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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 37, कुल 558 में से

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पृष्ठ 37

प्रस्तावना ३३
हैं। इसके सिवा अर्थान्तरन्यासके एक दो उदाहरण और भी उपस्थित किये जा सकते हैं पर विशेष प्रयोजन
न होनेसे उनका यहाँ हमने निर्देश नहीं किया है।
इस प्रकार इन चार उदाहरणोंसे इस बातका सहज ही पता लग जाता है कि आचार्य पूज्यपादने
मूल सूत्रपाठ और पाठान्तरोंकी रक्षाका कितना अधिक ख्याल रखा है।
सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थभाष्य- ऐसा होते हुए भी आचार्य पूज्यपादके ऊपर यह आक्षेप$^१$ किया
जाता है कि उन्होंने उन्हें उपलब्ध हुए सूत्रपाठमें सुधार और वृद्धि कर सर्वार्थसिद्धिकी रचना की है। सर्वार्थ-
सिद्धि किस कालकी रचना है और तत्त्वार्थभाष्य किस कालका यह तो हम आगे चलकर देखेंगे। यहाँ केवल
तुलनात्मक दृष्टिसे इन दोनोंके अन्तःस्वरूपका पर्यालोचन करना है।
सूत्रपाठ- सर्व प्रथम हम सूत्रपाठको लेते हैं। सर्वार्थसिद्धिमान्य सूत्रपाठसे तत्त्वार्थभाष्यमान्य सूत्रपाठमें
शब्दोंके हेरफेरसे या सूत्रोंके घटाने-बढ़ानेसे छोटे-मोटे अन्तर$^२$ तो पर्याप्त हुए हैं किन्तु उन सबका ऊहापोह यहाँ
नहीं करना है। जिनमें मौलिक अन्तर हुआ है ऐसे सूत्र तीन हैं। प्रथम स्वर्गोंकी संख्या का प्रतिपादक सूत्र,
दूसरा सानत्कुमार आदिमें प्रवीचारका प्रतिपादक सूत्र और तीसरा कालको स्वतन्त्र द्रव्य माननेवाला सूत्र ।
स्वर्गोंके प्रतिपादक सूत्रमें मौलिक अन्तर यह हुआ है कि सर्वार्थसिद्धिमान्य सूत्रपाठमें १६ कल्पोंकी परि-
गणना की गयी है और तत्त्वार्थभाष्यमान्य सूत्रपाठमें १२ कल्पोंकी परिगणना की गयी है। इस पर आक्षेप
यह किया जाता है कि 'जब सर्वार्थसिद्धिमान्य सूत्रपाठमें कल्पोपपन्न देवोंके भेद$^३$ बारह बतलाये हैं और नामों-
की परिगणना करते समय वे सोलह परिगणित किये गये हैं तब यह माननेके लिए पर्याप्त आधार हो जाता
है कि या तो आचार्य पूज्यपादने या इनके पूर्ववर्ती अन्य किसी आचार्यने इस सूत्रमें घटा-बढ़ाकर उसे वर्तमान
रूप दिया है जब कि तत्त्वार्थभाष्यमान्य सूत्रपाठकी स्थिति इससे सर्वथा भिन्न है। इसलिए बहुत सम्भव है कि
तत्त्वार्थभाष्यमान्य सूत्रपाठ मूल हो और उसमें सुधार कर उत्तरकालमें सर्वार्थसिद्धिमान्य सूत्रपाठ निर्मित
हुआ हो$^४$।'
यहाँ सर्वप्रथम यह विचार करना है कि क्या उक्त सूत्रके आधारसे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है
कि तत्त्वार्थभाष्यमान्य सूत्रपाठ मूल है और उसे सुधार कर या बढ़ाकर सर्वार्थसिद्धिमान्य सूत्रपाठ निर्मित हुआ
है। यह तो स्पष्ट है कि किसी एक पाठमें परिवर्तन किया गया हैं पर वह परिवर्तन किस पाठमें किया जाना
सम्भव है यही विचारणीय है। जैसा कि हम देखते हैं कि दिगम्बर परम्पराके अनुसार सर्वत्र कल्पोपपन्न देवोंके
भेद बारह और कल्प सोलह गिनाये गये हैं। कल्प कल्पोपपन्न देवोंके आवासस्थानकी विशेष संज्ञा है। यदि कल्पो-
पपन्न देव बारह प्रकारके होकर भी उनके आवासस्थान सोलह प्रकारके माने गये हैं तो इसमें बाधाको कौन सी
बात है। और इस आधारसे वह कैसे कहा जा सकता है कि सर्वार्थसिद्धिमान्य सूत्रपाठमें सुधार किया गया है।
यदि सुधार करना ही इष्ट होता तो अध्याय ४ सूत्र तीनमें भी 'बारह' के स्थानमें 'सोलह' किया जा सकता
था। प्रत्युत इसपरसे तो यही कहा जा सकता है कि पूज्यपाद स्वामीको जैसा पाठ मिला एकमात्र उसीकी
उन्होंने यथावत् रक्षा की है। दूसरी ओर जब हम तत्त्वार्थभाष्यमान्य पाठकी ओर ध्यान देते हैं तब भी इस
सूत्रके आधारसे किसी निष्कर्ष पर पहुँचना सम्भव प्रतीत नहीं होता। कारण कि वहाँ भी इस सूत्रमें घटा
बढ़ीका ऐसा प्रबल कारण नहीं मिलता जिससे यह कहा जा सके कि उक्त सूत्रमें परिवर्तन किया गया है।
दोनों ही परम्पराओंके आचार्य अपनी-अपनी परम्पराकी मान्यतापर दृढ़ हैं इसलिए इस आधारसे यही कहा
जा सकता है कि जिसने उत्तरकालमें रचना की होगी उसीके द्वारा सूत्रोंमें सुधार करना सम्भव है।
दूसरी सानत्कुमार आदिमें प्रविचारका प्रतिपादक सूत्र है। दोनोंमें इस सूत्रकी स्थिति इस प्रकार है।
१. देखो पं० सुखलालजीके तत्त्वार्थसूत्रकी भूमिका पृ० ८४, ८५ । २. देखो दो सूत्रपाठ प्रकरण, परि-
शिष्ट १ और उसके टिप्पण । ३. देखो अ० ३ सू० २। ४. इस आक्षेपके लिए देखो पं० सुखलालजीका
तत्त्वार्थसूत्र प्रस्तावना ७३ से ८९ ।
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