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सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
  • ४।३५ § ५१० ] चतुर्थोऽध्यायः १९३
    § ५०६. निर्दिष्टोत्कृष्टस्थितिकेषु देवेषु जघन्यस्थितिप्रतिपादनार्थमाह—
    अपरा पल्योपममधिकम् ॥३३॥
    § ५०७. पल्योपमं व्याख्यातम् । अपरा जघन्या१ स्थितिः । पल्योपमं साधिकम् । केषाम् ।
    सौधर्मेशानीयानाम् । कथं गम्यते । 'परतः परतः' इत्युत्तरत्र वक्ष्यमाणत्वात् ।
    § ५०८. तत ऊर्ध्वं जघन्यस्थितिप्रतिपादनार्थमाह—
    परतः परतः पूर्वापूर्वानन्तरा ॥३४॥
    § ५०९. परस्मिन्देशे परतः । वीप्सायां द्वित्वम् । 'पूर्व'शब्दस्यापि । 'अधिक'ग्रहणमनुवर्तते ।
    तेनैवमभिसंबन्धः क्रियते—सौधर्मेशानयोद्वे सागरोपमे साधिके उक्ते, ते साधिके सानत्कुमारमाहेन्द्र-
    योर्जघन्या स्थितिः । सानत्कुमारमाहेन्द्रयोः परा स्थितिः सप्तसागरोपमाणि साधिकानि, २तानि
    साधिकानि ब्रह्मब्रह्मोत्तरयोर्जघन्या स्थितिरित्यादि ।
    § ५१०. नारकाणामुत्कृष्टा स्थितिरुक्ता । जघन्यां सूत्रेऽनुपात्तामप्रकृतामपि लघुनोपायेन
    प्रतिपादयितुमिच्छन्नाह—
    नारकाणां च द्वितीयादिषु ॥३५॥
    § ५०६. जिनमें उत्कृष्ट स्थिति कह आये हैं उनमें जघन्य स्थिति का कथन करने के लिए
    आगेका सूत्र कहते हैं—
    सौधर्म और ऐशान कल्पमें जघन्य स्थिति साधिक एक पल्य है ॥३३॥
    § ५०७. पल्योपमका व्याख्यान कर आये । यहाँ 'अपरा' पदसे जघन्य स्थिति ली गयी है ।
    जो साधिक एक पल्य है । शंका—यह जघन्य स्थिति किनकी है । समाधान—सौधर्म और ऐशान
    कल्पके देवोंकी । शंका—कैसे जाना जाता है ? समाधान—जो पूर्व-पूर्व देवों की उत्कृष्ट स्थिति है
    वह अगले-अगले देवों की जघन्य स्थिति है यह आगे कहनेवाले हैं इससे जाना जाता कि यह
    सौधर्म और ऐशान कल्पके देवों की जघन्य स्थिति है ।
    § ५०८. अब सौधर्म और ऐशान कल्पसे आगेके देवोंकी जघन्य स्थितिका प्रतिपादन करनेके
    लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
    आगे-आगे पूर्व-पूर्वकी उत्कृष्ट स्थिति अनन्तर-अनन्तरकी जघन्य स्थिति है ॥३४॥
    § ५०९. यहाँ 'परतः' पदका अर्थ 'पर स्थानमें' लिया गया है । तथा द्वित्व वीप्सा रूप
    अर्थमें आया है । इसी प्रकार 'पूर्व' शब्द को भी वीप्सा अर्थमें द्वित्व किया है । अधिक पदकी यहाँ
    अनुवृत्ति होती है । इसलिए इस प्रकार सम्बन्ध करना चाहिए कि सौधर्म और ऐशान कल्पमें जो
    साधिक दो सागर उत्कृष्ट स्थिति कही है उसमें एक समय मिला देने पर सानत्कुमार और माहेन्द्र-
    कल्पमें जघन्य स्थिति होती है । सानत्कुमार और माहेन्द्रमें जो साधिक सात सागर उत्कृष्ट स्थिति
    कही है उसमें एक समय मिला देने पर ब्रह्म और ब्रह्मोत्तर में जघन्य स्थिति होती है इत्यादि ।
    § ५१०. नारकियोंकी उत्कृष्ट स्थिति कह आये हैं पर सूत्र-द्वारा अभी जघन्य स्थिति नहीं
    कही है । यद्यपि उसका प्रकरण नहीं है तो भी यहाँ उसका थोड़ेमें कथन हो सकता है इस इच्छासे
    आचार्यने आगेका सूत्र कहा है—
    दूसरी आदि भूमियोंमें नारकोंकी पूर्व-पूर्वकी उत्कृष्ट स्थिति ही अनन्तर-अनन्तरकी जघन्य
    स्थिति है ॥३५॥
    १. जघन्यस्थितिः मु० । २. तानि ब्रह्म-मु०, ता० ।
    २५
    CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

१९४ सर्वार्थसिद्धौ [ ४।३६ § ५११ -
§ ५११. 'च'शब्दः किमर्थः । प्रकृतसमुच्चयार्थः । किं च प्रकृतम् । 'परतः परतः पूर्वापूर्वा-
ऽनन्तरा' अपरा स्थितिरिति । तेनायमर्थो लक्ष्यते-रत्नप्रभायां नारकाणां परा स्थितिरेकं सागरोप-
मम् । सा शर्कराप्रभायां जघन्या । शर्कराप्रभायामुत्कृष्टा स्थितिरस्त्रीणि सागरोपमाणि । सा
वालुकाप्रभायां जघन्येत्यादि ।
§ ५१२. एवं द्वितीयादिषु जघन्या स्थितिरुक्ता । प्रथमायां का जघन्येति तत्प्रदर्शनार्थमाह-
दशवर्षसहस्राणि प्रथमायाम् ॥३६॥
§ ५१३. अपरा स्थितिरित्यनुवर्तते¹ । रत्नप्रभायां दशवर्षसहस्राणि अपरा स्थितिवेदितव्या ।
§ ५१४. अथ भवनवासिनां का जघन्या स्थितिरित्यत आह-
भवनेषु च ॥३७॥
§ ५१५. 'च' शब्द किमर्थः । प्रकृतसमुच्चयार्थः । तेन भवनवासिनामपरा स्थितिर्दशवर्ष-
सहस्राणीत्यभिसंबध्यते ।
§ ५१६. व्यन्तराणां तर्हि का जघन्या स्थितिरित्यत आह-
व्यन्तराणां च ॥३८॥
§ ५१७. 'च'शब्दः प्रकृतसमुच्चयार्थः । तेन व्यन्तराणामपरा स्थितिर्दशवर्षसहस्राणीत्यव-
गम्यते ।
§ ५११. शंका-सूत्र में 'च' शब्द किसलिए दिया है ? समाधान-प्रकृत विषयका समुच्चय
करनेके लिए 'च' शब्द दिया है। शंका-क्या प्रकृत है ? समाधान-'परतः परतः पूर्वा पूर्वाऽनन्तरा
अपरा स्थितिः' यह प्रकृत है 'च' शब्द से इसका समुच्चय हो जाता है। इससे यह अर्थ प्राप्त होता
है कि रत्नप्रभामें नारकियोंकी उत्कृष्ट स्थिति जो एक सागर है वह शर्कराप्रभामें जघन्य स्थिति
है । शर्कराप्रभामें उत्कृष्ट स्थिति जो तीन सागर है वह वालुका प्रभामें जघन्य स्थिति है इत्यादि ।
§ ५१२. इस प्रकार द्वितीयादि नरकोंमें जघन्य स्थिति कही । प्रथम नरकमें जघन्य स्थिति
कितनी है अब यह बतलाने के लिए आगेका सूत्र कहते हैं-
प्रथम भूमिमें दस हजार वर्ष जघन्य स्थिति है ॥३६॥
§ ५१३. इस सूत्रमें 'अपरा स्थितिः' इस पदकी अनुवृत्ति होती है। तात्पर्य यह है कि
रत्नप्रभा पृथिवीमें दस हजार वर्ष जघन्य स्थिति है।
§ ५१४. अब भवनवासियों की जघन्य स्थिति कितनी है यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं-
भवनवासियों में भी दस हजार वर्ष जघन्य स्थिति है ॥३७॥
§ ५१५. शंका-सूत्रमें 'च' शब्द किसलिए दिया है ? समाधान-प्रकृत विषयका समुच्चय
करनेके लिए। इससे ऐसा अर्थ घटित होता है कि भवनवासियोंकी जघन्य स्थिति दस हजार
वर्ष है।
§ ५१६. तो व्यन्तरोंकी जघन्य स्थिति कितनी है अब यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं-
व्यन्तरों की दस हजार वर्ष जघन्य स्थिति है ॥३८॥
§ ५१७. सूत्रमें 'च' शब्द प्रकृत विषयका समुच्चय करनेके लिए दिया है। इससे ऐसा
अर्थ घटित होता है कि व्यन्तरोंकी जघन्य स्थिति दस हजार वर्ष है।
१. -र्तते । अथ भवन-आ०, दि० १, दि० २ ।

– ४।४२ § ५२५ ] चतुर्थोऽध्यायः १९५
§ ५१८. अथैषां परा स्थितिः का इत्यत्रोच्यते—
परा पल्योपममधिकम् ॥३६॥
§ ५१९. परा उत्कृष्टा। स्थितिव्यन्तराणां पल्योपममधिकम् ।
§ ५२०. इदानीं ज्योतिष्काणां परा स्थितिर्वक्तव्येत्यत आह—
ज्योतिष्काणां च ॥४०॥
§ ५२१. 'च'शब्दः प्रकृतसमुच्चयार्थः । तेनैवमभिसंबन्धः । ज्योतिष्काणां परा स्थितिः
पल्योपममधिकमिति ।
§ ५२२. अथापरा कियतीत्यत आह—
तदष्टभागोऽपरा ॥४१॥
§ ५२३. तस्य पल्योपमस्याष्टभागो ज्योतिष्काणामपरा स्थितिरित्यर्थः ।
§ ५२४. अथ लौकान्तिकानां विशेषोक्तानां स्थितिविशेषो नोक्तः । स कियानित्यत्रोच्यते—
लौकान्तिकानामष्टौ सागरोपमाणि सर्वेषाम् ॥४२॥
§ ५२५. अविशिष्टाः सर्वे ते शुक्ललेश्याः पञ्चहस्तोत्सेधशरीराः१।
इति तत्त्वार्थवृत्तौ सर्वार्थसिद्धिसंज्ञायां चतुर्थोऽध्यायः ॥४॥
§ ५१८. अब व्यन्तरों की उत्कृष्ट स्थिति कितनी है यह बतलाने के लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
और उत्कृष्ट स्थिति साधिक एक पल्य है ॥३९॥
§ ५१९. पर शब्दका अर्थ उत्कृष्ट है । तात्पर्य यह है कि व्यन्तरों की उत्कृष्ट स्थिति साधिक
एक पल्य है।
§ ५२०. अब ज्योतिषियों की स्थिति कहनी चाहिए, अतः आगे का सूत्र कहते हैं—
ज्योतिषियोंकी उत्कृष्ट स्थिति साधिक एक पल्य है ॥४०॥
§ ५२१. सूत्रमें 'च' शब्द प्रकृतका समुच्चय करनेके लिए दिया है । इससे यह अर्थ घटित
होता है कि ज्योतिषियोंकी उत्कृष्ट स्थिति साधिक एक पल्य है ।
§ ५२२. ज्योतिषियोंकी जघन्य स्थिति कितनी है अब यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
ज्योतिषियोंकी जघन्य स्थिति उत्कृष्ट स्थितिका आठवां भाग है ॥४१॥
§ ५२३. इस सूत्रका यह भाव है कि उसका अर्थात् पल्यका आठवां भाग ज्योतिषियोंको
जघन्य स्थिति है ।
§ ५२४. विशेषरूपमें कहे गये लौकान्तिक देवोंकी स्थिति नहीं कही है । वह कितनी है अब
यह बतलाते हैं—
सब लौकान्तिकोंकी स्थिति आठ सागर है ॥४२॥
§ ५२५. इन सब लौकान्तिकोंकी शुक्ल लेश्या होती है । और शरीरकी ऊँचाई पाँच हाथ
होती है।
इस प्रकार सर्वार्थसिद्धि नामवाली तत्त्वार्थवृत्तिमें चौथा अध्याय समाप्त हुआ ॥४॥
१. शरीराः। चतुर्णिकायदेवानां स्थानं भेदः सुखादिकम् । परापरा स्थितिर्लेश्या तुर्याध्याये निरूपितम् । ३५
इति तत्त्वा०सु०, दि० १, मि० २, आ० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

