सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
२६ सर्वार्थसिद्धि
आगे चलकर तो ये मतभेद और भी बढ़े हैं। प्रमाणस्वरूप यहाँ हम तत्त्वार्थसूत्रको उस सटिप्पण
प्रतिके कुछ पाठभेद उपस्थित करते हैं जिनका परिचय श्रीमान् पण्डित जुगुलकिशोरजी मुख्तारने अनेकान्त वर्ष
तीन किरण एकमें दिया है। यह प्रति पण्डितजीके पास श्रीमान् पण्डित नाथूरामजी प्रेमीने भेजी थी।
इस प्रतिके आलोडन करनेसे यह तो साफ जाहिर होता है कि यह किसी श्वेताम्बर आचार्यकी कृति
है, क्योंकि इसमें दिगम्बर आचार्योंको जड़, दुरात्मा और सूत्रवचनचोर इत्यादि शब्दों द्वारा सम्बोधित किया
गया है। इसलिए इस प्रतिमें जो पाठभेद या अधिक सूत्र उपलब्ध होते हैं वे काफी महत्त्व रखते हैं। प्रतिमें
पाये जानेवाले अधिक सूत्र ये हैं—
तैजसमपि ५०, धर्मा वंशा शैलाञ्जनारिष्टा माघव्या माधवीति च २, उच्छ्वासाहारवेदनोपपातानुभाव-
तश्च साध्याः २३, स द्विविधः ४२, सम्यक्त्वं च २१, धर्मास्तिकायाभावात् ७।
तत्त्वार्थभाष्यकार इन्हें सूत्र रूपमें स्वीकार नहीं करते। साथ ही तत्त्वार्थभाष्यके मुख्य टीकाकार
हरिभद्रसूरि और सिद्धसेनगणि भी इन्हें सूत्र नहीं मानते, फिर भी टिप्पणकारने इन्हें सूत्र माना है। यदि हम
इनके सूत्र होने और न होनेके मतभेदकी बातको थोड़ी देरको भुला भी दें तो भी इनके मध्यमें पाया जाने-
वाला 'सम्यक्त्वं च' सूत्र किसी भी अवस्थामें नहीं भुलाया जा सकता। तत्त्वार्थभाष्यमें तो इसका उल्लेख
है ही नहीं, अन्य श्वेताम्बर आचार्योंने भी इसका उल्लेख नहीं किया है, फिर भी टिप्पणकार किसी पुराने
आधारसे इसे सूत्र मानते हैं। इतना ही नहीं वे इसे मूल सूत्रकारकी ही कृति मानकर चलते हैं।
यह तो हुई सूत्रभेदकी चर्चा। अब इसके एक पाठभेदको देखिए। दिगम्बर परम्पराके अनुसार तीसरे
अध्यायमें सात क्षेत्रोंके प्रतिपादक सूत्रके आदिमें 'तत्र' पाठ उपलब्ध नहीं होता किन्तु तत्त्वार्थभाष्यमान्य उक्त
सूत्रके प्रारम्भमें 'तत्र' पद उपलब्ध होता है। फिर भी टिप्पणकार यहाँ तत्त्वार्थभाष्यमान्य पाठको स्वीकार
न कर दिगम्बर परम्परामान्य पाठको स्वीकार करते हैं।
यहाँ देखना यह है कि जब तत्त्वार्थसूत्र और तत्त्वार्थभाष्य एक ही व्यक्तिकी कृति थी और श्वेताम्बर
आचार्य इस तथ्यको भलीभाँति समझते थे तब सूत्रपाठके विषयमें इतना मतभेद क्यों हुआ और खासकर उस
अवस्थामें जब कि तत्त्वार्थभाष्य उस द्वारा स्वीकृत पाठको सुनिश्चित कर देता है। हम तो इस समस्त मत-
भेदको देखते हुए इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि तत्त्वार्थभाष्यमान्य सूत्रपाठ स्वीकृत होनेके पहले श्वेताम्बर
परम्परामान्य सूत्रपाठ निश्चित करनेके लिए छोटे-बड़े अनेक प्रयत्न हुए हैं और वे प्रयत्न पीछे तक भी स्वीकृत
होते रहे हैं। यही कारण है कि वाचक उमास्वाति द्वारा तत्त्वार्थभाष्य लिखकर सूत्रपाठके सुनिश्चित कर देने
पर भी उसे वह मान्यता नहीं मिल सकी जो दिगम्बर परम्परामें सर्वार्थसिद्धि और उस द्वारा स्वीकृत सूत्र
पाठको मिली है।
२. सर्वार्थसिद्धि
नामकी सार्थकता—उपलब्ध साहित्यमें सर्वार्थसिद्धि प्रथम टीका है जो तत्त्वार्थसूत्र पर लिखी गयी
है। प्रत्येक अध्यायके अन्तमें स्वयं आचार्य पूज्यपादने समाप्ति सूचक पुष्पिका¹ दी है। उसमें इसका नाम
सर्वार्थसिद्धि बतलाते हुए इसे वृत्तिग्रन्थ रूपसे स्वीकार किया है। इसकी प्रशंसा में टीकाके अन्तमें वे लिखते हैं-
स्वर्गापवर्गसुखमाप्तुमनोभिरार्यैः जैनेन्द्रशासनवरामृतसारभूता ।
सर्वार्थसिद्धिरिति सद्भिरुपात्तनामा तत्त्वार्थवृत्तिरनिशं मनसा प्रधार्या ॥
जो आर्य स्वर्ग और मोक्षसुखके इच्छुक हैं वे जैनेन्द्र शासन रूपी उत्कृष्ट अमृतमें सारभूत और सज्जन
पुरुषों द्वारा रखे गये सर्वार्थसिद्धि इस नामसे प्रख्यात इस तत्त्वार्थवृत्तिको निरन्तर मनःपूर्वक धारण करें।
१ इति सर्वार्थसिद्धिसंज्ञायां तत्त्वार्थवृत्तौ प्रथमोऽध्यायः समाप्तः ।
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प्रस्तावना २७
वे पुनः लिखते हैं-
तत्त्वार्थवृत्तिमुदितां विदितार्थतत्त्वाः शृण्वन्ति ये परिपठन्ति च धर्मभक्त्या।
हस्ते कृतं परमसिद्धिसुखामृतं तैर्मर्त्यामरेश्वरसुखेषु किमस्ति वाच्यम् ॥
सब पदार्थोंके जानकार जो इस तत्त्वार्थवृत्तिको धर्मभक्तिसे सुनते हैं और पढ़ते हैं मानो उन्होंने परम
सिद्धिसुखरूपी अमृतको अपने हाथमें ही कर लिया है। फिर उन्हें चक्रवर्ती और इन्द्रके सुखके विषयमें तो
कहना ही क्या है ?
'सर्वार्थसिद्धि' इस नामके रखनेका प्रयोजन यह है कि इसके मनन करनेसे सब प्रकारके अर्थोंकी अथवा
सब अर्थोंमें श्रेष्ठ मोक्षसुखकी प्राप्ति होती है। यह कथन अत्युक्तिको लिये हुए भी नहीं है, क्योंकि इसमें
तत्त्वार्थसूत्रके जिस प्रमेयका व्याख्यान किया गया है वह सब पुरुषार्थोंमें प्रधानभूत मोक्ष पुरुषार्थका साधक है।
भारतीय परम्पराने अनेक दर्शनोंको जन्म दिया है। किन्तु उन सबके मूलमें मोक्ष पुरुषार्थकी प्राप्ति
प्रधान लक्ष्य रहा है। महर्षि जैमिनि पूर्वमीमांसादर्शनका प्रारम्भ इस सूत्रसे करते हैं-
'ओं अथातो धर्मजिज्ञासा ॥ १ ॥'
और इसके बाद वे धर्मका स्वरूप निर्देश कर उसके साधनोंका विचार करते हैं।
यही स्थिति व्यास महर्षिकी है। उन्होंने शारीरक मीमांसादर्शनको इस सूत्रसे प्रारम्भ किया है-
'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ॥ १ ॥'
अब न्यायदर्शनके सूत्रोंको देखिए। उसके प्रणेता गौतम महर्षि लिखते हैं कि 'प्रमाण, प्रमेय, संशय,
प्रयोजन, दृष्टान्त, सिद्धान्त, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति और निग्रह-
स्थान इनका तत्त्वज्ञान होनेसे निःश्रेयसकी प्राप्ति होती है ॥ १ ॥' सूत्र इस प्रकार है-
'प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्डाहेत्वाभासच्छलजातिनिग्रह-
स्थानानां तत्त्वज्ञानान्निःश्रेयसाधिगमः ॥ १ ॥'
वैशेषिकदर्शनके प्रणेता महर्षि कणादने भी यह दृष्टि सामने रखी है। वे प्रारम्भमें लिखते हैं -
'अथातो धर्मं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥'
कपिल ऋषिकी स्थिति इससे कुछ भिन्न नहीं है। उन्होंने भी अत्यन्त पुरुषार्थको ही मुख्य माना है।
वे सांख्य दर्शनका प्रारम्भ इन शब्दों द्वारा करते हैं-
'अथ त्रिविधदुःखात्यन्तनिवृत्तिरत्यन्तपुरुषार्थः ॥ १ ॥'
योगदर्शनका प्रारम्भ तो और भी मनोहारी शब्दों द्वारा हुआ है। महर्षि पतञ्जलि कहते हैं- 'अब
योगका अनुशासन करते हैं ॥ १ ॥ योगका अर्थ है चित्तवृत्तिका निरोध ॥ २ ॥ चित्तवृत्तिका निरोध होनेपर
ही द्रष्टाका अपने स्वरूपमें अवस्थान होता है' ॥ ३ ॥ इस विषयके प्रतिपादक उनके सूत्र देखिए-
'अथ योगानुशासनम् ॥ १ ॥ योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः ॥ २ ॥ तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् ॥ ३ ॥'
इन सबके बाद जब हमारी दृष्टि जैन दर्शनके सूत्र ग्रन्थ तत्त्वार्थसूत्र पर जाती है तो हमें वहाँ भी
उसी तत्त्वके दर्शन होते हैं। इसका प्रारम्भ करते हुए आचार्य गृद्धपिच्छ लिखते हैं-
'सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः ॥१॥१'
यह है भारतीय दर्शनोंके प्रणयनका सार। इसलिए पूज्यपाद स्वामीका यह कहना सर्वथा उचित है
कि 'जो मनुष्य धर्मभक्तिसे इस तत्त्वार्थवृत्तिको पढ़ते और सुनते हैं मानो उन्होंने परम सिद्धिसुखरूपी अमृतको
अपने हाथमें ही कर लिया है। फिर चक्रवर्ती और इन्द्रके सुखोंके विषयमें तो कहना ही क्या है।' इससे
इसका 'सर्वार्थसिद्धि' यह नाम सार्थक है।
रचनाशैली-हम कह आये हैं कि सर्वार्थसिद्धि टीका ग्रन्थ है और टीकाकारने इसे 'वृत्ति' कहा है।
जिसमें सूत्रके पदोंका आश्रय लेकर पद घटनाके साथ प्रत्येक पदका विवेचन किया जाता है उसे वृत्ति कहते हैं।
वृत्तिका यह अर्थ सर्वार्थसिद्धिमें अक्षरशः घटित होता है। सूत्रका शायद ही कोई पद हो जिसका इसमें व्याख्यान
नहीं किया गया है। उदाहरणार्थ-तत्त्वार्थसूत्रके अध्याय १ सूत्र २ में केवल 'तत्त्व' या 'अर्थ' पद न रखकर 'तत्त्वार्थ'
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२८ सर्वार्थसिद्धि
पद क्यों रखा है इसका विवेचन दर्शनान्तरोंका निर्देश करते हुए उन्होंने जिस विशदतासे किया है इसीसे
वृत्तिकारकी रचनाशैलीका स्पष्ट आभास मिल जाता है । वे सूत्रगत प्रत्येक पदका साङ्गोपाङ्ग विचार करते
हुए आगे बढ़ते हैं । सूत्रपाठमें जहाँ आगमसे विरोध दिखाई देता है वहाँ वे सूत्रपाठकी यथावत् रक्षा करते
हुए बड़े कौशलसे उसकी सङ्गति बिठलाते हैं । अध्याय ४ सूत्र १९ और सूत्र २२ में उनके इस कौशलके और
भी स्पष्ट दर्शन होते हैं । सूत्र १९ में 'नवग्रैवेयकेषु' न कहकर 'नवसु ग्रैवेयकेषु' कहा है । प्रत्येक आगमा-
भ्यासीसे यह बात छिपी हुई नहीं है कि नौ ग्रैवेयकके सिवा अनुदिश संज्ञक नौ विमान और हैं । किन्तु मूल
सूत्रमें नौ अनुदिशोंका उल्लेख नहीं किया है । आचार्य पूज्यपादसे यह रहस्य छिपा नहीं रहता । वे सूत्रकारकी
मनसाको भाप लेते हैं और 'नव' पदको समसित न रखनेका कारण बतलाते हुए वे स्पष्ट घोषणा करते हैं कि
यहाँ पर नौ अनुदिशोंका ग्रहण करनेके लिए 'नव' पदका पृथक् रूपसे निर्देश किया है । २२ वें सूत्रकी
व्याख्याके समय भी उनके सामने यही समस्या उपस्थित होती है । आगममें दूसरे कल्प तक पीतलेश्याका,
बारहवें कल्पतक पद्मलेश्याका और आगे शुक्ललेश्याका निर्देश किया है। आगमकी इस व्यवस्थाके अनुसार
उक्त सूत्रकी संगति बिठाना बहुत कठिन है । किन्तु वे ऐसे प्रसंग पर जिस साहससे आगम और सूत्रपाठ
दोनोंकी रक्षा करते हैं उसे देखते हुए हमारा मस्तक श्रद्धासे उनके चरणोंमें झुके बिना नहीं रहता ।
पाणिनीय व्याकरण पर पातञ्जल महाभाष्य प्रसिद्ध है । इसमें व्याकरण जैसे नीरस और कठिन
विषयका ऐसो सरस और सरल पद्धतिसे विवेचन किया गया है कि उसे हाथमें लेनेके बाद छोड़नेको जी नहीं
चाहता । यह तो हम आगे चलकर देखेंगे कि सर्वार्थसिद्धिकारने सर्वार्थसिद्धि लिखते समय उसका कितना
उपयोग किया है। यहाँ केवल यही बतलाना है कि इसमें न केवल उसका भरपूर उपयोग हुआ है अपितु उसे
