सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२ सर्वार्थसिद्धि
परक निर्देश होनेसे दर्शनमोहनीयके उदयमें अदर्शन परीषह होता है इस अर्थकी सङ्गति बैठ जाती है। किन्तु
तत्त्वार्थभाष्यकी व्याख्याको स्वीकार करने पर एक नयी अड़चन उठ खड़ी होती है। दर्शनमोहनीयका सत्त्व
उपशान्तमोह गुणस्थान तक रहता है, इसलिए यह कहा जा सकता है कि उन्होंने दर्शनमोहनीयके सत्त्वकी
अपेक्षा बादरसाम्पराय नामक नौवें गुणस्थान तक अदर्शन परीषह कहा होगा। किन्तु इस मतको स्वीकार
करने पर दो नयी आपत्तियां और सामने आती हैं। प्रथम तो यह कि यदि उन्होंने दर्शनमोहनीयके सत्त्वकी
अपेक्षा अदर्शन परीषहका सद्भाव स्वीकार किया है तो उसका सद्भाव ग्यारहवें गुणस्थान तक कहना चाहिए।
दूसरी यह कि वे 'क्षुत्पिपासा शीतोष्ण-' इत्यादि सूत्रकी व्याख्या करते हुए वह कहते हैं कि 'पञ्चानामपि
कर्मप्रकृतीनामुदयादेते परीषहाः प्रादुर्भवन्ति ।' अर्थात् पांच कर्मप्रकृतियोंके उदयसे परीषह उत्पन्न होते हैं।
सो पूर्वोक्त अर्थके स्वीकार करने पर इस कथनकी सङ्गति नहीं बैठती दिखलाई देती। क्योंकि एक ओर तो
दर्शनमोहनीयके सत्त्वकी अपेक्षा अदर्शन परीषहको नौवें गुणस्थान तक स्वीकार करना और दूसरी ओर सब
परीषहोंको पांच कर्मोंके उदयका कार्य कहना ये परस्पर विरोधी दोनों कथन कहां तक युक्तियुक्त हैं यह
विचारणीय हो जाता है। स्पष्ट है कि सिद्धसेन गणिकी टीकाके अनुसार तत्त्वार्थभाष्यका कथन न केवल
स्खलित है अपितु वह मूल सूत्रकारके अभिप्रायके प्रतिकूल भी है, क्योंकि मूल सूत्रकारने इन परीषहोंका
सद्भाव कर्मोंके उदयकी मुख्यतासे ही स्वीकार किया है। अन्यथा वे अदर्शन परीषहका सद्भाव और
चारित्रमोहके निमित्तसे होनेवाले नग्न्य आदि परीषहोंका सद्भाव उपशान्तमोह नामक ग्यारहवें गुणस्थान
तक अवश्य कहते ।
नग्न्य, अरति, स्त्री, निषद्या, आक्रोश, याचना और सत्कार-पुरस्कार ये सात परीषह चारित्रमोह-
नीयके उदयमें होते हैं। सामान्यतः चारित्रमोहनीयका उदय यद्यपि सूक्ष्मसाम्परायिक नामक दसवें गुणस्थान
तक होता है इसलिए इन सात परीषहोंका सद्भाव दसवें गुणस्थान तक कहना चाहिए था ऐसी शंका की जा
सकती है परन्तु इनका दसवें गुणस्थान तक सद्भाव न बतलानेके दो कारण हैं। प्रथम तो यह कि चारित्र-
मोहनीयके अवान्तरभेद क्रोध, मान और मायाका तथा नौ नोकषायोंका उदय नौवें गुणस्थानके अमुक भाग तक
ही होता है, इसलिए इन परीषहोंका सद्भाव नौवें गुणस्थान तक कहा है। दूसरा यह कि दसवें गुणस्थानमें
यद्यपि चारित्रमोहनीयका उदय होता है अवश्य पर एक लोभ कषायका ही उदय होता है और वह भी अति-
सूक्ष्म, इसलिए इनका सद्भाव दसवें गुणस्थान तक न कहकर मात्र नौवें गुणस्थान तक कहा है।
तथा क्षुधा, पिपासा, शीत, उष्ण, दंशमशक, चर्या, शय्या, वध, रोग, तृणस्पर्श और मल ये ग्यारह
परीषह वेदनीय कर्मके उदयमें होते हैं। वेदनीय कर्मका उदय जिनके भी होता है, इसलिए, इनका सद्भाव
वहाँ तक कहा है।
इस प्रकार अप्रमत्तसंयत आदि गुणस्थानोंमें सूत्रकारने जो परीषहोंका सद्भाव कहा है उसमें उनकी
दृष्टि कारणको ध्यानमें रखकर विवेचन करनेकी ही रही है और इसीलिए सर्वार्थसिद्धिकार आचार्य पूज्य-
पादने पहले सूत्रकारकी दृष्टि से 'एकादश जिने' इस सूत्रका व्याख्यान किया है। अनन्तर जब उन्होंने देखा कि
कुछ अन्य विद्वान् अन्य साधारण मनुष्योंके समान केवलीके कारणपरक परीषहोंके उल्लेखका विपर्यास करके
भूख-प्यास आदि बाधाओंका ही प्रतिपादन करने लगे हैं तो उन्होंने यह बतलानेके लिए कि केवलीके कार्य-
रूपमें ग्यारह परीषह नहीं होते 'न सन्ति' पदका अध्याहार कर उस सूत्रसे दूसरा अर्थ फलित किया है।
इसमें न तो उनकी साम्प्रदायिक दृष्टि रही है और न ही उन्होंने तोड़-मरोड़कर उसका अर्थ किया है। साम्प्र-
दायिक दृष्टि तो उनकी है जो उसे इस दृष्टिकोणसे देखते हैं। आचार्योंमें मतभेद हुए हैं और हैं पर सब मत-
भेदोंको साम्प्रदायिक दृष्टिका सेहरा बांधना कहाँ तक उचित है यह समझने और अनुभव करनेकी बात है।
आचार्य पूज्यपाद यदि साम्प्रदायिक दृष्टिकोणके होते तो वे ऐसा प्रयत्न न कर सूत्रका ही कायाकल्प कर
सकते थे। किन्तु उन्होंने अपनी स्थितिको बिल्कुल स्पष्ट रखा है। तत्त्वतः देखा जाय तो एक मात्र यही
उदाहरण उनकी साहित्यिक प्रामाणिकताकी कसौटी बन सकता है। यह अर्थान्तरन्यासका दूसरा उदाहरण
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