अथ पञ्चमोऽध्यायः
§ ५२६. इदानीं सम्यग्दर्शनस्य विषयभावेनोपक्षिप्तेषु जीवादिषु जीवपदार्थो व्याख्यातः ।
अथाजीवपदार्थो विचारप्राप्तस्तस्य संज्ञाभेदसंकीर्तनार्थमिदमुच्यते—
अजीवकाया धर्माधर्माकाशपुद्गलाः ॥१॥
§ ५२७. ‘काय’शब्दः शरीरे व्युत्पादितः । इहोपचारादध्यारोप्यते । कुत उपचारः । यथा
शरीरं पुद्गलद्रव्यप्रचयात्मकं तथा धर्मादिष्वपि प्रदेशप्रचयापेक्षया काया इव काया इति ।
अजीवाश्च ते कायाश्च अजीवकायाः “विशेषणं विशेष्येणेति”१ वृत्तिः । ननु च नीलोत्पलादिषु
व्यभिचारे सति विशेषणविशेष्ययोगः । इहापि व्यभिचारयोगोऽस्ति । अजीवशब्दोऽकाये कालेऽपि
वर्तते, कायोऽपि जीवे । किमर्थः कायशब्दः । प्रदेशबहुत्वज्ञापनार्थः । धर्मादीनां प्रदेशा बहव इति ।
ननु च ‘असंख्येयाः प्रदेशा धर्माधर्मैकजीवानाम्’ इत्यनेनैव प्रदेशबहुत्वं ज्ञापितम् । २सत्यमिदम् । परं
किन्त्वस्मिन्विधौ सति तदवधारणं विज्ञायते, असंख्येयाः । प्रदेशा न संख्येया नाप्यनन्ता इति ।
३कालस्य प्रदेशप्रचयाभावज्ञापनार्थं च इह ‘काय’ग्रहणम् । कालो वक्ष्यते । तस्य प्रदेशप्रतिषेधार्थमिह
§ ५२६. सम्यग्दर्शनके विषयरूपसे जो जीवादि पदार्थ कहे हैं उनमें-से जीव पदार्थका
व्याख्यान किया । अब अजीव पदार्थका व्याख्यान विचार प्राप्त है अतः उसकी संज्ञा और भेदोंका
कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
धर्म, अधर्म, आकाश और पुद्गल ये अजीवकाय हैं ॥१॥
§ ५२७. व्युत्पत्तिसे काय शब्दका अर्थ शरीर है तो भी यहाँ उपचारसे उसका आरोप किया
है । शंका—उपचारका क्या कारण है ? समाधान—जिस प्रकार शरीर पुद्गल द्रव्यके प्रचयरूप
होता है उसी प्रकार धर्मादिक द्रव्य भी प्रदेशप्रचयकी अपेक्षा कायके समान होनेसे काय कहे गये हैं ।
अजीव और काय इनमें कर्मधारय समास है । जो 'विशेषणं विशेष्येण' इस सूत्रसे हुआ है। शंका—
नीलोत्पल इत्यादिमें नील और उत्पल इन दोनों का व्यभिचार देखा जाता है अतः वहाँ विशेषण-
विशेष्य सम्बन्ध किया गया है, किन्तु अजीवकायमें विशेषणविशेष्य सम्बन्ध करनेका क्या कारण
है ? समाधान—अजीवकायका यहाँ भी व्यभिचार देखा जाता है क्योंकि अजीव शब्द कालमें भी
रहता है जो कि काय नहीं है और काय शब्द जीवमें रहता है, अतः इस दोषके निवारण करनेके
लिए यहाँ विशेषणविशेष्य सम्बन्ध किया है । शंका—काय शब्द किसलिए दिया है ? समाधान—
प्रदेश बहुत्वका ज्ञान करानेके लिए । धर्मादिक द्रव्योंके बहुत प्रदेश हैं यह इससे जाना जाता है ।
शंका—आगे यह सूत्र आया है कि ‘धर्म, अधर्म और एक जीवके असंख्यात प्रदेश हैं’ इसीसे इनके
बहुत प्रदेशोंका ज्ञान हो जाता है फिर यहाँ कायशब्दके देनेकी क्या आवश्यकता ? समाधान—यह
ठीक है । तो भी इस कथनके होनेपर उस सूत्रसे प्रदेशोंके विषयमें यह निश्चय किया जाता है कि
इन धर्मादिक द्रव्योंके प्रदेश असंख्यात हैं, न संख्यात हैं और न अनन्त । दूसरे काल द्रव्यमें प्रदेशों-
का प्रचय नहीं है यह ज्ञान कराने के लिए इस सूत्रमें ‘काय’ पदका ग्रहण किया है । कालका आगे
व्याख्यान करेंगे । उसके प्रदेशोंका निषेध करनेके लिए यहाँ ‘काय’ शब्दका ग्रहण किया है । जिस
१. जैनेन्द्र० १।३।४८ । २. सत्यं अस्मिन् ता, ना० । ३. कालप्रदेश-आ०, दि० १, दि० २ ।

'काय' ग्रहणम् । यथाऽणोः प्रदेशमात्रत्वाद् द्वितीयादयोऽस्य^१ प्रदेशा न सन्तीत्यप्रदेशोऽणुः, तथा
कालपरमाणोरप्येकप्रदेशत्वादप्रदेश इति । तेषां धर्मादीनाम् 'अजीव' इति सामान्यसंज्ञा जीव-
लक्षणाभावमुखेन प्रवृत्ता । 'धर्माधर्माकाशपुद्गलाः' इति विशेषसंज्ञाः सामयिक्यः । ^२
§ ५२८. अत्राह, 'सर्वद्रव्यपर्यायेषु केवलस्य' इत्याद्येषु द्रव्याण्युक्तानि, कानि
तानीत्युच्यते—
द्रव्याणि ॥२॥
§ ५२९. यथास्वं पर्यायैर्द्रूयन्ते द्रवन्ति वा तानि इति द्रव्याणि । द्रव्यत्वयोगाद् द्रव्यमिति
चेत् । न; उभयासिद्धेः । यथा दण्डदण्डिनोर्योगो भवति पृथक्सिद्धयोः, न च तथा द्रव्यद्रव्यत्वे
पृथक्सिद्धे स्तः । यद्यपृथक्सिद्धयोरपि योगः स्यादाकाशकुसुमस्य प्रकृतैपुरुषस्य^३ द्वितीयशिरसश्च
योगः स्यादिति । अथ पृथक्सिद्धिरभ्युपगम्यते, द्रव्यत्वकल्पना निरर्थका । गुणसमुदायो^४ द्रव्यमिति
चेत् । तत्रापि गुणानां समुदायस्य च भेदाभावे तद् व्यपदेशो नोपपद्यते । भेदाभ्युपगमे च पूर्वोक्त
एव दोषः । ननु गुणान्‍द्रवन्ति^६ गुणैर्वा द्रूयन्त^७ इति विग्रहेऽपि स एव दोष इति चेत् । न; कथंचिद्-
भेदाभेदोपपत्तेस्तद्द्व्यपदेशसिद्धिः । व्यतिरेकेणानुपलब्धेरभेदः संज्ञालक्षणप्रयोजनादिभेदाद् भेद
प्रकार अणु एक प्रदेशरूप होनेके कारण उसके द्वितीय आदि प्रदेश नहीं होते इसलिए अणुको
अप्रदेशी कहते हैं उसी प्रकार काल परमाणु भी एकप्रदेशरूप होनेके कारण अप्रदेशी है। धर्मादिक
द्रव्यमें जीवका लक्षण नहीं पाया जाता इसलिए उनकी अजीव यह सामान्य संज्ञा है। तथा धर्म,
अधर्म, आकाश और पुद्गल ये उनकी विशेष संज्ञाएं हैं जो कि यौगिक हैं ।
§ ५२८. 'सर्वद्रव्यपर्यायेषु केवलस्य' इत्यादि सूत्रोंमें द्रव्य कह आये हैं। वे कौन हैं ये
बतलानेके लिए आगे सूत्र कहते हैं—
ये धर्म, अधर्म, आकाश और पुद्गल द्रव्य हैं ॥२॥
§ ५२९. द्रव्य शब्दमें 'द्रू' धातु है जिसका अर्थ प्राप्त करना होता है। इससे द्रव्य शब्दका
व्युत्पत्तिरूप अर्थ इस प्रकार हुआ कि जो यथायोग्य अपनी-अपनी पर्यायोंके द्वारा प्राप्त होते
हैं या पर्यायोंको प्राप्त होते हैं वे द्रव्य कहलाते हैं। शंका—द्रव्यत्व नामकी एक जाति है उसके
सम्बन्धसे द्रव्य कहना ठीक है ? समाधान—नहीं, क्योंकि इस तरह दोनों की सिद्धि नहीं होती ।
जिस प्रकार दण्ड और दण्डी ये दोनों पृथक् सिद्ध हैं अतः उनका सम्बन्ध बन जाता है उस प्रकार
द्रव्य और द्रव्यत्व ये अलग-अलग सिद्ध नहीं हैं। यदि अलग-अलग सिद्ध न होनेपर भी इनका
सम्बन्ध माना जाता है तो आकाश-कुसुम का और प्रकृत पुरुषके दूसरे सिरका भी सम्बन्ध मानना
पड़ेगा । यदि इनकी पृथक् सिद्धि स्वीकार करते हो तो द्रव्यत्वका अलगसे मानना निष्फल है।
गुणोंके समुदायको द्रव्य कहते हैं यदि ऐसा मानते हो तो यहां भी गुणोंका और समुदायका भेद
नहीं रहनेपर पूर्वोक्त संज्ञा नहीं बन सकती है। यदि भेद माना जाता है तो द्रव्यत्वके सम्बन्धसे
द्रव्य होता है इसमें जो दोष दे आये हैं वही दोष यहां भी प्राप्त होता है। शंका—जो गुणोंको
प्राप्त हों या गुणोंके द्वारा प्राप्त हों उन्हें द्रव्य कहते हैं, द्रव्यका इस प्रकार विग्रह करनेपर भी वही
दोष प्राप्त होता है ? समाधान—नहीं, क्योंकि कथंचित् भेद और कथंचित् अभेदके बन जानेसे
द्रव्य इस संज्ञाकी सिद्धि हो जाती है। गुण और द्रव्य ये एक दूसरेको छोड़कर नहीं पाये जाते
इसलिए तो इनमें अभेद है। तथा संज्ञा, लक्षण और प्रयोजन आदिकी अपेक्षा भेद होनेसे इनमें
१. योऽस्य न. मु० । २. धर्मोऽधर्म आकाशं पुद्गलाः इति आ०, दि० १, दि० २ । ३. प्रकृतपुरुषद्वितीय-
आ०, दि० १, दि० २, ता० । प्रकृतिपुरुषस्य द्वितीय-मु० । ४. गुणसंद्रावो द्रव्य-आ०, दि० १, दि० २,
ता०, ना० । ५. तद्द्रव्यव्यप-मु० । ६. द्रवन्ति आ०, दि० १, दि० २ । ७. द्रूयते आ०, दि० १, दि० २ ।

१९८ सर्वार्थसिद्धौ [ ५।३ § ५३० -
इति । प्रकृता धर्मादयो बहवस्तत्सामानाधिकरण्याद् बहुत्वनिर्देशः । स्यादेतत्संख्यानुवृत्तिवत्पुंल्लि-
ङ्गानुवृत्तिरपि प्राप्नोति । नैष दोषः; आविष्टलिङ्गाः शब्दा न कदाचिल्लिङ्गं व्यभिचरन्ति¹ । अतो
धर्मादयो द्रव्याणि भवन्तीति ।
§ ५३०. अनन्तरत्वाच्चतुर्णामेव द्रव्यव्यपदेशप्रसङ्गेऽध्यारोपणार्थमिदमुच्यते—
जीवाश्च ॥३॥
§ ५३१. 'जीव'शब्दो व्याख्यातार्थः । बहुत्वनिर्देशो व्याख्यातभेदप्रतिपत्त्यर्थः । 'च'²शब्दः
द्रव्यसंज्ञानुकर्षणार्थः जीवाश्च द्रव्याणीति । एवमेतानि वक्ष्यमाणेण कालेन सह षड् द्रव्याणि
भवन्ति । ननु द्रव्यस्य लक्षणं वक्ष्यते 'गुणपर्ययवद् द्रव्यम्' इति । तल्लक्षणयोगाद्धर्मादीनां द्रव्य³-
व्यपदेशो भवति, नार्थः परिगणनेन । परिगणनमवधारणार्थम् । तेनान्यवादिपरिकल्पितानां
पृथिव्यादीनां निवृत्तिः कृता भवति । कथम् । पृथिव्यप्तेजोवायुमनांसि पुद्गलद्रव्येऽन्तर्भवन्ति;
रूपरसगन्धस्पर्शवत्त्वात् । वायुमनसो रूपादिभोगाभाव इति चेत् । न; वायुस्तावद्रूपादिमान्;
स्पर्शवत्त्वाद्धटादिवत् । चक्षुरादिकरणग्राह्यत्वाभावादप्यभाव इति चेत्⁵ । न; परमाण्वादिष्वति-
प्रसङ्गः स्यात् । आपो गन्धवत्यः; स्पर्शवत्त्वात्पृथिवीवत् । तेजोऽपि रसगन्धवद्; रूपवत्त्वात् तद्वदेव ।
परस्पर भेद है। प्रकृत धर्मादिक द्रव्य बहुत हैं इसलिए उनके साथ समानाधिकरण करनेके अभि-
प्रायसे 'द्रव्याणि' इस प्रकार बहुवचनरूप निर्देश किया है। शंका—जिस प्रकार यहां संख्याकी
अनुवृत्ति प्राप्त हुई है उसी प्रकार पुंलिंगकी भी अनुवृत्ति प्राप्त होती है ? समाधान—यह कोई दोष
नहीं है; क्योंकि जिस शब्दका जो लिंग है वह कभी भी अपने लिंगका त्याग करके अन्य लिंगके
द्वारा व्यवहृत नहीं होता। इसलिए 'धर्मादयो द्रव्याणि भवन्ति' ऐसा सम्बन्ध यहां करना चाहिए।
§ ५३०. अव्यवहित होनेके कारण धर्मादिक चारको ही द्रव्य संज्ञा प्राप्त हुई, अतः अन्यका
अध्यारोप करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
जीव भी द्रव्य हैं ॥३॥
§ ५३१. जीव शब्दका व्याख्यान कर आये । सूत्रमें जो बहुवचन दिया है वह जीव द्रव्यके
कहे गये भेदोंके दिखलानेके लिए दिया है। 'च' शब्द द्रव्य संज्ञाके खींचनेके लिए दिया है जिससे
'जीव भी द्रव्य हैं' यह अर्थ फलित हो जाता है। इस प्रकार ये पांच आगे कहे जानेवाले कालके
साथ छह द्रव्य होते हैं। शंका—आगे 'गुणपर्ययवद् द्रव्यम्' इस सूत्र-द्वारा द्रव्यका लक्षण
कहेंगे; अतः लक्षणके सम्बन्धसे धर्मादिकको 'द्रव्य' संज्ञा प्राप्त हो जाती है फिर यहां उनकी अलगसे
गिनती करनेका कोई कारण नहीं है ? समाधान—गिनती निश्चय करनेके लिए की है। इससे
अन्यवादियोंके द्वारा माने गये पृथिवी आदि द्रव्योंका निराकरण हो जाता है। शंका—कैसे ?
समाधान—पृथिवी, जल, अग्नि, वायु और मन इनका पुद्गल द्रव्यमें अन्तर्भाव हो जाता है;
क्योंकि ये रूप, रस, गन्ध और स्पर्शवाले होते हैं। शंका—वायु और मनमें रूपादिक नहीं हैं ?
समाधान—नहीं, क्योंकि वायु रूपादिवाला है, स्पर्शवाला होनेसे, घटके समान। इस अनुमानके
द्वारा वायुमें रूपादिककी सिद्धि होती है। शंका—चक्षु आदि इन्द्रियोंके द्वारा वायुका ग्रहण नहीं
होता, इसलिए उसमें रूपादिकका अभाव है ? समाधान—नहीं; क्योंकि इस प्रकार माननेपर
परमाणु आदिमें अतिप्रसंग दोष आता है। अर्थात् परमाणु आदिको भी चक्षु आदि इन्द्रियां नहीं
ग्रहण करतीं इसलिए उनमें भी रूपादिकका अभाव मानना पड़ेगा। इसी प्रकार जल गन्धवाला
१. -चरन्ति, अनन्तरत्वात् ता०, ना० । २. च शब्दः संज्ञा—मु० । ३. द्रव्यत्वव्यप-मु० । ४. 'पृथिव्याप-
स्तेजोवायुराकाशं कालो दिगात्मा मन इति द्रव्याणि।'—वै० सू० १।१, ५ । ५. –त्त्वाच्चक्षुरिन्द्रियवत् ।
वायु-मु०, ता०, ना० । ६. इति चेत्पर-मु०, आ० दि० १, दि० २।

