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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 339, कुल 558 में से

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पृष्ठ 339

लक्षणः पर्यायः । तद्विपरीतपरिणामो रूक्षत्वम् । 'स्निग्धरूक्षत्वात्' इति हेतुनिर्देशः । तत्कृतो
बन्धो द्व्यणुकादिपरिणामः । द्वयोः स्निग्धरूक्षयोरण्वोः परस्परश्लेषलक्षणे बन्धे सति द्व्यणुक-
स्कन्धो भवति । एवं संख्येयासंख्येयानन्तप्रदेशः स्कन्धो योज्यः । तत्र स्नेहगुण एकद्वित्रिचतुः-
संख्येयासंख्येयानन्तविकल्पः । तथा रूक्षगुणोऽपि । तद्गुणाः परमाणवः सन्ति । यथा तोयाजागो-
महिष्युष्ट्रीक्षीरघृतेषु स्नेहगुणः प्रकर्षाप्रकर्षेण प्रवर्तते । पांशुकणिकाशर्करादिषु च रूक्षगुणो दृष्टः ।
तथा परमाणुष्वपि स्निग्धरूक्षगुणयोर्वृत्तिः प्रकर्षाप्रकर्षेणानुमीयते ।
§ ५९१. स्निग्धरूक्षत्वगुणनिमित्ते बन्धे अविशेषेण प्रसक्ते अनिष्टगुणनिवृत्त्यर्थमाह—
न जघन्यगुणानाम् ॥३४॥
§ ५९२. जघन्यो निकृष्टः । गुणो भागः । जघन्यो गुणो येषां ते जघन्यगुणाः । तेषां जघन्य-
गुणानां नास्ति बन्धः । तद्यथा—एकगुणस्निग्धस्यैकगुणस्निग्धेन द्व्यादिसंख्येयासंख्येयानन्तगुण-
स्निग्धेन वा नास्ति बन्धः । तस्यैवैकगुणस्निग्धस्य एकगुणरूक्षेण द्व्यादिसंख्येयासंख्येयानन्तगुण-
रूक्षेण वा नास्ति बन्धः । तथा एकगुणरूक्षस्यापि योज्यमिति ।
§ ५९३. एतौ जघन्यगुणस्निग्धरूक्षौ वर्जयित्वा अन्येषां स्निग्धानां रूक्षाणां च परस्परेण
बन्धो भवतीत्यविशेषेण प्रसङ्गे तत्रापि प्रतिषेधविषयख्यापनार्थमाह—
पुद्गल रूक्ष कहा जाता है । स्निग्ध पुद्गलका धर्म स्निग्धत्व है और रूक्ष पुद्गलका धर्म रूक्षत्व
है । पुद्गलकी चिकने गुणरूप जो पर्याय है वह स्निग्धत्व है और इससे जो विपरीत परिणमन है
वह रूक्षत्व है । सूत्रमें 'स्निग्धरूक्षत्वात्' इस प्रकार हेतुपरक निर्देश किया है । तात्पर्य यह है कि
द्व्यणुक आदि लक्षणवाला जो बन्ध होता है वह इनका कार्य है । स्निग्ध और रूक्ष गुणवाले दो
परमाणुओंका परस्पर संश्लेषलक्षण बन्ध होनेपर द्व्यणुक नामका स्कन्ध बनता है । इसी प्रकार
संख्यात, असंख्यात और अनन्त प्रदेशवाले स्कन्ध उत्पन्न होते हैं । स्निग्ध गुणके एक, दो, तीन,
चार, संख्यात, असंख्यात और अनन्त भेद हैं। इसी प्रकार रूक्ष गुणके भी एक, दो, तीन, चार,
संख्यात, असंख्यात और अनन्त भेद हैं। और इन गुणवाले परमाणु होते हैं। जिस प्रकार जल
तथा बकरी, गाय, भैंस, और ऊँटके दूध और घीमें उत्तरोत्तर अधिक रूपसे स्नेह गुण रहता है
तथा पांशु, कणिका और शर्करा आदिमें उत्तरोत्तर न्यूनरूपसे रूक्ष गुण रहता है उसी प्रकार
परमाणुओंमें भी न्यूनाधिकरूपसे स्निग्ध और रूक्ष गुणका अनुमान होता है ।
§ ५९१. स्निग्धत्व और रूक्षत्व गुणके निमित्तसे सामान्यसे बन्धके प्राप्त होनेपर बन्धमें
अप्रयोजनीय गुणके निराकरण करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
जघन्य गुणवाले पुद्गलोंका बन्ध नहीं होता ॥३४॥
§ ५९२. यहाँ जघन्य शब्दका अर्थ निकृष्ट है और गुण शब्दका अर्थ भाग है। जिनमें जघन्य
गुण होता है अर्थात् जिनका शक्त्यंश निकृष्ट होता है वे जघन्य गुणवाले कहलाते हैं। उन जघन्य
गुणवालोंका बन्ध नहीं होता । यथा—एक स्निग्ध शक्त्यंशवालेका एक स्निग्ध शक्त्यंशवालेके
साथ या दो से लेकर संख्यात, असंख्यात और अनन्त शक्त्यंशवालोंके साथ बन्ध नहीं होता ।
उसी प्रकार एक स्निग्ध शक्त्यंशवालेका एक रूक्ष शक्त्यंशवालेके साथ या दोसे लेकर संख्यात,
असंख्यात और अनन्त रूक्षशक्त्यंशवालोंके साथ बन्ध नहीं होता । उसी प्रकार एक रूक्ष शक्त्यंश-
वालेकी भी योजना करनी चाहिए ।
§ ५९३. इन जघन्य स्निग्ध और रूक्ष शक्त्यंशवालोंके सिवा अन्य स्निग्ध और रूक्ष
पुद्गलोंका परस्पर बन्ध सामान्य रीतिसे प्राप्त हुआ इसलिए इनमें भी जो बन्धयोग्य नहीं हैं उनका
खुलासा करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—