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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 348, कुल 558 में से

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पृष्ठ 348

२३६ | सर्वार्थसिद्धौ | [ ५।४१ § ६०५ -
§ ६०५. आह गुणपर्ययवद् द्रव्यमित्युक्तं तत्र के गुणा इत्यत्रोच्यते—
द्रव्याश्रया निर्गुणा गुणाः ॥४१॥
§ ६०६. द्रव्यमाश्रयो येषां ते द्रव्याश्रयाः । निष्क्रान्ता गुणेभ्यो निर्गुणाः । एवमुभयलक्षणो-
पेता गुणा इति । ‘निर्गुणाः' इति विशेषणं द्व्यणुकादिनिवृत्त्यर्थम् । तान्यपि हि कारणभूतपरमाणु-
द्रव्याश्रयाणि गुणवन्ति तु तस्मात् ‘निर्गुणाः' इति विशेषणात्तानि निर्वर्त्तितानि भवन्ति । ननु
पर्याया अपि घटसंस्थानादयो द्रव्याश्रया निर्गुणाश्च, तेषामपि गुणत्वं प्राप्नोति । 'द्रव्याश्रयाः' इति
वचनात् ‘नित्यं द्रव्यमाश्रित्य वर्तन्ते¹ ये' ते गुणा इति ²विशेषात्पर्याया निर्वर्तिता भवन्ति । ते हि
कादाचित्का इति ।
§ ६०५. 'गुण और पर्यायवाला द्रव्य है' यह पहले कह आये हैं। अब गुण क्या है यह
बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
जो निरन्तर द्रव्यमें रहते हैं और गुणरहित हैं वे गुण हैं ॥४१॥
§ ६०६. जिनके रहनेका आश्रय द्रव्य है वे द्रव्याश्रय कहलाते हैं और जो गुणोंसे रहित हैं
वे निर्गुण कहे जाते हैं। इस प्रकार इन दोनों लक्षणोंसे युक्त गुण होते हैं। सूत्रमें 'निर्गुणाः' यह
विशेषण द्व्यणुक आदिके निराकरण करनेके लिए दिया है। वे भी अपने कारणभूत परमाणु द्रव्य-
के आश्रयसे रहते हैं और गुणवाले हैं, इसलिए 'निर्गुणाः' इस विशेषणसे उनका निषेध किया गया
है। शंका—घटसंस्थान आदि जितनी पर्याय हैं वे सब द्रव्यके आश्रयसे रहती हैं और निर्गुण होती
हैं अतः गुणके उक्त लक्षणके अनुसार उन्हें भी गुणत्व प्राप्त होता है ? समाधान—सूत्रमें जो
'द्रव्याश्रयाः' विशेषण है उसका यह अभिप्राय है कि जो सदा द्रव्यके आश्रयसे रहते हैं वे गुण हैं।
इस प्रकार 'सदा' विशेषण लगानेसे पर्यायोंका निषेध हो जाता है अर्थात् गुणका लक्षण पर्यायोंमें
नहीं जाता है; क्योंकि पर्याय कादाचित्क होती हैं।
विशेषार्थ—पहले गुण और पर्यायवाला द्रव्य है यह कह आये हैं। यहाँ गुणके स्वरूपका
विचार किया गया है। जब कि द्रव्यको गुण और पर्यायवाला बतलाया है तब इसीसे स्पष्ट है कि
गुण द्रव्यके आश्रयसे रहते हैं अर्थात् द्रव्य आधार है और गुण आधेय है। पर इससे आधार और
आधेयमें दही और कुण्डके समान सर्वथा भेदपक्षका ग्रहण नहीं करना चाहिए क्योंकि गुण द्रव्यके
आश्रयसे रहते हुए भी वे उससे कथंचित् अभिन्न हैं जैसे-तैल तिलके सब अवयवोंमें व्याप्त होकर
रहता है वैसे ही प्रत्येक गुण द्रव्यके सभी अवयवोंमें समान रूपसे व्याप्त होकर रहता है, पर इससे
द्व्यणुक आदिमें भी यह लक्षण घटित हो जाता है क्योंकि द्व्यणुक आदि भी अपने आधारभूत
परमाणु द्रव्यके आश्रयसे रहते हैं। अतएव जो स्वयं विशेष रहित हों वे गुण हैं यह कहा है। ऐसा
नियम है कि जैसे द्रव्यमें गुण पाये जाते हैं वैसे गुणमें अन्य गुण नहीं रहते। अतएव गुण स्वयं
विशेष रहित रहते हैं, इस प्रकार यद्यपि जो द्रव्यके आश्रयसे रहते हैं और स्वयं विशेष रहित हैं
वे गुण हैं, गुणका इतना लक्षण फलित हो जाता है पर यह पर्यायोंमें भी पाया जाता है। क्योंकि
वे भी द्रव्यके आश्रयसे रहती हैं और स्वयं विशेषरहित होती हैं। इसलिए इस अतिव्याप्ति दोषका
निराकरण करनेके लिए जो द्रव्यके आश्रयसे रहते हैं इसका अर्थ-जो द्रव्यके आश्रयसे सदा रहते
हैं, इतना समझना चाहिए। इस प्रकार गुणोंके स्वरूपका विचार किया। गुणका एक नाम विशेष
भी है। जिनके निमित्तसे एक द्रव्य अन्य द्रव्यसे भेद को प्राप्त हों वे विशेष अर्थात् गुण हैं यह उक्त
कथनका तात्पर्य है। ऐसे गुण प्रत्येक द्रव्यमें अनन्त होते हैं। उनमें कुछ सामान्य होते हैं और कुछ
विशेष। जो एकाधिक द्रव्योंमें उपलब्ध होते हैं वे सामान्यगुण कहलाते हैं और जो प्रत्येक द्रव्यकी
विशेषताको व्यक्त करते हैं वे विशेषगुण कहलाते हैं।
१. -र्तन्ते गुणा मु० । २. विशेषणत्वात्पर्यायाश्च निव-मु० ।