ॥३१॥
§ ५८६. 'तद्भावः' इत्युच्यते । कस्तद्भावः । प्रत्यभिज्ञानहेतुता । तदेवेदमिति स्मरणं
प्रत्यभिज्ञानम् । तदकस्मान्न भवतीति योऽस्य हेतुः स १तद्भावः। भवनं भावः । तस्य भावस्तद्भावः ।
येनात्मना प्राग्दृष्टं वस्तु तेनैवात्मना 'पुनरपि भावात्तदेवेदमिति प्रत्यभिज्ञायते । यद्यत्यन्तैनिरोधो-
ऽभिनवप्रादुर्भावमात्रमेव वा स्यात्ततः स्मरणानुपपत्तिः । तदधीनो लोकसंव्यवहारो विरुध्येत ।
ततस्तद्भावेनाव्ययं३ तद्भावाव्ययं नित्यमिति निश्चीयते । तत् तु कथंचिद्वेदितव्यम् । सर्वथा
नित्यत्वे अन्यथाभावाभावात्संसारतद्विनिवृत्तिकारणप्रक्रियाविरोधः स्यात् ।
§ ५८७. ननु इदमेव विरुद्धं तदेव नित्यं तदेवानित्यमिति । यदि नित्यं व्ययोदयाभावाद-
नित्यताव्याघातः । अथानित्यमेव स्थित्यभावान्नित्यताव्याघात इति । नैतद्विरुद्धम् । कुतः ।
अर्पितानर्पितसिद्धेः ॥३२॥
§ ५८८. अनेकान्तात्मकस्य वस्तुनः प्रयोजनवशाद्यस्य कस्यचिद्धर्मस्य विवक्षया४ प्रापितं
प्राधान्यमर्पितमुपनीतमिति यावत् । तद्विपरीतमर्पितम् । प्रयोजनाभावात् सतोऽप्यविवक्षा भवती-
§ ५८५. 'नित्यावस्थितान्यरूपणि' यह सूत्र कह आये हैं। वहाँ यह नहीं ज्ञात होता कि
नित्य क्या है इसलिए आगेका सूत्र कहते हैं—
उसके भावसे ( अपनी जातिसे ) च्युत न होना नित्य है ॥३१॥
§ ५८६. अब तद्भाव इस पदका खुलासा करते हैं। शंका—'तद्भाव' क्या वस्तु है ?
समाधान—जो प्रत्यभिज्ञानका कारण है वह तद्भाव है, 'वही यह है' इस प्रकारके स्मरणको प्रत्य-
भिज्ञान कहते हैं। वह अकस्मात् तो होता नहीं, इसलिए जो इसका कारण है वही तद्भाव है।
इसकी निरुक्ति 'भवनं भावः' तस्य भावः तद्भावः' इस प्रकार होती है। तात्पर्य यह है कि पहले
जिस रूप वस्तुको देखा है उसी रूप उसके पुनः होनेसे 'वही यह है' इस प्रकारका प्रत्यभिज्ञान
होता है। यदि पूर्व वस्तुका सर्वथा नाश हो जाय या सर्वथा नयी वस्तुका उत्पाद माना जाय तो
इससे स्मरणकी उत्पत्ति नहीं हो सकती और स्मरणकी उत्पत्ति न हो सकनेसे स्मरणके आधीन
जितना लोकसंव्यवहार चालू है वह सब विरोधको प्राप्त होता है। इसलिए जिस वस्तुका जो भाव
है उस रूपसे च्युत न होना तद्भावाव्यय अर्थात् नित्य है ऐसा निश्चित होता है। परन्तु इसे
कथंचित् जानना चाहिए। यदि सर्वथा नित्यता मान ली जाय तो परिणमनका सर्वथा अभाव प्राप्त
होता है और ऐसा होनेसे संसार और इसकी निवृत्तिके कारण रूप प्रक्रियाका विरोध प्राप्त
होता है।
§ ५८७. शंका—उसीको नित्य कहना और उसीको अनित्य कहना यह विरुद्ध है। यदि
नित्य है तो उसका व्यय और उत्पाद न होनेसे उसमें अनित्यता नहीं बनती। और यदि अनित्य है
तो स्थितिका अभाव होनेसे नित्यताका व्याघात होता है ? समाधान—नित्यता और अनित्यताका
एक साथ रहना विरुद्ध नहीं है, क्योंकि—
मुख्यता और गौणताकी अपेक्षा एक वस्तुमें विरोधी मालूम पड़नेवाले दो धर्मोंकी सिद्धि
होती है ॥३२॥
§ ५८८. वस्तु अनेकान्तात्मक है। प्रयोजनके अनुसार उसके किसी एक धर्मको विवक्षासे
जब प्रधानता प्राप्त होती है तो वह अर्पित या उपनीत कहलाता है और प्रयोजनके अभावमें


१. तद्भावः । तस्य मु० । २. -त्यन्तविरोधो मु० । ३. -नाव्ययं नित्य-मु० । ४. विवक्षाया- आ०,
दि० १, दि० २ ।
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