सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४ सर्वार्थसिद्धि
शेषाः स्पर्श्वरूपशब्दमनःप्रवीचाराः । सर्वा० ।
शेषाः स्पर्श्वरूपशब्दमनःप्रवीचाराः द्वयोर्द्वयोः । त० भा० ।
हम देखते हैं कि तत्त्वार्थभाष्यके अनुसार इस सूत्रमें 'द्वयोर्द्वयोः' इतना पद अधिक है जब कि सर्वार्थ-
सिद्धिमें इसका सर्वथा अभाव है । इसके पहले दोनों ही परम्पराओंमें 'कायप्रवीचाराः आ ऐशानात्' यह सूत्र
आता है । इस द्वारा सौधर्म और ऐशान कल्प तक प्रवीचारका विधान किया गया है । आगे सर्वार्थसिद्धिके
अनुसार चौदह और तत्त्वार्थभाष्यके अनुसार दस कल्प शेष रहते हैं जिनमें यह सूत्र प्रवीचारका विधान करता
है । प्रकृतमें देखना यह है कि सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थभाष्य इन दोनोंमें इसकी संगति किस प्रकार बिठलायी
गयी है । यह तो स्पष्ट है कि सर्वार्थसिद्धिमें 'द्वयोर्द्वयोः' पद न होनेसे आचार्य पूज्यपादको इसकी व्याख्या
करनेमें कोई कठिनाई नहीं गयी । उन्होंने तो आर्षके अनुसार इसकी व्याख्या करके छुट्टी पा ली । किन्तु
तत्त्वार्थभाष्यकारकी स्थिति इससे सर्वथा भिन्न है । उनके सामने 'द्वयोर्द्वयोः' पदके कारण इसकी व्याख्या करते
समय यह समस्या रही है कि प्रवीचारके विषय चार और कल्प दस होनेसे इसकी संगति कैसे बिठलायी जाय ।
फलस्वरूप उन्हें अन्तके चार कल्पोंको दो मानकर इस सूत्रकी व्याख्या करनेके लिए बाध्य होना पड़ा है ।
उन्होंने किसी प्रकार व्याख्या करनेका तो प्रयत्न किया पर इससे जो असंगति उत्पन्न होती है वह कथमपि दूर
नहीं की जा सकी है । इससे मालूम पड़ता है कि या तो तत्त्वार्थभाष्यकार को 'द्वयोर्द्वयोः' पदके साथ सूत्रपाठ
मिला है या फिर स्वयं उन्होंने तत्त्वार्थभाष्यके आश्रयसे इस सूत्रको स्पष्ट करनेकी मनसासे सूत्रमें यह पद
बढ़ाया है । यहाँ उत्तर विकल्पकी अधिक सम्भावना है । हमें ऐसे एक दो स्थल और मिले हैं जिनमें तत्त्वार्थ-
भाष्यके आश्रयसे सूत्रोंको संगति बिठलायी गयी है । उदाहरण स्वरूप 'यथोक्तनिमित्तः' पद लीजिए । यह
प्रथम अध्यायके २२वें सूत्रमें आया है । इसके पहले एक सूत्रके अन्तरसे वे 'द्विविधोऽवधिः' सूत्र कह आये
हैं और इन भेदोंका स्पष्टीकरण इस सूत्रके भाष्यमें किया है । प्रकृतमें 'यथोक्तनिमित्तः' पदमें आये हुए
'यथोक्त' पद द्वारा उनका संकेत इसी भाष्यकी ओर है । वे इस पद द्वारा कहना चाहते हैं कि दूसरे जिस
निमित्तका संकेत हमने 'द्विविधोऽवधिः' सूत्रके भाष्यमें किया है उस निमित्तसे शेष जीवोंके छह प्रकार का
अवधिज्ञान होता है । किन्तु उस अवस्था में जब कि सूत्र रचना पहले हो चुकी थी और भाष्य बादमें लिखा
गया है भाष्यकारकी स्थिति सन्देहजनक हो जाती है । और मानना पड़ता है कि तत्त्वार्थभाष्यकार वाचक
उमास्वातिने प्राचीन सूत्रपाठमें सुधार करनेका प्रयत्न किया है ।
तीसरा कालके अस्तित्वको स्वीकार करनेवाला सूत्र है । यह सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थभाष्यमें इस
प्रकार उल्लिखित है—
कालश्च । सर्वा० ।
कालश्चेत्येके । त० भा० ।
इस द्वारा कालको द्रव्यरूपसे स्वीकार किया गया है । किन्तु तत्त्वार्थभाष्यकार ऐसा करते हुए भी अन्य
आचार्योंके मतसे कालको द्रव्यरूपसे स्वीकार करते हैं स्वयं नहीं । यही कारण है कि उन्होंने तत्त्वार्थभाष्यमें
जहाँ जहाँ द्रव्योंका उल्लेख किया है वहाँ वहाँ पाँच अस्तिकायोंका¹ ही उल्लेख किया है और लोकको
पाँच अस्तिकायात्मक बतलाया है । श्वेताम्बर आगम साहित्यमें छह द्रव्योंका निर्देश किया है अवश्य और एक
स्थानपर तो तत्त्वार्थभाष्यकार भी छह द्रव्योंका² उल्लेख करते हैं परन्तु इससे वे कालको द्रव्य मानते ही हैं
यह नहीं कहा जा सकता । कारण यह है कि श्वेताम्बर आगम साहित्यमें जहाँ भी छह द्रव्योंका नामनिर्देश
किया है वहाँ कालद्रव्यके लिए 'अद्धासमय' शब्द प्रयुक्त हुआ है 'काल' शब्द नहीं और अद्धासमय शब्दका
अर्थ वहाँ पर्याय ही लिया गया है प्रदेशात्मक द्रव्य नहीं । तत्त्वार्थभाष्यकारने भी इसी परिपाटीका निर्वाह किया
१. सर्वं पञ्चत्वमस्तिकायावरोधात् । अ० १, सू० ३५ । पञ्चास्तिकायो लोकः । अ० ३, सू० ६ । पञ्चास्ति-
कायात्मकम् । अ० ९, सू० ७ । २. षट्त्वं षड्द्रव्यावरोधात् । अ० १, सू० ३५ ।