  • ५।३ § ५३१ ] पञ्चमोऽध्यायः १९९
    मनोऽपि द्विविधं द्रव्यमनो भावमनश्चेति। तत्र भावमनो ज्ञानम्; तस्य जीवगुणत्वादात्मन्यन्तर्भावः।
    द्रव्यमनश्च रूपादियोगात्पुद्गलद्रव्यविकारः। १ रूपादिमन्मनः; ज्ञानोपयोगकरणत्वाच्चक्षुरिन्द्रियवत्।
    ननु अमूर्तेऽपि शब्दे ज्ञानोपयोगकरणत्वदर्शनाद् व्यभिचारी हेतुरिति चेत् । न; तस्य पौद्गलिक-
    त्वान्मूत्तिमत्त्वोपपत्तेः। ननु यथा परमाणूनां रूपादिमत्कार्य२दर्शनाद्रूपादिमत्त्वं न तथा वायुमनसो
    रूपादिसत्कार्यं दृश्यते ३ इति चेत् । न; तेषामपि ४ तदुपपत्तेः । सर्वेषां परमाणूनां सर्वरूपादि- ५
    मत्कार्यत्वप्राप्तियोग्यत्वाभ्युपगमात् । न च केचित्पार्थिवादिजातिविशेषयुक्ताः परमाणवः सन्ति;
    जातिसांकर्येणारम्भदर्शनात् । दिशोऽप्याकाशेऽन्तर्भावः, आदित्योदयाद्यपेक्षया आकाशप्रदेशपङ्क्तिषु
    इत इदमिति व्यवहारोपपत्तेः ।
    है, स्पर्शवाला होनेसे, पृथिवीके समान । अग्नि भी रस और गन्धवाली है, रूपवाली होनेसे,
    पृथिवीके समान । मन भी दो प्रकारका है—द्रव्यमन और भावमन । उनमें-से भावमन ज्ञानस्वरूप १०
    है, और ज्ञान जीवका गुण है इसलिए इसका आत्मामें अन्तर्भाव होता है। तथा द्रव्यमनमें रूपा-
    दिक पाये जाते हैं, अतः वह पुद्गलद्रव्यकी पर्याय है। यथा—मन रूपादिवाला है, ज्ञानोपयोग-
    का करण होनेसे, चक्षु इन्द्रियके समान । शंका—शब्द अमूर्त होते हुए भी उसमें ज्ञानोपयोगकी
    करणता देखी जाती है, अतः मनको रूपादिवाला सिद्ध करनेके लिए जो हेतु दिया है वह व्यभि-
    चारी है ? समाधान—नहीं; क्योंकि शब्द पौद्गलिक है अतः उसमें मूर्तपना बन जाता है। शंका— १५
    जिस प्रकार परमाणुओंके रूपादि गुणवाले कार्य देखे जाते हैं अतः वे रूपादिवाले सिद्ध होते हैं उस
    प्रकार वायु और मनके रूपादि गुणवाले कार्य नहीं दिखाई देते ? समाधान—नहीं, क्योंकि वायु
    और मनके भी रूपादि गुणवाले कार्य सिद्ध हो जाते हैं; क्योंकि सब परमाणुओंमें सब रूपादि गुण-
    वाले कार्योंके होनेकी योग्यता मानी है। कोई पार्थिव आदि भिन्न-भिन्न जातिके अलग-अलग
    परमाणु हैं, यह बात नहीं है; क्योंकि जातिका संकर होकर सब कार्योंका आरम्भ देखा जाता है। २०
    इसी प्रकार दिशाका भी आकाशमें अन्तर्भाव होता है, क्योंकि सूर्यके उदयादिककी अपेक्षा आकाश
    प्रदेशपंक्तियोंमें यहांसे यह दिशा है इस प्रकारके व्यवहारकी उत्पत्ति होती है।
    विशेषार्थ—जातिकी अपेक्षा ये जीव पुद्गलादि जितने पदार्थ हैं वे सब द्रव्य कहलाते हैं।
    द्रव्य इस शब्दमें दो अर्थ छिपे हुए हैं—द्रवणशीलता और ध्रुवता । जगत्का प्रत्येक पदार्थ परि-
    णमनशील होकर भी ध्रुव है इसलिए उसे द्रव्य कहते हैं। आशय यह है कि प्रत्येक पदार्थ अपने २५
    गुणों और पर्यायोंका कभी भी उल्लंघन नहीं करता। उसके प्रवाहित होनेकी नियत धारा है
    जिसके आश्रयसे वह प्रवाहित होता रहता है। द्रव्य इस शब्दका उपयोग हमें जैन दर्शनके सिवा
    वैशेषिक दर्शनमें विशेष रूपसे व्यवहृत दिखाई देता है। वैशेषिकदर्शनमें गुण-गुणी, क्रिया-क्रियावान्
    और सामान्य-विशेषमें सर्वथा भेद माना है इसलिए वह द्रव्यत्वके सम्बन्धसे द्रव्य होता है, द्रव्य
    शब्दका ऐसा अर्थ करता है किन्तु उसका यह अर्थ संगत प्रतीत नहीं होता । क्योंकि द्रव्यत्व नाम- ३०
    का कोई स्वतन्त्र पदार्थ अनुभवमें नहीं आता। इस दर्शनने द्रव्यके पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, मन,
    दिशा आदि अनेक भेद किये हैं किन्तु विचार करनेपर पृथिवी, जल, अग्नि और वायुका अन्तर्भाव
    पुद्गलमें हो जाता है। पुद्गलका स्वरूप आगे बतलानेवाले हैं। वहाँ उसे रूप, रस, गन्ध और
    स्पर्शवाला बतलाया है। पृथ्बी जलादि जो पदार्थ पहले कह आये हैं, उन सबमें ये स्पर्शादिक
    उपलब्ध होते हैं यह निर्विवाद है। मनके दो भेद हैं—द्रव्यमन और भावमन । उनमें-से द्रव्यमनका ३५
    अन्तर्भाव पुद्गलमें और भावमनका अन्तर्भाव जीवमें होता है। इसी प्रकार दिशा आकाशसे
    १. -योगकारणत्व-मु० । २. -कार्यत्वदर्श-मु० । ३. दृश्यते न तेषा- आ०, दि० १, दि० २ ।
    ४. तदुत्पत्तेः मु० ।
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२०० सर्वार्थसिद्धौ [ ५।४ § ५३२ -
§ ५३२. उक्तानां द्रव्याणां विशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह—
नित्यावस्थितान्यरूपाणि ॥४॥
§ ५३३. नित्यं ध्रुवमित्यर्थः ।१ “नेर्ध्रुवे त्यः२” इति निष्पादितत्वात् । धर्मादीनि द्रव्याणि
गतिहेतुत्वादिविशेषलक्षणद्रव्यार्थादेशादस्तित्वादिसामान्यलक्षणद्रव्यार्थादेशाच्च कदाचिदपि न
व्ययन्तीति नित्यानि । वक्ष्यते हि 'तद्भावाव्ययं नित्यम्' इति । इयत्ताऽव्यभिचारादवस्थितानि ।
धर्मादीनि षडपि द्रव्याणि कदाचिदपि षडिति इयत्त्वं नातिवर्तन्ते । ततोऽवस्थितानीत्युच्यन्ते । न
विद्यते रूपमेषामित्यरूपाणि, रूपप्रतिषेधे३ तत्सहचारिणां रसादीनामपि प्रतिषेधः । तेन अरूपाण्य-
मूर्तानीत्यर्थः ।
§ ५३४. यथा सर्वेषां द्रव्याणां 'नित्यावस्थितानि' इत्येतत्साधारणं लक्षणं४ प्राप्तं तथा
पुद्गलानामपि अरूपित्वं प्राप्तम् । अतस्तदपवादार्थमाह—
रूपिणः पुद्गलाः ॥५॥
§ ५३५. रूपं मूर्तिरित्यर्थः । का मूर्तिः । रूपादिंसंस्थानपरिणामो मूर्तिः । रूपमेषामस्तीति
रूपिणः । मूर्तिमन्त इत्यर्थः । अथवा रूपमति५ गुणविशेषवचनशब्दः । तदेषामस्तीति रूपिणः ।
पृथक् भूत पदार्थ नहीं है क्योंकि सूर्यके उदयादिकी अपेक्षा आकाशमें ही दिशा व्यवहार होता है ।
इस प्रकार विचार करनेपर जैन दर्शनमें जो जीवादि पदार्थ गिनाये हैं वे ही द्रव्य ठहरते हैं अन्य
नहीं, ऐसा सिद्ध होता है ।
§ ५३२. अब उक्त द्रव्योंके विशेषका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
उक्त द्रव्य नित्य हैं, अवस्थित हैं और अरूपी हैं ॥४॥
§ ५३३. नित्य शब्दका अर्थ ध्रुव है । 'नेर्ध्रुवे त्यः' इस वार्तिकके अनुसार 'नि' शब्दसे ध्रुव-
अर्थमें 'त्य' प्रत्यय लगाकर नित्य शब्द बना है । गतिहेतुत्व आदि रूप विशेष लक्षणोंको ग्रहण करने-
वाले द्रव्यार्थिक नयकी अपेक्षा और अस्तित्व आदि रूप सामान्य लक्षणको ग्रहण करनेवाले द्रव्या-
र्थिक नयकी अपेक्षा ये छहों द्रव्य कभी भी विनाशको प्राप्त नहीं होते इसलिए नित्य हैं । 'तद्भावा-
व्ययं नित्यम्' इस सूत्र-द्वारा इसी बातको आगे कहनेवाले भी हैं । संख्याका कभी व्यभिचार नहीं होता
इसलिए अवस्थित हैं । ये धर्मादिक छहों द्रव्य कभी भी छह इस संख्याका उल्लंघन नहीं करते
इसलिए ये अवस्थित कहे जाते हैं । इनमें रूप नहीं पाया जाता इसलिए अरूपी हैं । यहाँ केवल
रूपका निषेध किया है, किन्तु रसादिक उसके सहचारी हैं अतः उनका भी निषेध हो जाता है ।
इससे अरूपीका अर्थ अमूर्त होता है ।
§ ५३४. जिस प्रकार सब द्रव्योंका नित्य और अवस्थित यह साधारण लक्षण प्राप्त होता
है उसी प्रकार पुद्गलोंमें अरूपीपना भी प्राप्त होता है अतः इसका अपवाद करनेके लिए आगेका
सूत्र कहते हैं—
पुद्गल रूपी हैं ॥५॥
§ ५३५. रूप और मूर्ति इनका एक अर्थ है । शंका—मूर्ति किसे कहते हैं ? समाधान—
रूपादिकके आकारसे परिणमन होनेको मूर्ति कहते हैं । जिनके रूप पाया जाता है वे रूपी कहलाते
हैं । इसका अर्थ मूर्तिमान् है । अथवा, रूप यह गुणविशेषका वाची शब्द है । वह जिनके पाया
१. नि ध्रुवे नित्य इति आ०, दि० १, दि० २ । नेर्ध्रुवेऽर्थे त्यः ता० । २. 'त्यन्नेर्ध्रुव इति वक्तव्यम्'-पा० ४,
२, १०४ वार्तिकम् । नेर्ध्रुवे'-जैनेन्द्र० ३, २, ८२ वार्तिकम् । ३. -षेधेन तत्सह-मु० । ४. लक्षणं
तथा अरूपित्वं पुद्गलानामपि प्राप्तम् मु० । ५. शब्दः । तेषा-आ०, दि० १, दि० २ ।

  • ५१६ § ५३७ ] पञ्चमोऽध्यायः २०१
    रसाद्यग्रहणमिति चेत् । न; तदविनाभावात्तदन्तर्भावः । 'पुद्गलाः' इति बहुवचनं भेदप्रतिपाद-
    नार्थम् । भिन्ना हि पुद्गलाः; स्कन्धपरमाणुभेदात् । तद्विकल्प उपरिष्टाद्वक्ष्यते । यदि प्रधानवदरूपि-
    त्वमेकत्वं चेष्टं स्यात्, विश्वरूपकार्यदर्शनविरोधः स्यात् ।
    § ५३६. आह, किं पुद्गलवद्धर्मादीन्यपि द्रव्याणि प्रत्येकं भिन्नानीत्यत्रोच्यते—
    आ¹ आकाशादेकद्रव्याणि ॥६॥ ५
    § ५३७. 'आङ्' अयमभिविध्यर्थः । सौत्रीमानुपूर्वी²मासृत्यैतदुक्तम् । तेन धर्माधर्माकाशानि
    गृह्यन्ते । 'एक' शब्दः संख्यावचनः । तेन द्रव्यं विशिष्यते, एकं द्रव्यं एकद्रव्यमिति । यद्येवं
    बहुवचनमयुक्तम्, धर्माद्यपेक्षया बहुत्वसिद्धिर्भवति³ । ननु एकस्यानेकार्थप्रत्ययनशक्तियोगादेकैक-
    मित्यस्तु, लघुत्वाद् । 'द्रव्य' ग्रहणमनर्थकम् । [ सत्यम्⁴; ] तथापि द्रव्यापेक्षया एकत्वख्यापनार्थं
    द्रव्यग्रहणम् । क्षेत्रभावोद्यपेक्षया⁵ असंख्येयत्वानन्तत्वविकल्पस्येष्टत्वान्न जीवपुद्गलवदेषां बहुत्व- १०
    मित्येतदनेन ख्याप्यते ।
    जाता है वे रूपी कहलाते हैं। शंका—यहाँ रसादिका ग्रहण नहीं किया है ? समाधान—नहीं;
    क्योंकि रसादिक रूपके अविनाभावी हैं, इसलिए उनका अन्तर्भाव हो जाता है ।
    पुद्गलोंके भेदोंका कथन करनेके लिए सूत्रमें 'पुद्गलाः' यह बहुवचन दिया है। स्कन्ध
    और परमाणुके भेदसे पुद्गल अनेक प्रकारके हैं। पुद्गलके ये सब भेद आगे कहेंगे। यदि पुद्गलको १५
    प्रधानके समान एक और अरूपी माना जाय तो जो विश्वरूप कार्य दिखाई देता है उसके होनेमें
    विरोध आता है ।
    § ५३६. पुद्गल द्रव्यके समान क्या धर्मादिक प्रत्येक द्रव्य भी अनेक हैं। अब इस बातका
    ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
    आकाश तक एक-एक द्रव्य हैं ॥६॥ २०
    § ५३७. इस सूत्रमें 'आङ्' अभिविधि अर्थमें आया है । सूत्र सम्बन्धी आनुपूर्वीका अनुसरण
    करके यह कहा है । इससे धर्म, अधर्म और आकाश इन तीनका ग्रहण होता है । एक शब्द संख्या-
    वाची है और वह द्रव्यका विशेषण है । तात्पर्य यह है कि धर्म, अधर्म और आकाश ये एक-एक
    द्रव्य हैं। शंका—यदि ऐसा है तो सूत्र में 'एकद्रव्याणि' इस प्रकार बहुवचनका प्रयोग करना अयुक्त
    है ? समाधान—धर्मादिक द्रव्योंकी अपेक्षा बहुवचन बन जाता है। शंका—एकमें अनेकके ज्ञान २५
    करानेकी शक्ति होती है, इसलिए 'एकद्रव्याणि'के स्थानमें 'एकैकम्' इतना ही रहा आवे । इससे
    सूत्र छोटा हो जाता है। तथा 'द्रव्य' पदका ग्रहण करना भी निष्फल है ? समाधान—ये धर्मादिक
    द्रव्यकी अपेक्षा एक हैं इस बातके बतलानेके लिए सूत्रमें 'द्रव्य' पदका ग्रहण किया है। तात्पर्य यह
    है कि यदि सूत्रमें 'एकैकम्' इतना ही कहा जाता तो यह नहीं मालूम पड़ता कि ये धर्मादिक द्रव्य,
    द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव इनमें-से किसकी अपेक्षा एक हैं अतः सन्देहकें निवारण करनेके लिए ३०
    'एकद्रव्याणि' पद रखा है । इनमें-से धर्म और अधर्म द्रव्यके क्षेत्रकी अपेक्षा असंख्यात विकल्प इष्ट
    होनेसे और भावकी अपेक्षा अनन्त विकल्प इष्ट होनेसे तथा आकाशके क्षेत्र और भाव दोनोंकी
    अपेक्षा अनन्त विकल्प इष्ट होनेसे ये जीव और पुद्गलके समान बहुत नहीं हैं इस प्रकार यह बात
    इस सूत्रमें दिखायी गयी है ।
    १. -'ईषदर्थे क्रियायोगे मर्यादाभिविधौ च यः । एतमातं ङितं विद्याद् वाक्यस्मरणयोरङित् ।' २. -पूर्वीमनु- ३५
    सृत्यै-मु० । ३. -वति । एक-आ० दि० १, दि० २ । ४. -र्थकं । तत्क्रियते द्रव्या-ता० ना० । -र्थकं ।
    तज्ज्ञायते द्रव्या-आ० दि० १, दि० २ । ५. -भावापेक्षया आ०, ता०, ना०, दि० १, दि० २ ।
    २६

२०२ सर्वार्थसिद्धौ [ ५।७ § ५३८ –
§ ५३८. अधिकृतानामेव एकद्रव्याणां विशेषप्रतिपत्त्यर्थमिदमुच्यते—
निष्क्रियाणि च ॥७॥
§ ५३९. उभयनिमित्तवशादुत्पद्यमानः पर्यायो द्रव्यस्य देशान्तरप्राप्तिहेतुः क्रिया। तस्या
निष्क्रान्तानि निष्क्रियाणि। अत्र चोद्यते—धर्मादीनि द्रव्याणि यदि निष्क्रियाणि ततस्तेषामुत्पादो
५ न भवेत्। क्रियापूर्वको हि घटादीनामुत्पादो दृष्टः। उत्पादाभावाच्च व्ययाभाव इति। अतः सर्व-
द्रव्याणामुत्पादादित्रितयकल्पना व्याघात इति। तन्न; किं कारणम्। अन्यथोपपत्तेः। क्रियानिमि-
त्तोत्पादाभावेऽप्येषां धर्मादीनामन्यथोत्पादः कल्प्यते। तद्यथा—द्विविध उत्पादः स्वनिमित्तः परप्रत्य-
यश्च। स्वनिमित्तस्तावदनन्तानामगुरुलघुगुणानामागमप्रामाण्यादभ्युपगम्यमानानां षट्स्थानपति-
तया वृद्ध्या हान्या च प्रवर्तमानानां स्वभावादेतेषामुत्पादो व्ययश्च। परप्रत्ययोऽपि अश्वादिगति-
१० स्थित्यवगाहनहेतुत्वात् क्षणे क्षणे तेषां भेदात्तद्धेतुत्वमपि भिन्नमिति परप्रत्ययापेक्ष उत्पादो विनाशश्च
व्यवह्रियते। ननु यदि निष्क्रियाणि धर्मादीनि, जीवपुद्गलानां गत्यादिहेतुत्वं नोपपद्यते। जलादीनि
हि क्रियावन्ति मत्स्यादीनां गत्यादिनिमित्तानि दृष्टानीति। नैष दोषः; बलाधाननिमित्तत्वाच्चक्षु-
र्वत्। यथा रूपोपलब्धौ चक्षुर्निमित्तंमिति न व्याक्षिप्तमनस्कस्यापि भवति। अधिकृतानां धर्मा-
§ ५३८. अब अधिकार प्राप्त उन्हीं एक-एक द्रव्योंका विशेष ज्ञान करानेके लिए आगेका
१५ सूत्र कहते हैं—
तथा निष्क्रिय हैं ॥७॥
§ ५३९. अन्तरंग और बहिरंग निमित्तसे उत्पन्न होनेवाली जो पर्याय द्रव्यके एक
क्षेत्रसे दूसरे क्षेत्रमें प्राप्त करानेका कारण है वह क्रिया कहलाती है और जो इस प्रकारकी क्रियासे
रहित हैं वे निष्क्रिय कहलाते हैं। शंका—यदि धर्मादिक द्रव्य निष्क्रिय हैं तो उनका उत्पाद नहीं
२० बन सकता, क्योंकि घटादिकका क्रियापूर्वक ही उत्पाद देखा जाता है। और उत्पाद नहीं बननेसे
इनका व्यय नहीं बनता। अतः सब द्रव्य उत्पाद आदि तीन रूप होते हैं इस कल्पनाका व्याघात हो
जाता है? समाधान—नहीं, क्योंकि इनमें उत्पाद आदिक तीन अन्य प्रकारसे बन जाते हैं। यद्यपि
इन धर्मादिक द्रव्योंमें क्रियानिमित्तक उत्पाद नहीं है तो भी इनमें अन्य प्रकारसे उत्पाद माना
गया है। यथा—उत्पाद दो प्रकारका है, स्वनिमित्तक उत्पाद और परप्रत्यय उत्पाद। स्वनिमित्तक
२५ यथा—प्रत्येक द्रव्यमें आगम प्रमाणसे अनन्त अगुरुलघु गुण स्वीकार किये गये हैं जिनका छह
स्थानपतित वृद्धि और हानिके द्वारा वर्तन होता रहता है, अतः इनका उत्पाद और व्यय स्वभाव-
से होता है। इसी प्रकार परप्रत्यय भी उत्पाद और व्यय होता है। यथा—ये धर्मादिक द्रव्य क्रमसे
अश्व आदिकी गति, स्थिति और अवगाहनमें कारण हैं। चूंकि इन गति आदिक में क्षण-क्षणमें
अन्तर पड़ता है इसीलिए इनके कारण भी भिन्न-भिन्न होने चाहिए, इस प्रकार इन धर्मादिक
३० द्रव्योंमें परप्रत्ययकी अपेक्षा उत्पाद और व्ययका व्यवहार किया जाता है। शंका—यदि धर्मादिक
द्रव्य निष्क्रिय हैं तो ये जीव और पुद्गलोंकी गति आदिकके कारण नहीं हो सकते; क्योंकि जला-
दिक क्रियावान् होकर ही मछली आदिकी गति आदिमें निमित्त देखे जाते हैं, अन्यथा नहीं?
समाधान—यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि चक्षु इन्द्रियके समान ये बलाधानमें निमित्तमात्र हैं।
जैसे चक्षु इन्द्रिय रूपके ग्रहण करनेमें निमित्तमात्र है, इसलिए जिसका मन व्याक्षिप्त है उसके चक्षु
३५ इन्द्रियके रहते हुए भी रूपका ग्रहण नहीं होता। उसी प्रकार प्रकृतमें समझ लेना चाहिए। इस
१. -दादित्रयकल्प-मु०। २. -गमप्रमाणादभ्यु-आ०, दि० १, दि० २। ३. -निमित्तमपि न मु०,
ता०, ना०।
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  • ५।९ § ५४२ ] पञ्चमोऽध्यायः २०३
    धर्माकाशानां निष्क्रियत्वेऽभ्युपगते जीवपुद्गलानां सक्रियत्वमर्थादापन्नम् । कालस्यापि सक्रियत्व-
    मिति चेत् । न; अनधिकारात् । अत एवासावेतैः सह नाधिक्रियते ।
    § ५४०. अजीवकाया इत्यत्र कायग्रहणेन प्रदेशास्तित्वमात्रं निर्ज्ञातं न त्वियत्तावधारिता
    प्रदेशानामतस्तन्निर्धारणार्थमिदमुच्यते—
    असंख्येयाः प्रदेशा धर्माधर्मैकजीवानाम् ॥८॥ ५
    § ५४१. संख्यामतीता असंख्येयाः । असंख्येयस्त्रिविधः-जघन्य उत्कृष्टोऽजघन्योत्कृष्टश्चेति ।
    तत्रेहाजघन्योत्कृष्टासंख्येयः परिगृह्यते । प्रदिश्यन्त इति प्रदेशाः । वक्ष्यमाणलक्षणः परमाणुः स
    यावति क्षेत्रे व्यवतिष्ठते स प्रदेश इति व्यवह्रियते । धर्माधर्मैकजीवास्तुल्यासंख्येयप्रदेशाः । तत्र
    धर्माधर्मौ निष्क्रियौ लोकाकाशं व्याप्य स्थितौ । जीवस्तावत्प्रदेशोऽपि सन् संहरणविसर्पणस्वभाव-
    त्वात् कर्मनिर्वर्तितं शरीरमणु महद्वाऽधितिष्ठंस्तावदवगाह्य वर्तते । यदा तु लोकपूरणं भवति तदा १०
    मन्दरस्याधश्चित्रवज्रपटलमध्ये जीवस्याष्टौ मध्यप्रदेशा व्यवतिष्ठन्ते । इतरे प्रदेशा ऊर्ध्वमधस्तिर्यक्
    च कृत्स्नं लोकाकाशं व्यश्नुवते ।
    § ५४२. अथाकाशस्य कति प्रदेशा इत्यत आह—
    आकाशस्यानन्ताः ॥९॥^१
    प्रकार अधिकार प्राप्त धर्म, अधर्म और आकाश द्रव्यको निष्क्रिय मान लेने पर जीव और पुद्गल १५
    सक्रिय हैं यह प्रकरणसे अपने-आप प्राप्त हो जाता है । शंका—काल द्रव्य भी सक्रिय होगा ?
    समाधान—नहीं; क्योंकि उसका यहाँ अधिकार नहीं है । इसलिए इन द्रव्यों के साथ उसका
    अधिकार नहीं किया है ।
    § ५४०. 'अजीवकायाः' इत्यादि सूत्रमें 'काय' पदके ग्रहण करनेसे प्रदेशोंका अस्तित्व मात्र
    जाना जाता है प्रदेशोंकी संख्या नहीं मालूम होती, अतः उसका निर्धारण करनेके लिए आगेका २०
    सूत्र कहते हैं—
    धर्म, अधर्म और एक जीवके असंख्यात प्रदेश हैं ॥८॥
    § ५४१. जो संख्यासे परे हैं वे असंख्यात कहलाते हैं । असंख्यात तीन प्रकारका है—जघन्य,
    उत्कृष्ट और अजघन्योत्कृष्ट । उनमें-से यहाँ अजघन्योत्कृष्टका ग्रहण किया है । 'प्रदिश्यन्ते, इति
    प्रदेशाः' यह प्रदेश शब्दकी व्युत्पत्ति है । तात्पर्य यह है कि जिससे विवक्षित परिमाणका संकेत २५
    मिलता है, उसे प्रदेश कहते हैं । परमाणुका लक्षण आगे कहेंगे । वह जितने क्षेत्रमें रहता है वह
    प्रदेश है ऐसा व्यवहार किया जाता है । धर्म, अधर्म और एक जीवके प्रदेशोंकी संख्या समान है ।
    इनमें-से धर्म और अधर्मद्रव्य निष्क्रिय हैं और लोकाकाशभरमें फैले हुए हैं । यद्यपि जीवके प्रदेश
    धर्म और अधर्म द्रव्यके बराबर ही हैं तो भी वह संकोच और विस्तारस्वभाववाला है; इसलिए
    कर्मके निमित्तसे छोटा या बड़ा जैसा शरीर मिलता है उतनी अवगाहनाका होकर यह जीव रहता ३०
    है । और केवलिसमुद्घातके समय जब यह लोकको व्यापता है उस समय जीवके मध्यके आठ
    प्रदेश मेरु पर्वतके नीचे चित्रा पृथिवीके वज्रमय पटलके मध्यमें स्थित हो जाते हैं और शेष प्रदेश
    ऊपर, नीचे और तिरछे समस्त लोकको व्याप लेते हैं ।
    § ५४२. अब आकाश द्रव्यके कितने प्रदेश हैं यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
    आकाशके अनन्त प्रदेश हैं ॥९॥ ३५
    १. -नन्ताः ॥९॥ लोकेऽलोके चाकाशं वर्तते । अवि-मु० ।

२०४ सर्वार्थसिद्धौ [ ५।१० § ५४३ -
§ ५४३. अविद्यमानोऽन्तो येषां ते अनन्ताः । के । प्रदेशाः । कस्य । आकाशस्य । पूर्वव-
दस्यापि प्रदेशकल्पनावसेया ।
§ ५४४. उक्तममूर्तानां प्रदेशपरिमाणम् । इदानीं मूर्तानां पुद्गलानां प्रदेशपरिमाणं निर्ज्ञात-
व्यमित्यत आह—
संख्येयाऽसंख्येयाश्च पुद्गलानाम् ॥१०॥
§ ५४५. 'च'शब्दादनन्ताश्चेत्यनुकृष्यते । कस्यचित्पुद्गलद्रव्यस्य द्व्यणुकादेः संख्येयाः
प्रदेशाः कस्यचिदसंख्येया अनन्ताश्च । अनन्तानन्तोपसंख्यानमिति चेत् । न; अनन्तसामान्यात् ।
अनन्तप्रमाणं त्रिविधमुक्तं परीतानन्तं युक्तानन्तमन्तानन्तं चेति । तत्सर्वमनन्तसामान्येन गृह्यते ।
स्यादेतदसंख्यातप्रदेशो लोकः अनन्तप्रदेशस्यानन्तानन्तप्रदेशस्य च स्कन्धस्याधिकरणमिति विरोध-
स्ततो नानन्त्यमिति । नैष दोषः; सूक्ष्मपरिणामावगाहनशक्तियोगात् । परमाण्वादयो हि सूक्ष्मभावेन
परिणता एकैकस्मिन्नप्याकाशप्रदेशेऽनन्तानन्ता अवतिष्ठन्ते. अवगाहनशक्तिश्चैषामव्याहतास्ति ।
तस्मादेकस्मिन्नपि प्रदेशे अनन्तानन्तानामवस्थानं न विरुध्यते ।
§ ५४६. 'पुद्गलानाम्' इत्यविशेषवचनात्परमाणोरपि प्रदेशवत्त्वप्रसङ्गे तत्प्रतिषेधार्थमाह—
नाणोः ॥११॥
§ ५४३. जिनका अन्त नहीं है वे अनन्त कहलाते हैं ? शंका- अनन्त क्या हैं? समाधान-
प्रदेश । शंका- किसके ? समाधान - आकाशके । पहलेके समान इसके भी प्रदेशकी कल्पना जान
लेनी चाहिए । अर्थात् जितने क्षेत्रमें एक परमाणु रहता है उसे प्रदेश कहते हैं। प्रदेशका यह अर्थ
यहाँ भी जानना चाहिए ।
§ ५४४. अमूर्त द्रव्योंके प्रदेश कहे । अब मूर्त पुद्गलोंके प्रदेशोंकी संख्या ज्ञातव्य है, अतः
उसका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं-
पुद्गलोंके संख्यात, असंख्यात और अनन्त प्रदेश हैं ॥१०॥
§ ५४५. सूत्रमें जो 'च' शब्द दिया है उससे अनन्तकी अनुवृत्ति होती है। तात्पर्य यह है
कि किसी द्व्यणुक आदि पुद्गल द्रव्यके संख्यात प्रदेश होते हैं और किसीके असंख्यात तथा अनन्त
प्रदेश होते हैं। शंका-यहाँ अनन्तानन्तका उपसंख्यान करना चाहिए ? समाधान -नहीं; क्योंकि
यहाँ अनन्त सामान्यका ग्रहण किया है। अनन्त प्रमाण तीन प्रकारका कहा है- परीतानन्त,
युक्तानन्त और अनन्तानन्त । इसलिए इन सबका अनन्त सामान्यसे ग्रहण हो जाता है। शंका-
लोक असंख्यात प्रदेशवाला है इसलिए वह अनन्त प्रदेशवाले और अनन्तानन्त प्रदेशवाले स्कन्धका
आधार है, इस बातके माननेमें विरोध आता है अतः पुद्गलके अनन्त प्रदेश नहीं बनते ?
समाधान- यह कोई दोष नहीं है; क्योंकि सूक्ष्म परिणमन होनेसे और अवगाहन शक्तिके निमित्तसे
अनन्त या अनन्तानन्त प्रदेशवाले पुद्गल स्कन्धोंका आकाश आधार हो जाता है । सूक्ष्मरूपसे
परिणत हुए परमाणु आकाशके एक-एक प्रदेशमें अनन्तानन्त ठहर जाते हैं। इनकी यह अवगाहन
शक्ति व्याघात रहित है, इसलिए आकाशके एक प्रदेशमें भी अनन्तानन्त परमाणुओंका अवस्थान
विरोधको प्राप्त नहीं होता ।
§ ५४६. पूर्व सूत्रमें 'पुद्गलानाम्' यह सामान्य वचन कहा है । इससे परमाणुके भी प्रदेशों
का प्रसंग प्राप्त होता है, अतः उसका निषेध करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं-
परमाणुके प्रदेश नहीं होते ॥११॥
१. च शब्देनानन्ता-मु०, ता०, ना० ।

– ५।१२ § ५४९ ] ° पञ्चमोऽध्यायः २०५
§ ५४७. अणोः 'प्रदेशा न सन्ति' इति वाक्यशेषः । कुतो न सन्तीति चेत् । प्रदेशमात्रत्वात् ।
यथा आकाशप्रदेशस्यैकस्य प्रदेशभेदाभावादप्रदेशत्वमेवमणोरपि प्रदेशमात्रत्वात्प्रदेशभेदाभावः । किं
च ततोऽल्पपरिमाणाभावात् । न ह्यणोरल्पीयानन्योऽस्ति, यतोऽस्य प्रदेशा भिद्येरन् ।
§ ५४८. एषामवधृतप्रदेशानां धर्मादीनामाधारप्रतिपत्त्यर्थमिदमुच्यते—
लोकाकाशेऽवगाहः ॥१२॥ ५
§ ५४९. उक्तानां धर्मादीनां द्रव्याणां लोकाकाशेऽवगाहो न बहिरित्यर्थः । यदि धर्मादीनां
लोकाकाशमाधारः, आकाशस्य क आधार इति । आकाशस्य नास्त्यन्य आधारः । स्वप्रतिष्ठमा-
काशम् । यद्याकाशं स्वप्रतिष्ठम्; धर्मादीन्यपि स्वप्रतिष्ठान्येव । अथ धर्मादीनामन्य आधारः कल्प्यते,
आकाशस्याप्यन्य आधारः कल्प्यः । तथा सत्यनवस्थाप्रसङ्ग इति चेत् । नैष दोषः; नाकाशादन्य-
दधिकपरिमाणं द्रव्यमस्ति यत्राकाशं स्थितमित्युच्येत । सर्वतोऽनन्तं हि तत्¹ । धर्मादीनां पुनरधि- १०
करणमाकाशमित्युच्यते व्यवहारनयवशात् । एवम्भूतनयापेक्षया तु सर्वाणि द्रव्याणि स्वप्रतिष्ठान्येव ।
तथा चोक्तम्, “क्व भवानास्ते । आत्मनि” इति । धर्मादीनि लोकाकाशान्न बहिः सन्तीत्येता-
वदत्राधाराधेयकल्पनासाध्यं फलम् । ननु च लोके पूर्वोत्तरकालभाविनामाधाराधेयभावो दृष्टो यथा
कुण्डे बदरादीनाम् । न तथाऽऽकाशं पूर्वं धर्मादीन्युत्तरकालभावीनि; अतो व्यवहारनयापेक्षयाऽपि
आधाराधेयकल्पनानुपपत्तिरिति ? नैष दोषः; युगपद्भाविनामपि आधाराधेयभावो दृश्यते । घटे १५
§ ५४७. परमाणुके प्रदेश नहीं हैं। यहाँ 'सन्ति' यह वाक्यका शेष है । शंका—परमाणुके
प्रदेश क्यों नहीं होते ? समाधान—क्योंकि वह स्वयं एक प्रदेश मात्र है। जिस प्रकार एक आकाश
प्रदेशमें प्रदेश-भेद नहीं होनेसे वह अप्रदेशी माना गया है उसी प्रकार अणु स्वयं एक प्रदेशरूप है
इसलिए उसमें प्रदेशभेद नहीं होता । दूसरे अणुसे अल्प परिमाण नहीं पाया जाता। ऐसी कोई
अन्य वस्तु नहीं जो परमाणुसे छोटी हो जिससे इसके प्रदेश भेदको प्राप्त होवें । २०
§ ५४८. इस प्रकार निश्चित प्रदेशवाले इन धर्मादिक द्रव्योंके आधारका ज्ञान करानेके
लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
इन धर्मादिक द्रव्योंका अवगाह लोकाकाशमें है ॥१२॥
§ ५४९. उक्त धर्मादिक द्रव्योंका लोकाकाशमें अवगाह है बाहर नहीं, यह इस सूत्रका तात्पर्य
है। शंका—यदि धर्मादिक द्रव्योंका लोकाकाश आधार है तो आकाशका क्या आधार है ? २५
समाधान—आकाशका अन्य आधार नहीं है; क्योंकि आकाश स्वप्रतिष्ठ है। शंका—यदि आकाश
स्वप्रतिष्ठ है तो धर्मादिक द्रव्य भी स्वप्रतिष्ठ ही होने चाहिए। यदि धर्मादिक द्रव्योंका अन्य
आधार माना जाता है तो आकाशका भी अन्य आधार मानना चाहिए। और ऐसा मानने पर
अनवस्था दोष प्राप्त होता है। समाधान—यह कोई दोष नहीं है; क्योंकि आकाशसे अधिक
परिमाणवाला अन्य द्रव्य नहीं है जहाँ आकाश स्थित है यह कहा जाय । वह सबसे अनन्त है । ३०
परन्तु धर्मादिक द्रव्योंका आकाश अधिकरण है यह व्यवहारनयकी अपेक्षा कहा जाता है। एवंभूत
नयकी अपेक्षा तो सब द्रव्य स्वप्रतिष्ठ ही हैं। कहा भी है—आप कहाँ रहते हैं ? अपनेमें । धर्मादिक
द्रव्य लोकाकाशके बाहर नहीं हैं। यहाँ आधार-आधेय कल्पनासे इतना ही फलितार्थ लिया गया
है । शंका—लोकमें जो पूर्वोत्तर कालभावी होते हैं उन्हींका आधार-आधेयभाव देखा गया है। जैसे
कि बेरोंका आधार कुण्ड होता है। उस प्रकार आकाश पूर्वकालभावी हो और धर्मादिक द्रव्य ३५
पीछेसे उत्पन्न हुए हों, ऐसा तो है नहीं, अतः व्यवहारनयकी अपेक्षा भी आधार-आधेयकल्पना नहीं
बनती ? समाधान—यह कोई दोष नहीं है; क्योंकि एक साथ होनेवाले पदार्थों में आधार-आधेय-
१. तत् । ततो धर्मा-ता०, ना० मु० ।

