सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३२ सर्वार्थसिद्धौ [ ५।३९ § ६०१ -
भूतः । यश्च रसादिभ्योऽर्थान्तरभूताद्रूपादनर्थान्तरभूतः समुदायः स कथं रसादिभ्योऽर्थान्तरभूतो
न भवेत् । ततश्च रूपमात्रं समुदायः प्रसक्तः । न चैकं रूपं समुदायो भवितुमर्हति । ततः समु-
दायाभावः । समुदायाभावाच्च तदनर्थान्तरभूतानां समुदायिनामप्यभाव इति सर्वाभावः । एवं
रसादिष्वपि योज्यम् । तस्मात्समुदायमिच्छता कथंचिदर्थान्तरभाव एषितव्यः ।
५ § ६०१. उक्तानां द्रव्याणां लक्षणनिर्देशात्तद्विषय एव द्रव्याध्यवसाये प्रसक्ते अनुक्तद्रव्यसं-
सूचनार्थमिदमाह—
कालश्च ॥३९॥
§ ६०२. किम् । 'द्रव्यम्' इति वाक्यशेषः । कुतः । तल्लक्षणोपेतत्वात् । द्विविधं लक्षण-
मुक्तम्—'उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सत्' 'गुणपर्ययवद् द्रव्यम्' इति च । तदुभयं लक्षणं कालस्य
१० रसादिक भिन्न हैं । अब यदि इनका समुदाय अभिन्न माना जाता है तो रसादिकसे भिन्न जो रूप
है और उससे अभिन्न जो समुदाय है वह रसादिकसे भिन्न कैसे नहीं होगा अर्थात् अवश्य होगा ।
और इस प्रकार समुदाय रूपमात्र प्राप्त होता है । परन्तु एक रूप गुण समुदाय हो नहीं सकता इस-
लिए समुदायका अभाव प्राप्त होता है और समुदायका अभाव हो जानेसे उससे अभिन्न समुदा-
यियोंका भी अभाव होता है इस प्रकार समुदाय और समुदायी सबका अभाव हो जाता है। जिस प्रकार
१५ रूपकी अपेक्षा कथन किया उसी प्रकार रसादिककी अपेक्षा भी कथन करना चाहिए । इसलिए
यदि समुदाय स्वीकार किया जाता है तो वह कथंचित् अभिन्न ही मानना चाहिए ।
विशेषार्थ—पहले उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यसे युक्त द्रव्य होता है यह कह आये हैं । यहां
प्रकारान्तरसे द्रव्यका लक्षण कहा गया है । इसमें द्रव्यको गुणपर्यायवाला बतलाया गया है । बात
यह है कि प्रत्येक द्रव्य अनन्तगुणोंका और क्रमसे होनेवाली उनकी पर्यायोंका पिण्डमात्र है । सर्वत्र
२० गुणोंको अन्वयी और पर्यायोंको व्यतिरेकी बतलाया है। इसका अर्थ यह है कि जिनसे धारामें
एकरूपता बनी रहती है वे गुण कहलाते हैं और जिनसे उसमें भेद प्रतीत होता है वे पर्याय कहलाते
हैं । जीवमें ज्ञानादिक की धाराका, पुद्गलमें रूप रसादिककी धाराका, धर्मद्रव्यमें गतिहेतुत्वकी
धाराका, अधर्मद्रव्यमें स्थितिहेतुत्वकी धाराका, आकाशमें अवगाहन हेतुत्वकी धाराका और काल
द्रव्यमें वर्तनाका कभी विच्छेद नहीं होता इसलिए वे ज्ञानादिक उस उस द्रव्यके गुण हैं किन्तु वे
२५ गुण सदाकाल एकरूप नहीं रहते । जो नित्य द्रव्योंके गुण हैं उन्हें यदि छोड़ भी दिया जाय तो भी
जीव और पुद्गलोंके गुणोंमें प्रतिसमय स्पष्टतया परिणाम लक्षित होता है । उदाहरणार्थ-जीवका
ज्ञानगुण संसार अवस्थामें कभी मतिज्ञानरूप होता है और कभी श्रुतज्ञान रूप । इसीलिए ये मति-
ज्ञानादि ज्ञानगुणकी पर्याय हैं। इसी प्रकार अन्य गुणोंमें भी जान लेना चाहिए । द्रव्य सदा इन
गुणरूप पर्यायों में रहता है इसलिए वह गुणपर्यायवाला कहा गया । फिर भी गुण और पर्यायको
३० द्रव्यसे सर्वथा भिन्न न जानना चाहिए । वे दोनों मिलकर द्रव्यकी आत्मा हैं इसका अभिप्राय यह
है कि गुण और पर्यायको छोड़कर द्रव्य कोई स्वतन्त्र वस्तु नहीं ।
§ ६०१. पूर्वोक्त द्रव्योंके लक्षणका निर्देश करनेसे यह प्राप्त हुआ कि जो उस लक्षणका
विषय है वही द्रव्य है, अतः अभी तक जिस द्रव्यका कथन नहीं किया उसकी सूचना करनेके लिए
आगेका सूत्र कहते हैं—
३५ काल भी द्रव्य है ॥३९॥
§ ६०२. शंका—क्या है ? समाधान—'द्रव्य है' इतना वाक्य शेष है । शंका—काल द्रव्य
क्यों है ? समाधान—क्योंकि इसमें द्रव्यका लक्षण पाया जाता है । जो उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यसे
युक्त है वह सत् है तथा जो गुण और पर्यायवाला है वह द्रव्य है । इस प्रकार द्रव्यका दो प्रकारसे
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