अच्छी तरह पचाकर उसी शैली में इसका निर्माण भी हुआ है । और आश्चर्य यह कि वह व्याकरणका ग्रन्थ
और यह दर्शनका ग्रन्थ फिर भी रचनामें कहीं भी शिथिलता नहीं आने पायी है । सर्वार्थसिद्धिकी रचना
शैलीको हम समतल नदीके गतिशील प्रवाहकी उपमा दे सकते हैं जो स्थिर और प्रशान्त भावसे आगे एक
रूपमें सदा बढ़ता ही रहता है रुकना कहीं वह जानता ही नहीं ।
आचार्य पूज्यपादने इसमें केवल भाषा-सौष्ठवका ही ध्यान नहीं रखा है अपितु आगमिक परम्पराका
भी पूरी तरह निर्वाह किया है । प्रथम अध्यायका सातवाँ और आठवाँ सूत्र इसका प्राञ्जल उदाहरण है । इन
सूत्रों की व्याख्या का आलोडन करते समय उन्होंने सिद्धान्त ग्रन्थों का कितना गहरा अभ्यास किया था इस
बातका सहज ही पता लग जाता है । इस परसे हम यह दृढ़तापूर्वक कहनेका साहस करते हैं कि उन्होंने
सर्वार्थसिद्धि लिखकर जहाँ एक ओर संस्कृत साहित्यकी श्रीवृद्धि की है वहाँ उन्होंने परम्परासे आये हुए
आगमिक साहित्यकी रक्षाका श्रेय भी सम्पादित किया है।
निचोड़ रूपमें सर्वार्थसिद्धिकी रचनाशैलीके विषय में संक्षेपमें यही कहा जा सकता है कि वह ऐसी
प्रसन्न और विषयस्पर्शी शैलीमें लिखी गयी है जिससे वाचक उमास्वातिप्रभृति सभी तत्त्वार्थसूत्रके भाष्यकारों,
वार्तिककारों और टीकाकारोंको उसका अनुसरण करनेके लिए बाध्य होना पड़ा है ।
पाठभेद और अर्थान्तरन्यास—सर्वार्थसिद्धि लिखते समय आचार्य पूज्यपादके सामने तत्त्वार्थ-
सूत्रपर लिखा गया अन्य कोई टीका ग्रन्थ या भाष्यग्रन्थ था इसका तो स्वयं उन्होंने उल्लेख नहीं किया है
किन्तु सर्वार्थसिद्धि परसे इतना अवश्य कहा जा सकता है कि यह लिखते समय उनके सामने एक-दो छोटे-
मोटे टीकाग्रन्थ अवश्य थे और उनमें एक-दो स्थलोंपर महत्त्वपूर्ण पाठभेद भी था । ऐसे पाठभेदोंकी चर्चा
आचार्य पूज्यपादने दो स्थलों पर की है । प्रथम स्थल है प्रथम अध्यायका १६वाँ सूत्र और दूसरा स्थल है
दूसरे अध्यायका ५३वाँ सूत्र ।
१. प्रथम अध्यायका १६वाँ सूत्र इस प्रकार है—
'बहुबहुविधक्षिप्रानिःसृतानुक्तध्रुवाणां सेतराणाम् ॥ १६ ॥'
इसमें क्षिप्रके बाद अनिःसृत पाठ है । किन्तु इस पर आचार्य पूज्यपाद सूचित करते हैं कि 'अपरेषां
क्षिप्रनिःसृत इति पाठः ।' अर्थात् अन्य आचार्योंके मतसे क्षिप्रके बाद अनिःसृतके स्थानपर निःसृत पाठ है ।
प्रस्तावना २९
वर्तमानमें हमारे सामने दिगम्बर और श्वेताम्बर जितने भी तत्त्वार्थसूत्रके टीकाग्रन्थ और सूत्रपाठ
उपस्थित हैं उनमेंसे किसीमें भी यह दूसरा पाठ उपलब्ध नहीं होता, इसलिए यह तो कहा ही नहीं जा सकता
कि इनमेंसे किसी एक टीकाग्रन्थ या सूत्रपाठके आधारसे आचार्य पूज्यपादने इस मतभेदका उल्लेख किया है।
तत्त्वार्थभाष्यकार वाचक उमास्वातिने अवश्य ही सर्वार्थसिद्धिमान्य 'अनिःसृत' पदको स्वीकार न कर उसके
स्थानमें 'अनिश्रित' पाठ स्वीकार किया है। इसलिए यह भी शंका नहीं होती कि आचार्य पूज्यपादके सामने
तत्त्वार्थभाष्य या तत्त्वार्थभाष्यमान्य सूत्रपाठ था और उन्होंने इस पाठान्तर द्वारा उसकी ओर इशारा किया
है। सम्भव यही दिखाई देता है कि सर्वार्थसिद्धि टीका लिखते समय उनके सामने जो टीका-टिप्पणियां उपस्थित
थीं उनमेंसे किन्हींमें यह दूसरा पाठ रहा होगा और उसी आधारसे आचार्य पूज्यपादने उस पाठभेदका यहाँ
उल्लेख किया है। इतना ही नहीं किन्तु किसी टीकाग्रन्थमें उसकी संगति भी बिठलायी गयी होगी। यही
कारण है कि आचार्य पूज्यपाद केवल पाठभेदका उल्लेख करके ही नहीं रह गये। किन्तु इस पाठको स्वीकार
कर लेनेपर उसकी व्याख्या दूसरे आचार्य किस प्रकार करते हैं इस बातका भी उन्होंने 'ते एवं वर्णयन्ति'
इत्यादि वाक्य द्वारा उल्लेख किया है।
२. दूसरे अध्यायका ५३ वाँ सूत्र इस प्रकार है—
'औपपादिकचरमोत्तमदेहासंख्येयवर्षायुषोऽनपवर्त्यायुषः ॥ ५३ ॥'
समें 'चरमोत्तमदेह' पाठ है। इससे यह भ्रम होता है कि क्या चरमशरीरी सभी उत्तम देहवाले
होते हैं या कोई-कोई । यदि सभी उत्तम देहवाले होते हैं तो उत्तम पदके देनेकी क्या आवश्यकता है। और
यदि कोई कोई उत्तम देहवाले होते हैं तो फिर क्या यह माना जाय कि जो चरमशरीरी उत्तम देहवाले होते
हैं केवल वे ही अनपवर्त्य आयुवाले होते हैं अन्य चरमशरीरी नहीं ? बहुत सम्भव है कि इसी दोषका
परिहार करनेके लिए किसीने 'चरमदेह' पाठ स्वीकार किया होगा। यह भी सम्भव है कि आचार्य गृद्धपिच्छने
ही 'चरमदेह' पाठ स्वीकार किया हो। जो कुछ भी हो। पूज्यपाद आचार्यके सामने दोनों पाठ थे और
उन्होंने 'चरमोत्तमदेह' पाठको सूत्रकारका मानकर स्वीकार कर लिया और 'चरमदेह' पाठका पाठान्तरके
रूपमें उल्लेख कर दिया ।
तत्त्वार्थभाष्यमान्य जो सूत्रपाठ इस समय उपलब्ध होता है उसमें 'चरमदेहोत्तमपुरुष' पाठ है। इस
परसे कुछ विद्वान् यह शंका करते हैं कि बहुत सम्भव है कि आचार्य पूज्यपादके सामने तत्त्वार्थभाष्य रहा हो
और उसके आधारसे उन्होंने सर्वार्थसिद्धिमें इस पाठान्तरका उल्लेख किया हो; किन्तु हमें उनके इस कथनमें
कुछ भी तथ्यांश नहीं दिखाई देता। कारण एक तो तत्त्वार्थभाष्यमें 'चरमदेह' पाठ ही नहीं है। उसमें
'चरमदेहोत्तमपुरुष' पाठ अवश्य ही उपलब्ध होता है किन्तु इस पाठके विषयमें भी उसकी स्थिति धुंधली है।
आचार्य सिद्धसेनने अपनी तत्त्वार्थभाष्यकी टीकामें इस प्रसंगको उठाया है और अन्तमें यही कहा है कि
हम नहीं कह सकते कि इस सम्बन्धमें वस्तुस्थिति क्या है।
दूसरे यदि आचार्य पूज्यपादके सामने तत्त्वार्थभाष्यका पाठ उपस्थित होता तो वे 'चरमदेहा¹ इति वा
१. यद्यपि वाचक उमास्वातिने 'औपपातिक' सूत्रके प्रत्येक पदका व्याख्यान करते हुए 'उत्तमपुरुष' पदका
स्वतन्त्र व्याख्यान किया है और बादमें उपसंहार करते हुए उन्होंने 'उत्तमपुरुष पदको छोड़कर शेषको ही
अनपवर्त्य आयुवाले बतलाया है, इसलिए इस परसे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि 'चरमदेहोत्तमपुरुष'
पदके समान केवल 'चरमदेह' पद भी उन्हें स्वयं इष्ट रहा है और बहुत सम्भव है कि आचार्य पूज्यपादने इसी
आधारसे पाठान्तरका सूचन किया हो। किन्तु यहाँ देखना यह है कि वाचक उमास्वातिने स्वयं सूत्रकार होते हुए
भाष्यमें ये दो पाठ किस आधारसे स्वीकार किये हैं। जब उनका यह निश्चय था कि उत्तमपुरुष भी अनपवर्त्य
आयुवाले होते हैं तब उपसंहार करते हुए अन्योंके साथ उनका भी ग्रहण करना था। किन्तु उन्होंने ऐसा नहीं
किया। इससे स्पष्ट विदित होता है कि वाचक उमास्वातिको भी दो पाठ उपलब्ध हुए होंगे और उन्होंने क्रमसे
दोनोंका व्याख्यान करना उचित समझा होगा। इस आधारसे वे सूत्रकार तो किसी हालतमें हो ही नहीं सकते।
३० सर्वार्थसिद्धि
पाठः' के स्थानमें 'चरमदेहोत्तमपुरुषा इति वा पाठः' ऐसा उल्लेख करते, क्योंकि उन्हें 'चरमोत्तमदेह' इस
पाठके स्थानमें दूसरा पाठ क्या उपलब्ध होता है इसका निर्णय करना था । ऐसी अवस्थामें अधूरे पाठान्तरका
भूल कर भी वे उल्लेख नहीं करते ।
स्पष्ट है कि 'क्षिप्रनिःसृत' के समान यह पाठान्तर भी आचार्य पूज्यपादको दूसरे टीका ग्रन्थोंमें उप-
लब्ध हुआ होगा और उसी आधारसे उन्होंने यहाँ उसका उल्लेख किया है ।
३. अर्थान्तरन्यासका एक उदाहरण हम रचना शैलीके प्रसंगसे अध्याय ४ सूत्र २२ का उल्लेख करते
समय दे आये हैं। वहाँ हमने यह संकेत किया ही है कि उक्त सूत्रमें पूरे आगमिक अर्थकी संगति बैठती न
देख आचार्य पूज्यपादने सूत्र और आगम दोनोंका सुन्दरता पूर्वक निर्वाह किया है। यह प्रथम अर्थान्तरन्यासका
उदाहरण है।
४. द्वितीय उदाहरण स्वरूप हम ९वें अध्यायका ११ वाँ सूत्र उपस्थित करते हैं। इसमें वेदनीय
निमित्तक ११ परीषह जिनके कही गयी हैं। इस विषयको अधिक स्पष्ट करनेके लिए हम थोड़ी विस्तारके
साथ चर्चा करना इष्ट मानेंगे ।
परीषहोंका विचार छठवें गुणस्थानसे किया जाता है, क्योंकि श्रामण्य पदका प्रारम्भ यहींसे होता है,
अतः इस गुणस्थानमें सब परीषह होते हैं यह तो ठीक ही है, क्योंकि इस गुणस्थानमें प्रमादका सद्भाव रहता
है और प्रमादके सद्भावमें क्षुधादिजन्य विकल्प और उसके परिहारके लिए चित्तवृत्तिको उस ओरसे हटाकर
धर्म्यध्यानमें लगानेके लिए प्रयत्नशील होना यह दोनों कार्य बन जाते हैं। तथा सातवें गुणस्थानकी स्थिति
प्रमाद रहित होकर भी इससे भिन्न नहीं है, क्योंकि इन दोनों गुणस्थानोंमें प्रमाद और अप्रमादजन्य ही भेद
है। यद्यपि विकल्प और तदनुकूल प्रवृत्तिका नाम छठा गुणस्थान है और उसके निरोधका नाम सातवाँ
गुणस्थान है। तथापि इन दोनों गुणस्थानोंकी धारा इतनी अधिक चढ़ा-उतारकी है जिससे उनमें परीषह और
उनके जय आदि कार्योंका ठीक तरहसे विभाजन न होकर ये कार्य मिलकर दोनोंके मानने पड़ते हैं। छठे
गुणस्थान तक वेदनीयकी उदीरणा होती है आगे नहीं, इसलिए यह कहा जा सकता है कि वेदनीयके निमित्तसे
जो क्षुधादिजन्य वेदनकार्य छठे गुणस्थानमें होता है वह आगे कथमपि सम्भव नहीं । विचारकर देखने पर
बात तो ऐसी ही प्रतीत होती है और है भी वह वैसी ही, क्योंकि अप्रमत्तसंयत आदि गुणस्थानोंमें जब जीवकी
न तो बाह्यप्रवृत्ति होती है और न बाह्यप्रवृत्तिके अनुकूल परिणाम ही होते हैं तब वहाँ क्षुधादि परीषहोंका
सद्भाव मानना कहाँतक उचित है यह विचारणीय हो जाता है। इसलिए यहाँ यह देखना है कि आगेके
गुणस्थानोंमें इन परीषहोंका सद्भाव किस दृष्टिसे माना गया है।
किसी भी पदार्थका विचार दो दृष्टियोंसे किया जाता है—एक तो कार्यकी दृष्टिसे और दूसरे कारणकी
दृष्टिसे । परीषहोंका कार्य क्या है और उनके कारण क्या हैं इस विषयका साङ्गोपाङ्ग ऊहापोह शास्त्रोंमें
किया है। परीषह तथा उनके जयका अर्थ है—बाधाके कारण उपस्थित होनेपर उनमें जाते हुए अपने चित्तको
रोकना तथा स्वाध्याय ध्यान आदि आवश्यक कार्योंमें लगे रहना । परीषह और उनके जयके इस स्वरूपको
ध्यानमें रखकर विचार करने पर ज्ञात होता है कि एक प्रमत्तसंयत गुणस्थान ही ऐसा है जिसमें बाधाके कारण
उपस्थित होनेपर उनमें चित्त जाता है और उनसे चित्तवृत्तिको रोकनेके लिए यह जीव उद्यमशील होता है।
किन्तु आगेके गुणस्थानोंकी स्थिति इससे भिन्न है। वहाँ बाह्य कारणोंके रहनेपर भी उनमें चित्तवृत्तिका रंच-