२०६ सर्वार्थसिद्धौ [ ५।१३ ६ ५५० -
रूपादयः शरीरे हस्तादय इति । लोक इत्युच्यते । को लोकः । धर्माधर्मादीनि द्रव्याणि यत्र
लोक्यन्ते स लोक इति । अधिकरणसाधनो घञ् । आकाशं द्विधा विभक्तं लोकाकाशमलोकाकाशं
चेति । लोक उक्तः । स यत्र तल्लोकाकाशम् । ततो बहिः सर्वतोऽनन्तमलोकाकाशम् । लोकालोक-
विभागश्च धर्माधर्मास्तिका य सद्भावासद्भावाद्द्ज्ञेयः । असति हि तस्मिन्धर्मास्तिकाये जीवपुद्-
गलांनां गतिनियमहेत्वभावाद्विभागो न स्यात् । असति चाधर्मास्तिकाये स्थितेराश्रयनिमित्ताभावात्
स्थितेरभावो लोकालोकविभागाभावो वा स्यात् । तस्मादुभयसद्भावाँसद्भावाल्लोकालोक-
विभागसिद्धिः ।
§ ५५०. तत्रावध्रियमाणानामवस्थानभेदसंभवाद्विशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह -
धर्माधर्मयोः कृत्स्ने ॥१३॥
§ ५५१. कृत्स्नवचनमशेषव्याप्तिप्रदर्शनायँम् । अगारेऽवस्थितो घट इति यथा तथा धर्माधर्म-
योर्लोकाकाशेऽवगाहो न भवति । किं र्तार्ह । कृत्स्ने तिलेषु तैलवदिति । अन्योन्यप्रदेशप्रवेशव्याघाता-
भावः अवगाहनशक्तियोगाद्वेदितव्यः ।
§ ५५२. अतो विपरीतानां मूर्तिमतोमप्रदेशसंख्येयासंख्येयानन्तप्रदेशानां पुद्गलानामवगाह-
विशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह -
भाव देखा जाता है। यथा - घटमें रूपादिकका और शरीरमें हाथ आदिका । अब लोकका स्वरूप
कहते हैं- शंका- लोक किसे कहते हैं ? समाधान - जहाँ धर्मादिक द्रव्य विलोके जाते हैं उसे लोक
कहते हैं । 'लोक' धातुसे अधिकरण अर्थमें 'घञ्' प्रत्यय करके लोक शब्द बना है। आकाश दो
प्रकारका है- लोकाकाश और अलोकाकाश । लोकका स्वरूप पहले कह आये हैं। वह जितने
आकाशमें होता है वह लोकाकाश है और उससे बाहर सबसे अनन्त अलोकाकाश है। यह लोका-
लोकका विभाग धर्मास्तिकाय और अधर्मास्तिकायके सद्भाव और असद्भावकी अपेक्षासे जानना
चाहिए । अर्थात् धर्मास्तिकाय और अधर्मास्तिकाय जहां तक पाये जाते हैं वह लोकाकाश है और
इससे बाहर अलोकाकाश है । यदि धर्मास्तिकायका सद्भाव न माना जाय तो जीव और पुद्गलों-
की गतिके नियमका हेतु न रहनेसे लोकालोकका विभाग नहीं बनता । उसी प्रकार यदि अधर्मा-
स्तिकायका सद्भाव न माना जाय तो स्थितिका निमित्त न रहनेसे जीव और पुद्गलोंकी स्थितिका
अभाव होता है जिससे लोकालोकका विभाग नहीं बनता । इसलिए इन दोनोंके सद्भाव और
असद्भावकी अपेक्षा लोकालोकके विभागकी सिद्धि होती है।
§ ५५०. लोकाकाशमें जितने द्रव्य बतलाये हैं उनके अवस्थानमें भेद हो सकता है इसलिए
प्रत्येक द्रव्यके अवस्थान विशेषका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं-
धर्म और अधर्म द्रव्यका अवगाह समग्र लोकाकाशमें है ॥१३॥
§ ५५१. सब लोकाकाशके साथ व्याप्तिके दिखलानेके लिए सूत्रमें 'कृत्स्न' पद रखा है।
घरमें जिस प्रकार घट अवस्थित रहता है उस प्रकार लोकाकाशमें धर्म और अधर्म द्रव्यका अवगाह
नहीं है। किन्तु जिस प्रकार तिलमें तैल रहता है उस प्रकार सब लोकाकाशमें धर्म और अधर्म
द्रव्यका अवगाह है । यद्यपि ये सब द्रव्य एक जगह रहते हैं तो भी अवगाहन शक्तिके निमित्तसे
इनके प्रदेश परस्पर प्रविष्ट होकर व्याघातको नहीं प्राप्त होते ।
§ ५५२. अब जो उक्त द्रव्योंसे विपरीत हैं और जो अप्रदेशी हैं या संख्यात असंख्यात और
अनन्तप्रदेशी हैं ऐसे मूर्तिमान् पुद्गलोंके अवगाह विशेषके ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र
कहते है-
१. 'हलः' जैनेन्द्र, २।३।११८। 'हलश्च' पाणिनि, ३।३।१२१ । २. -कायसद्भावाद्धि-मु० । ३. -रभावः ।
तस्या अभावे लोका-मु०, ता०, ना० । ४. - भयसद्भावाल्लोका-मु० । ५. -मतामेकप्रदे-मु० ।
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  • ५।१५ § ५५५ ] पञ्चमोऽध्यायः २०७
    एकप्रदेशादिषु भाज्यः पुद्गलानाम् ॥१४॥
    § ५५३. एकः प्रदेश एकप्रदेशः । एकप्रदेश आदिर्येषां त इमे एकप्रदेशादयः । तेषु पुद्ग-
    लानामवगाहो भाज्यो विकल्प्यः । “अवयवेन विग्रहः समुदायः समासार्थः” $^२$ इति एकप्रदेशोऽपि
    गृह्यते । तद्यथा—एकस्मिन्नाकाशप्रदेशे परमाणोरवगाहः । द्वयोरेकत्रोभयत्र च बद्धयोरबद्धयोश्च ।
    त्रयाणामप्येकत्र द्वयोस्त्रिषु च बद्धानामबद्धानां च । एवं संख्येयासंख्येयानन्तप्रदेशानां स्कन्धानामे-
    कसंख्येयासंख्येयप्रदेशेषु लोकाकाशेऽवस्थानं प्रत्येत्तव्यम् । ननु युक्तं तावदमूर्त्तयोर्धर्माधर्मयोरेकत्रा-
    विरोधेनावरोध इति । मूर्त्तिमतां पुद्गलानां कथम् । इत्यत्रोच्यते-अवगाहनस्वभावत्वात्सूक्ष्मपरि-
    णामाच्च मूर्तिमनामप्यवगाहो न विरुध्यते एकापवरके अनेकदीपप्रकाशावस्थानवत् । आगम-
    प्रामाण्याच्च तथाऽध्यवसेयम् । तदुक्तम्—
    “ओगाढगाढणिचिओ पुग्गलकाएहि संव्वदो लोगो ।
    सुहुमेहिं बादरेहिं अणंताणंतेहिं विवहेहिं ॥”
    § ५५४. अथ जीवानां कथमवगानमित्यत्रोच्यते—
    असंख्येयभागादिषु जीवानाम् ॥१५॥
    § ५५५. ‘लोकाकाशे’ इत्यनुवर्तते । तस्यासंख्येयभागीकृतस्यैको भागोऽसंख्येयभाग इत्यु-
    च्यते । स आदिर्येषां तेऽसंख्येयभागादयः । तेषु जीवानागवगाहो वेदितव्यः । तद्यथा—एकस्मिन्न-
    पुद्गलोंका अवगाह लोकाकाशके एक प्रदेश आदिमें विकल्पसे होता है ॥१४॥
    § ५५३. एक और प्रदेश इन दोनोंका द्वन्द्व समास है । जिनके आदिमें एक प्रदेश है वे एक
    प्रदेश आदि कहलाते हैं। उनमें पुद्गलोंका अवगाह विकल्पसे है। यहाँ पर विग्रह अवयवके साथ
    है किन्तु समासार्थ समुदायरूप लिया है इसलिए एक प्रदेशका भी ग्रहण होता है। खुलासा इस
    प्रकार है—आकाशके एक प्रदेशमें एक परमाणुका अवगाह है। बन्धको प्राप्त हुए या खुले हुए दो
    परमाणुओंका आकाशके एक प्रदेशमें या दो प्रदेशोंमें अवगाह है। बन्धको प्राप्त हुए या खुले हुए
    तीन परमाणुओंका आकाशके एक, दो या तीन प्रदेशोंमें अवगाह है। इसी प्रकार संख्यात, असंख्यात
    और अनन्त प्रदेशवाले स्कन्धोंका लोकाकाशके एक, संख्यात और असंख्यात प्रदेशोंमें अवगाह
    जानना चाहिए । शंका—यह तो युक्त है कि धर्म और अधर्म द्रव्य अमूर्त हैं इसलिए उनका एक
    जगह बिना विरोधके रहना बन जाता है किन्तु पुद्गल मूर्त हैं इसलिए उनका बिना विरोधके
    एक जगह रहना कैसे बन सकता है ? समाधान—इनका अवगाहन स्वभाव है और सूक्ष्म रूपसे
    परिणमन हो जाता है इसलिए एक झक्कनमें जिस प्रकार अनेक दीपकोंका प्रकाश रह जाता है
    उसी प्रकार मूर्त्तमान् पुद्गलोंका एक जगह अवगाह विरोधको प्राप्त नहीं होता । तथा आगम
    प्रमाणसे यह बात जानी जाती है। कहा भी है—
    § ५५४. अब जीवोंका अवगाह किस प्रकार है इस बातको अगले सूत्रमें कहते हैं—
    'लोक सूक्ष्म और स्थूल अनन्तानन्त नाना प्रकारके पुद्गलकायोंसे चारों ओरसे खचाखच
    भरा है।'
    जीवोंका अवगाह लोकाकाशके असंख्यातवें भाग आदिमें है ॥१५॥
    § ५५५. इस सूत्रमें ‘लोकाकाशे' इस पदकी अनुवृत्ति होती है। उसके असंख्यात भाग
    करके जो एक भाग प्राप्त हो वह असंख्यातवाँ भाग कहलाता है। वह जिनके आदिमें है वे सब
    असंख्यातवें भाग आदि हैं । उनमें जीवोंका अवगाह जानना चाहिए। स्पष्ट इस प्रकार है—
    १. एक एव प्रदेशः मु० । २. पा० म० मा० २, २, २४ । ३. -याणामेकत्र मु०, ता० । ४. पंचत्थि०
    गा० ६४ ।

संख्येयभागे एको जीवोऽवतिष्ठते । एवं द्वित्रिचतुरादिष्वपि असंख्येयभागेषु आ सर्वलोकादवगाहः
प्रत्येतव्यः । नानाजीवानां तु सर्वलोक एव । यद्येकस्मिन्नसंख्येयभागे एको जीवोऽवतिष्ठते, कथं
द्रव्यप्रमाणेनानन्तानन्तो जीवराशिः सशरीरोऽवतिष्ठते लोकाकाशे । सूक्ष्मबादरभेदादवस्थानं
प्रत्येतव्यम् । बादरास्तावत्सप्रतिघातशरीराः । सूक्ष्मास्तु सशरीरा अपि सूक्ष्मभावादेवैकनिगोद-
जीवावगाह्येऽपि प्रदेशे साधारणशरीरा अनन्तानन्ता वसन्ति । न ते परस्परेण बादरैश्च व्याहन्यन्त
इति नास्त्यवगाहविरोधः² ।
§ ५५६. अत्राह लोकाकाशतुल्यप्रदेश एकजीव इत्युक्तम्, तस्य कथं लोकस्यासंख्येयभागा-
दिषु वृत्तिः । ननु सर्वलोकव्याप्त्यैव भवितव्यमित्यत्रोच्यते—
प्रदेशसंहारविसर्पाभ्यां प्रदीपवत् ॥१६॥
§ ५५७. अमूर्तस्वभावस्यात्मनोऽनादिबन्धं प्रत्येकत्वात् कथंचिन्मूर्ततां बिभ्रतः कार्मणशरी-
रवशान्महदणु च शरीरमधितिष्ठतस्तत्तद्गात्रप्रदेशसंहरणविसर्पणस्वभावस्य तावत्प्रमाणतायां सत्याम-
संख्येयभागादिषु वृत्तिरुपपद्यते, प्रदीपवत् । यथा निरावरणव्योमप्रदेशेऽनव³धृतप्रकाशपरिमाणस्य
प्रदीपस्य शरावमणिकापवरकाद्यावरणवशात्तत्परिमाणतेति । अत्राह धर्मादीनामन्योन्यप्रदेशानु-
प्रवेशात्संकरे⁴ सति, एकत्वं प्राप्नोतीति । तन्न; परस्परमत्यन्तसंश्लेषे सत्यपि स्वभावं न जहति ।
उक्तं च—
एक असंख्यातवे भागमें एक जीव रहता है। इस प्रकार दो, तीन और चार आदि असंख्यात भागों
से लेकर सब लोकपर्यन्त एक जीवका अवगाह जानना चाहिए। किन्तु नाना जीवोंका अवगाह
सब लोकमें ही होता है। शंका—यदि लोकके एक असंख्यातवें भागमें एक जीव रहता है तो
संख्याकी अपेक्षा अनन्तानन्त सशरीर जीवराशि लोकाकाशमें कैसे रह सकती है ? समाधान—जीव
दो प्रकारके हैं सूक्ष्म और बादर, अतः उनका लोकाकाशमें अवस्थान बन जाता है। जो बादर
जीव हैं उनका शरीर तो प्रतिघात सहित होता है। किन्तु जो सूक्ष्म हैं वे यद्यपि सशरीर हैं तो
भी सूक्ष्म होनेके कारण एक निगोद जीव आकाशके जितने प्रदेशोंको अवगाहन करता है उतनेमें
साधारण शरीरवाले अनन्तानन्त जीव रह जाते हैं। वे परस्परमें और बादरोंके साथ व्याघातको
नहीं प्राप्त होते इसलिए लोकाकाशमें अनन्तानन्त जीवोंके अवगाहमें कोई विरोध नहीं आता।
§ ५५६. यहाँ पर शंकाकारका कहना है कि जब एक जीवके प्रदेश लोकाकाशके बराबर
बतलाये हैं तो लोकके असंख्यातवें भाग आदिमें एक जीव कैसे रह सकता है, उसे तो सब लोक
व्याप्त कर ही रहना चाहिए ? अब इस शंकाका समाधान करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
क्योंकि प्रदीपके समान जीवके प्रदेशोंका संकोच और विस्तार होता है ॥१६॥
§ ५५७. चूंकि आत्मा अमूर्त स्वभाव है तो भी अनादिकालीन बन्धके कारण एकपनेको
प्राप्त होनेसे वह मूर्त हो रहा है और कार्मण शरीरके कारण वह छोटे-बड़े शरीरमें रहता है,
इसलिए वह प्रदेशोंके संकोच और विस्तार स्वभाववाला है और इसलिए शरीरके अनुसार दीपक-
के समान उसका लोकके असंख्यातवें भाग आदिमें रहना बन जाता है। जिस प्रकार निरावरण
आकाश-प्रदेशमें यद्यपि दीपकके प्रकाशके परिमाणका निश्चय नहीं होता तथापि वह सकोरा,
मानिक तथा आवरण करनेवाले दूसरे पदार्थोंके आवरणके वशसे तत्परिमाण होता है उसी प्रकार
प्रकृतमें जानना चाहिए। शंका—धर्मादिक द्रव्योंके प्रदेशोंका परस्पर प्रवेश होनेके कारण संकर
होनेसे अभेद प्राप्त होता है ? समाधान—नहीं; क्योंकि परस्पर अत्यन्त सम्बन्ध हो जाने पर भी वे
अपने-अपने स्वभावको नहीं छोड़ते; इसलिए उनमें अभेद नहीं प्राप्त होता। कहा भी है—
१. सशरीरत्वेऽपि आ०, दि० १, दि० २ । २. -वगाहेऽपि मु० । ३. -देशेऽववृ-ता० ना० । ४. पंचत्थि०
गा० ७ ।

  • ५।१७ § ५५९ ] पञ्चमोऽध्यायः २०९
    “अण्णोण्णं पविसंता दिंता ओगासमण्णमण्णस्स ।
    मेलंता वि य णिच्चं सगसब्भावं ण जहंति ।”
    § ५५८. यद्येवं धर्मादीनां स्वभावभेद उच्यतामित्यत आह—
    गतिस्थित्युपग्रहौ धर्माधर्मयोरुपकारः ॥१७॥
    § ५५९. देशान्तरप्राप्तिहेतुर्गतिः। तद्विपरीता स्थितिः। उपगृह्यत इत्युपग्रहः। गतिश्च ५
    स्थितिश्च गतिस्थिती। गतिस्थिती एव उपग्रहौ गतिस्थित्युपग्रहौ। धर्माधर्मयोरिति कर्तृनिर्देशः।
    उपक्रियत इत्युपकारः। कः पुनरसौ। गत्युपग्रहः स्थित्युपग्रहश्च। यद्येवं द्वित्वनिर्देशः प्राप्नोति।
    नैष दोषः; सामान्येन व्युत्पादितः१ शब्द उपात्तसंख्यः शब्दान्तरसंबन्धे सत्यपि न पूर्वोपात्तां संख्यां
    जहाति। यथा—“साधोः कार्यं तपःश्रुते” इति। एतदुक्तं भवति-गतिपरिणामिनां जीवपुद्गलानां
    गत्युपग्रहे कर्तव्ये धर्मास्तिकायः साधारणश्रयो जलवन्मत्स्यगमने। तथा स्थितिपरिणामिनां १०
    जीवपुद्गलानां स्थित्युपग्रहे कर्तव्ये अधर्मास्तिकायः साधारणश्रयः पृथिवीधातुरिवाश्वादिस्थित्या-
    विति। ननु च 'उपग्रह' वचनमनर्थकम् 'उपकारः' इत्येवं२ सिद्धत्वात्। 'गतिस्थिती धर्माधर्म-
    योरुपकारः' इति। नैष दोषः; याथासंख्यनिवृत्त्यर्थम् 'उपग्रह'वचनम्। धर्माधर्मयोर्गतिस्थित्योश्च
    यथासंख्यं भवति, एवं जीवपुद्गलानां यथासंख्यं प्राप्नोति धर्मस्योपकारो जीवानां गतिः अधर्म-
    'सब द्रव्य परस्पर प्रविष्ट हैं, एक दूसरेको अवकाश देते हैं, और सदा मिलकर रह १५
    रहे हैं तो भी अपने स्वभावको नहीं छोड़ते।'
    § ५५८. यदि ऐसा है तो धर्मादिक द्रव्योंका स्वभावभेद कहना चाहिए इसलिए आगेका
    सूत्र-कहते हैं—
    गति और स्थितिमें निमित्त होना यह क्रमसे धर्म और अधर्म द्रव्यका उपकार है ॥१७॥
    § ५५९. एक स्थानसे दूसरे स्थानके प्राप्त करानेमें जो कारण है उसे गति कहते हैं। स्थिति- २०
    का स्वरूप इससे उलटा है। उपग्रह शब्द उपकारका पर्यायवाची है जिसकी व्युत्पत्ति 'उपगृह्यते'
    है। गति और स्थिति इन दोनोंमें द्वन्द्व समास है। गति और स्थिति ही उपग्रह हैं, इसलिए
    'गतिस्थित्युपग्रहौ' यह सूत्रवचन कहा है। 'धर्माधर्मयोः' यह कर्ता अर्थमें षष्ठी निर्देश है। उपकार-
    की व्युत्पत्ति 'उपक्रियते' है। शंका—यह उपकार क्या है ? समाधान—गति उपग्रह और स्थिति
    उपग्रह यही उपकार है। शंका—यदि ऐसा है तो द्विवचनका निर्देश प्राप्त होता है ? समाधान— २५
    यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि सामान्यसे ग्रहण किया गया शब्द जिस संख्याको प्राप्त कर लेता है
    दूसरे शब्दके सम्बन्ध होनेपर भी वह उस संख्याको नहीं छोड़ता। जैसे 'साधोः कार्यं तपःश्रुते'
    इस वाक्य में 'कार्यम्' एकवचन और 'तपःश्रुते' द्विवचन है। यही बात प्रकृतमें जानना चाहिए।
    इस सूत्रका यह अभिप्राय है कि जिस प्रकार मछलीके गमनमें जल साधारण निमित्त है उसी
    प्रकार गमन करते हुए जीव और पुद्गलोंके गमनमें धर्मास्तिकाय साधारण निमित्त है। तथा जिस ३०
    प्रकार घोड़ा आदिके ठहरनेमें पृथिवी साधारण निमित्त है उसी प्रकार ठहरनेवाले जीव और
    पुद्गलोंके ठहरनेमें अधर्मास्तिकाय साधारण निमित्त है। शंका—सूत्रमें 'उपग्रह' वचन निरर्थक है
    क्योंकि 'उपकार' इसीसे काम चल जाता है। यथा—'गतिस्थिती धर्माधर्मयोरुपकारः' ?
    समाधान—यह कोई दोष नहीं है; क्योंकि यथाक्रमके निराकरण करनेके लिए 'उपग्रह' पद रखा
    है। जिस प्रकार धर्म और अधर्मके साथ गति और स्थितिका क्रमसे सम्बन्ध होता है उसी प्रकार ३५
    जीव और पुद्गलोंका क्रमसे सम्बन्ध प्राप्त होता है। यथा-धर्म द्रव्यका उपकार जीवोंकी गति
    १. -दितः उपात्त-ता०, ना०, मु०। २. इत्येव सिद्ध-ता० ।
    २७

