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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 336, कुल 558 में से

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पृष्ठ 336

नयापेक्षया युक्तशब्दो दृष्टः । यथा सारयुक्तः स्तम्भ इति । तथा सति तेषामविनाभावात्सद्द्व्यपदेशो
युक्तः । समाधिवचनो वा युक्तशब्दः । युक्तः समाहितस्तदात्मक इत्यर्थः । उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं
सत् उत्पादव्ययध्रौव्यात्मकमिति यावत् । एतदुक्तं भवति-उत्पादादीनि^१ द्रव्यस्य लक्षणानि ।
द्रव्यं लक्ष्यम्^२ । तत्र पर्यायार्थिकनयापेक्षया परस्परतो द्रव्याच्चार्थान्तरभावः । द्रव्यार्थिकनयापेक्षया
व्यतिरेकेणानुपलब्धेरनर्थान्तरभावः । इति लक्ष्यलक्षणभावसिद्धिः ।
तीनोंका और उन तीनोंसे युक्त द्रव्यका अभाव प्राप्त होता है । समाधान-यह कोई दोष नहीं है;
क्योंकि अभेदमें भी कथंचित् भेदग्राही नयकी अपेक्षा युक्त शब्दका प्रयोग देखा जाता है । जैसे सार
युक्त स्तम्भ । ऐसी हालतमें उन तीनोंका परस्पर अविनाभाव सम्बन्ध होनेसे यहाँ युक्त शब्दका
प्रयोग करना युक्त है । अथवा यह युक्त शब्द समाधिवाची है । भाव यह है कि युक्त, समाहित और
तदात्मक ये तीनों एकार्थवाची शब्द हैं । जिससे 'सत् उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यसे युक्त है' इसका
भाव 'सत् उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यात्मक है' यह होता है । उक्त कथनका तात्पर्य यह है कि उत्पाद
आदि द्रव्यके लक्षण हैं और द्रव्य लक्ष्य है । यदि इनका पर्यायार्थिक नयकी अपेक्षा विचार करते हैं
तो ये आपसमें और द्रव्यसे पृथक् पृथक् हैं और यदि द्रव्यार्थिक नयकी अपेक्षा विचार करते हैं तो
ये पृथक्-पृथक् उपलब्ध नहीं होनेसे अभिन्न हैं । इस प्रकार इनमें और द्रव्यमें लक्ष्य-लक्षणभावकी
सिद्धि होती है ।
विशेषार्थ-यहाँ द्रव्यका लक्षण उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य स्वभाव बतलाया है । अपनी
जातिका त्याग किये बिना नवीन पर्यायकी प्राप्ति उत्पाद है, पूर्व पर्यायका त्याग व्यय है, और
अनादि पारिणामिक स्वाभावरूप अन्वयका बना रहना ध्रौव्य है । उदाहरणार्थ-कोयला जलकर
राख हो जाता है, इसमें पुद्गलकी कोयला रूप पर्यायका व्यय होता है और क्षार रूप पर्यायका
उत्पाद होता है किन्तु दोनों अवस्थाओंमें पुद्गल द्रव्यका अस्तित्व बना रहता है । पुद्गलपनेका
कभी भी नाश नहीं होता यही उसकी ध्रौव्यता है । आशय यह है कि प्रत्येक पदार्थ परिवर्तनशील
है और उसमें यह परिवर्तन प्रति समय होता रहता है जैसे दूध कुछ समय बाद दही रूपसे परिणम
जाता है और फिर दहीका मट्ठा बना लिया जाता है, यहाँ यद्यपि दूधसे दही और दहीसे मट्ठा ये
तीन भिन्न-भिन्न अवस्थाएँ हुई हैं पर हैं ये तीनों एक गोरसकी ही । इसी प्रकार प्रत्येक द्रव्यमें
अवस्था भेदके होनेपर भी उसका अन्वय पाया जाता है इसलिए वह उत्पाद, व्यय और ध्रौव्ययुक्त
सिद्ध होता है । यह प्रत्येक द्रव्यका सामान्य स्वभाव है । अब प्रश्न यह होता है कि प्रत्येक द्रव्य
एक साथ तीनरूप कैसे हो सकता है । कदाचित् कालभेदसे उसे उत्पाद और व्ययरूप मान भी
लिया जाय क्योंकि जिसका उत्पाद होता है उसका कालान्तरमें नाश अवश्य होता है । तथापि
वह ऐसी अवस्थामें ध्रौव्यरूप नहीं हो सकता, क्योंकि जिसका उत्पाद और व्यय होता है उसे
ध्रौव्य स्वभाव माननेमें विरोध आता है । समाधान यह है कि अवस्थाभेदसे द्रव्यमें ये तीनों धर्म
माने गये हैं । जिस समय द्रव्यकी पूर्व अवस्था नाशको प्राप्त होती है उसी समय उसकी नयी
अवस्था उत्पन्न होती है फिर भी उसका त्रैकालिक अन्वय स्वभाव बना रहता है । इसी बातको
आचार्य समन्तभद्रने इन शब्दोंमें व्यक्त किया है-'घटका इच्छुक उसका नाश होने पर दुखी होता
है, मुकुटका इच्छुक उसका उत्पाद होनेपर हर्षित होता है और स्वर्णका इच्छुक न दुखी होता है
न हर्षित होता है, वह मध्यस्थ रहता है । एक ही समयमें यह शोक, प्रमोद और मध्यस्थभाव
बिना कारणके नहीं हो सकता इससे प्रत्येक द्रव्य उत्पाद, व्यय और ध्रौव्ययुत है यह सिद्ध
होता है ।
१. -दादीनि त्रीणि द्रव्य -मु० । २. लक्ष्यम् । तत्पर्या-मु०, आ०, दि० १ ।