मात्र भी प्रवेश नहीं होता। इतना ही नहीं, कुछ आगे चलकर तो यह स्थिति उत्पन्न हो जाती है कि जहाँ न
तो बाह्य कारण ही उपस्थित होते हैं और न चित्तवृत्ति ही शेष रहती है। इसलिए इन गुणस्थानोंमें केवल
अन्तरंग कारणोंको ध्यानमें रखकर ही परीषहोंका निर्देश किया गया है। कारण भी दो प्रकारके होते हैं—एक
बाह्य कारण और दूसरे अन्तरङ्ग कारण । बाह्य कारणोंके उपस्थित होनेका तो कोई नियम नहीं है। किन्हींको
उनकी प्राप्ति सम्भव भी है और किन्हींको नहीं भी । परन्तु अन्तरङ्ग कारण सबके पाये जाते हैं । यही कारण
है कि दिगम्बर और श्वेताम्बर दोनों परम्पराओंके ग्रन्थोंमें परीषहोंके कारणोंका विचार करते समय मुख्यरूपसे
प्रस्तावना ३१
अन्तरङ्ग कारणोंका ही निर्देश किया है । इसीसे तत्त्वार्थसूत्रमें वे अन्तरंग कारण ज्ञानावरण, वेदनीय, दर्शन-
मोहनीय, चारित्रमोहनीय और अन्तरायके उदयरूप कहे हैं, अन्यरूप नहीं ।
कुल परीषह २२ हैं । इनमेंसे प्रज्ञा और अज्ञान परीषह ज्ञानावरणके उदयमें होते हैं । ज्ञानावरणका
उदय क्षीणमोह गुणस्थान तक होता है, इसलिए इनका सद्भाव क्षीणमोह गुणस्थान तक कहा है । किन्तु
इसका यह अभिप्राय नहीं कि प्रज्ञा और अज्ञानके निमित्तसे जैसा विकल्प प्रमत्तसंयत जीवके हो सकता है
वैसा वह अप्रमत्तसंयत आदि गुणस्थानोंमें भी होता है । आगेके गुणस्थानोंमें इस प्रकारके विकल्पके न होनेपर
भी वहाँ केवल ज्ञानावरणका उदय पाया जाता है, इसलिए वहाँ इन परीषहोंका सद्भाव कहा है ।
अदर्शनपरीषह दर्शनमोहनीयके उदयमें और अलाभ परीषह अन्तरायके उदयमें होते हैं। यह बात किसी
भी कर्मशास्त्रके अभ्यासीसे छिपी हुई नहीं है कि दर्शनमोहनीयका उदय अधिकसे अधिक अप्रमत्तसंयत गुण-
स्थान तक ही होता है, इसलिए अदर्शन परीषहका सद्भाव अधिकसे अधिक इसी गुणस्थान तक कहा जा
सकता है और अन्तरायका उदय क्षीणमोह गुणस्थान तक होता है, इसलिए अलाभ परीषहका सद्भाव वहाँ तक
कहा है । किन्तु कार्यरूपमें ये दोनों परीषह भी प्रमत्तसंयत गुणस्थान तक ही जानने चाहिए । आगे इनका
सद्भाव दर्शनमोहनीयके उदय और अन्तरायके उदयकी अपेक्षा ही कहा है ।
प्रसङ्गसे यहाँ इस बातका विचार कर लेना भी इष्ट है कि तत्त्वार्थसूत्रकार आचार्य गृद्धपिच्छ बादर-
साम्पराय जीवके सब परीषहोंका सद्भाव बतलाते हुए उन्हें बादरायसाम्पराय शब्दका अर्थ क्या अभिप्रेत रहा
होगा । हम यह तो लिख ही चुके हैं कि दर्शनमोहनीयका उदय अप्रमत्तसंयतगुणस्थान तक ही होता है,
इसलिए अदर्शनपरीषहका सद्भाव अप्रमत्तसंयत गुणस्थानसे आगे कथमपि नहीं माना जा सकता । ऐसी
अवस्थामें बादरसाम्पराय का अर्थ स्थूल कषाय युक्त जीव ही हो सकता है । यही कारण है कि सर्वार्थसिद्धिमें
इस पदकी व्याख्या करते हुए यह कहा है कि 'यह गुणस्थान विशेषका ग्रहण नहीं है । तो क्या है ? सार्थक
निर्देश है । इससे प्रमत्त आदि संयतोंका ग्रहण होता है' ।¹
किन्तु तत्त्वार्थभाष्यमें 'बादरसाम्पराये सर्वे ।' इस सूत्रकी व्याख्या इन शब्दोंमें की है—'बादरसाम्प-
रायसंयते सर्वे द्वाविंशतिरपि परीषहाः सम्भवन्ति ।' अर्थात् बादरसाम्पराय संयतके सब अर्थात् बाईस परीषह
ही सम्भव हैं । तत्त्वार्थभाष्यके मुख्य व्याख्याकार सिद्धसेनगणि हैं । वे तत्त्वार्थभाष्यके उक्त शब्दोंकी व्याख्या
इन शब्दोंमें करते हैं—
'बादरः स्थूलः साम्परायः कषायस्तदुदयो यस्यासौ बादरसाम्परायः संयतः । स च मोहप्रकृतोः
कश्चिदुषशमयतीत्युपशमकः । कश्चित् क्षपयतीति क्षपकः । तत्र सर्वेषां द्वाविंशतेरपि क्षुदादीनां परीषहाणाम-
दर्शनान्तानां सम्भवः ।'
जिसके कषाय स्थूल होता है वह बादरसाम्पराय संयत कहलाता है । उनमेंसे कोई मोहनीयका
उपशम करता है इसलिए उपशमक कहलाता है और कोई क्षय करता है इसलिए क्षपक कहलाता है । इसके
सभी बाईस क्षुधा आदि परीषहोंका सद्भाव सम्भव है ।
इस व्याख्यानसे स्पष्ट है कि सिद्धसेनगणिके अभिप्रायसे तत्त्वार्थभाष्यकार वाचक उमास्वातिको यहाँ
'बादरसाम्पराय' पदसे नौवां गुणस्थान ही इष्ट है । प्रज्ञाचक्षु पं० सुखलालजीने तत्त्वार्थसूत्रकी व्याख्यामें यही
अर्थ स्वीकार किया है । वे लिखते हैं—'जिसमें साम्पराय-कषायका बादर अर्थात् विशेषरूपमें सम्भव हो
ऐसे बादरसाम्पराय नामक नौवें गुणस्थानमें बाईस परीषह होते हैं । इसका कारण यह है कि परीषहोंके
कारणभूत सभी कर्म वहाँ होते हैं ।'
'बादरसाम्पराय' पदकी ये दो व्याख्याएँ हैं जो क्रमशः सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थभाष्यमें उपलब्ध
होती हैं । सर्वार्थसिद्धिकी व्याख्याके अनुसार 'बादरसाम्पराय पद गुणस्थान-विशेषाका सूचक न होकर अर्थ-
१. नेदं गुणस्थानविशेषग्रहणम् । किं तर्हि ? अर्थनिर्देशः । तेन प्रमत्तादीनां संयतादीनां ग्रहणम् । स०,
अ० ९, सू० १२ ।
३२ सर्वार्थसिद्धि
परक निर्देश होनेसे दर्शनमोहनीयके उदयमें अदर्शन परीषह होता है इस अर्थकी सङ्गति बैठ जाती है। किन्तु
तत्त्वार्थभाष्यकी व्याख्याको स्वीकार करने पर एक नयी अड़चन उठ खड़ी होती है। दर्शनमोहनीयका सत्त्व
उपशान्तमोह गुणस्थान तक रहता है, इसलिए यह कहा जा सकता है कि उन्होंने दर्शनमोहनीयके सत्त्वकी
अपेक्षा बादरसाम्पराय नामक नौवें गुणस्थान तक अदर्शन परीषह कहा होगा। किन्तु इस मतको स्वीकार
करने पर दो नयी आपत्तियां और सामने आती हैं। प्रथम तो यह कि यदि उन्होंने दर्शनमोहनीयके सत्त्वकी
अपेक्षा अदर्शन परीषहका सद्भाव स्वीकार किया है तो उसका सद्भाव ग्यारहवें गुणस्थान तक कहना चाहिए।
दूसरी यह कि वे 'क्षुत्पिपासा शीतोष्ण-' इत्यादि सूत्रकी व्याख्या करते हुए वह कहते हैं कि 'पञ्चानामपि
कर्मप्रकृतीनामुदयादेते परीषहाः प्रादुर्भवन्ति ।' अर्थात् पांच कर्मप्रकृतियोंके उदयसे परीषह उत्पन्न होते हैं।
सो पूर्वोक्त अर्थके स्वीकार करने पर इस कथनकी सङ्गति नहीं बैठती दिखलाई देती। क्योंकि एक ओर तो
दर्शनमोहनीयके सत्त्वकी अपेक्षा अदर्शन परीषहको नौवें गुणस्थान तक स्वीकार करना और दूसरी ओर सब
परीषहोंको पांच कर्मोंके उदयका कार्य कहना ये परस्पर विरोधी दोनों कथन कहां तक युक्तियुक्त हैं यह
विचारणीय हो जाता है। स्पष्ट है कि सिद्धसेन गणिकी टीकाके अनुसार तत्त्वार्थभाष्यका कथन न केवल
स्खलित है अपितु वह मूल सूत्रकारके अभिप्रायके प्रतिकूल भी है, क्योंकि मूल सूत्रकारने इन परीषहोंका
सद्भाव कर्मोंके उदयकी मुख्यतासे ही स्वीकार किया है। अन्यथा वे अदर्शन परीषहका सद्भाव और
चारित्रमोहके निमित्तसे होनेवाले नग्न्य आदि परीषहोंका सद्भाव उपशान्तमोह नामक ग्यारहवें गुणस्थान
तक अवश्य कहते ।
नग्न्य, अरति, स्त्री, निषद्या, आक्रोश, याचना और सत्कार-पुरस्कार ये सात परीषह चारित्रमोह-
नीयके उदयमें होते हैं। सामान्यतः चारित्रमोहनीयका उदय यद्यपि सूक्ष्मसाम्परायिक नामक दसवें गुणस्थान
तक होता है इसलिए इन सात परीषहोंका सद्भाव दसवें गुणस्थान तक कहना चाहिए था ऐसी शंका की जा
सकती है परन्तु इनका दसवें गुणस्थान तक सद्भाव न बतलानेके दो कारण हैं। प्रथम तो यह कि चारित्र-
मोहनीयके अवान्तरभेद क्रोध, मान और मायाका तथा नौ नोकषायोंका उदय नौवें गुणस्थानके अमुक भाग तक
ही होता है, इसलिए इन परीषहोंका सद्भाव नौवें गुणस्थान तक कहा है। दूसरा यह कि दसवें गुणस्थानमें
यद्यपि चारित्रमोहनीयका उदय होता है अवश्य पर एक लोभ कषायका ही उदय होता है और वह भी अति-
सूक्ष्म, इसलिए इनका सद्भाव दसवें गुणस्थान तक न कहकर मात्र नौवें गुणस्थान तक कहा है।
तथा क्षुधा, पिपासा, शीत, उष्ण, दंशमशक, चर्या, शय्या, वध, रोग, तृणस्पर्श और मल ये ग्यारह
परीषह वेदनीय कर्मके उदयमें होते हैं। वेदनीय कर्मका उदय जिनके भी होता है, इसलिए, इनका सद्भाव
वहाँ तक कहा है।
इस प्रकार अप्रमत्तसंयत आदि गुणस्थानोंमें सूत्रकारने जो परीषहोंका सद्भाव कहा है उसमें उनकी
दृष्टि कारणको ध्यानमें रखकर विवेचन करनेकी ही रही है और इसीलिए सर्वार्थसिद्धिकार आचार्य पूज्य-
पादने पहले सूत्रकारकी दृष्टि से 'एकादश जिने' इस सूत्रका व्याख्यान किया है। अनन्तर जब उन्होंने देखा कि
कुछ अन्य विद्वान् अन्य साधारण मनुष्योंके समान केवलीके कारणपरक परीषहोंके उल्लेखका विपर्यास करके
भूख-प्यास आदि बाधाओंका ही प्रतिपादन करने लगे हैं तो उन्होंने यह बतलानेके लिए कि केवलीके कार्य-
रूपमें ग्यारह परीषह नहीं होते 'न सन्ति' पदका अध्याहार कर उस सूत्रसे दूसरा अर्थ फलित किया है।
इसमें न तो उनकी साम्प्रदायिक दृष्टि रही है और न ही उन्होंने तोड़-मरोड़कर उसका अर्थ किया है। साम्प्र-
दायिक दृष्टि तो उनकी है जो उसे इस दृष्टिकोणसे देखते हैं। आचार्योंमें मतभेद हुए हैं और हैं पर सब मत-
भेदोंको साम्प्रदायिक दृष्टिका सेहरा बांधना कहाँ तक उचित है यह समझने और अनुभव करनेकी बात है।
आचार्य पूज्यपाद यदि साम्प्रदायिक दृष्टिकोणके होते तो वे ऐसा प्रयत्न न कर सूत्रका ही कायाकल्प कर
सकते थे। किन्तु उन्होंने अपनी स्थितिको बिल्कुल स्पष्ट रखा है। तत्त्वतः देखा जाय तो एक मात्र यही
उदाहरण उनकी साहित्यिक प्रामाणिकताकी कसौटी बन सकता है। यह अर्थान्तरन्यासका दूसरा उदाहरण
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प्रस्तावना ३३
हैं। इसके सिवा अर्थान्तरन्यासके एक दो उदाहरण और भी उपस्थित किये जा सकते हैं पर विशेष प्रयोजन
न होनेसे उनका यहाँ हमने निर्देश नहीं किया है।
इस प्रकार इन चार उदाहरणोंसे इस बातका सहज ही पता लग जाता है कि आचार्य पूज्यपादने
मूल सूत्रपाठ और पाठान्तरोंकी रक्षाका कितना अधिक ख्याल रखा है।
सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थभाष्य- ऐसा होते हुए भी आचार्य पूज्यपादके ऊपर यह आक्षेप$^१$ किया
जाता है कि उन्होंने उन्हें उपलब्ध हुए सूत्रपाठमें सुधार और वृद्धि कर सर्वार्थसिद्धिकी रचना की है। सर्वार्थ-
सिद्धि किस कालकी रचना है और तत्त्वार्थभाष्य किस कालका यह तो हम आगे चलकर देखेंगे। यहाँ केवल
तुलनात्मक दृष्टिसे इन दोनोंके अन्तःस्वरूपका पर्यालोचन करना है।
सूत्रपाठ- सर्व प्रथम हम सूत्रपाठको लेते हैं। सर्वार्थसिद्धिमान्य सूत्रपाठसे तत्त्वार्थभाष्यमान्य सूत्रपाठमें
शब्दोंके हेरफेरसे या सूत्रोंके घटाने-बढ़ानेसे छोटे-मोटे अन्तर$^२$ तो पर्याप्त हुए हैं किन्तु उन सबका ऊहापोह यहाँ
नहीं करना है। जिनमें मौलिक अन्तर हुआ है ऐसे सूत्र तीन हैं। प्रथम स्वर्गोंकी संख्या का प्रतिपादक सूत्र,
दूसरा सानत्कुमार आदिमें प्रवीचारका प्रतिपादक सूत्र और तीसरा कालको स्वतन्त्र द्रव्य माननेवाला सूत्र ।
स्वर्गोंके प्रतिपादक सूत्रमें मौलिक अन्तर यह हुआ है कि सर्वार्थसिद्धिमान्य सूत्रपाठमें १६ कल्पोंकी परि-
गणना की गयी है और तत्त्वार्थभाष्यमान्य सूत्रपाठमें १२ कल्पोंकी परिगणना की गयी है। इस पर आक्षेप
यह किया जाता है कि 'जब सर्वार्थसिद्धिमान्य सूत्रपाठमें कल्पोपपन्न देवोंके भेद$^३$ बारह बतलाये हैं और नामों-
की परिगणना करते समय वे सोलह परिगणित किये गये हैं तब यह माननेके लिए पर्याप्त आधार हो जाता
है कि या तो आचार्य पूज्यपादने या इनके पूर्ववर्ती अन्य किसी आचार्यने इस सूत्रमें घटा-बढ़ाकर उसे वर्तमान
रूप दिया है जब कि तत्त्वार्थभाष्यमान्य सूत्रपाठकी स्थिति इससे सर्वथा भिन्न है। इसलिए बहुत सम्भव है कि
तत्त्वार्थभाष्यमान्य सूत्रपाठ मूल हो और उसमें सुधार कर उत्तरकालमें सर्वार्थसिद्धिमान्य सूत्रपाठ निर्मित
हुआ हो$^४$।'
यहाँ सर्वप्रथम यह विचार करना है कि क्या उक्त सूत्रके आधारसे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है
कि तत्त्वार्थभाष्यमान्य सूत्रपाठ मूल है और उसे सुधार कर या बढ़ाकर सर्वार्थसिद्धिमान्य सूत्रपाठ निर्मित हुआ
है। यह तो स्पष्ट है कि किसी एक पाठमें परिवर्तन किया गया हैं पर वह परिवर्तन किस पाठमें किया जाना
सम्भव है यही विचारणीय है। जैसा कि हम देखते हैं कि दिगम्बर परम्पराके अनुसार सर्वत्र कल्पोपपन्न देवोंके
भेद बारह और कल्प सोलह गिनाये गये हैं। कल्प कल्पोपपन्न देवोंके आवासस्थानकी विशेष संज्ञा है। यदि कल्पो-
पपन्न देव बारह प्रकारके होकर भी उनके आवासस्थान सोलह प्रकारके माने गये हैं तो इसमें बाधाको कौन सी
बात है। और इस आधारसे वह कैसे कहा जा सकता है कि सर्वार्थसिद्धिमान्य सूत्रपाठमें सुधार किया गया है।
यदि सुधार करना ही इष्ट होता तो अध्याय ४ सूत्र तीनमें भी 'बारह' के स्थानमें 'सोलह' किया जा सकता
था। प्रत्युत इसपरसे तो यही कहा जा सकता है कि पूज्यपाद स्वामीको जैसा पाठ मिला एकमात्र उसीकी
उन्होंने यथावत् रक्षा की है। दूसरी ओर जब हम तत्त्वार्थभाष्यमान्य पाठकी ओर ध्यान देते हैं तब भी इस
सूत्रके आधारसे किसी निष्कर्ष पर पहुँचना सम्भव प्रतीत नहीं होता। कारण कि वहाँ भी इस सूत्रमें घटा
बढ़ीका ऐसा प्रबल कारण नहीं मिलता जिससे यह कहा जा सके कि उक्त सूत्रमें परिवर्तन किया गया है।
दोनों ही परम्पराओंके आचार्य अपनी-अपनी परम्पराकी मान्यतापर दृढ़ हैं इसलिए इस आधारसे यही कहा
जा सकता है कि जिसने उत्तरकालमें रचना की होगी उसीके द्वारा सूत्रोंमें सुधार करना सम्भव है।
दूसरी सानत्कुमार आदिमें प्रविचारका प्रतिपादक सूत्र है। दोनोंमें इस सूत्रकी स्थिति इस प्रकार है।
१. देखो पं० सुखलालजीके तत्त्वार्थसूत्रकी भूमिका पृ० ८४, ८५ । २. देखो दो सूत्रपाठ प्रकरण, परि-
शिष्ट १ और उसके टिप्पण । ३. देखो अ० ३ सू० २। ४. इस आक्षेपके लिए देखो पं० सुखलालजीका
तत्त्वार्थसूत्र प्रस्तावना ७३ से ८९ ।
५
३४ सर्वार्थसिद्धि
शेषाः स्पर्श्वरूपशब्दमनःप्रवीचाराः । सर्वा० ।
शेषाः स्पर्श्वरूपशब्दमनःप्रवीचाराः द्वयोर्द्वयोः । त० भा० ।
हम देखते हैं कि तत्त्वार्थभाष्यके अनुसार इस सूत्रमें 'द्वयोर्द्वयोः' इतना पद अधिक है जब कि सर्वार्थ-
सिद्धिमें इसका सर्वथा अभाव है । इसके पहले दोनों ही परम्पराओंमें 'कायप्रवीचाराः आ ऐशानात्' यह सूत्र
आता है । इस द्वारा सौधर्म और ऐशान कल्प तक प्रवीचारका विधान किया गया है । आगे सर्वार्थसिद्धिके
अनुसार चौदह और तत्त्वार्थभाष्यके अनुसार दस कल्प शेष रहते हैं जिनमें यह सूत्र प्रवीचारका विधान करता
है । प्रकृतमें देखना यह है कि सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थभाष्य इन दोनोंमें इसकी संगति किस प्रकार बिठलायी
गयी है । यह तो स्पष्ट है कि सर्वार्थसिद्धिमें 'द्वयोर्द्वयोः' पद न होनेसे आचार्य पूज्यपादको इसकी व्याख्या
करनेमें कोई कठिनाई नहीं गयी । उन्होंने तो आर्षके अनुसार इसकी व्याख्या करके छुट्टी पा ली । किन्तु
तत्त्वार्थभाष्यकारकी स्थिति इससे सर्वथा भिन्न है । उनके सामने 'द्वयोर्द्वयोः' पदके कारण इसकी व्याख्या करते
समय यह समस्या रही है कि प्रवीचारके विषय चार और कल्प दस होनेसे इसकी संगति कैसे बिठलायी जाय ।
फलस्वरूप उन्हें अन्तके चार कल्पोंको दो मानकर इस सूत्रकी व्याख्या करनेके लिए बाध्य होना पड़ा है ।
उन्होंने किसी प्रकार व्याख्या करनेका तो प्रयत्न किया पर इससे जो असंगति उत्पन्न होती है वह कथमपि दूर
नहीं की जा सकी है । इससे मालूम पड़ता है कि या तो तत्त्वार्थभाष्यकार को 'द्वयोर्द्वयोः' पदके साथ सूत्रपाठ
मिला है या फिर स्वयं उन्होंने तत्त्वार्थभाष्यके आश्रयसे इस सूत्रको स्पष्ट करनेकी मनसासे सूत्रमें यह पद
बढ़ाया है । यहाँ उत्तर विकल्पकी अधिक सम्भावना है । हमें ऐसे एक दो स्थल और मिले हैं जिनमें तत्त्वार्थ-
भाष्यके आश्रयसे सूत्रोंको संगति बिठलायी गयी है । उदाहरण स्वरूप 'यथोक्तनिमित्तः' पद लीजिए । यह
प्रथम अध्यायके २२वें सूत्रमें आया है । इसके पहले एक सूत्रके अन्तरसे वे 'द्विविधोऽवधिः' सूत्र कह आये
हैं और इन भेदोंका स्पष्टीकरण इस सूत्रके भाष्यमें किया है । प्रकृतमें 'यथोक्तनिमित्तः' पदमें आये हुए
'यथोक्त' पद द्वारा उनका संकेत इसी भाष्यकी ओर है । वे इस पद द्वारा कहना चाहते हैं कि दूसरे जिस
निमित्तका संकेत हमने 'द्विविधोऽवधिः' सूत्रके भाष्यमें किया है उस निमित्तसे शेष जीवोंके छह प्रकार का
अवधिज्ञान होता है । किन्तु उस अवस्था में जब कि सूत्र रचना पहले हो चुकी थी और भाष्य बादमें लिखा
गया है भाष्यकारकी स्थिति सन्देहजनक हो जाती है । और मानना पड़ता है कि तत्त्वार्थभाष्यकार वाचक
उमास्वातिने प्राचीन सूत्रपाठमें सुधार करनेका प्रयत्न किया है ।
तीसरा कालके अस्तित्वको स्वीकार करनेवाला सूत्र है । यह सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थभाष्यमें इस
प्रकार उल्लिखित है—
कालश्च । सर्वा० ।
कालश्चेत्येके । त० भा० ।
इस द्वारा कालको द्रव्यरूपसे स्वीकार किया गया है । किन्तु तत्त्वार्थभाष्यकार ऐसा करते हुए भी अन्य
आचार्योंके मतसे कालको द्रव्यरूपसे स्वीकार करते हैं स्वयं नहीं । यही कारण है कि उन्होंने तत्त्वार्थभाष्यमें
जहाँ जहाँ द्रव्योंका उल्लेख किया है वहाँ वहाँ पाँच अस्तिकायोंका¹ ही उल्लेख किया है और लोकको
पाँच अस्तिकायात्मक बतलाया है । श्वेताम्बर आगम साहित्यमें छह द्रव्योंका निर्देश किया है अवश्य और एक
स्थानपर तो तत्त्वार्थभाष्यकार भी छह द्रव्योंका² उल्लेख करते हैं परन्तु इससे वे कालको द्रव्य मानते ही हैं
यह नहीं कहा जा सकता । कारण यह है कि श्वेताम्बर आगम साहित्यमें जहाँ भी छह द्रव्योंका नामनिर्देश
किया है वहाँ कालद्रव्यके लिए 'अद्धासमय' शब्द प्रयुक्त हुआ है 'काल' शब्द नहीं और अद्धासमय शब्दका
अर्थ वहाँ पर्याय ही लिया गया है प्रदेशात्मक द्रव्य नहीं । तत्त्वार्थभाष्यकारने भी इसी परिपाटीका निर्वाह किया
१. सर्वं पञ्चत्वमस्तिकायावरोधात् । अ० १, सू० ३५ । पञ्चास्तिकायो लोकः । अ० ३, सू० ६ । पञ्चास्ति-
कायात्मकम् । अ० ९, सू० ७ । २. षट्त्वं षड्द्रव्यावरोधात् । अ० १, सू० ३५ ।
प्रस्तावना ३५
है। उन्होंने तत्त्वार्थसूत्रके जिन सूत्रोंमें 'काल' शब्द आया है वहाँ तो उनकी व्याख्या करते हुए 'काल' शब्दका
ही उपयोग किया है किन्तु जिन सूत्रोंमें 'काल' शब्द नहीं आया है और वहाँ 'काल'का उल्लेख करना उन्होंने
आवश्यक समझा तो 'काल' शब्दका प्रयोग न कर 'अद्धासमय'¹ 'शब्दका ही प्रयोग किया है।
तत्त्वार्थभाष्य और उस मान्य सूत्रपाठकी ये दो स्थितियाँ हैं जो हमें इस निष्कर्षपर पहुँचानेमें सहा-
यता करती हैं कि प्रारम्भमें तो 'कालश्च' इस प्रकारके सूत्रका ही निर्माण हुआ होगा किन्तु बादमें वह बदल-
कर 'कालश्चेत्येके' यह रूप ले लेता है।
यहाँ प्रसंगसे सूत्र रचनाकी शैलीके विषयमें भी दो शब्द कहने हैं। सर्वार्थसिद्धिमान्य सूत्रपाठको देखते
हुए तो यह कहा जा सकता है कि परिशेषन्यायसे उसमें कोई भी बात नहीं कही गयी है। वह सीधी सूत्र और
उनके पदोंकी व्याख्या करते हुए आगे बढ़ती है। इसके विपरीत दूसरी ओर जब हम तत्त्वार्थभाष्यको देखते
हैं तो उसमें हमें कोई एक निश्चित शैलीके दर्शन नहीं होते हैं। कहीं वे परिशेषन्यायको स्वीकार करते हैं और
कहीं नहीं। जैसे 'शेषाणां संमूर्छनम्' और 'अशुभः पापस्य' ये दो सूत्र परिशेषन्यायसे नहीं कहे जाने चाहिए
थे फिर भी उन्होंने इनको स्वतन्त्र सूत्र मान लिया है और 'शेषास्त्रिवेदाः' तथा 'अतोऽन्यत्पापम्' इनको छोड़
दिया। ऐसी अवस्थामें यह कहना कि आचार्य पूज्यपादने तत्त्वार्थभाष्यको देखकर इन्हें स्वतन्त्र सूत्रोंका रूप
दिया है युक्तियुक्त प्रतीत नहीं होता। वस्तुतः तत्त्वार्थभाष्यकार अपनेको ऐसी स्थितिमें नहीं रख सके हैं जिससे
उनके विषयमें कोई निश्चित रेखा खींची जा सके। एक दूसरे अध्याय के शरीर प्रकरणको ही लीजिए। उसमें
वैक्रियिक शरीरकी उत्पत्तिके दोनों प्रकार तो सूत्रोंमें दिखा दिये किन्तु जब तैजस शरीरका प्रसंग आया तो
उसकी उत्पत्तिके प्रकारको सूत्रमें दिखलाना उन्होंने आवश्यक नहीं समझा। क्या इस प्रकरणको देखते हुए यह
कहा जा सकता है कि यह असंगति मूलसूत्रकारको रुचिकर प्रतीत रही होगी। तत्त्वार्थभाष्यके अन्य सूत्रोंमें
भी ऐसी असंगतियाँ दीख पड़ती हैं। चौथे अध्यायमें लौकान्तिक देवोंका प्रतिपादक सूत्र आता है। उसमें
लौकान्तिक देवोंके भेदोंका प्रतिपादन करते समय नौ भेद दर्शाये हैं किन्तु तत्त्वार्थभाष्यमें 'एते सारस्वता-
दयोऽष्टविधा देवाः' इन शब्दों द्वारा वे आठ ही रह गये हैं।
वे भी ऐसे उदाहरण हैं जो तत्त्वार्थभाष्यमान्य सूत्रपाठकी स्थितिमें सन्देह उत्पन्न करते हैं और यह
माननेके लिए बाध्य करते हैं कि बहुत सम्भव है कि सर्वार्थसिद्धिमान्य सूत्रपाठ पुराना हो और उसमें ऐच्छिक
परिवर्तन कर तत्त्वार्थभाष्यमान्य सूत्रपाठकी रचना की गयी हो।
पौर्वापर्यविचार—पिछले प्रकरणसे यद्यपि सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थभाष्यकी स्थिति बहुत कुछ स्पष्ट
हो जाती है। तथापि कुछ अत्युपयोगी विषयोंपर प्रकाश डालना आवश्यक प्रतीत होता है; क्योंकि अन्तमें
हमें यह देखना है कि इनकी रचनाकी आनुपूर्वी क्या है। इस प्रकरणको विशेष स्फुट करनेके लिए सर्व-प्रथम
हम समान स्थलोंका ऊहापोह करेंगे और उसके बाद उन स्थलोंको स्पर्श करेंगे जिससे इनके पौर्वापर्यके ऊपर
प्रकाश पड़ता है; क्योंकि सर्वप्रथम हमें यह दिखलाना है कि इन दोनों ग्रन्थोंकी स्थिति ऐसी है कि किसी
एकको सामने रखकर दूसरा लिखा गया है और अन्तमें यह विचार करना है कि यह अनुसरणकी प्रवृत्ति
किसमें स्वीकार की गयी है।
सर्वप्रथम प्रथम अध्यायका प्रथम सूत्र ही लीजिए। इसमें सर्वार्थसिद्धिमें यह वाक्य आता है—
एतेषां स्वरूपं लक्षणतो विधानतश्च पुरस्ताद्विस्तरेण निर्देश्यामः ।
यही वाक्य तत्त्वार्थभाष्यमें कुछ शब्दोंके हेर-फेरके साथ इन शब्दों द्वारा स्फुट किया गया है—
तं पुरस्ताल्लक्षणतो विधानतश्च विस्तरेणोपदेक्ष्यामः ।
१. अ० ५ सू० १ ।
An exact line-by-line transcription of the page into clean Markdown:
३६ सर्वार्थसिद्धि
आगे भी यह सादृश्य अन्त तक देखनेको मिलता है । यथा—
सर्वार्थसिद्धि | तत्त्वार्थभाष्य
तत्त्वार्थश्च वक्ष्यमाणो जीवादिः १,२ । | तत्त्वानि जीवादीनि वक्ष्यन्ते । १,२ ।
प्रशमसंवेगानुकम्पास्तिक्याद्यभिव्यक्तिलक्षणं | तदेवं प्रशमसंवेगनिर्वेदानुकम्पास्तिक्याभिव्यक्ति-
प्रथमम् । १,२ । | लक्षणं तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनमिति । १,२ ।
तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनमित्युक्तम् । अथ | तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनमित्युक्तम् । तत्र
किं तत्त्वमित्यत इदमाह— उत्थानिका १,४ । | किं तत्त्वमिति । अत्रोच्यते— उत्थानिका १,४ ।
तद्यथा—नामजीवः स्थापनाजीवो द्रव्यजीवो | तद्यथा—नामजीवः स्थापनाजीवो द्रव्यजीवो
भावजीव इति चतुर्धा जीवशब्दार्थो न्यस्यते १,५ । | भावजीव इति । १,५ ।
प्रस्तावना ३७
आग्रह बँध जानेके बाद ही सर्वार्थसिद्धि लिखी गयी है, जब कि भाष्यमें साम्प्रदायिक अभिनिवेशका यह तत्त्व
दिखाई नहीं देता ।
प्रकृतमें इस विषयपर विचार करनेके पहले पण्डितजी ऐसा लिखनेका साहस क्यों करते हैं इस बात-
का विचार कर लेना आवश्यक प्रतीत होता है ।
भगवान् महावीर स्वामीके मुक्तिलाभ करनेपर जो पाँच श्रुतकेवली हुए हैं उनमें अन्तिम भद्रबाहु थे ।
इनके समयमें उत्तर भारतमें बारह वर्षका दुर्भिक्ष पड़ा था। इससे संघसहित भद्रबाहु दक्षिणकी ओर विहार
कर गये थे । इस दुर्भिक्षका उल्लेख श्वेताम्बर परम्परा भी करती है और साधुसंघके समुद्रके समीप जाकर
बिखर जानेकी बात स्वीकार करतो है । उस समय भद्रबाहुके मुख्य शिष्य मौर्य चन्द्रगुप्त भी उनके साथ गये
थे और वहाँ पहुँचते-पहुँचते आयु क्षीण हो जानेसे भद्रबाहुने वहीं समाधि ले ली थी । किन्तु कुछ साधु
श्रावकोंके विशेष अनुरोधवश पटना ही रह गये थे और कालान्तरमें परिस्थितिवश उन्होंने वस्त्र स्वीकार कर
लिया था । जिससे जैन परम्परामें श्वेताम्बर संघकी उत्पत्ति मानी जाती है। जब बारह वर्षका दुर्भिक्ष समाप्त
हुआ तब साधु पुनः पटना लौट आये । श्वेताम्बर परम्पराके अनुसार 'भद्रबाहु उस समय नेपालकी तराईमें
थे और बारह वर्षकी विशेष तपश्चर्या करनेमें लगे हुए थे । साधुसंघने भद्रबाहुको पटना बुलाया किन्तु वे
नहीं आये जिससे उन्हें संघबाह्य करनेकी धमकी दी गयी और किसी प्रकार उन्हें शिष्य समुदायको पढ़ानेके
लिए राजी कर लिया गया । स्थूलभद्रने अंगज्ञान उन्हींसे प्राप्त किया है।'¹ यदि श्वेताम्बर सम्प्रदायके इस
कथनको सत्य मानकर चलें तब भी श्वेताम्बर सम्प्रदायका अपनी परम्पराको स्थूलभद्रसे स्वीकार करना और
पटना वाचनामें भद्रबाहुका सम्मिलित न होना ये दो बातें ऐसी हैं जो उस समय जैनसंघमें हुए किसी बड़े भारी
विस्फोटका संकेत करती हैं । स्पष्ट है कि उस समयकी वाचनाको अखिल जैनसंघका प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं
था और कालान्तरमें जो अंगसाहित्य संकलित और लिपिबद्ध हुआ है वह सवस्त्रसाधुको जैन परम्परामें प्रतिष्ठित
करनेकी दृष्टिसे ही हुआ है । इस समय जो श्वेताम्बर अंग साहित्य उपलब्ध है वह लगभग भगवान् महावीरके
मोक्ष गमनके एक हजार वर्षके बादका ही संकलन है। सोचनेकी बात है कि जब भद्रबाहुके कालमें ही प्रथम
वाचना हुई थी तब उसे उसी समय पुस्तकारूढ़ करके उसकी रक्षा क्यों नहीं की गयी ? घटनाक्रमसे विदित
होता है कि उस समय श्वेताम्बर संघके भीतर हो तीव्र मतभेद¹ रहा होगा और एक दल यह कहता होगा कि
संघभेदकी स्थितिमें भी अंगसाहित्यमें परिवर्तन करना इष्ट नहीं है । बहुत सम्भव है कि यदि उस समय
श्वेताम्बर अंग साहित्य संकलित होकर पुस्तकारूढ़ किया जाता तो उसका वर्तमान में रूप ही कुछ दूसरा
होता ।
यद्यपि श्वेताम्बर अंगसाहित्यमें ऐसे भी उल्लेख दृष्टिगोचर होते हैं जो नग्नताके समर्थक हैं । किन्तु
इन उल्लेखोंको उसकी प्रामाणिकताकी कसौटी नहीं माना जा सकता । वस्तुतः ये परिस्थितिवश स्वीकार किये
गये हैं । प्रज्ञाचक्षु पं० सुखलालजी इस स्थितिसे अनभिज्ञ हों ऐसी बात नहीं है । वे जानते हुए भी किसी
कारणवश इस स्थितिको दृष्टिओझल करनेके यत्नमें हैं और यह घोषित करनेका प्रयत्न करते हैं कि श्वेताम्बर
अंगश्रुतमें अचेलकत्व समर्थक वाक्य ही भगवान् महावीरकी परम्पराके पूरे प्रतिनिधित्वके सूचक हैं ।²
यह सत्य है कि श्रमण परम्परामें अचेलकत्व और सचेलकत्व दोनोंको स्थान रहा है और यह भी सत्य
है कि अचेलकत्व उत्सर्ग धर्म और सचेलकत्व अपवाद धर्म माना गया है। हमें दिगम्बर परम्पराके साहित्यमें
भी ऐसे उल्लेख उपलब्ध होते हैं जिनसे इस तथ्यकी पुष्टि होती है । किन्तु वहाँ अचेलकत्वसे तात्पर्य मुनिधर्मसे
१. सचेल दलके भीतर तीव्र मतभेदकी बात प्रज्ञाचक्षु पं० सुखलालजी भी स्वीकार करते हैं । वे लिखते
हैं-'मथुराके बाद बलभीमें पुनः श्रुतसंस्कार हुआ जिसमें स्थविर या सचेल दलका रहा सहा मतभेद भी नाम
शेष हो गया । देखो तत्त्वार्थसूत्र प्रस्तावना पृ० ३० । २. प्रज्ञाचक्षु पं० सुखलालजीके लेखों का भाव । देखो
तत्त्वार्थसूत्र प्रस्तावना पृ० २९ ।
३८ सर्वार्थसिद्धि
है और सचेलकत्वसे तात्पर्य गृहस्थधर्म या श्रावकधर्मसे है। श्रावकधर्म मुनिधर्मका अपवादमार्ग है। जहाँ
गृहस्थ सब प्रकारकी हिंसा, असत्य, स्तेय और अब्रह्मका परिहार कर मुनि होता है वहाँ उसे सब प्रकारके
परिग्रहका परिहार करना भी आवश्यक होता है। श्वेताम्बर अंगश्रुत और प्रकीर्णक साहित्यमें वस्त्र और
पात्रके स्वीकार करनेको भी संयमका साधन माना गया है किन्तु संयमका साधन वह हो सकता है जो शरीर
की सुविधाके लिए आवश्यक न होकर मात्र प्राणिपीड़ा परिहारके लिए स्वीकार किया जाता है। किन्तु वस्त्र
और पात्र प्राणिपीड़ा परिहारके लिए स्वीकार किये जाते हैं यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण प्रतीत होता है, क्योंकि
इन साधनोंसे उक्त कार्य दृष्टिगोचर नहीं होता। दूसरे इन्हें उक्त कार्यका अनिवार्य अंग मानकर चलने पर
नग्नता और पाणिपात्रत्वका विधान करना नहीं बन सकता है। किन्तु हम देखते हैं कि श्वेताम्बर आगममें
अचेलत्व और पाणिपात्रत्वका भी विधान है अतः वस्त्र और पात्र उन्हींके मतसे संयमके उपकरण नहीं हो
सकते। एक चरचा उत्सर्ग और अपवादलिंगकी की जाती है। यह कहा जाता है कि नग्नता और पाणिपात्रत्व
उत्सर्ग लिंग है किन्तु इसका अपवाद भी होना चाहिए और अपवादरूपमें ही वस्त्र और पात्र स्वीकार किये
जाते हैं। हम मानते हैं कि प्रत्येक उत्सर्गका अपवाद होता है और यह व्यवस्था श्रमण परम्पराने भी स्वीकार
की है। तभी तो वह मुनिधर्म और गृहस्थधर्म इन दो भेदों का निर्देश करती है। मुनिधर्म उत्सर्ग लिंग है और
गृहस्थधर्म उसका अपवाद है। इसलिए वस्त्र और पात्रका स्वीकार मुनि आचारका अंग नहीं बन सकता है।
भले ही दुर्भिक्षके समय ऐसी परिस्थिति रही है जिससे उस समय उत्तर भारतमें जो साधु रह गये थे उन्हें
वस्त्र और पात्र स्वीकार करने पड़े थे। इतना ही नहीं उन्हें कारणवश दण्ड भी स्वीकार करना पड़ा था।
किन्तु इन्हें साधुका चिह्न मान लेना मुनि मार्गके विरुद्ध है। यह हम पहले ही बतला आये हैं कि जो कमजोरी-
वश वस्त्रादिकको स्वीकार करते हैं वे श्रावक होते हैं। उनके परिणाम मुनिधर्मके अनुकूल नहीं हो सकते।
इस स्थितिके होते हुए भी आग्रहवश श्वेताम्बर अंगश्रुतमें वस्त्र, पात्रादिको साधुके अंग मानकर उनके
जिनकल्प और स्थविरकल्प ये दो भेद कर दिये गये हैं। इस कारण प्रज्ञाचक्षु पं० सुखलालजीको भी उसकी
पुष्टिके लिए बाध्य होना पड़ा है। अन्यथा उन्हें जिन तथ्योंके निर्देशमें साम्प्रदायिकताकी गन्ध आती है उन्हें वे
न केवल तात्त्विक दृष्टिसे स्वीकार करते अपितु वे परिस्थितिवश श्रमण परम्परामें हुई एक बहुत बड़ी गलतीका
परिहारकर आगेका पथ प्रशस्त करनेमें सहायक होते।
यह हम पहले संकेत कर आये हैं कि पण्डितजीने सर्वार्थसिद्धिमेंसे ऐसी चार बातें चुनी हैं जिनका
निर्देश वे साम्प्रदायिक कोटिका मानते हैं। सर्वार्थसिद्धिमें निर्णायक रूपसे काल तत्त्वका विधान किया गया है
जब कि तत्त्वार्थभाष्यमें मतविशेषके रूपमें उसका उल्लेख है। सर्वार्थसिद्धि केवलिकवलाहार और स्त्री मुक्तिका
निषेधकर नग्न्यको स्वीकार करती है जब कि तत्त्वार्थभाष्य परीषहोंके प्रसंगसे नग्न्यको स्वीकार कर वस्त्र,
पात्र और स्त्री तीर्थंकरका भी विधान करता है। सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थभाष्यकी यह स्थिति है जिस कारण
पण्डितजीने सर्वार्थसिद्धिके विषयमें अपना उक्त प्रकारका मत बनाया है और इस आधारसे तत्त्वार्थभाष्यको
सर्वार्थसिद्धिसे प्राचीन सिद्ध करनेका प्रयत्न किया है। इस विषयमें पण्डितजीका अभिमत है कि 'साम्प्रदायिक
अभिनिवेश बढ़ जानेके बाद ही सर्वार्थसिद्धि लिखी गयी थी जब कि तत्त्वार्थभाष्यमें ऐसे अभिनिवेशका सर्वथा
अभाव है।'
यह तो हम पहले ही बतला आये हैं कि जैन परम्परामें साधुओंने वस्त्र और पात्र किस परिस्थितिमें
स्वीकार किये थे और यह भी उल्लेख कर आये हैं कि श्वेताम्बर अंगश्रुतकी रचना पाँचवीं शताब्दीके बाद
हुई है। अतएव यह भी सुनिश्चित है कि तत्त्वार्थभाष्य उसके बाद ही किसी समय लिखा गया होगा, क्योंकि
पण्डितजीके ही शब्दोंमें 'उन्होंने (तत्त्वार्थभाष्यकारने) तत्त्वार्थकी रचनाके आधाररूप जिस अंग अनंगश्रुतका
अवलम्बन किया था वह पूर्णतया स्थविरपक्षको मान्य था।' इस अभिप्रायसे उक्त कथनकी पुष्टि होती है।
साधारणतः यह मतभेद श्वेताम्बरोय अंगश्रुतके पुस्तकारूढ़ हो जानेके बाद ही उग्ररूपमें प्रकट होने
लगा था; क्योंकि जैनपरम्पराके कहे जानेवाले अंगश्रुत जैसे महत्त्वपूर्ण साहित्यमें सवस्त्र मुक्ति और स्त्रीमुक्ति
जैसे विषयका समावेश होना पुरानी परम्पराको ही नष्ट-भ्रष्ट करनेवाली घटना थी। इस कालमें एक ओर
प्रस्तावना ३९
जहाँ साम्प्रदायिक अभिनिवेशमें आकर उक्त बातोंका विधान किया जाने लगा था वहाँ दूसरी ओर तात्त्विक-
दृष्टिसे उसका निषेध करना और दर्शनमोहनीयके बन्धका कारण बतलाना अनिवार्य हो गया था। सर्वार्थसिद्धि-
कारने यह कार्य किया है और दृढ़ताके साथ किया है। वस्तुतः उस कालमें तात्त्विक पक्षकी रक्षाका भार
उनपर था और उन्होंने उसका सुन्दरतापूर्वक निर्वाह भी किया है।
ऐसी अवस्थामें हमें सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थभाष्यके पौर्वापर्यका विचार अन्य प्रमाणोंके आधारसे
करना चाहिए। शैलीभेद, अर्थविकास और साम्प्रदायिकताके आधारसे इसका निर्णय करना गौण है। अतः
आइए, अन्य प्रमाणोंके प्रकाशमें इस तत्त्वका निर्णय किया जाय।
इस समय तत्त्वार्थभाष्यपर मुख्यतया प्रथम दो टीकाएँ उपलब्ध होती हैं-प्रथम हरिभद्रकी टीका¹
और दूसरी सिद्धसेनगणिकी टीका। आचार्य हरिभद्र और सिद्धसेनगणि समकालीन या कुछ आगे पीछेके होते
हुए भी भट्ट अकलंक देवके बादमें हुए हैं। इतना ही नहीं सिद्धसेनगणिने तो भट्ट अकलंक देवकी कृतियोंका
भरपूर उपयोग भी किया है यह उनकी टीकाके देखनेसे भी विदित होता है। किन्तु प्रज्ञाचक्षु पं० सुखलालजी
इस मतसे सहमत होते हुए भी दूर चले जाते हैं। वे तत्त्वार्थसूत्रकी भूमिका पृ० ९६ में लिखते हैं—
'किसी-किसी स्थलपर एक ही सूत्रके भाष्यका विवरण करते हुए वे पाँच-छह मतान्तर निर्दिष्ट करते
हैं, इससे ऐसा अनुमान करनेका कारण मिलता है कि जब सिद्धसेनने वृत्ति रची तब उनके सामने कमसे कम
तत्त्वार्थ सूत्रपर रची हुई पाँच टीकाएँ होनी चाहिए; जो सर्वार्थसिद्धि आदि प्रसिद्ध दिगम्बरीय तीन व्याख्याओंसे
पृथक् होंगी ऐसा मालूम पड़ता है; क्योंकि राजवार्तिक और श्लोकवार्तिककी रचनाके पहले ही सिद्धसेनीय
वृत्तिका रचा जाना बहुत सम्भव है; कदाचित् उनसे पहले यह रची गयी हों तो भी इसकी रचनाके बीचमें
इतना तो कमसे कम अन्तर है ही कि सिद्धसेनको राजवार्तिक और श्लोकवार्तिकका परिचय मिलनेका
प्रसंग ही न आया।'
यहाँ हमें सर्वप्रथम पण्डितजीके इस वक्तव्यकी आलोचना करनी है और इसके वाद देखना है कि
क्या सिद्धसेनगणिकी टीका राजवार्तिकका आलोडन किये बिना लिखी गयी थी।
पण्डितजीने सर्वप्रथम सिद्धसेनगणिकी अध्याय पाँच सूत्र तीनकी टीकाके आधारसे तत्त्वार्थसूत्र पर
लिखी गयी पाँच-छह स्वतन्त्र टीकाओंका अनुमान किया है. इस आधारसे हम इसे ठीक मान लेते हैं। तथापि
इससे यह निष्कर्ष कैसे निकाला जा सकता है कि सिद्धसेनगणिने तत्त्वार्थवार्तिकका आलोडन किये बिना ही
अपनी टीका लिखी थी। इससे तो केवल इतना ही पता लगता हैं कि उनके सामने और भी कई टीकाएँ थीं
जो 'नित्यावस्थितान्यरूपणि' सूत्रके कई पाठ प्रस्तुत करती थीं। यह स्वतन्त्र विषय है और इसपर स्वतन्त्र-
रूपसे ही विचार होना चाहिए कि सिद्धसेनगणिके सामने तत्त्वार्थभाष्यपर अपनी टीका लिखते समय तत्त्वार्थ-
वार्तिक था या नहीं और तत्काल हमें प्रसंगोचित इसी बातका विचार करना है।
इसमें सन्देह नहीं कि सिद्धसेनगणि बहुश्रुत विद्वान् थे। उन्होंने अपनी टीकामें तत्त्वार्थसूत्रके अनेक
पाठान्तरों, मत-मतान्तरों, ग्रन्थों, आचार्यों और प्रमाणोंका उल्लेख किया है, जिनसे अनेक ऐतिहासिक तथ्यों-
पर प्रकाश पड़ता है। इस प्रसंगसे वे भट्ट अकलंक देवके सिद्धिविनिश्चय और तत्त्वार्थवार्तिकको भी नहीं भूले
हैं। अध्याय १ सूत्र ३ की टीकामें सिद्धिविनिश्चयका उल्लेख करते हुए वे लिखते हैं—
'एवं कार्यकारणसंबन्धः समवायपरिणामनिमित्तनिर्वर्तकादिरूपः सिद्धिविनिश्चयसृष्टिपरीक्षातो
योजनीयो विशेषाथिना दूषणद्वारेणेति ।'
भट्ट अकलंक देवके उपलब्ध साहित्यमें सिद्धिविनिश्चय अन्यतम दर्शनप्रभावक ग्रन्थ है और उसमें सृष्टि-
परीक्षा प्रकरण भी उपलब्ध होता है। इससे निश्चित होता है कि यह उल्लेख इसी सिद्धिविनिश्चयका है।
हमने तत्त्वार्थवार्तिकके साथ भी सिद्धसेनगणिकी उक्त टीकाका तुलनात्मक अध्ययन किया है। इससे
१. हरिभद्रकी टीका तीन लेखकोंने पूरी की है ऐसा प्रज्ञाचक्षु पं० सुखलालजी तत्त्वार्थसूत्रकी
भूमिका पृ० ९५ में सूचित करते हैं और टीकाके देखनेसे यह मत समीचीन प्रतीत होता है।
४० सर्वार्थसिद्धि
हम इस निष्कर्षपर पहुँचे हैं कि सिद्धसेनगणिके सामने तत्त्वार्थभाष्यपर अपनी प्रसिद्ध टीका लिखते समय
तत्त्वार्थवार्तिक अवश्य था । तुलनाके लिए देखिए—
'अर्थवशाद् विभक्तिपरिणामो भवति । तद्यथा— उच्चानि देवदत्तस्य गृहाण्यामन्त्रयस्वैनम् । देवदत्त-
मिति गम्यते ।
—तत्त्वार्थवार्तिक अ० १ सू० ७ ।
'अर्थवशाच्च विभक्तिपरिणामः उच्चैर्गृहाणि देवदत्तस्यामन्त्रयस्वैनमिति ।'
—सि० टी० उत्थानिका श्लोक ६ की टीका ।
इसी प्रकार समानता सूचक और भी वाक्य उपलब्ध होते हैं—जिनका निर्देश पं० परमानन्दजी
शास्त्रीने अनेकान्त वर्ष ३ किरण ११ में 'सिद्धसेनके सामने सर्वार्थसिद्धि और राजवार्तिक' लेखमें किया है ।
इन समानता सूचक वाक्योंके अतिरिक्त सिद्धसेनगणिकी टीकामें कुछ ऐसे भी उल्लेख मिलते हैं जिनके
आधारसे उसकी स्थिति तत्त्वार्थवार्तिकके बाद स्थिर होनेमें विशेष सहायता मिलती है । यथा—तत्त्वार्थ-
वार्तिकमें नरकायुके कारणोंकी व्याख्या करते हुए यह वाक्य आता है—
'बह्वारम्भाः परिग्रहा यस्य स बह्वारम्भपरिग्रहः'
इसी बातको सिद्धसेनगणि मतभेदके साथ इन शब्दोंमें व्यक्त करते हैं—
'अपरे ब्रुवते—बह्वारम्भाः परिग्रहा यस्यासौ बह्वारम्भपरिग्रहः ।
इस पदकी व्याख्या सर्वार्थसिद्धिमें भी उपलब्ध होती है । इसलिए इसपरसे यह कहा जा सकता है
कि सिद्धसेनगणिने यह मतभेद सर्वार्थसिद्धिको लक्ष्यमें रखकर व्यक्त किया होगा । किन्तु सर्वार्थसिद्धिमें उक्त
पदके किये गये विग्रहसे पूर्वोक्त विग्रहमें मौलिक अन्तर है। सर्वार्थसिद्धिमें यह विग्रह इस प्रकार उपलब्ध
होता है—
'बहव आरम्भपरिग्रहा यस्य स बह्वारम्भपरिग्रहः ।
किन्तु सिद्धसेनगणिकी टीका इस विषयमें तत्त्वार्थवार्तिकका अनुसरण करती है सर्वार्थसिद्धिका
नहीं । अतएव इसपरसे यह माननेके लिए बाध्य होना पड़ता है कि सिद्धसेनगणिको यहाँपर 'अपरे' पदसे
तत्त्वार्थवार्तिककार अभिप्रेत रहे हैं ।
सिद्धसेनगणिकी टीकामें ऐसे और भी पाठ² या मतभेदके उल्लेख उपलब्ध होते हैं जो तत्त्वार्थवार्तिक-
की ओर संकेत करते हैं ।
इससे इस बातके स्पष्ट होते हुए भी कि सिद्धसेनगणिके सामने तत्त्वार्थभाष्यपर अपनी टीका लिखते
समय तत्त्वार्थवार्तिक उपस्थित था, यहाँ तत्त्वार्थभाष्यकी उत्तरावधि निश्चित करनी है और इसके लिए हमें
तत्त्वार्थभाष्यके साथ तत्त्वार्थवार्तिकका तुलनात्मक विचार करना है ।
प्रायः यह तो सभी मनीषियोंने स्वीकार किया है कि तत्त्वार्थवार्तिक सर्वार्थसिद्धिको पचा कर लिखा
गया है और इस बातके भी स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं कि तत्त्वार्थभाष्य तत्त्वार्थवार्तिकके पहलेकी रचना होनी
चाहिए । इसके लिए हमें अन्यत्र प्रमाण खोजनेकी आवश्यकता नहीं है किन्तु स्वयं तत्त्वार्थवार्तिक इसका साक्षी
है । सर्वप्रथम तत्त्वार्थवार्तिककी उत्थानिकाको ही लीजिए । तत्त्वार्थसूत्रकी रचना किस निमित्तसे हुई है इस
विषयमें सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थभाष्यमें व्याख्याभेद है । सर्वार्थसिद्धिमें स्वीकार किया गया है कि कोई भव्य
मुनियोंकी सभामें बैठे हुए आचार्यवर्यसे प्रश्न³ करता है कि भगवन् ! आत्माका हित क्या है ? आचार्यवर्य
उत्तर देते हैं कि 'मोक्ष' । वह पुनः प्रश्न करता है कि इसकी प्राप्तिका उपाय क्या है और इसीके उत्तर स्वरूप
तत्त्वार्थसूत्रकी रचना हुई है । किन्तु तत्त्वार्थभाष्यमें यह उत्थानिका दूसरे प्रकारसे निर्दिष्ट की गयी है ।¹ वहीं
१. इसके लिए प्रथम सूत्रकी उत्थानिका व अध्याय ६ सूत्र १६, १७, १८ आदि देखिए । २. देखो सर्वार्थ-
सिद्धि पृ० १ । ३. देखो तत्त्वार्थभाष्य उत्थानिका श्लोक ३१ ।
प्रस्तावना ४१
बतलाया है कि इस श्लोकमें मोक्षमार्गके बिना हितका उपदेश होना दुर्लभ है, इसलिए मोक्षमार्गका उपदेश
करते हैं। अब इन दोनों उत्थानिकाओंके प्रकाशमें तत्त्वार्थवार्तिक की उत्थानिकाको पढ़िए। देखनेसे विदित
होगा कि इसमें क्रमसे सर्वार्थसिद्धि¹ और तत्त्वार्थभाष्य² इन दोनोंकी उत्थानिकाओंका स्पष्टतः निर्देश किया
है। यही नहीं इसमें तत्त्वार्थभाष्यको उत्थानिकाका निर्देश 'अपरे' पदसे प्रारम्भ किया है। स्पष्ट है कि तत्त्वार्थ-
वार्तिककार सर्वार्थसिद्धिकी उत्थानिकाको दिगम्बर परम्परासम्मत मानते रहे और तत्त्वार्थभाष्यकी उत्थानिका-
को अन्यकी । यह उत्थानिकाकी बात हुई।
आगे सूत्रपाठको देखिए—तत्त्वार्थभाष्यकारने तीसरे अध्यायके प्रथम सूत्रमें 'पृथुतरा:' पाठ अधिक
स्वीकार किया है। श्वेताम्बर आगम साहित्यमें इस अर्थको व्यक्त करनेके लिए 'छत्ताइछत्ता' पाठ उपलब्ध
होता है। तत्त्वार्थभाष्यकारने भी इस पदकी व्याख्या करते हुए 'छत्रातिच्छत्रसंस्थिता:' पद द्वारा उसका
स्पष्टीकरण किया है। यह पाठ सर्वार्थसिद्धिमान्य सूत्रपाठमें नहीं है। तत्त्वार्थवार्तिककारकी न केवल इसपर
दृष्टि पड़ती है अपितु इसे वे आड़े हाथों लेते हैं और यह बतलानेका प्रयत्न करते हैं कि सूत्रमें 'पृथुतरा:'
पाठ असङ्गत है ।
साधारणतः सर्वार्थसिद्धि मान्य सूत्रपाठसे तत्त्वार्थभाष्यमान्य सूत्रपाठमें काफी परिवर्तन हुआ है पर
तत्त्वार्थवार्तिककार उन सब सूत्रपाठोंकी चर्चा नहीं करते। वे प्रायः तत्त्वार्थभाष्यके ऐसे ही सूत्रपाठका
विरोध व्यक्त करते हैं जिसे स्वीकार करने पर स्पष्टतः आगम विरोध दिखाई देता है। चौथे अध्यायमें 'शेषाः
स्पर्श-' इत्यादि सूत्र आता है। तत्त्वार्थभाष्यके अनुसार इस सूत्रके अन्तमें 'द्वयोर्द्वयोः' इतना पाठ अधिक
उपलब्ध होता है। भट्ट अकलंकदेवकी सूक्ष्मदृष्टि इस पाठ पर जाती है और वे आर्षसे विरोध बतला कर इस
अधिक पाठको स्वीकार करना मान्य नहीं करते। इसी प्रकार पाँचवें अध्यायमें 'बन्धेऽधिकौ पारिणामिकौ च'
सूत्र आता है। किन्तु तत्त्वार्थभाष्यमें इसका परिवर्तित रूप इस प्रकार उपलब्ध होता है—'बन्धे समाधिकौ
पारिणामिकौ ।'
यह स्पष्ट है कि आगममें बन्धकी जो व्यवस्था निर्दिष्ट की गयी है उसके साथ इस सूत्रमें आये हुए 'सम'
शब्दका मेल नहीं बैठता । तत्त्वार्थवार्तिककारकी दृष्टिसे यह बात भी छिपी नहीं रहती, इसलिए आगमसे
विरोध होनेके कारण वे स्पष्ट शब्दोंमें इसकी अप्रामाणिकता घोषित करते हैं। यही दशा तत्त्वार्थभाष्यमें आये
हुए पाँचवें अध्यायके अन्तिम तीन सूत्रोंकी होती है। वे सूत्र हैं—
'अनादिरादिमांश्च ॥४२॥ रूपिष्वादिमान् ॥४३॥ योगोपयोगौ जीवेषु ॥४४॥'
इन सूत्रोंमें परिणामके अनादि और सादि ये दो भेद करके पुद्गल और जीवके परिणामको सादि कहा
है। साथ ही ४२वें सूत्रके भाष्यमें धर्म, अधर्म, आकाश और जीवके परिणामको अनादि कहा है। इस पर
तत्त्वार्थवार्तिकमें आपत्ति करते हुए कहा है—अत्रान्ये धर्माधर्मकालाकाशेषु अनादिः परिणामः आदिमान् जीव-
पुद्गलेषु वदन्ति तदयुक्तम् ।'
अर्थात् अन्य लोग धर्म, अधर्म, काल और आकाशमें परिणामको अनादि कहते हैं तथा जीव और
पुद्गलोंमें उसे सादि कहते हैं किन्तु उनका ऐसा कहना अयुक्त है।
इसी प्रकार अध्याय १ सूत्र १५ व २१; अध्याय २ सूत्र ७, २० व ३३; अध्याय ४ सूत्र ८; अध्याय
५ सूत्र २-३, अध्याय ६ सूत्र १८ और अध्याय ८ सू० ६ के तत्त्वार्थवार्तिकके देखनेसे भी विदित होता है कि
अकलंकदेवके सामने तत्त्वार्थभाष्य अवश्य था ।
यद्यपि इस विषयमें कुछ मतभेद है। डॉ० जगदीशचन्द्रजीने अनेकान्त वर्ष ३ किरण ४ में इस आशय-
का एक लेख लिखा था जिसमें उन्होंने बतलाया है कि अकलंकदेवके सामने उमास्वाति का तत्त्वार्थभाष्य उप-
१. तत्त्वार्थवार्तिक उत्थानिका पृ० १ । २. तत्त्वार्थवार्तिक उत्थानिका पृ० ३ ।
६
४२ सर्वार्थसिद्धि
स्थित था। किन्तु उनके इस मतको श्री पं० जुगलकिशोरजी मुख्तार स्वीकार नहीं करते।१ श्री पं० कैलाश-
चन्द्रजी शास्त्रीका भी यही मत है।२
हमारा विचार है कि वाचक उमास्वातिने तत्त्वार्थभाष्यमें जो सूत्रपाठ स्वीकार किया है वह तत्त्वार्थ-
भाष्य लिखनेके पूर्व अवस्थित था इस विषयका पोषक कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलता। आचार्य पूज्यपादने और
सिद्धसेनगणिने अपनी टीकाओंमें जगह-जगह सूत्रपाठ सम्बन्धी जिस मतभेदकी३ चर्चा की है उसका सम्बन्ध
भी तत्त्वार्थभाष्य मान्य सूत्रपाठसे नहीं है। ऐसी अवस्थामें यह मानना कि भट्ट अकलंकदेवके सामने वाचक
उमास्वातिका तत्त्वार्थभाष्य नहीं था, हमें शिथिल प्रतीत होता है। तत्त्वार्थसूत्रपर लिखी गयीं दिगम्बर और
श्वेताम्बर समस्त टीकाओंके अवलोकनसे केवल हम इतना निश्चय कर सकते हैं कि जिस महान् आचार्यने
तत्त्वार्थसूत्रकी रचना की है उन्होंने तत्त्वार्थसूत्र पर कोई भाष्य या वृत्ति ग्रन्थ नहीं लिखा था। तत्त्वार्थसूत्रमें
सूत्र विषयक जो विविध मतभेद दिखाई देते हैं वे इसके प्रमाण हैं। यह बात स्पष्ट है कि आचार्य पूज्यपादके
काल तक वे मतभेद बहुत ही स्वल्पमात्रामें रहे हैं। किन्तु मूल सूत्रपाठ सर्वार्थसिद्धि द्वारा दिगम्बर परम्परा मान्य
हो जाने से दूसरी ओर इसकी बलवती प्रतिक्रिया हुई और मूल सूत्रपाठको तिलांजलि दे दी गयी। परिणाम
स्वरूप सूत्रपाठके स्वरूपके विषयमें न केवल मतभेद बढ़ने लगा अपि तु स्वतन्त्र सूत्रपाठके स्थिर करनेका भी
भाव जागृत हुआ। इन सारे घटना क्रम व तथ्योंके आधारसे हमारा तो यही विचार पुष्ट होता है कि स्वयं
वाचक उमास्वातिने अपने तत्त्वार्थभाष्यमान्य सूत्रपाठको अन्तिम रूप दिया होगा और आगे यह पाठभेद सम्बन्धी
मतभेद उग्र रूप धारण न करे इसलिए उन्होंने ही उसपर अपना प्रसिद्ध तत्त्वार्थाधिगमभाष्य लिखा होगा।
यह ठीक है कि वाचक उमास्वातिके पहले अन्य श्वेताम्बर आचार्योंने मूल तत्त्वार्थसूत्रमें काट-छांट चालू कर दी
थी४ और वाचक उमास्वातिको उसका वारसा मिला है। मूल यदि पं० जुगुलकिशोरजी मुख्तार इसी अभिप्रायको
ध्यानमें रखकर इस मतका प्रस्थापन करते हैं कि तत्त्वार्थभाष्यमान्य सूत्रपाठ वाचक उमास्वातिके भी पूर्व उप-
स्थित था तो यह कथन कुछ अंशमें सम्भव हो सकता है पर इससे तत्त्वार्थवार्तिककारके सामने तत्त्वार्थभाष्य
उपस्थित था इस मतपर रंचमात्र भी आंच नहीं आती, क्योंकि तत्त्वार्थवार्तिकमें केवल तत्त्वार्थभाष्य मान्य
सूत्रविषयक मतभेदोंका ही उल्लेख नहीं है अपितु कुछ ऐसे मतोंका भी उल्लेख है जिनका सीधा सम्बन्ध
तत्त्वार्थभाष्यसे है।
इस प्रकार इन प्रमाणोंके प्रकाशमें यह मान लेनेपर भी कि तत्त्वार्थभाष्य तत्त्वार्थवार्तिकके पहले
कभी लिखा गया है, फिर भी वह कब लिखा गया है यह विचारणीय हो जाता है। इसका हमें कई दृष्टियोंसे
पर्यालोचन करना है। पर्यालोचनके विषय ये हैं—१. अन्य टीकाओंके उल्लेख, २. सूत्रोल्लेख, और ३. अर्थ
विकास।
१. अन्य टीकाओंके उल्लेख—अभी तक प्रचलित परम्पराके अनुसार साधारणतः यह माना जाता है
कि दिगम्बर परम्परामान्य सूत्रपाठकी प्रथम टीका सर्वार्थसिद्धि है और श्वेताम्बर परम्परामान्य तत्त्वार्थसूत्रकी
प्रथम टीका तत्त्वार्थभाष्य है। तत्त्वार्थभाष्यके विषयमें तो कुछ विद्वान् यह भी मानते हैं कि वह तत्त्वार्थसूत्र-
कारकी ही मूल कृति है५ और इस आधारसे वे यह निष्कर्ष फलित करते हैं कि आचार्य पूज्यपादने मूल
सूत्रपाठमें सुधार करके सर्वार्थसिद्धिमान्य सूत्रपाठकी रचना की है जो आज दिगम्बर परम्परामें प्रचलित है।
किन्तु इन टीकाग्रन्थों और अन्य प्रमाणोंसे जो तथ्य सामने आ रहे हैं उनसे यह विषय बहुत कुछ विचारणीय
हो जाता है। पहले हम सर्वार्थसिद्धिमें दो पाठभेदोंका उल्लेख कर आये हैं। उनमेंसे दूसरा पाठभेद यदि सूत्र-
पोथीके आधारसे ही मान लिया जाये तो भी प्रथम पाठभेदको देखते हुए यह अनुमान करना सहज हो जाता
१. देखो अनेकान्त वर्ष ३ किरण ४, ११ व १२ । २. देखो पं० कैलाशचन्द्रजीका तत्त्वार्थसूत्र प्रस्तावना
पृ० ९ आदि । ३. देखो सर्वार्थसिद्धि अ० १ सू० १६ व अ० २ सू० ५३ तथा सिद्धसेनकी टीका अ० १
सू० व अ० ५ सू० ३ आदि । ४. देखो चालू प्रस्तावनाका ‘सूत्रपाठोंमें मतभेद’ प्रकरण । ५. देखो
पं० सुखलालजी की तत्त्वार्थसूत्रकी प्रस्तावना।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri
प्रस्तावना ४३
है कि सर्वार्थसिद्धिकारके सामने कोई छोटा-मोटा टीका ग्रन्थ अवश्य था। अन्यथा वे पाठविषयक मतभेदको
स्पष्ट करते हुए यह न कहते- 'त एवं वर्णयन्ति' इत्यादि ।
तत्त्वार्थवार्तिकमें अध्याय पाँच सूत्र चारका विवरण लिखते समय यह प्रश्न उठाया गया है कि 'वृत्तिमें
पाँच¹ ही द्रव्य कहे हैं, इस लिए छह द्रव्योंका उपदेश घटित नहीं होता।' आगे इसका समाधान करते हुए
तत्त्वार्थवार्तिककार कहते हैं कि 'वृत्तिकारका आप अभिप्राय नहीं समझे। आगे काल द्रव्यका निर्देश किया
जानेवाला है उसकी अपेक्षा न कर यहाँ वृत्तिकारने पाँच द्रव्य कहे हैं।'
इसी प्रकार एक प्रश्न इस अध्यायके ३७वें सूत्रका विवरण लिखते समय भी उठाया गया है। वहाँ
कहा गया है कि 'गुण यह संज्ञा अन्य सम्प्रदायके ग्रन्थोंमें उल्लिखित है आर्हंत मतमें तो केवल द्रव्य और
पर्यायका ही निर्देश किया है। अतः तत्त्व दो ही सिद्ध होते हैं और इनके आश्रयसे द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक
ये नय भी दो ही बनते हैं। यदि गुण नामका कोई पदार्थ है तो उसको विषय करनेवाला एक तीसरा नय
अवश्य होना चाहिए। यतः तीसरा नय नहीं है अतः गुण नामका कोई तीसरा पदार्थ सिद्ध नहीं होता है और
इसीलिए 'गुणपर्ययवद्द्रव्यम्' यह सूत्र भी घटित नहीं होता।' आगे इसका समाधान करते हुए कहा गया
है कि 'यह बात नहीं है, क्योंकि अर्हत्प्रवचनहृदय आदि ग्रन्थोंमें गुणका उपदेश दिया गया है। और इसके आगे
'उक्तं हि अर्हत्प्रवचने द्रव्याश्रया निर्गुणा गुणाः' यह वाक्य आया है।
तत्त्वार्थवार्तिकके ये दो उल्लेख हैं जिनसे अन्य वृत्ति तथा ग्रन्थान्तरकी सूचना मिलती है। प्रथम उल्लेखसे
हम जानते हैं कि तत्त्वार्थवार्तिककारके सामने तत्त्वार्थसूत्रपर लिखी गयी कोई एक वृत्ति थी जिसमें 'नित्यावस्थि-
तान्यरूपणि' सूत्रका विवरण लिखते समय पाँच द्रव्योंका विधान किया गया था और जिसका सामंजस्य
तत्त्वार्थवार्तिककारने यहाँ बिठलाया है। तथा दूसरे उल्लेखसे इस बातका अनुमान किया जा सकता है कि
तत्त्वार्थवार्तिककारके सामने एक दूसरा अर्हत्प्रवचनहृदय या अर्हत्प्रवचन नामका स्वतन्त्र ग्रन्थ अवश्य था जो
न केवल सूत्रशैलीमें लिखा गया था अपितु उसमें 'द्रव्याश्रया निर्गुणा गुणाः' यह सूत्र भी मौजूद था और
सम्भवतः उसे तत्त्वार्थवार्तिककार अति प्राचीन भी मानते रहे तभी तो प्रकृतमें गुणके समर्थनमें उन्होंने उसका
उल्लेख किया है।
यह अर्हत्प्रवचनहृदय या अर्हत्प्रवचन क्या है यह प्रश्न बहुत गम्भीर है। इसका उल्लेख तत्त्वार्थ-
भाष्यकार वाचक उमास्वातिने भी किया है। वे लिखते हैं कि मैं ²'अर्हद्वचनके एकदेशके संग्रहरूप और बहुत
अर्थवाले तत्त्वार्थाधिगम नामके लघुग्रन्थका शिष्योंकी हितबुद्धिसे कथन करता हूँ। इसी प्रकार अमृतचन्द्र
आचार्यने भी समयप्राभृतकी टीकामें³ समयप्राभृतको अर्हत्प्रवचनका अवयव कहा है। इन दोनों स्थलोंपर
