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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 30, कुल 558 में से

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२६ सर्वार्थसिद्धि
आगे चलकर तो ये मतभेद और भी बढ़े हैं। प्रमाणस्वरूप यहाँ हम तत्त्वार्थसूत्रको उस सटिप्पण
प्रतिके कुछ पाठभेद उपस्थित करते हैं जिनका परिचय श्रीमान् पण्डित जुगुलकिशोरजी मुख्तारने अनेकान्त वर्ष
तीन किरण एकमें दिया है। यह प्रति पण्डितजीके पास श्रीमान् पण्डित नाथूरामजी प्रेमीने भेजी थी।
इस प्रतिके आलोडन करनेसे यह तो साफ जाहिर होता है कि यह किसी श्वेताम्बर आचार्यकी कृति
है, क्योंकि इसमें दिगम्बर आचार्योंको जड़, दुरात्मा और सूत्रवचनचोर इत्यादि शब्दों द्वारा सम्बोधित किया
गया है। इसलिए इस प्रतिमें जो पाठभेद या अधिक सूत्र उपलब्ध होते हैं वे काफी महत्त्व रखते हैं। प्रतिमें
पाये जानेवाले अधिक सूत्र ये हैं—
तैजसमपि ५०, धर्मा वंशा शैलाञ्जनारिष्टा माघव्या माधवीति च २, उच्छ्वासाहारवेदनोपपातानुभाव-
तश्च साध्याः २३, स द्विविधः ४२, सम्यक्त्वं च २१, धर्मास्तिकायाभावात् ७।
तत्त्वार्थभाष्यकार इन्हें सूत्र रूपमें स्वीकार नहीं करते। साथ ही तत्त्वार्थभाष्यके मुख्य टीकाकार
हरिभद्रसूरि और सिद्धसेनगणि भी इन्हें सूत्र नहीं मानते, फिर भी टिप्पणकारने इन्हें सूत्र माना है। यदि हम
इनके सूत्र होने और न होनेके मतभेदकी बातको थोड़ी देरको भुला भी दें तो भी इनके मध्यमें पाया जाने-
वाला 'सम्यक्त्वं च' सूत्र किसी भी अवस्थामें नहीं भुलाया जा सकता। तत्त्वार्थभाष्यमें तो इसका उल्लेख
है ही नहीं, अन्य श्वेताम्बर आचार्योंने भी इसका उल्लेख नहीं किया है, फिर भी टिप्पणकार किसी पुराने
आधारसे इसे सूत्र मानते हैं। इतना ही नहीं वे इसे मूल सूत्रकारकी ही कृति मानकर चलते हैं।
यह तो हुई सूत्रभेदकी चर्चा। अब इसके एक पाठभेदको देखिए। दिगम्बर परम्पराके अनुसार तीसरे
अध्यायमें सात क्षेत्रोंके प्रतिपादक सूत्रके आदिमें 'तत्र' पाठ उपलब्ध नहीं होता किन्तु तत्त्वार्थभाष्यमान्य उक्त
सूत्रके प्रारम्भमें 'तत्र' पद उपलब्ध होता है। फिर भी टिप्पणकार यहाँ तत्त्वार्थभाष्यमान्य पाठको स्वीकार
न कर दिगम्बर परम्परामान्य पाठको स्वीकार करते हैं।
यहाँ देखना यह है कि जब तत्त्वार्थसूत्र और तत्त्वार्थभाष्य एक ही व्यक्तिकी कृति थी और श्वेताम्बर
आचार्य इस तथ्यको भलीभाँति समझते थे तब सूत्रपाठके विषयमें इतना मतभेद क्यों हुआ और खासकर उस
अवस्थामें जब कि तत्त्वार्थभाष्य उस द्वारा स्वीकृत पाठको सुनिश्चित कर देता है। हम तो इस समस्त मत-
भेदको देखते हुए इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि तत्त्वार्थभाष्यमान्य सूत्रपाठ स्वीकृत होनेके पहले श्वेताम्बर
परम्परामान्य सूत्रपाठ निश्चित करनेके लिए छोटे-बड़े अनेक प्रयत्न हुए हैं और वे प्रयत्न पीछे तक भी स्वीकृत
होते रहे हैं। यही कारण है कि वाचक उमास्वाति द्वारा तत्त्वार्थभाष्य लिखकर सूत्रपाठके सुनिश्चित कर देने
पर भी उसे वह मान्यता नहीं मिल सकी जो दिगम्बर परम्परामें सर्वार्थसिद्धि और उस द्वारा स्वीकृत सूत्र
पाठको मिली है।
२. सर्वार्थसिद्धि
नामकी सार्थकता—उपलब्ध साहित्यमें सर्वार्थसिद्धि प्रथम टीका है जो तत्त्वार्थसूत्र पर लिखी गयी
है। प्रत्येक अध्यायके अन्तमें स्वयं आचार्य पूज्यपादने समाप्ति सूचक पुष्पिका¹ दी है। उसमें इसका नाम
सर्वार्थसिद्धि बतलाते हुए इसे वृत्तिग्रन्थ रूपसे स्वीकार किया है। इसकी प्रशंसा में टीकाके अन्तमें वे लिखते हैं-
स्वर्गापवर्गसुखमाप्तुमनोभिरार्यैः जैनेन्द्रशासनवरामृतसारभूता ।
सर्वार्थसिद्धिरिति सद्भिरुपात्तनामा तत्त्वार्थवृत्तिरनिशं मनसा प्रधार्या ॥
जो आर्य स्वर्ग और मोक्षसुखके इच्छुक हैं वे जैनेन्द्र शासन रूपी उत्कृष्ट अमृतमें सारभूत और सज्जन
पुरुषों द्वारा रखे गये सर्वार्थसिद्धि इस नामसे प्रख्यात इस तत्त्वार्थवृत्तिको निरन्तर मनःपूर्वक धारण करें।
१ इति सर्वार्थसिद्धिसंज्ञायां तत्त्वार्थवृत्तौ प्रथमोऽध्यायः समाप्तः ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri