सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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- ५।९ § ५४२ ] पञ्चमोऽध्यायः २०३
धर्माकाशानां निष्क्रियत्वेऽभ्युपगते जीवपुद्गलानां सक्रियत्वमर्थादापन्नम् । कालस्यापि सक्रियत्व-
मिति चेत् । न; अनधिकारात् । अत एवासावेतैः सह नाधिक्रियते ।
§ ५४०. अजीवकाया इत्यत्र कायग्रहणेन प्रदेशास्तित्वमात्रं निर्ज्ञातं न त्वियत्तावधारिता
प्रदेशानामतस्तन्निर्धारणार्थमिदमुच्यते—
असंख्येयाः प्रदेशा धर्माधर्मैकजीवानाम् ॥८॥ ५
§ ५४१. संख्यामतीता असंख्येयाः । असंख्येयस्त्रिविधः-जघन्य उत्कृष्टोऽजघन्योत्कृष्टश्चेति ।
तत्रेहाजघन्योत्कृष्टासंख्येयः परिगृह्यते । प्रदिश्यन्त इति प्रदेशाः । वक्ष्यमाणलक्षणः परमाणुः स
यावति क्षेत्रे व्यवतिष्ठते स प्रदेश इति व्यवह्रियते । धर्माधर्मैकजीवास्तुल्यासंख्येयप्रदेशाः । तत्र
धर्माधर्मौ निष्क्रियौ लोकाकाशं व्याप्य स्थितौ । जीवस्तावत्प्रदेशोऽपि सन् संहरणविसर्पणस्वभाव-
त्वात् कर्मनिर्वर्तितं शरीरमणु महद्वाऽधितिष्ठंस्तावदवगाह्य वर्तते । यदा तु लोकपूरणं भवति तदा १०
मन्दरस्याधश्चित्रवज्रपटलमध्ये जीवस्याष्टौ मध्यप्रदेशा व्यवतिष्ठन्ते । इतरे प्रदेशा ऊर्ध्वमधस्तिर्यक्
च कृत्स्नं लोकाकाशं व्यश्नुवते ।
§ ५४२. अथाकाशस्य कति प्रदेशा इत्यत आह—
आकाशस्यानन्ताः ॥९॥^१
प्रकार अधिकार प्राप्त धर्म, अधर्म और आकाश द्रव्यको निष्क्रिय मान लेने पर जीव और पुद्गल १५
सक्रिय हैं यह प्रकरणसे अपने-आप प्राप्त हो जाता है । शंका—काल द्रव्य भी सक्रिय होगा ?
समाधान—नहीं; क्योंकि उसका यहाँ अधिकार नहीं है । इसलिए इन द्रव्यों के साथ उसका
अधिकार नहीं किया है ।
§ ५४०. 'अजीवकायाः' इत्यादि सूत्रमें 'काय' पदके ग्रहण करनेसे प्रदेशोंका अस्तित्व मात्र
जाना जाता है प्रदेशोंकी संख्या नहीं मालूम होती, अतः उसका निर्धारण करनेके लिए आगेका २०
सूत्र कहते हैं—
धर्म, अधर्म और एक जीवके असंख्यात प्रदेश हैं ॥८॥
§ ५४१. जो संख्यासे परे हैं वे असंख्यात कहलाते हैं । असंख्यात तीन प्रकारका है—जघन्य,
उत्कृष्ट और अजघन्योत्कृष्ट । उनमें-से यहाँ अजघन्योत्कृष्टका ग्रहण किया है । 'प्रदिश्यन्ते, इति
प्रदेशाः' यह प्रदेश शब्दकी व्युत्पत्ति है । तात्पर्य यह है कि जिससे विवक्षित परिमाणका संकेत २५
मिलता है, उसे प्रदेश कहते हैं । परमाणुका लक्षण आगे कहेंगे । वह जितने क्षेत्रमें रहता है वह
प्रदेश है ऐसा व्यवहार किया जाता है । धर्म, अधर्म और एक जीवके प्रदेशोंकी संख्या समान है ।
इनमें-से धर्म और अधर्मद्रव्य निष्क्रिय हैं और लोकाकाशभरमें फैले हुए हैं । यद्यपि जीवके प्रदेश
धर्म और अधर्म द्रव्यके बराबर ही हैं तो भी वह संकोच और विस्तारस्वभाववाला है; इसलिए
कर्मके निमित्तसे छोटा या बड़ा जैसा शरीर मिलता है उतनी अवगाहनाका होकर यह जीव रहता ३०
है । और केवलिसमुद्घातके समय जब यह लोकको व्यापता है उस समय जीवके मध्यके आठ
प्रदेश मेरु पर्वतके नीचे चित्रा पृथिवीके वज्रमय पटलके मध्यमें स्थित हो जाते हैं और शेष प्रदेश
ऊपर, नीचे और तिरछे समस्त लोकको व्याप लेते हैं ।
§ ५४२. अब आकाश द्रव्यके कितने प्रदेश हैं यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
आकाशके अनन्त प्रदेश हैं ॥९॥ ३५
१. -नन्ताः ॥९॥ लोकेऽलोके चाकाशं वर्तते । अवि-मु० ।