साधारणतः अर्हद्वचन या अर्हत्प्रवचनसे द्वादशांगका बोध होता है। किन्तु जब भट्ट अकलंक देव अर्हत्प्रवचन-
हृदय या अर्हत्प्रवचन नामके स्वतन्त्र ग्रन्थका उल्लेख करते हैं। इतना ही नहीं वे उसके एक वचनको उद्धृत
भी करते हैं जो तत्त्वार्थसूत्रके सूत्रसे बिलकुल मिलता जुलता है तब यह प्रश्न अवश्य होता है कि क्या ऐसा
कोई महान् ग्रंथ रहा है जिसमें समग्र जैनसिद्धान्तका रहस्य अन्तर्निहित था और जिसका उल्लेख करना सबके
लिए अनिवार्य था। जो कुछ भी हो एक बात स्पष्ट है कि तत्त्वार्थवार्तिककारके सामने तत्त्वार्थकी उपलब्ध
टीकाओंके अतिरिक्त कोई अन्य वृत्ति अवश्य रही है जो सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थभाष्यसे भिन्न थी और बहुत
सम्भव है कि उसी वृत्तिका उल्लेख उन्होंने तत्त्वार्थवार्तिकमें किया है।
इसी प्रसंगसे हमने सिद्धसेनगणिकी टीकाका भी आलोडन किया है। इस सम्बन्धमें हम पहले ही
कह आये हैं कि सिद्धसेन गणिकी टीका अनेक सूत्र विषयक मत मतान्तरों और उल्लेखोंको लिये हुए है।
उसका बारीकीसे पर्यालोचन करनेपर यह भी विदित होता है कि उनके सामने न केवल सर्वार्थसिद्धि,
१. वृत्तौ पञ्चत्ववचनात् षड्द्रव्योपदेशव्याघात इति चेत्, न, अभिप्रायपरिज्ञानात् । २. 'तत्त्वार्थाधिगमाख्यं
बह्वर्थं संग्रहं लघुग्रन्थम् । वक्ष्यामि शिष्यहितमिममहंद्रचनैकदेशस्य ।।२२.।' ३. 'प्राभृताह्वयस्यार्हत्प्रवचना-
वयवस्य' गा. १. टीका।
४४ सर्वार्थसिद्धि
तत्त्वार्थभाष्य और राजवार्तिक थे अपितु तत्त्वार्थसूत्रपर लिखी गयी नयी पुरानी और भी अनेक टीकाएँ उनके
सामने रही हैं। यह अनुमान प्रज्ञाचक्षु पं० सुखलालजीका भी है जिसका निर्देश हम पहले कर आये हैं।
सर्वार्थसिद्धि, तत्त्वार्थवार्तिक और सिद्धसेनगणिकी टीकाके ये वे उल्लेख हैं जिनसे हमें तत्त्वार्थसूत्र
विषयक अन्य अनेक छोटी-बड़ी टीकाओं के अस्तित्वका आभास मिलता है। तत्काल विचारणीय यह है कि
ये सब टीका ग्रन्थ किस आधारसे लिखे गये होंगे। सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थवार्तिकमें जिनका उल्लेख है वे
तो स्वतन्त्र होंगे यह स्पष्ट ही है। मात्र विचार उनका करना है जिनका उल्लेख सिद्धसेनगणिने किया है। यह
तो हम स्पष्ट देखते हैं कि तत्त्वार्थभाष्यके कारण भाष्यानुसारी सूत्रपाठका स्वरूप और अर्थ एक तरहसे सुनि-
श्चित है। जो लिपिकारोंकी असावधानी से थोड़े बहुत दोष उत्पन्न होते हैं वे तत्त्वार्थभाष्यमें भी देखे जाते हैं १।
किन्तु इन दोषोंके कारण तत्त्वार्थभाष्य सम्मत सूत्रपाठमें तत्त्वार्थभाष्यकी उपस्थितिमें पाठान्तर या अर्थान्तरकी
कल्पना करना सम्भव नहीं है। ऐसी अवस्थामें इन टीका ग्रन्थोंको भी सर्वार्थसिद्धि और राजवार्तिकमें उल्लि-
खित टीका ग्रन्थोंके समान स्वतन्त्र ही मानना पड़ता है। सिद्धसेनगणिने मतभेदोंको दरसाते हुए अन्य मतोंका
जिस रूपमें उल्लेख किया है उससे भी तथ्यकी पुष्टि होती है। ये सब टीकाग्रन्थ कब और किन आचार्योंकी
कृति हैं यह तो हम निश्चयपूर्वक नहीं कह सकते हैं। बहुत सम्भव है कि वे सब या उनमेंसे कुछ तत्त्वार्थ-
भाष्यके भी पहले लिखे गये हों और उनके लेखक श्वेताम्बर आचार्य रहे हों। यदि यह अनुमान सही हैं,
जिसके कि सही होनेकी अधिक सम्भावना है, तो यही कहना पड़ता है कि तत्त्वार्थभाष्य उस कालकी रचना
है जबकि मूल तत्त्वार्थसूत्रपर अनेक टीका टिप्पणियाँ प्रचलित हो चुकी थीं और जिनमेंसे एक सर्वार्थ-
सिद्धि भी है।
२. सूत्रोल्लेख—साधारणतः किसी विषयको स्पष्ट करने, उसकी सूचना देने या अगले सूत्रकी
उत्थानिका बाँधनेके लिए टीकाकार आगेके या पीछेके सूत्रका उल्लेख करते हैं। यह परिपाटी सर्वार्थसिद्धि
और तत्त्वार्थभाष्यमें भी विस्तारपूर्वक अपनायी गयी है। किन्तु आगेके या पीछेके सूत्रका उल्लेख करते समय
इन टीका ग्रन्थोंमें उन्हीं सूत्रपाठोंका उल्लेख किया जाता है जो उन्हें सम्मत होते हैं। उदाहरणार्थ-सर्वार्थ-
सिद्धिकारने अध्याय एकके इक्कीस नम्बरका सूत्र 'भवप्रत्ययोऽवधिर्देवनारकाणाम्' इस रूपमें स्वीकार किया
हैं, अतएव वे चौथे अध्यायके प्रथम सूत्रकी उत्थानिका लिखते समय इस सूत्रका इसी रूपमें उल्लेख करते हैं।
इसी प्रकार तत्त्वार्थभाष्यकारने इस सूत्रको 'भवप्रत्ययोऽवधिर्नारकडेवानाम्' इस रूपमें स्वीकार किया है इस-
लिए वे चौथे अध्यायके प्रथम सूत्रकी उत्थानिकामें इसे इसी रूपमें उद्धृत करते हैं। साधारणतः ये टीकाकार
कहीं पूरे सूत्रको उद्धृत करते हैं और कहीं उसके एक अंशको। पर जितने अंशको उद्धृत करते हैं वह
अपनेमें पूरा होता है। ऐसा व्यत्यय कहीं भी नहीं दिखाई देता कि किसी एक अंशको उद्धृत करते हुए भी
वे उसमेंसे समसित प्रारम्भ के किसी पदको छोड़ देते हों।
ऐसी अवस्थामें हम तो यही अनुमान करते थे कि इन दोनों टीका ग्रन्थोंमें ऐसा उद्धरण शायद ही
मिलेगा जिस से इनकी स्थितिमें सन्देह उत्पन्न किया जा सके। इस दृष्टिसे हमने सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थ-
भाष्यका बारीकीसे पर्यालोचन किया है। किन्तु हमें यह स्वीकार करना पड़ता है कि तत्त्वार्थभाष्यमें एक
स्थलपर ऐसा स्खलन अवश्य हुआ है, जो इसकी स्थितिमें सन्देह उत्पन्न करता है। यह स्खलन अध्याय १
सूत्र २० का भाष्य लिखते समय हुआ है।
मतिज्ञान और श्रुतज्ञानके विषयका प्रतिपादन करनेवाला सर्वार्थसिद्धिमान्य सूत्र इस प्रकार है-
'मतिश्रुतयोर्निबन्धो द्रव्येष्वसर्वपर्यायेषु ।'
यही सूत्र तत्त्वार्थभाष्यमें इस रूपमें उपलब्ध होता है-
'मतिश्रुतयोर्निबन्धः सर्वद्रव्येष्वसर्वपर्यायेषु ।'
१. देखो अध्याय ६ सूत्र ३ व ४ का तत्त्वार्थभाष्य ।
तत्त्वार्थभाष्यमें सर्वार्थसिद्धामान्य सूत्रपाठकी अपेक्षा 'द्रव्य' पदके विशेषणरूपसे 'सर्व' पद अधिक
स्वीकार किया गया है। किन्तु जब वे ही तत्त्वार्थभाष्यकार इस सूत्रके उत्तरार्धको अध्याय १ सूत्र २० के
भाष्यमें उद्धृत करते हैं तब उसका रूप सर्वार्थसिद्धामान्य सूत्रपाठ ले लेता है। यथा -
'अत्राह - मतिश्रुतयोस्तुल्यविषयत्वं वक्ष्यति - 'द्रव्येष्वसर्वपर्यायेषु' इति'
कदाचित् कहा जाय कि इस उल्लेखमेंसे लिपिकारकी असावधानीवश 'सर्व' पद छूट गया होगा किन्तु
यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि अपनी टीकामें सिद्धसेनगणि और हरिभद्रने भी तत्त्वार्थभाष्यके इस अंशको
इसी रूपमें स्वीकार किया है। प्रश्न यह है कि जब तत्त्वार्थभाष्यकारने उक्त सूत्रका उत्तरार्ध 'सर्वद्रव्ये-
ष्वसर्वपर्यायेषु' स्वीकार किया तब अन्यत्र उसे उद्धृत करते समय वे उसके 'सर्व' पदको क्यों छोड़ गये ।
पदका विस्मरण हो जानेसे ऐसा हुआ होगा यह बात बिना कारणके कुछ नपी-तुली प्रतीत नहीं होती ।
यह तो हम मान लेते हैं कि प्रमादवश या जान-बूझकर उन्होंने ऐसा नहीं किया होगा फिर भी यदि विस्मरण
होनेसे ही यह व्यत्यय माना जाये तो इसका कोई कारण अवश्य होना चाहिए। हमारा तो खयाल है कि
तत्त्वार्थभाष्य लिखते समय उनके सामने सर्वार्थसिद्धामान्य सूत्रपाठ अवश्य रहा है और हमने क्या पाठ
स्वीकार किया है इसका विशेष विचार किये बिना उन्होंने अनायास उसके सामने होनेसे सर्वार्थसिद्धामान्य
सूत्रपाठका अंश यहाँ उद्धृत कर दिया है। यह भी हो सकता है कि अध्याय १ सूत्र २० का भाष्य लिखते
समय तक वे यह निश्चय न कर सके हों कि क्या इसमें 'सर्व' पदको 'द्रव्य' पदका विशेषण बनाना आवश्यक
होगा या जो पुराना सूत्रपाठ है उसे अपने मूलरूपमें ही रहने दिया जाय और सम्भव है कि ऐसा कुछ निश्चय
न कर सकनेके कारण यहाँ उन्होंने पुराने पाठको ही उद्धृत कर दिया हो। हम यह तो मानते हैं कि
तत्त्वार्थभाष्य प्रारम्भ करनेके पहले ही वे तत्त्वार्थसूत्रका स्वरूप निश्चित कर चुके थे फिर भी किसी खास
सूत्रके विषयमें शंकास्पद बने रहना और तत्त्वार्थभाष्य लिखते समय उसमें परिवर्तन करना सम्भव है। जो
कुछ भी हो इस उल्लेखसे इतना निश्चय करनेके लिए तो बल मिलता ही है कि तत्त्वार्थभाष्य लिखते समय
वाचक उमास्वातिके सामने सर्वार्थसिद्धामान्य सूत्रपाठ अवश्य होना चाहिए।
३. अर्थ विकास - इसी प्रकार इन दोनोंके बिम्बप्रतिबिम्बभाव और कहीं-कहीं वस्तुके विवेचनमें
तत्त्वार्थभाष्यमें अर्थ विकासके स्पष्ट दर्शन होनेसे भी उक्त कथनकी पुष्टि होती है। उदाहरणार्थ - दसवें
अध्यायमें 'धर्मास्तिकायाभावात्' सूत्र आता है। इसके पहले यह बतला आये हैं कि मुक्त जीव अमुक-अमुक
कारणसे ऊपर लोकके अन्त तक जाता है। प्रश्न होता है कि वह इसके आगे क्यों नहीं जाता हैं और इसीके
उत्तरस्वरूप इस सूत्रकी रचना हुई है। किन्तु यदि टीकाको छोड़ कर केवल सूत्रोंका पाठ किया जाय तो यहाँ
जाकर रुकना पड़ता है और मनमें यह शंका बनी ही रहती है कि धर्मास्तिकाय न होनेसे आचार्य क्या
बतलाना चाहते हैं। सूत्रपाठकी यह स्थिति वाचक उमास्वातिके ध्यानमें आयी और उन्होंने इस स्थितिको साफ
करनेकी दृष्टिसे ही उसे सूत्र न मानकर भाष्यका अंग बनाया है। यह क्रिया स्पष्टतः बादमें की गयी जान
पड़ती है। इसी प्रकार इसी अध्यायके सर्वार्थसिद्धामान्य दूसरे सूत्रको लीजिए। इसके पहले मोहनीय आदि
कर्मोंके अभावसे केवलज्ञानकी उत्पत्तिका विधान किया गया है। किन्तु इनका अभाव क्यों होता है इसका
समुचित उत्तर उस सूत्रसे नहीं मिलता और न ही सर्वार्थसिद्धिकार इस प्रश्नको स्पर्श करते हैं। किन्तु
वाचक उमास्वातिको यह त्रुटि खटकती है। फलस्वरूप वे सर्वार्थसिद्धामान्य 'बन्धहेत्वभावनिर्जराभ्यां
कृत्स्नकर्मविप्रमोक्षो मोक्षः' इस सूत्रके पूर्वार्धको स्वतन्त्र और उत्तरार्धको स्वतन्त्र सूत्र मानकर इस कमीकी
पूर्ति करते हैं। सर्वार्थसिद्धिमें जब कि इसका सम्बन्ध केवल 'कृत्स्नकर्मविप्रमोक्षः' पदके साथ जोड़ा गया है
वहाँ वाचक उमास्वाति इसे पूर्वसूत्र और उत्तरसूत्र दोनोंके लिए बतलाते हैं।
ऐसी ही एक बात, जो विशेष ध्यान देने योग्य है, पाँचवें अध्यायके कालके उपकारके प्रतिपादक सूत्रके
प्रसंगसे आती है। प्रकरण परत्व और अपरत्वका है। ये दोनों कितने प्रकारके होते हैं इसका निर्देश सर्वार्थसिद्धि
और तत्त्वार्थभाष्य दोनोंमें किया है। सर्वार्थसिद्धिमें इनके प्रकार बतलाते हुए कहा है- परत्वापरत्वे क्षेत्रकृते