सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 312, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ें२०० सर्वार्थसिद्धौ [ ५।४ § ५३२ -
§ ५३२. उक्तानां द्रव्याणां विशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह—
नित्यावस्थितान्यरूपाणि ॥४॥
§ ५३३. नित्यं ध्रुवमित्यर्थः ।१ “नेर्ध्रुवे त्यः२” इति निष्पादितत्वात् । धर्मादीनि द्रव्याणि
गतिहेतुत्वादिविशेषलक्षणद्रव्यार्थादेशादस्तित्वादिसामान्यलक्षणद्रव्यार्थादेशाच्च कदाचिदपि न
व्ययन्तीति नित्यानि । वक्ष्यते हि 'तद्भावाव्ययं नित्यम्' इति । इयत्ताऽव्यभिचारादवस्थितानि ।
धर्मादीनि षडपि द्रव्याणि कदाचिदपि षडिति इयत्त्वं नातिवर्तन्ते । ततोऽवस्थितानीत्युच्यन्ते । न
विद्यते रूपमेषामित्यरूपाणि, रूपप्रतिषेधे३ तत्सहचारिणां रसादीनामपि प्रतिषेधः । तेन अरूपाण्य-
मूर्तानीत्यर्थः ।
§ ५३४. यथा सर्वेषां द्रव्याणां 'नित्यावस्थितानि' इत्येतत्साधारणं लक्षणं४ प्राप्तं तथा
पुद्गलानामपि अरूपित्वं प्राप्तम् । अतस्तदपवादार्थमाह—
रूपिणः पुद्गलाः ॥५॥
§ ५३५. रूपं मूर्तिरित्यर्थः । का मूर्तिः । रूपादिंसंस्थानपरिणामो मूर्तिः । रूपमेषामस्तीति
रूपिणः । मूर्तिमन्त इत्यर्थः । अथवा रूपमति५ गुणविशेषवचनशब्दः । तदेषामस्तीति रूपिणः ।
पृथक् भूत पदार्थ नहीं है क्योंकि सूर्यके उदयादिकी अपेक्षा आकाशमें ही दिशा व्यवहार होता है ।
इस प्रकार विचार करनेपर जैन दर्शनमें जो जीवादि पदार्थ गिनाये हैं वे ही द्रव्य ठहरते हैं अन्य
नहीं, ऐसा सिद्ध होता है ।
§ ५३२. अब उक्त द्रव्योंके विशेषका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
उक्त द्रव्य नित्य हैं, अवस्थित हैं और अरूपी हैं ॥४॥
§ ५३३. नित्य शब्दका अर्थ ध्रुव है । 'नेर्ध्रुवे त्यः' इस वार्तिकके अनुसार 'नि' शब्दसे ध्रुव-
अर्थमें 'त्य' प्रत्यय लगाकर नित्य शब्द बना है । गतिहेतुत्व आदि रूप विशेष लक्षणोंको ग्रहण करने-
वाले द्रव्यार्थिक नयकी अपेक्षा और अस्तित्व आदि रूप सामान्य लक्षणको ग्रहण करनेवाले द्रव्या-
र्थिक नयकी अपेक्षा ये छहों द्रव्य कभी भी विनाशको प्राप्त नहीं होते इसलिए नित्य हैं । 'तद्भावा-
व्ययं नित्यम्' इस सूत्र-द्वारा इसी बातको आगे कहनेवाले भी हैं । संख्याका कभी व्यभिचार नहीं होता
इसलिए अवस्थित हैं । ये धर्मादिक छहों द्रव्य कभी भी छह इस संख्याका उल्लंघन नहीं करते
इसलिए ये अवस्थित कहे जाते हैं । इनमें रूप नहीं पाया जाता इसलिए अरूपी हैं । यहाँ केवल
रूपका निषेध किया है, किन्तु रसादिक उसके सहचारी हैं अतः उनका भी निषेध हो जाता है ।
इससे अरूपीका अर्थ अमूर्त होता है ।
§ ५३४. जिस प्रकार सब द्रव्योंका नित्य और अवस्थित यह साधारण लक्षण प्राप्त होता
है उसी प्रकार पुद्गलोंमें अरूपीपना भी प्राप्त होता है अतः इसका अपवाद करनेके लिए आगेका
सूत्र कहते हैं—
पुद्गल रूपी हैं ॥५॥
§ ५३५. रूप और मूर्ति इनका एक अर्थ है । शंका—मूर्ति किसे कहते हैं ? समाधान—
रूपादिकके आकारसे परिणमन होनेको मूर्ति कहते हैं । जिनके रूप पाया जाता है वे रूपी कहलाते
हैं । इसका अर्थ मूर्तिमान् है । अथवा, रूप यह गुणविशेषका वाची शब्द है । वह जिनके पाया
१. नि ध्रुवे नित्य इति आ०, दि० १, दि० २ । नेर्ध्रुवेऽर्थे त्यः ता० । २. 'त्यन्नेर्ध्रुव इति वक्तव्यम्'-पा० ४,
२, १०४ वार्तिकम् । नेर्ध्रुवे'-जैनेन्द्र० ३, २, ८२ वार्तिकम् । ३. -षेधेन तत्सह-मु० । ४. लक्षणं
तथा अरूपित्वं पुद्गलानामपि प्राप्तम् मु० । ५. शब्दः । तेषा-आ०, दि० १, दि० २ ।