सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 342, कुल 558 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 342

२३० सर्वार्थसिद्धौ [ ५।३७ § ५९८ –
ग्धरूक्षस्य चतुर्गुणादिस्निग्धरूक्षः पारिणामिको भवति । ततः पूर्वावस्थाप्रच्यवनपूर्वकं तार्तीयिकम-
वस्थान्तरं प्रादुर्भवतीत्येकत्वमुपपद्यते । इतरथा हि शुक्लकृष्णतन्तुवत् संयोगे सत्यप्यपारिणामि-
कत्वात्सर्वं विविक्तरूपेणैवावतिष्ठेत । उक्तेन विधिना बन्धे पुनः सति ज्ञानावरणादीनां कर्मणां
त्रिंशत्सागरोपमकोटीकोट्यादिस्थितिरुपपन्ना भवति ।
५ विशेषार्थ—यहाँ एक परमाणुका अन्य परमाणुसे बन्ध कैसे होता है इसका विचार
किया गया है। रूक्ष और स्निग्ध ये विरोधी गुण हैं। जिसमें स्निग्ध गुण होता है उसमें
रूक्ष गुण नहीं होता और जिसमें रूक्ष गुण होता है उसमें स्निग्ध गुण नहीं होता । ये गुण
ही बन्धके कारण होते हैं। किन्तु इसका अभिप्राय यह नहीं कि रूक्ष और स्निग्ध गुणका
सद्भावमात्र बन्धका कारण है क्योंकि ऐसा माननेपर एक भी पुद्गल परमाणु बन्धके बिना
१० नहीं रह सकता, इसलिए यहाँपर विधिनिषेध-द्वारा बतलाया गया है कि किन पुद्गल पर-
माणुओंका परस्परमें बन्ध होता है और किनका नहीं होता है। जो स्निग्ध और रूक्ष गुण
जघन्य शक्त्यंश लिये हुए होते हैं उन पुद्गल-परमाणुओंका बन्ध नहीं होता । इसी प्रकार गुणकी
समानताके होनेपर सदृशोंका बन्ध नहीं होता किन्तु द्व्यधिक गुणवाले पुद्गलपरमाणुका ही
द्व्यहीन गुणवाले पुद्गलपरमाणुके साथ होता है। ऐसा बन्ध स्निग्ध परमाणुका स्निग्ध परमाणुके
१५ साथ, रूक्ष परमाणुका रूक्ष परमाणुके साथ और स्निग्ध परमाणुका रूक्ष परमाणुके साथ होता है
यह नियम है। इसके अनुसार निम्न व्यवस्था फलित होती है—
क्रमांक | गुणांश | सदृशबन्ध | विसदृशबन्ध
१ | जघन्य + जघन्य | नहीं | नहीं
२ | जघन्य + एकादि अधिक | नहीं | नहीं
२० ३ | जघन्येतर + समजघन्येतर | नहीं | नहीं
४ | जघन्येतर + एकाधिकजघन्येतर | नहीं | नहीं
५ | जघन्येतर + द्व्यधिकजघन्येतर | है | है
६ | जघन्येतर + त्र्यादिअधिकजघन्येतर | नहीं | नहीं

  • तत्त्वार्थसूत्रमें निर्दिष्ट यह बन्ध-व्यवस्था प्रवचनसारका अनुसरण करती है। प्रवचनसारमें
    २५ भी इसी प्रकारसे बन्ध व्यवस्थाका निर्देश किया गया है किन्तु षट्खण्डागमके वर्गणाखण्डमें कही
    गयी बन्ध व्यवस्था इससे कुछ भिन्न है जिसका ठीक तरहसे परिज्ञान होनेके लिए आगे कोष्ठक
    दिया जाता है—
    क्रमांक | गुणांश | सदृशबन्ध | विसदृशबन्ध
    १ | जघन्य + जघन्य | नहीं | नहीं
    ३० २ | जघन्य + एकादिअधिक | नहीं | नहीं
    ३ | जघन्येतर + समजघन्येतर | नहीं | है
    ४ | जघन्येतर + एकाधिक जघन्येतर | नहीं | है
    ५ | जघन्येतर + द्व्यधिक जघन्येतर | है | है
    ६ | जघन्येतर + त्र्यादि अधिकजघन्येतर | नहीं | है
    CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri