सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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पद क्यों रखा है इसका विवेचन दर्शनान्तरोंका निर्देश करते हुए उन्होंने जिस विशदतासे किया है इसीसे
वृत्तिकारकी रचनाशैलीका स्पष्ट आभास मिल जाता है । वे सूत्रगत प्रत्येक पदका साङ्गोपाङ्ग विचार करते
हुए आगे बढ़ते हैं । सूत्रपाठमें जहाँ आगमसे विरोध दिखाई देता है वहाँ वे सूत्रपाठकी यथावत् रक्षा करते
हुए बड़े कौशलसे उसकी सङ्गति बिठलाते हैं । अध्याय ४ सूत्र १९ और सूत्र २२ में उनके इस कौशलके और
भी स्पष्ट दर्शन होते हैं । सूत्र १९ में 'नवग्रैवेयकेषु' न कहकर 'नवसु ग्रैवेयकेषु' कहा है । प्रत्येक आगमा-
भ्यासीसे यह बात छिपी हुई नहीं है कि नौ ग्रैवेयकके सिवा अनुदिश संज्ञक नौ विमान और हैं । किन्तु मूल
सूत्रमें नौ अनुदिशोंका उल्लेख नहीं किया है । आचार्य पूज्यपादसे यह रहस्य छिपा नहीं रहता । वे सूत्रकारकी
मनसाको भाप लेते हैं और 'नव' पदको समसित न रखनेका कारण बतलाते हुए वे स्पष्ट घोषणा करते हैं कि
यहाँ पर नौ अनुदिशोंका ग्रहण करनेके लिए 'नव' पदका पृथक् रूपसे निर्देश किया है । २२ वें सूत्रकी
व्याख्याके समय भी उनके सामने यही समस्या उपस्थित होती है । आगममें दूसरे कल्प तक पीतलेश्याका,
बारहवें कल्पतक पद्मलेश्याका और आगे शुक्ललेश्याका निर्देश किया है। आगमकी इस व्यवस्थाके अनुसार
उक्त सूत्रकी संगति बिठाना बहुत कठिन है । किन्तु वे ऐसे प्रसंग पर जिस साहससे आगम और सूत्रपाठ
दोनोंकी रक्षा करते हैं उसे देखते हुए हमारा मस्तक श्रद्धासे उनके चरणोंमें झुके बिना नहीं रहता ।
पाणिनीय व्याकरण पर पातञ्जल महाभाष्य प्रसिद्ध है । इसमें व्याकरण जैसे नीरस और कठिन
विषयका ऐसो सरस और सरल पद्धतिसे विवेचन किया गया है कि उसे हाथमें लेनेके बाद छोड़नेको जी नहीं
चाहता । यह तो हम आगे चलकर देखेंगे कि सर्वार्थसिद्धिकारने सर्वार्थसिद्धि लिखते समय उसका कितना
उपयोग किया है। यहाँ केवल यही बतलाना है कि इसमें न केवल उसका भरपूर उपयोग हुआ है अपितु उसे
अच्छी तरह पचाकर उसी शैली में इसका निर्माण भी हुआ है । और आश्चर्य यह कि वह व्याकरणका ग्रन्थ
और यह दर्शनका ग्रन्थ फिर भी रचनामें कहीं भी शिथिलता नहीं आने पायी है । सर्वार्थसिद्धिकी रचना
शैलीको हम समतल नदीके गतिशील प्रवाहकी उपमा दे सकते हैं जो स्थिर और प्रशान्त भावसे आगे एक
रूपमें सदा बढ़ता ही रहता है रुकना कहीं वह जानता ही नहीं ।
आचार्य पूज्यपादने इसमें केवल भाषा-सौष्ठवका ही ध्यान नहीं रखा है अपितु आगमिक परम्पराका
भी पूरी तरह निर्वाह किया है । प्रथम अध्यायका सातवाँ और आठवाँ सूत्र इसका प्राञ्जल उदाहरण है । इन
सूत्रों की व्याख्या का आलोडन करते समय उन्होंने सिद्धान्त ग्रन्थों का कितना गहरा अभ्यास किया था इस
बातका सहज ही पता लग जाता है । इस परसे हम यह दृढ़तापूर्वक कहनेका साहस करते हैं कि उन्होंने
सर्वार्थसिद्धि लिखकर जहाँ एक ओर संस्कृत साहित्यकी श्रीवृद्धि की है वहाँ उन्होंने परम्परासे आये हुए
आगमिक साहित्यकी रक्षाका श्रेय भी सम्पादित किया है।
निचोड़ रूपमें सर्वार्थसिद्धिकी रचनाशैलीके विषय में संक्षेपमें यही कहा जा सकता है कि वह ऐसी
प्रसन्न और विषयस्पर्शी शैलीमें लिखी गयी है जिससे वाचक उमास्वातिप्रभृति सभी तत्त्वार्थसूत्रके भाष्यकारों,
वार्तिककारों और टीकाकारोंको उसका अनुसरण करनेके लिए बाध्य होना पड़ा है ।
पाठभेद और अर्थान्तरन्यास—सर्वार्थसिद्धि लिखते समय आचार्य पूज्यपादके सामने तत्त्वार्थ-
सूत्रपर लिखा गया अन्य कोई टीका ग्रन्थ या भाष्यग्रन्थ था इसका तो स्वयं उन्होंने उल्लेख नहीं किया है
किन्तु सर्वार्थसिद्धि परसे इतना अवश्य कहा जा सकता है कि यह लिखते समय उनके सामने एक-दो छोटे-
मोटे टीकाग्रन्थ अवश्य थे और उनमें एक-दो स्थलोंपर महत्त्वपूर्ण पाठभेद भी था । ऐसे पाठभेदोंकी चर्चा
आचार्य पूज्यपादने दो स्थलों पर की है । प्रथम स्थल है प्रथम अध्यायका १६वाँ सूत्र और दूसरा स्थल है
दूसरे अध्यायका ५३वाँ सूत्र ।
१. प्रथम अध्यायका १६वाँ सूत्र इस प्रकार है—
'बहुबहुविधक्षिप्रानिःसृतानुक्तध्रुवाणां सेतराणाम् ॥ १६ ॥'
इसमें क्षिप्रके बाद अनिःसृत पाठ है । किन्तु इस पर आचार्य पूज्यपाद सूचित करते हैं कि 'अपरेषां
क्षिप्रनिःसृत इति पाठः ।' अर्थात् अन्य आचार्योंके मतसे क्षिप्रके बाद अनिःसृतके स्थानपर निःसृत पाठ है ।