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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 31, कुल 558 में से

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पृष्ठ 31

प्रस्तावना २७
वे पुनः लिखते हैं-
तत्त्वार्थवृत्तिमुदितां विदितार्थतत्त्वाः शृण्वन्ति ये परिपठन्ति च धर्मभक्त्या।
हस्ते कृतं परमसिद्धिसुखामृतं तैर्मर्त्यामरेश्वरसुखेषु किमस्ति वाच्यम् ॥
सब पदार्थोंके जानकार जो इस तत्त्वार्थवृत्तिको धर्मभक्तिसे सुनते हैं और पढ़ते हैं मानो उन्होंने परम
सिद्धिसुखरूपी अमृतको अपने हाथमें ही कर लिया है। फिर उन्हें चक्रवर्ती और इन्द्रके सुखके विषयमें तो
कहना ही क्या है ?
'सर्वार्थसिद्धि' इस नामके रखनेका प्रयोजन यह है कि इसके मनन करनेसे सब प्रकारके अर्थोंकी अथवा
सब अर्थोंमें श्रेष्ठ मोक्षसुखकी प्राप्ति होती है। यह कथन अत्युक्तिको लिये हुए भी नहीं है, क्योंकि इसमें
तत्त्वार्थसूत्रके जिस प्रमेयका व्याख्यान किया गया है वह सब पुरुषार्थोंमें प्रधानभूत मोक्ष पुरुषार्थका साधक है।
भारतीय परम्पराने अनेक दर्शनोंको जन्म दिया है। किन्तु उन सबके मूलमें मोक्ष पुरुषार्थकी प्राप्ति
प्रधान लक्ष्य रहा है। महर्षि जैमिनि पूर्वमीमांसादर्शनका प्रारम्भ इस सूत्रसे करते हैं-
'ओं अथातो धर्मजिज्ञासा ॥ १ ॥'
और इसके बाद वे धर्मका स्वरूप निर्देश कर उसके साधनोंका विचार करते हैं।
यही स्थिति व्यास महर्षिकी है। उन्होंने शारीरक मीमांसादर्शनको इस सूत्रसे प्रारम्भ किया है-
'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा ॥ १ ॥'
अब न्यायदर्शनके सूत्रोंको देखिए। उसके प्रणेता गौतम महर्षि लिखते हैं कि 'प्रमाण, प्रमेय, संशय,
प्रयोजन, दृष्टान्त, सिद्धान्त, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति और निग्रह-
स्थान इनका तत्त्वज्ञान होनेसे निःश्रेयसकी प्राप्ति होती है ॥ १ ॥' सूत्र इस प्रकार है-
'प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्डाहेत्वाभासच्छलजातिनिग्रह-
स्थानानां तत्त्वज्ञानान्निःश्रेयसाधिगमः ॥ १ ॥'
वैशेषिकदर्शनके प्रणेता महर्षि कणादने भी यह दृष्टि सामने रखी है। वे प्रारम्भमें लिखते हैं -
'अथातो धर्मं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥'
कपिल ऋषिकी स्थिति इससे कुछ भिन्न नहीं है। उन्होंने भी अत्यन्त पुरुषार्थको ही मुख्य माना है।
वे सांख्य दर्शनका प्रारम्भ इन शब्दों द्वारा करते हैं-
'अथ त्रिविधदुःखात्यन्तनिवृत्तिरत्यन्तपुरुषार्थः ॥ १ ॥'
योगदर्शनका प्रारम्भ तो और भी मनोहारी शब्दों द्वारा हुआ है। महर्षि पतञ्जलि कहते हैं- 'अब
योगका अनुशासन करते हैं ॥ १ ॥ योगका अर्थ है चित्तवृत्तिका निरोध ॥ २ ॥ चित्तवृत्तिका निरोध होनेपर
ही द्रष्टाका अपने स्वरूपमें अवस्थान होता है' ॥ ३ ॥ इस विषयके प्रतिपादक उनके सूत्र देखिए-
'अथ योगानुशासनम् ॥ १ ॥ योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः ॥ २ ॥ तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् ॥ ३ ॥'
इन सबके बाद जब हमारी दृष्टि जैन दर्शनके सूत्र ग्रन्थ तत्त्वार्थसूत्र पर जाती है तो हमें वहाँ भी
उसी तत्त्वके दर्शन होते हैं। इसका प्रारम्भ करते हुए आचार्य गृद्धपिच्छ लिखते हैं-
'सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि मोक्षमार्गः ॥१॥१'
यह है भारतीय दर्शनोंके प्रणयनका सार। इसलिए पूज्यपाद स्वामीका यह कहना सर्वथा उचित है
कि 'जो मनुष्य धर्मभक्तिसे इस तत्त्वार्थवृत्तिको पढ़ते और सुनते हैं मानो उन्होंने परम सिद्धिसुखरूपी अमृतको
अपने हाथमें ही कर लिया है। फिर चक्रवर्ती और इन्द्रके सुखोंके विषयमें तो कहना ही क्या है।' इससे
इसका 'सर्वार्थसिद्धि' यह नाम सार्थक है।
रचनाशैली-हम कह आये हैं कि सर्वार्थसिद्धि टीका ग्रन्थ है और टीकाकारने इसे 'वृत्ति' कहा है।
जिसमें सूत्रके पदोंका आश्रय लेकर पद घटनाके साथ प्रत्येक पदका विवेचन किया जाता है उसे वृत्ति कहते हैं।
वृत्तिका यह अर्थ सर्वार्थसिद्धिमें अक्षरशः घटित होता है। सूत्रका शायद ही कोई पद हो जिसका इसमें व्याख्यान
नहीं किया गया है। उदाहरणार्थ-तत्त्वार्थसूत्रके अध्याय १ सूत्र २ में केवल 'तत्त्व' या 'अर्थ' पद न रखकर 'तत्त्वार्थ'
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri