सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 345, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंविद्यते । तद्यथा—ध्रौव्यं तावत्कालस्य स्वप्रत्ययं स्वभावव्यवस्थानात् । व्ययोदयौ परप्रत्ययौ,
अगुरुलघुगुणवृद्धिहान्यपेक्षया स्वप्रत्ययौ च । तथा गुणा अपि कालस्य साधारणासाधारणरूपाः
सन्ति । तत्रासाधारणो वर्तनाहेतुत्वम्, साधारणाश्चाचेतनत्वामूर्तत्वसूक्ष्मत्वागुरुलघुत्वादयः । पर्या-
याश्च व्ययोत्पादलक्षणा योज्याः । तस्माद् द्विप्रकारलक्षणोपेतत्वादाकाशादिवत्कालस्य द्रव्यत्वं
सिद्धम् । तस्यास्तित्वलिङ्गं धर्मादिवद् व्याख्यातम् 'वर्तनालक्षणः कालः' इति¹। ननु किमर्थमयं
कालः पृथगुच्यते । यत्रैव धर्मादय उक्तास्तत्रैवायमपि वक्तव्यः 'अजीवकाया धर्माधर्माकाशकाल-
पुद्गलाः' इति । नैवं शङ्क्यम्; तत्रोद्देशे सति कायत्वमस्य स्यात् । नेष्यते च मुख्योपचारप्रदेश-
प्रचयकल्पनाभावात् । धर्मादीनां तावन्मुख्यप्रदेशप्रचय उक्तः 'असंख्येयाः प्रदेशाः' इत्येवमादिना ।
अणोरप्येकप्रदेशस्य पूर्वोत्तरभावे²प्रज्ञापननयापेक्षयोपचारकल्पनया प्रदेशप्रचय उक्तः । कालस्य
पुनर्द्वेधापि प्रदेशप्रचयकल्पना नास्तीत्यकायत्वम् । अपि च तत्र पाठे 'निष्क्रियाणि च' इत्यत्र धर्मा-
दीनामाकाशान्तानां निष्क्रियत्वे प्रतिपादिते इतरेषां जीवपुद्गलानां³ सक्रियत्वप्राप्तिकवत्कालस्यापि
सक्रियत्वं स्यात् । अथाकाशात्प्राक्काल उद्दिश्येत⁴ । तन्न; 'आ आकाशादेकद्रव्याणि' इत्येकद्रव्यत्व-
मस्य स्यात् । तस्मात्पृथगिह कालोद्देशः क्रियते । अनेकद्रव्यत्वे सति किमस्य प्रमाणम् । लोका-
काशस्य यावन्तः प्रदेशास्तावन्तः कालाणवो निष्क्रिया एकैकाकाशप्रदेशे एकैकवृत्त्या लोकं व्याप्य
व्यवस्थिताः । उक्तं च—
लक्षण कहा है। वे दोनों ही लक्षण कालमें पाये जाते हैं। खुलासा इस प्रकार है—कालमें ध्रुवता
स्वनििमत्तक है, क्योंकि वह अपने स्वभावमें सदा स्थित है। व्यय और उत्पाद परनिमित्तक हैं,
और अगुरुलघु गुणकी हानि और वृद्धिकी अपेक्षा स्वनििमत्तक भी हैं। तथा कालके साधारण और
असाधारण रूप दो प्रकारके गुण भी हैं। उनमेंसे असाधारण गुण वर्तनाहेतुत्व है और साधारण
गुण अचेतनत्व, अमूर्तत्व, सूक्ष्मत्व और अगुरुलघुत्व आदिक हैं। इसी प्रकार व्यय और उत्पादरूप
पर्याय भी घटित कर लेना चाहिए। इसलिए कालमें जब द्रव्यके दोनों लक्षण पाये जाते हैं तो वह
आकाशके समान स्वतन्त्र द्रव्य है यह सिद्ध होता है। धर्मादिक द्रव्यके समान इसके अस्तित्वके कारण
का व्याख्यान किया ही है कि कालका लक्षण वर्तना है। शंका—काल द्रव्यको अलगसे क्यों कहा ?
जहां धर्मादिक द्रव्योंका कथन किया है वहीं पर इसका कथन करना था जिससे प्रथम सूत्रका रूप
निम्न होता—'अजीवकाया धर्माधर्माकाशकालपुद्गलाः' । समाधान—इस प्रकार शंका करना ठीक
नहीं है; क्योंकि वहां पर यदि इसका कथन करते तो इसे कायपना प्राप्त होता । परन्तु काल द्रव्य
कायवान् नहीं कहा है, क्योंकि इसमें मुख्य और उपचार दोनों प्रकारसे प्रदेशप्रचयकी कल्पनाका
अभाव है । धर्मादिक द्रव्योंका तो 'असंख्येयाः प्रदेशाः' इत्यादिक सूत्र-द्वारा मुख्यरूपसे प्रदेशप्रचय
कहा है । उसी प्रकार एक प्रदेशवाले अणुका भी पूर्वोत्तरभाव प्रज्ञापन नयकी अपेक्षा उपचार-
कल्पनासे प्रदेशप्रचय कहा है परन्तु कालके दोनों प्रकारसे प्रदेशप्रचयकी कल्पना नहीं बनती
इसलिए वह अकाय है । दूसरे यदि प्रथम सूत्र में कालका पाठ रखते हैं तो 'निष्क्रियाणि च'
यहाँपर धर्मसे लेकर आकाश तक के द्रव्योंको निष्क्रिय कहनेपर जैसे जीव और पुद्गलोंको
सक्रियत्व प्राप्त होता है वैसे ही काल द्रव्यको भी सक्रियत्व प्राप्त होता है । शंका—इस दोषको दूर
करनेके लिए आकाशसे पहले कालको रख दिया जाय ? समाधान—यह कहना ठीक नहीं है
क्योंकि 'आकाश तक एक द्रव्य है' इस सूत्र वचनके अनुसार यदि कालको आकाशके पहले रखते
हैं तो उसे एक द्रव्यत्व प्राप्त होता है । ये सब दोष न रहें इसलिए कालका अलगसे कथन किया
है । शंका—काल अनेक द्रव्य हैं इसमें क्या प्रमाण है ? समाधान—लोकाकाशके जितने प्रदेश हैं
१. इति । किमर्थ-मु० । २. -त्तरप्रज्ञा-मु० । ३. -पुद्गलादीनां मु० । ४. -श्यते । आ आका-आ०,
दि० १, दि० २, ता० ।
३०