सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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- ५१६ § ५३७ ] पञ्चमोऽध्यायः २०१
रसाद्यग्रहणमिति चेत् । न; तदविनाभावात्तदन्तर्भावः । 'पुद्गलाः' इति बहुवचनं भेदप्रतिपाद-
नार्थम् । भिन्ना हि पुद्गलाः; स्कन्धपरमाणुभेदात् । तद्विकल्प उपरिष्टाद्वक्ष्यते । यदि प्रधानवदरूपि-
त्वमेकत्वं चेष्टं स्यात्, विश्वरूपकार्यदर्शनविरोधः स्यात् ।
§ ५३६. आह, किं पुद्गलवद्धर्मादीन्यपि द्रव्याणि प्रत्येकं भिन्नानीत्यत्रोच्यते—
आ¹ आकाशादेकद्रव्याणि ॥६॥ ५
§ ५३७. 'आङ्' अयमभिविध्यर्थः । सौत्रीमानुपूर्वी²मासृत्यैतदुक्तम् । तेन धर्माधर्माकाशानि
गृह्यन्ते । 'एक' शब्दः संख्यावचनः । तेन द्रव्यं विशिष्यते, एकं द्रव्यं एकद्रव्यमिति । यद्येवं
बहुवचनमयुक्तम्, धर्माद्यपेक्षया बहुत्वसिद्धिर्भवति³ । ननु एकस्यानेकार्थप्रत्ययनशक्तियोगादेकैक-
मित्यस्तु, लघुत्वाद् । 'द्रव्य' ग्रहणमनर्थकम् । [ सत्यम्⁴; ] तथापि द्रव्यापेक्षया एकत्वख्यापनार्थं
द्रव्यग्रहणम् । क्षेत्रभावोद्यपेक्षया⁵ असंख्येयत्वानन्तत्वविकल्पस्येष्टत्वान्न जीवपुद्गलवदेषां बहुत्व- १०
मित्येतदनेन ख्याप्यते ।
जाता है वे रूपी कहलाते हैं। शंका—यहाँ रसादिका ग्रहण नहीं किया है ? समाधान—नहीं;
क्योंकि रसादिक रूपके अविनाभावी हैं, इसलिए उनका अन्तर्भाव हो जाता है ।
पुद्गलोंके भेदोंका कथन करनेके लिए सूत्रमें 'पुद्गलाः' यह बहुवचन दिया है। स्कन्ध
और परमाणुके भेदसे पुद्गल अनेक प्रकारके हैं। पुद्गलके ये सब भेद आगे कहेंगे। यदि पुद्गलको १५
प्रधानके समान एक और अरूपी माना जाय तो जो विश्वरूप कार्य दिखाई देता है उसके होनेमें
विरोध आता है ।
§ ५३६. पुद्गल द्रव्यके समान क्या धर्मादिक प्रत्येक द्रव्य भी अनेक हैं। अब इस बातका
ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
आकाश तक एक-एक द्रव्य हैं ॥६॥ २०
§ ५३७. इस सूत्रमें 'आङ्' अभिविधि अर्थमें आया है । सूत्र सम्बन्धी आनुपूर्वीका अनुसरण
करके यह कहा है । इससे धर्म, अधर्म और आकाश इन तीनका ग्रहण होता है । एक शब्द संख्या-
वाची है और वह द्रव्यका विशेषण है । तात्पर्य यह है कि धर्म, अधर्म और आकाश ये एक-एक
द्रव्य हैं। शंका—यदि ऐसा है तो सूत्र में 'एकद्रव्याणि' इस प्रकार बहुवचनका प्रयोग करना अयुक्त
है ? समाधान—धर्मादिक द्रव्योंकी अपेक्षा बहुवचन बन जाता है। शंका—एकमें अनेकके ज्ञान २५
करानेकी शक्ति होती है, इसलिए 'एकद्रव्याणि'के स्थानमें 'एकैकम्' इतना ही रहा आवे । इससे
सूत्र छोटा हो जाता है। तथा 'द्रव्य' पदका ग्रहण करना भी निष्फल है ? समाधान—ये धर्मादिक
द्रव्यकी अपेक्षा एक हैं इस बातके बतलानेके लिए सूत्रमें 'द्रव्य' पदका ग्रहण किया है। तात्पर्य यह
है कि यदि सूत्रमें 'एकैकम्' इतना ही कहा जाता तो यह नहीं मालूम पड़ता कि ये धर्मादिक द्रव्य,
द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव इनमें-से किसकी अपेक्षा एक हैं अतः सन्देहकें निवारण करनेके लिए ३०
'एकद्रव्याणि' पद रखा है । इनमें-से धर्म और अधर्म द्रव्यके क्षेत्रकी अपेक्षा असंख्यात विकल्प इष्ट
होनेसे और भावकी अपेक्षा अनन्त विकल्प इष्ट होनेसे तथा आकाशके क्षेत्र और भाव दोनोंकी
अपेक्षा अनन्त विकल्प इष्ट होनेसे ये जीव और पुद्गलके समान बहुत नहीं हैं इस प्रकार यह बात
इस सूत्रमें दिखायी गयी है ।
१. -'ईषदर्थे क्रियायोगे मर्यादाभिविधौ च यः । एतमातं ङितं विद्याद् वाक्यस्मरणयोरङित् ।' २. -पूर्वीमनु- ३५
सृत्यै-मु० । ३. -वति । एक-आ० दि० १, दि० २ । ४. -र्थकं । तत्क्रियते द्रव्या-ता० ना० । -र्थकं ।
तज्ज्ञायते द्रव्या-आ० दि० १, दि० २ । ५. -भावापेक्षया आ०, ता०, ना०, दि० १, दि० २ ।
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