२१० सर्वार्थसिद्धौ [ ५।१८ § ५६० –
स्योपकारः पुद्गलानां स्थितिरिति । तन्निवृत्त्यर्थमुपग्रहवचनं क्रियते । आह धर्माधर्मयोर्य उपकारः
स आकाशस्य युक्तः; सर्वगतत्वादिति चेत् । तदयुक्तम्; तस्यान्योपकारसद्भावात् । सर्वेषां धर्मादीनां
द्रव्याणामवगाहनं तत्प्रयोजनम् । एकस्यानेकप्रयोजनकल्पनायां लोकालोकविभागाभावः । भूमि-
जलादीन्येव तत्प्रयोजनसमर्थानि नार्थो धर्माधर्माभ्यामिति चेत् । न; साधारणाश्रय इति विशि-
ष्योक्तत्वात् । अनेककारणसाध्यत्वाच्चैकस्य कार्यस्य । तुल्यबलत्वात्तयोर्गतिस्थितिप्रतिबन्ध इति
चेत् । न; अप्रेरकत्वात् । अनुपलब्धेर्न तौ स्तः खरविषाणवदिति चेत् । न; सर्व१प्रवाद्यविप्रतिपत्तेः ।
सर्वे हि २प्रवादिनाः प्रत्यक्षाप्रत्यक्षानर्थानभिवाञ्छन्ति । अस्मान्प्रति हेतोरसिद्धेश्च । सर्वज्ञेन
निरतिशयप्रत्यक्षज्ञानचक्षुषा धर्मादयः सर्वे उपलभ्यन्ते । तदुपदेशाच्च श्रुतज्ञानिभिरपि ।
§ ५६०. अत्राह, यद्यतीन्द्रिययोर्धर्माधर्मयोरुपकारसंबन्धेनास्तित्वमवध्रियते, तदनन्तरमु-
द्दिष्टस्य नभसोऽतीन्द्रियस्याधिगमे क उपकार इत्युच्यते—
आकाशस्यावगाहः ॥१८॥
§ ५६१. ३'उपकारः' इत्यनुवर्तते । जीवपुद्गलादीनामवगाहिनामवकाशदानमवगाह-आकाश-
स्योपकारो वेदितव्यः । आह, जीवपुद्गलानां क्रियावतामवगाहिनामवकाशदानं युक्तम् । धर्मास्ति-
है और अधर्म द्रव्यका उपकार पुद्गलोंकी स्थिति है अतः इसका निराकरण करनेके लिए
सूत्रमें 'उपग्रह' पद रखा है। शंका—धर्म और अधर्म द्रव्यका जो उपकार है उसे आकाशका
मान लेना युक्त है, क्योंकि आकाश सर्वगत है ? समाधान—यह कहना युक्त नहीं है; क्योंकि
आकाशका अन्य उपकार है। सब धर्मादिक द्रव्योंको अवगाहन देना आकाशका प्रयोजन है । यदि
एक द्रव्यके अनेक प्रयोजन माने जाते हैं तो लोकालोकके विभागका अभाव होता है, अतः धर्म
और अधर्म द्रव्यका जो उपकार है वह आकाशका मानना युक्त नहीं । शंका—धर्म और अधर्म
द्रव्यके जो प्रयोजन हैं पृथिवी और जल आदिक ही उनके करनेमें समर्थ हैं, अतः धर्म और अधर्म
द्रव्यका मानना ठीक नहीं ? समाधान—नहीं, क्योंकि धर्म और अधर्म द्रव्य गति और स्थितिके
साधारण कारण हैं यह विशेष रूपसे कहा है । तथा एक कार्य अनेक कारणोंसे होता है, इसलिए
धर्म और अधर्म द्रव्यका मानना ठीक है। शंका—धर्म और अधर्म ये दोनों द्रव्य तुल्य बलवाले हैं,
अतः गतिसे स्थितिका और स्थितिसे गतिका प्रतिबन्ध होना चाहिए ? समाधान—नहीं, क्योंकि
ये अप्रेरक हैं । शंका—धर्म और अधर्म द्रव्य नहीं हैं, क्योंकि उनकी उपलब्धि नहीं होती, जैसे
गधेके सींग ? समाधान—नहीं; क्योंकि इसमें सब वादियोंको विवाद नहीं है । तात्पर्य यह है कि
जितने वादी हैं वे प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों प्रकारके पदार्थोंको स्वीकार करते हैं । इसलिए इनका
अभाव नहीं किया जा सकता । दूसरे हम जैनोंके प्रति 'अनुपलब्धि' हेतु असिद्ध है, क्योंकि जिनके
सातिशय प्रत्यक्ष ज्ञानरूपी नेत्र विद्यमान हैं ऐसे सर्वज्ञ देव सब धर्मादिक द्रव्योंको प्रत्यक्ष जानते हैं
और उनके उपदेशसे श्रुतज्ञानी भी जानते हैं ।
§ ५६०. यदि अतीन्द्रिय धर्म और अधर्म द्रव्यका उपकारके सम्बन्धसे अस्तित्व स्वीकार
किया जाता है तो इनके अनन्तर जो अतीन्द्रिय आकाश द्रव्य कहा है, ऐसा कौन-सा उपकार है
जिससे उसका ज्ञान होता है ? अब इसी बातके बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
अवकाश देना आकाशका उपकार है ॥१८॥
§ ५६१. इस सूत्रमें 'उपकार' इस पदकी अनुवृत्ति होती है । अवगाहन करनेवाले जीव
और पुद्गलोंको अवकाश देना आकाशका उपकार जानना चाहिए । शंका—अवगाहन स्वभाव
वाले जीव और पुद्गल क्रियावान् हैं इसलिए इनको अवकाश देना युक्त है परन्तु धर्मादिक द्रव्य
१. –प्रतिवाद्य ता०, ना० । २. प्रतिवादिनः ता०, ना० । ३. उपकार इति वर्तते आ०, ता०, ना० ।
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  • ५।१९ § ५६३ ] पञ्चमोऽध्यायः २११
    कायादयः पुन्र्निष्क्रिया नित्यसंबन्धास्तेषां कथमवगाह इति चेत् । न; उपचारांतस्तत्सिद्धेः । यथा
    गमनाभावेऽपि 'सर्वगतमाकाशम्' इत्युच्यते; सर्वत्र सद्भावात्, एवं धर्माधर्मवपि अवगाहक्रिया-
    भावेऽपि सर्वत्र व्याप्तिदर्शनादवगाहिनावित्युपचर्येते । आह यद्यवकाशदानमस्य स्वभावो वज्रादि-
    भिर्लोष्टादीनां भित्त्यादिभिर्गवादीनां च व्याघातो न प्राप्नोति । दृश्यते च व्याघातः । तस्मादस्याव-
    काशदानं हीयते इति । नैष दोषः; वज्रलोष्टादीनां स्थूलानां परस्परव्याघात इति नास्यावकाश- ५
    दानसामर्थ्यं हीयते; तत्रावगाहिनामेव व्याघातात् । वज्रादयः पुनः स्थूलत्वात्परस्परं प्रत्यवकाश-
    दानं न कुर्वन्तीति नासावाकाशदोषः । ये खलु पुद्गलाः सूक्ष्मास्ते¹ परस्परं प्रत्यवकाशदानं
    कुर्वन्ति । यद्येवं नेदमाकाशस्यासाधारणं लक्षणम्; इतरेषामपि तत्सद्भावादिति । तन्न; सर्वपदा-
    र्थानां साधारणावगाहनहेतुत्वमस्यासाधारणं लक्षणमिति नास्ति दोषः । अलोकाकाशे तदभावाद-
    भाव इति चेत्; न; स्वभावापरित्यागात् । १०
    § ५६२. उक्त आकाशस्योपकारः । अथ तदनन्तरोद्दिष्टानां पुद्गलानां क उपकार इत्य-
    त्रोच्यते—
    शरीरवाङ्मनःप्राणापानाः पुद्गलानाम् ।।१९।।
    § ५६३. इदमयुक्तं वर्तते । किमत्रायुक्तम् । पुद्गलानां क उपकार इति परिप्रश्ने पुद्गलानां
    निष्क्रिय और सदा सम्बन्धवाले हैं इसलिए उनका अवगाह कैसे बन सकता है ? समाधान—नहीं; १५
    क्योंकि उपचारसे इसकी सिद्धि होती है । जैसे गमन नहीं करने पर भी आकाश सर्वगत कहा
    जाता है, क्योंकि वह सर्वत्र पाया जाता है इसी प्रकार यद्यपि धर्म और अधर्म द्रव्यमें अवगाह-
    रूप क्रिया नहीं पायी जाती तो भी लोकाकाशमें वे सर्वत्र व्याप्त हैं अतः वे अवगाही हैं ऐसा
    उपचार कर लिया जाता है । शंका—यदि अवकाश देना आकाशका स्वभाव है तो वज्रादिकसे
    लोढ़ा आदिकका और भीत आदिकसे गाय आदिकका व्याघात नहीं प्राप्त होता है, किन्तु व्याघात २०
    तो देखा जाता है इससे मालूम होता है कि अवकाश देना आकाशका स्वभाव नहीं ठहरता ?
    समाधान—यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि वज्र और लोढ़ा आदिक स्थूल पदार्थ हैं इसलिए उनका
    आपसमें व्याघात होता है, अतः आकाशकी अवकाश देने रूप सामर्थ्य नहीं नष्ट होती । यहाँ जो
    व्याघात दिखाई देता है वह अवगाहन करनेवाले पदार्थोंका ही है । तात्पर्य यह है कि वज्रादिक
    स्थूल पदार्थ हैं इसलिए वे परस्पर अवकाश नहीं देते, यह कुछ आकाशका दोष नहीं है । हाँ, जो २५
    पुद्गल सूक्ष्म होते हैं वे परस्पर अवकाश देते हैं । शंका—यदि ऐसा है तो यह आकाशका असा-
    धारण लक्षण नहीं रहता, क्योंकि दूसरे पदार्थोंमें भी इसका सद्भाव पाया जाता है ? समाधान—
    नहीं, क्योंकि आकाश द्रव्य सब पदार्थोंको अवकाश देनेमें साधारण कारण है यही इसका असाधारण
    लक्षण है, इसलिए कोई दोष नहीं है । शंका—अलोकाकाशमें अवकाशदान रूप स्वभाव नहीं पाया
    जाता, इससे ज्ञात होता है कि यह आकाशका स्वभाव नहीं है ? समाधान—नहीं, क्योंकि कोई ३०
    भी द्रव्य अपने स्वभावका त्याग नहीं करता ।
    § ५६२. आकाश द्रव्यका उपकार कहा । अब उसके अनन्तर कहे गये पुद्गलोंका क्या
    उपकार है, यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
    शरीर, वचन, मन और प्राणापान यह पुद्गलोंका उपकार है ॥१९॥
    § ५६३. शंका—यह अयुक्त है ? प्रतिशंका—क्या अयुक्त है ? शंका—पुद्गलोंका क्या ३५
    १. -स्तेऽपि परस्प- आ०, दि० १, दि० २ । २. -क्षणमिति परे-आ०, दि० १, दि० २ ।

२१२ सर्वार्थसिद्धौ [ ५।१९ § ५६३ -
लक्षणमुच्यते¹; शरीरादीनि पुद्गलमयानीति । नैतद्युक्तम्; पुद्गलानां लक्षणमुत्तरत्र² वक्ष्यते । इदं
तु जीवान् प्रति पुद्गलानामुपकारप्रतिपादनार्थमेवेति उपकारप्रकरणे उच्यते । शरीराण्युक्तानि ।
औदारिकादीनि सौक्ष्म्यादप्रत्यक्षाणि । तदुदयापादित³वृत्तीन्युपचयशरीराणि कानिचित्प्रत्यक्षाणि
कानिचिदप्रत्यक्षाणि । एतेषां कारणभूतानि कर्माण्यपि शरीरग्रहणेन गृह्यन्ते । एतानि पौद्गलिका-
५ नीति कृत्वा जीवानामुपकारे पुद्गलाः प्रवर्तन्ते । स्यान्मतं कार्मणमपौद्गलिकम्; अनाकारत्वाद्⁴ ।
आकारवतां हि औदारिकादीनां पौद्गलिकत्वं युक्तमिति । तन्न; तदपि पौद्गलिकमेव; तद्विपाकस्य
मूर्तिमत्संबन्धनिमित्तत्वात् । दृश्यते हि व्रीह्यादीनामुदकादिद्रव्यसंबन्धप्रापितपरिपाकानां
पौद्गलिकत्वम् । तथा कार्मणमपि गुडकण्टकादिमूर्तिमद्द्रव्योपनिपाते सति विपच्यमानत्वात्पौद्-
गलिकमित्यवसेयम् । वाग् द्विविधा-द्रव्यवाग् भाववागिति । तत्र भाववाक् तावद्वीर्यान्तरायमति-
१० श्रुतज्ञानावरणक्षयोपशमाङ्गोपाङ्गनामलब्धिनिमित्तत्वात् पौद्गलिकी । तदभावे तद्वृत्त्यभावात् ।
तत्सामर्थ्योपेतेन क्रियावतात्मना प्रेर्यमाणाः पुद्गला वाक्त्वेन विपरिणमन्त इति द्रव्यवागपि
पौद्गलिकी; श्रोत्रेन्द्रियविषयत्वात् । इतरेन्द्रियविषया कस्मान्न भवति । तद्ग्रहणायोग्यत्वात् ।
घ्राणग्राह्ये गन्धद्रव्ये रसाद्यनुपलब्धिवत् । अमूर्ता वागिति चेत् । न; मूर्तिमद्ग्रहणावरोधव्याघाता-
उपकार है यह प्रश्न था पर उसके उत्तरमें 'शरीरादिक पुद्गलमय हैं' इस प्रकार पुद्गलोंका लक्षण
१५ कहा जाता है ? समाधान—यह अयुक्त नहीं है, क्योंकि पुद्गलोंका लक्षण आगे कहा जायगा, यह सूत्र
तो जीवोंके प्रति पुद्गलोंके उपकारका कथन करनेके लिए ही आया है अतः उपकार प्रकरणमें ही
यह सूत्र कहा है। औदारिक आदिक पाँचों शरीरोंका कथन पहले कर आये हैं। वे सूक्ष्म होनेसे
इन्द्रियगोचर नहीं हैं। किन्तु उनके उदयसे जो उपचय शरीर प्राप्त होते हैं उनमें-से कुछ शरीर
इन्द्रियगोचर हैं और कुछ इन्द्रियातीत हैं। इन पाँचों शरीरोंके कारणभूत जो कर्म हैं उनका भी शरीर
२० पदके ग्रहण करनेसे ग्रहण हो जाता है। ये सब शरीर पौद्गलिक हैं ऐसा मानकर जीवोंका उपकार
पुद्गल करते हैं यह कहा है। शंका—आकाशके समान कार्मण शरीरका कोई आकार नहीं पाया
जाता इसलिए उसे पौद्गलिक मानना युक्त नहीं। हाँ, जो औदारिक आदिक शरीर आकारवाले हैं
उनको पौद्गलिक मानना युक्त है ? समाधान—यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि कार्मण शरीर भी
पौद्गलिक ही है, क्योंकि उसका फल मूर्तिमान् पदार्थोंके सम्बन्धसे होता है। यह तो स्पष्ट दिखाई
२५ देता है कि जलादिकके सम्बन्धसे पकनेवाले धान आदि पौद्गलिक हैं। उसी प्रकार कार्मण शरीर
भी गुड़ और काँटे आदि मूर्तिमान् पदार्थोंके मिलने पर फल देते हैं इससे ज्ञात होता है कि कार्मण
शरीर भी पौद्गलिक है। वचन दो प्रकारका है--द्रव्यवचन और भाववचन । इनमें-से भाववचन
वीर्यान्तराय और मतिज्ञानावरण तथा श्रुतज्ञानावरण कर्मोंके क्षयोपशम और अंगोपांग नामकर्मके
निमित्तसे होता है इसलिए वह पौद्गलिक है; क्योंकि पुद्गलोंके अभावमें भाववचनका सद्भाव
३० नहीं पाया जाता। चूँकि इस प्रकारकी सामर्थ्यसे युक्त क्रियावाले आत्माके द्वारा प्रेरित हो कर
पुद्गल वचनरूपसे परिणमन करते हैं इसलिए द्रव्य वचन भी पौद्गलिक हैं। दूसरे द्रव्य वचन
श्रोत्र इन्द्रियके विषय हैं इससे भी ज्ञात होता है कि वे पौद्गलिक हैं। शंका—वचन इतर इन्द्रियों-
के विषय क्यों नहीं होते ? समाधान—घ्राण इन्द्रिय गन्धको ग्रहण करती है उससे जिस प्रकार
रसादिककी उपलब्धि नहीं होती उसी प्रकार इतर इन्द्रियोंमें वचनके ग्रहण करनेकी योग्यता नहीं
३५ है। शंका—वचन अमूर्त हैं ? समाधान—नहीं; क्योंकि वचनोंका मूर्त इन्द्रियोंके द्वारा ग्रहण होता
है, वे मूर्त भीत आदिके द्वारा रुक जाते हैं, प्रतिकूल वायु आदिके द्वारा उनका व्याघात देखा
१. -च्यते भवता शरी-मु० । २. -रत्र स्पर्शरसगन्धवर्णवन्तः पुद्गलाः इत्यत्र वक्ष्यते मु० । ३. -पादित-
( तदुदयोपपादित )वृत्ती-मु० । ४. -कारत्वादाकाशवत् । आकार-मु० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri