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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 311, कुल 558 में से

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पृष्ठ 311
  • ५।३ § ५३१ ] पञ्चमोऽध्यायः १९९
    मनोऽपि द्विविधं द्रव्यमनो भावमनश्चेति। तत्र भावमनो ज्ञानम्; तस्य जीवगुणत्वादात्मन्यन्तर्भावः।
    द्रव्यमनश्च रूपादियोगात्पुद्गलद्रव्यविकारः। १ रूपादिमन्मनः; ज्ञानोपयोगकरणत्वाच्चक्षुरिन्द्रियवत्।
    ननु अमूर्तेऽपि शब्दे ज्ञानोपयोगकरणत्वदर्शनाद् व्यभिचारी हेतुरिति चेत् । न; तस्य पौद्गलिक-
    त्वान्मूत्तिमत्त्वोपपत्तेः। ननु यथा परमाणूनां रूपादिमत्कार्य२दर्शनाद्रूपादिमत्त्वं न तथा वायुमनसो
    रूपादिसत्कार्यं दृश्यते ३ इति चेत् । न; तेषामपि ४ तदुपपत्तेः । सर्वेषां परमाणूनां सर्वरूपादि- ५
    मत्कार्यत्वप्राप्तियोग्यत्वाभ्युपगमात् । न च केचित्पार्थिवादिजातिविशेषयुक्ताः परमाणवः सन्ति;
    जातिसांकर्येणारम्भदर्शनात् । दिशोऽप्याकाशेऽन्तर्भावः, आदित्योदयाद्यपेक्षया आकाशप्रदेशपङ्क्तिषु
    इत इदमिति व्यवहारोपपत्तेः ।
    है, स्पर्शवाला होनेसे, पृथिवीके समान । अग्नि भी रस और गन्धवाली है, रूपवाली होनेसे,
    पृथिवीके समान । मन भी दो प्रकारका है—द्रव्यमन और भावमन । उनमें-से भावमन ज्ञानस्वरूप १०
    है, और ज्ञान जीवका गुण है इसलिए इसका आत्मामें अन्तर्भाव होता है। तथा द्रव्यमनमें रूपा-
    दिक पाये जाते हैं, अतः वह पुद्गलद्रव्यकी पर्याय है। यथा—मन रूपादिवाला है, ज्ञानोपयोग-
    का करण होनेसे, चक्षु इन्द्रियके समान । शंका—शब्द अमूर्त होते हुए भी उसमें ज्ञानोपयोगकी
    करणता देखी जाती है, अतः मनको रूपादिवाला सिद्ध करनेके लिए जो हेतु दिया है वह व्यभि-
    चारी है ? समाधान—नहीं; क्योंकि शब्द पौद्गलिक है अतः उसमें मूर्तपना बन जाता है। शंका— १५
    जिस प्रकार परमाणुओंके रूपादि गुणवाले कार्य देखे जाते हैं अतः वे रूपादिवाले सिद्ध होते हैं उस
    प्रकार वायु और मनके रूपादि गुणवाले कार्य नहीं दिखाई देते ? समाधान—नहीं, क्योंकि वायु
    और मनके भी रूपादि गुणवाले कार्य सिद्ध हो जाते हैं; क्योंकि सब परमाणुओंमें सब रूपादि गुण-
    वाले कार्योंके होनेकी योग्यता मानी है। कोई पार्थिव आदि भिन्न-भिन्न जातिके अलग-अलग
    परमाणु हैं, यह बात नहीं है; क्योंकि जातिका संकर होकर सब कार्योंका आरम्भ देखा जाता है। २०
    इसी प्रकार दिशाका भी आकाशमें अन्तर्भाव होता है, क्योंकि सूर्यके उदयादिककी अपेक्षा आकाश
    प्रदेशपंक्तियोंमें यहांसे यह दिशा है इस प्रकारके व्यवहारकी उत्पत्ति होती है।
    विशेषार्थ—जातिकी अपेक्षा ये जीव पुद्गलादि जितने पदार्थ हैं वे सब द्रव्य कहलाते हैं।
    द्रव्य इस शब्दमें दो अर्थ छिपे हुए हैं—द्रवणशीलता और ध्रुवता । जगत्का प्रत्येक पदार्थ परि-
    णमनशील होकर भी ध्रुव है इसलिए उसे द्रव्य कहते हैं। आशय यह है कि प्रत्येक पदार्थ अपने २५
    गुणों और पर्यायोंका कभी भी उल्लंघन नहीं करता। उसके प्रवाहित होनेकी नियत धारा है
    जिसके आश्रयसे वह प्रवाहित होता रहता है। द्रव्य इस शब्दका उपयोग हमें जैन दर्शनके सिवा
    वैशेषिक दर्शनमें विशेष रूपसे व्यवहृत दिखाई देता है। वैशेषिकदर्शनमें गुण-गुणी, क्रिया-क्रियावान्
    और सामान्य-विशेषमें सर्वथा भेद माना है इसलिए वह द्रव्यत्वके सम्बन्धसे द्रव्य होता है, द्रव्य
    शब्दका ऐसा अर्थ करता है किन्तु उसका यह अर्थ संगत प्रतीत नहीं होता । क्योंकि द्रव्यत्व नाम- ३०
    का कोई स्वतन्त्र पदार्थ अनुभवमें नहीं आता। इस दर्शनने द्रव्यके पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, मन,
    दिशा आदि अनेक भेद किये हैं किन्तु विचार करनेपर पृथिवी, जल, अग्नि और वायुका अन्तर्भाव
    पुद्गलमें हो जाता है। पुद्गलका स्वरूप आगे बतलानेवाले हैं। वहाँ उसे रूप, रस, गन्ध और
    स्पर्शवाला बतलाया है। पृथ्बी जलादि जो पदार्थ पहले कह आये हैं, उन सबमें ये स्पर्शादिक
    उपलब्ध होते हैं यह निर्विवाद है। मनके दो भेद हैं—द्रव्यमन और भावमन । उनमें-से द्रव्यमनका ३५
    अन्तर्भाव पुद्गलमें और भावमनका अन्तर्भाव जीवमें होता है। इसी प्रकार दिशा आकाशसे
    १. -योगकारणत्व-मु० । २. -कार्यत्वदर्श-मु० । ३. दृश्यते न तेषा- आ०, दि० १, दि० २ ।
    ४. तदुत्पत्तेः मु० ।
    CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri