सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०२ सर्वार्थसिद्धौ [ ५।७ § ५३८ –
§ ५३८. अधिकृतानामेव एकद्रव्याणां विशेषप्रतिपत्त्यर्थमिदमुच्यते—
निष्क्रियाणि च ॥७॥
§ ५३९. उभयनिमित्तवशादुत्पद्यमानः पर्यायो द्रव्यस्य देशान्तरप्राप्तिहेतुः क्रिया। तस्या
निष्क्रान्तानि निष्क्रियाणि। अत्र चोद्यते—धर्मादीनि द्रव्याणि यदि निष्क्रियाणि ततस्तेषामुत्पादो
५ न भवेत्। क्रियापूर्वको हि घटादीनामुत्पादो दृष्टः। उत्पादाभावाच्च व्ययाभाव इति। अतः सर्व-
द्रव्याणामुत्पादादित्रितयकल्पना व्याघात इति। तन्न; किं कारणम्। अन्यथोपपत्तेः। क्रियानिमि-
त्तोत्पादाभावेऽप्येषां धर्मादीनामन्यथोत्पादः कल्प्यते। तद्यथा—द्विविध उत्पादः स्वनिमित्तः परप्रत्य-
यश्च। स्वनिमित्तस्तावदनन्तानामगुरुलघुगुणानामागमप्रामाण्यादभ्युपगम्यमानानां षट्स्थानपति-
तया वृद्ध्या हान्या च प्रवर्तमानानां स्वभावादेतेषामुत्पादो व्ययश्च। परप्रत्ययोऽपि अश्वादिगति-
१० स्थित्यवगाहनहेतुत्वात् क्षणे क्षणे तेषां भेदात्तद्धेतुत्वमपि भिन्नमिति परप्रत्ययापेक्ष उत्पादो विनाशश्च
व्यवह्रियते। ननु यदि निष्क्रियाणि धर्मादीनि, जीवपुद्गलानां गत्यादिहेतुत्वं नोपपद्यते। जलादीनि
हि क्रियावन्ति मत्स्यादीनां गत्यादिनिमित्तानि दृष्टानीति। नैष दोषः; बलाधाननिमित्तत्वाच्चक्षु-
र्वत्। यथा रूपोपलब्धौ चक्षुर्निमित्तंमिति न व्याक्षिप्तमनस्कस्यापि भवति। अधिकृतानां धर्मा-
§ ५३८. अब अधिकार प्राप्त उन्हीं एक-एक द्रव्योंका विशेष ज्ञान करानेके लिए आगेका
१५ सूत्र कहते हैं—
तथा निष्क्रिय हैं ॥७॥
§ ५३९. अन्तरंग और बहिरंग निमित्तसे उत्पन्न होनेवाली जो पर्याय द्रव्यके एक
क्षेत्रसे दूसरे क्षेत्रमें प्राप्त करानेका कारण है वह क्रिया कहलाती है और जो इस प्रकारकी क्रियासे
रहित हैं वे निष्क्रिय कहलाते हैं। शंका—यदि धर्मादिक द्रव्य निष्क्रिय हैं तो उनका उत्पाद नहीं
२० बन सकता, क्योंकि घटादिकका क्रियापूर्वक ही उत्पाद देखा जाता है। और उत्पाद नहीं बननेसे
इनका व्यय नहीं बनता। अतः सब द्रव्य उत्पाद आदि तीन रूप होते हैं इस कल्पनाका व्याघात हो
जाता है? समाधान—नहीं, क्योंकि इनमें उत्पाद आदिक तीन अन्य प्रकारसे बन जाते हैं। यद्यपि
इन धर्मादिक द्रव्योंमें क्रियानिमित्तक उत्पाद नहीं है तो भी इनमें अन्य प्रकारसे उत्पाद माना
गया है। यथा—उत्पाद दो प्रकारका है, स्वनिमित्तक उत्पाद और परप्रत्यय उत्पाद। स्वनिमित्तक
२५ यथा—प्रत्येक द्रव्यमें आगम प्रमाणसे अनन्त अगुरुलघु गुण स्वीकार किये गये हैं जिनका छह
स्थानपतित वृद्धि और हानिके द्वारा वर्तन होता रहता है, अतः इनका उत्पाद और व्यय स्वभाव-
से होता है। इसी प्रकार परप्रत्यय भी उत्पाद और व्यय होता है। यथा—ये धर्मादिक द्रव्य क्रमसे
अश्व आदिकी गति, स्थिति और अवगाहनमें कारण हैं। चूंकि इन गति आदिक में क्षण-क्षणमें
अन्तर पड़ता है इसीलिए इनके कारण भी भिन्न-भिन्न होने चाहिए, इस प्रकार इन धर्मादिक
३० द्रव्योंमें परप्रत्ययकी अपेक्षा उत्पाद और व्ययका व्यवहार किया जाता है। शंका—यदि धर्मादिक
द्रव्य निष्क्रिय हैं तो ये जीव और पुद्गलोंकी गति आदिकके कारण नहीं हो सकते; क्योंकि जला-
दिक क्रियावान् होकर ही मछली आदिकी गति आदिमें निमित्त देखे जाते हैं, अन्यथा नहीं?
समाधान—यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि चक्षु इन्द्रियके समान ये बलाधानमें निमित्तमात्र हैं।
जैसे चक्षु इन्द्रिय रूपके ग्रहण करनेमें निमित्तमात्र है, इसलिए जिसका मन व्याक्षिप्त है उसके चक्षु
३५ इन्द्रियके रहते हुए भी रूपका ग्रहण नहीं होता। उसी प्रकार प्रकृतमें समझ लेना चाहिए। इस
१. -दादित्रयकल्प-मु०। २. -गमप्रमाणादभ्यु-आ०, दि० १, दि० २। ३. -निमित्तमपि न मु०,
ता०, ना०।
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