सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 308, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ पञ्चमोऽध्यायः
§ ५२६. इदानीं सम्यग्दर्शनस्य विषयभावेनोपक्षिप्तेषु जीवादिषु जीवपदार्थो व्याख्यातः ।
अथाजीवपदार्थो विचारप्राप्तस्तस्य संज्ञाभेदसंकीर्तनार्थमिदमुच्यते—
अजीवकाया धर्माधर्माकाशपुद्गलाः ॥१॥
§ ५२७. ‘काय’शब्दः शरीरे व्युत्पादितः । इहोपचारादध्यारोप्यते । कुत उपचारः । यथा
शरीरं पुद्गलद्रव्यप्रचयात्मकं तथा धर्मादिष्वपि प्रदेशप्रचयापेक्षया काया इव काया इति ।
अजीवाश्च ते कायाश्च अजीवकायाः “विशेषणं विशेष्येणेति”१ वृत्तिः । ननु च नीलोत्पलादिषु
व्यभिचारे सति विशेषणविशेष्ययोगः । इहापि व्यभिचारयोगोऽस्ति । अजीवशब्दोऽकाये कालेऽपि
वर्तते, कायोऽपि जीवे । किमर्थः कायशब्दः । प्रदेशबहुत्वज्ञापनार्थः । धर्मादीनां प्रदेशा बहव इति ।
ननु च ‘असंख्येयाः प्रदेशा धर्माधर्मैकजीवानाम्’ इत्यनेनैव प्रदेशबहुत्वं ज्ञापितम् । २सत्यमिदम् । परं
किन्त्वस्मिन्विधौ सति तदवधारणं विज्ञायते, असंख्येयाः । प्रदेशा न संख्येया नाप्यनन्ता इति ।
३कालस्य प्रदेशप्रचयाभावज्ञापनार्थं च इह ‘काय’ग्रहणम् । कालो वक्ष्यते । तस्य प्रदेशप्रतिषेधार्थमिह
§ ५२६. सम्यग्दर्शनके विषयरूपसे जो जीवादि पदार्थ कहे हैं उनमें-से जीव पदार्थका
व्याख्यान किया । अब अजीव पदार्थका व्याख्यान विचार प्राप्त है अतः उसकी संज्ञा और भेदोंका
कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
धर्म, अधर्म, आकाश और पुद्गल ये अजीवकाय हैं ॥१॥
§ ५२७. व्युत्पत्तिसे काय शब्दका अर्थ शरीर है तो भी यहाँ उपचारसे उसका आरोप किया
है । शंका—उपचारका क्या कारण है ? समाधान—जिस प्रकार शरीर पुद्गल द्रव्यके प्रचयरूप
होता है उसी प्रकार धर्मादिक द्रव्य भी प्रदेशप्रचयकी अपेक्षा कायके समान होनेसे काय कहे गये हैं ।
अजीव और काय इनमें कर्मधारय समास है । जो 'विशेषणं विशेष्येण' इस सूत्रसे हुआ है। शंका—
नीलोत्पल इत्यादिमें नील और उत्पल इन दोनों का व्यभिचार देखा जाता है अतः वहाँ विशेषण-
विशेष्य सम्बन्ध किया गया है, किन्तु अजीवकायमें विशेषणविशेष्य सम्बन्ध करनेका क्या कारण
है ? समाधान—अजीवकायका यहाँ भी व्यभिचार देखा जाता है क्योंकि अजीव शब्द कालमें भी
रहता है जो कि काय नहीं है और काय शब्द जीवमें रहता है, अतः इस दोषके निवारण करनेके
लिए यहाँ विशेषणविशेष्य सम्बन्ध किया है । शंका—काय शब्द किसलिए दिया है ? समाधान—
प्रदेश बहुत्वका ज्ञान करानेके लिए । धर्मादिक द्रव्योंके बहुत प्रदेश हैं यह इससे जाना जाता है ।
शंका—आगे यह सूत्र आया है कि ‘धर्म, अधर्म और एक जीवके असंख्यात प्रदेश हैं’ इसीसे इनके
बहुत प्रदेशोंका ज्ञान हो जाता है फिर यहाँ कायशब्दके देनेकी क्या आवश्यकता ? समाधान—यह
ठीक है । तो भी इस कथनके होनेपर उस सूत्रसे प्रदेशोंके विषयमें यह निश्चय किया जाता है कि
इन धर्मादिक द्रव्योंके प्रदेश असंख्यात हैं, न संख्यात हैं और न अनन्त । दूसरे काल द्रव्यमें प्रदेशों-
का प्रचय नहीं है यह ज्ञान कराने के लिए इस सूत्रमें ‘काय’ पदका ग्रहण किया है । कालका आगे
व्याख्यान करेंगे । उसके प्रदेशोंका निषेध करनेके लिए यहाँ ‘काय’ शब्दका ग्रहण किया है । जिस
१. जैनेन्द्र० १।३।४८ । २. सत्यं अस्मिन् ता, ना० । ३. कालप्रदेश-आ०, दि० १, दि० २ ।