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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 310, कुल 558 में से

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पृष्ठ 310

१९८ सर्वार्थसिद्धौ [ ५।३ § ५३० -
इति । प्रकृता धर्मादयो बहवस्तत्सामानाधिकरण्याद् बहुत्वनिर्देशः । स्यादेतत्संख्यानुवृत्तिवत्पुंल्लि-
ङ्गानुवृत्तिरपि प्राप्नोति । नैष दोषः; आविष्टलिङ्गाः शब्दा न कदाचिल्लिङ्गं व्यभिचरन्ति¹ । अतो
धर्मादयो द्रव्याणि भवन्तीति ।
§ ५३०. अनन्तरत्वाच्चतुर्णामेव द्रव्यव्यपदेशप्रसङ्गेऽध्यारोपणार्थमिदमुच्यते—
जीवाश्च ॥३॥
§ ५३१. 'जीव'शब्दो व्याख्यातार्थः । बहुत्वनिर्देशो व्याख्यातभेदप्रतिपत्त्यर्थः । 'च'²शब्दः
द्रव्यसंज्ञानुकर्षणार्थः जीवाश्च द्रव्याणीति । एवमेतानि वक्ष्यमाणेण कालेन सह षड् द्रव्याणि
भवन्ति । ननु द्रव्यस्य लक्षणं वक्ष्यते 'गुणपर्ययवद् द्रव्यम्' इति । तल्लक्षणयोगाद्धर्मादीनां द्रव्य³-
व्यपदेशो भवति, नार्थः परिगणनेन । परिगणनमवधारणार्थम् । तेनान्यवादिपरिकल्पितानां
पृथिव्यादीनां निवृत्तिः कृता भवति । कथम् । पृथिव्यप्तेजोवायुमनांसि पुद्गलद्रव्येऽन्तर्भवन्ति;
रूपरसगन्धस्पर्शवत्त्वात् । वायुमनसो रूपादिभोगाभाव इति चेत् । न; वायुस्तावद्रूपादिमान्;
स्पर्शवत्त्वाद्धटादिवत् । चक्षुरादिकरणग्राह्यत्वाभावादप्यभाव इति चेत्⁵ । न; परमाण्वादिष्वति-
प्रसङ्गः स्यात् । आपो गन्धवत्यः; स्पर्शवत्त्वात्पृथिवीवत् । तेजोऽपि रसगन्धवद्; रूपवत्त्वात् तद्वदेव ।
परस्पर भेद है। प्रकृत धर्मादिक द्रव्य बहुत हैं इसलिए उनके साथ समानाधिकरण करनेके अभि-
प्रायसे 'द्रव्याणि' इस प्रकार बहुवचनरूप निर्देश किया है। शंका—जिस प्रकार यहां संख्याकी
अनुवृत्ति प्राप्त हुई है उसी प्रकार पुंलिंगकी भी अनुवृत्ति प्राप्त होती है ? समाधान—यह कोई दोष
नहीं है; क्योंकि जिस शब्दका जो लिंग है वह कभी भी अपने लिंगका त्याग करके अन्य लिंगके
द्वारा व्यवहृत नहीं होता। इसलिए 'धर्मादयो द्रव्याणि भवन्ति' ऐसा सम्बन्ध यहां करना चाहिए।
§ ५३०. अव्यवहित होनेके कारण धर्मादिक चारको ही द्रव्य संज्ञा प्राप्त हुई, अतः अन्यका
अध्यारोप करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
जीव भी द्रव्य हैं ॥३॥
§ ५३१. जीव शब्दका व्याख्यान कर आये । सूत्रमें जो बहुवचन दिया है वह जीव द्रव्यके
कहे गये भेदोंके दिखलानेके लिए दिया है। 'च' शब्द द्रव्य संज्ञाके खींचनेके लिए दिया है जिससे
'जीव भी द्रव्य हैं' यह अर्थ फलित हो जाता है। इस प्रकार ये पांच आगे कहे जानेवाले कालके
साथ छह द्रव्य होते हैं। शंका—आगे 'गुणपर्ययवद् द्रव्यम्' इस सूत्र-द्वारा द्रव्यका लक्षण
कहेंगे; अतः लक्षणके सम्बन्धसे धर्मादिकको 'द्रव्य' संज्ञा प्राप्त हो जाती है फिर यहां उनकी अलगसे
गिनती करनेका कोई कारण नहीं है ? समाधान—गिनती निश्चय करनेके लिए की है। इससे
अन्यवादियोंके द्वारा माने गये पृथिवी आदि द्रव्योंका निराकरण हो जाता है। शंका—कैसे ?
समाधान—पृथिवी, जल, अग्नि, वायु और मन इनका पुद्गल द्रव्यमें अन्तर्भाव हो जाता है;
क्योंकि ये रूप, रस, गन्ध और स्पर्शवाले होते हैं। शंका—वायु और मनमें रूपादिक नहीं हैं ?
समाधान—नहीं, क्योंकि वायु रूपादिवाला है, स्पर्शवाला होनेसे, घटके समान। इस अनुमानके
द्वारा वायुमें रूपादिककी सिद्धि होती है। शंका—चक्षु आदि इन्द्रियोंके द्वारा वायुका ग्रहण नहीं
होता, इसलिए उसमें रूपादिकका अभाव है ? समाधान—नहीं; क्योंकि इस प्रकार माननेपर
परमाणु आदिमें अतिप्रसंग दोष आता है। अर्थात् परमाणु आदिको भी चक्षु आदि इन्द्रियां नहीं
ग्रहण करतीं इसलिए उनमें भी रूपादिकका अभाव मानना पड़ेगा। इसी प्रकार जल गन्धवाला
१. -चरन्ति, अनन्तरत्वात् ता०, ना० । २. च शब्दः संज्ञा—मु० । ३. द्रव्यत्वव्यप-मु० । ४. 'पृथिव्याप-
स्तेजोवायुराकाशं कालो दिगात्मा मन इति द्रव्याणि।'—वै० सू० १।१, ५ । ५. –त्त्वाच्चक्षुरिन्द्रियवत् ।
वायु-मु०, ता०, ना० । ६. इति चेत्पर-मु०, आ० दि० १, दि० २।