सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रस्तावना ३१
अन्तरङ्ग कारणोंका ही निर्देश किया है । इसीसे तत्त्वार्थसूत्रमें वे अन्तरंग कारण ज्ञानावरण, वेदनीय, दर्शन-
मोहनीय, चारित्रमोहनीय और अन्तरायके उदयरूप कहे हैं, अन्यरूप नहीं ।
कुल परीषह २२ हैं । इनमेंसे प्रज्ञा और अज्ञान परीषह ज्ञानावरणके उदयमें होते हैं । ज्ञानावरणका
उदय क्षीणमोह गुणस्थान तक होता है, इसलिए इनका सद्भाव क्षीणमोह गुणस्थान तक कहा है । किन्तु
इसका यह अभिप्राय नहीं कि प्रज्ञा और अज्ञानके निमित्तसे जैसा विकल्प प्रमत्तसंयत जीवके हो सकता है
वैसा वह अप्रमत्तसंयत आदि गुणस्थानोंमें भी होता है । आगेके गुणस्थानोंमें इस प्रकारके विकल्पके न होनेपर
भी वहाँ केवल ज्ञानावरणका उदय पाया जाता है, इसलिए वहाँ इन परीषहोंका सद्भाव कहा है ।
अदर्शनपरीषह दर्शनमोहनीयके उदयमें और अलाभ परीषह अन्तरायके उदयमें होते हैं। यह बात किसी
भी कर्मशास्त्रके अभ्यासीसे छिपी हुई नहीं है कि दर्शनमोहनीयका उदय अधिकसे अधिक अप्रमत्तसंयत गुण-
स्थान तक ही होता है, इसलिए अदर्शन परीषहका सद्भाव अधिकसे अधिक इसी गुणस्थान तक कहा जा
सकता है और अन्तरायका उदय क्षीणमोह गुणस्थान तक होता है, इसलिए अलाभ परीषहका सद्भाव वहाँ तक
कहा है । किन्तु कार्यरूपमें ये दोनों परीषह भी प्रमत्तसंयत गुणस्थान तक ही जानने चाहिए । आगे इनका
सद्भाव दर्शनमोहनीयके उदय और अन्तरायके उदयकी अपेक्षा ही कहा है ।
प्रसङ्गसे यहाँ इस बातका विचार कर लेना भी इष्ट है कि तत्त्वार्थसूत्रकार आचार्य गृद्धपिच्छ बादर-
साम्पराय जीवके सब परीषहोंका सद्भाव बतलाते हुए उन्हें बादरायसाम्पराय शब्दका अर्थ क्या अभिप्रेत रहा
होगा । हम यह तो लिख ही चुके हैं कि दर्शनमोहनीयका उदय अप्रमत्तसंयतगुणस्थान तक ही होता है,
इसलिए अदर्शनपरीषहका सद्भाव अप्रमत्तसंयत गुणस्थानसे आगे कथमपि नहीं माना जा सकता । ऐसी
अवस्थामें बादरसाम्पराय का अर्थ स्थूल कषाय युक्त जीव ही हो सकता है । यही कारण है कि सर्वार्थसिद्धिमें
इस पदकी व्याख्या करते हुए यह कहा है कि 'यह गुणस्थान विशेषका ग्रहण नहीं है । तो क्या है ? सार्थक
निर्देश है । इससे प्रमत्त आदि संयतोंका ग्रहण होता है' ।¹
किन्तु तत्त्वार्थभाष्यमें 'बादरसाम्पराये सर्वे ।' इस सूत्रकी व्याख्या इन शब्दोंमें की है—'बादरसाम्प-
रायसंयते सर्वे द्वाविंशतिरपि परीषहाः सम्भवन्ति ।' अर्थात् बादरसाम्पराय संयतके सब अर्थात् बाईस परीषह
ही सम्भव हैं । तत्त्वार्थभाष्यके मुख्य व्याख्याकार सिद्धसेनगणि हैं । वे तत्त्वार्थभाष्यके उक्त शब्दोंकी व्याख्या
इन शब्दोंमें करते हैं—
'बादरः स्थूलः साम्परायः कषायस्तदुदयो यस्यासौ बादरसाम्परायः संयतः । स च मोहप्रकृतोः
कश्चिदुषशमयतीत्युपशमकः । कश्चित् क्षपयतीति क्षपकः । तत्र सर्वेषां द्वाविंशतेरपि क्षुदादीनां परीषहाणाम-
दर्शनान्तानां सम्भवः ।'
जिसके कषाय स्थूल होता है वह बादरसाम्पराय संयत कहलाता है । उनमेंसे कोई मोहनीयका
उपशम करता है इसलिए उपशमक कहलाता है और कोई क्षय करता है इसलिए क्षपक कहलाता है । इसके
सभी बाईस क्षुधा आदि परीषहोंका सद्भाव सम्भव है ।
इस व्याख्यानसे स्पष्ट है कि सिद्धसेनगणिके अभिप्रायसे तत्त्वार्थभाष्यकार वाचक उमास्वातिको यहाँ
'बादरसाम्पराय' पदसे नौवां गुणस्थान ही इष्ट है । प्रज्ञाचक्षु पं० सुखलालजीने तत्त्वार्थसूत्रकी व्याख्यामें यही
अर्थ स्वीकार किया है । वे लिखते हैं—'जिसमें साम्पराय-कषायका बादर अर्थात् विशेषरूपमें सम्भव हो
ऐसे बादरसाम्पराय नामक नौवें गुणस्थानमें बाईस परीषह होते हैं । इसका कारण यह है कि परीषहोंके
कारणभूत सभी कर्म वहाँ होते हैं ।'
'बादरसाम्पराय' पदकी ये दो व्याख्याएँ हैं जो क्रमशः सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थभाष्यमें उपलब्ध
होती हैं । सर्वार्थसिद्धिकी व्याख्याके अनुसार 'बादरसाम्पराय पद गुणस्थान-विशेषाका सूचक न होकर अर्थ-
१. नेदं गुणस्थानविशेषग्रहणम् । किं तर्हि ? अर्थनिर्देशः । तेन प्रमत्तादीनां संयतादीनां ग्रहणम् । स०,
अ० ९, सू० १२ ।