सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३० सर्वार्थसिद्धि
पाठः' के स्थानमें 'चरमदेहोत्तमपुरुषा इति वा पाठः' ऐसा उल्लेख करते, क्योंकि उन्हें 'चरमोत्तमदेह' इस
पाठके स्थानमें दूसरा पाठ क्या उपलब्ध होता है इसका निर्णय करना था । ऐसी अवस्थामें अधूरे पाठान्तरका
भूल कर भी वे उल्लेख नहीं करते ।
स्पष्ट है कि 'क्षिप्रनिःसृत' के समान यह पाठान्तर भी आचार्य पूज्यपादको दूसरे टीका ग्रन्थोंमें उप-
लब्ध हुआ होगा और उसी आधारसे उन्होंने यहाँ उसका उल्लेख किया है ।
३. अर्थान्तरन्यासका एक उदाहरण हम रचना शैलीके प्रसंगसे अध्याय ४ सूत्र २२ का उल्लेख करते
समय दे आये हैं। वहाँ हमने यह संकेत किया ही है कि उक्त सूत्रमें पूरे आगमिक अर्थकी संगति बैठती न
देख आचार्य पूज्यपादने सूत्र और आगम दोनोंका सुन्दरता पूर्वक निर्वाह किया है। यह प्रथम अर्थान्तरन्यासका
उदाहरण है।
४. द्वितीय उदाहरण स्वरूप हम ९वें अध्यायका ११ वाँ सूत्र उपस्थित करते हैं। इसमें वेदनीय
निमित्तक ११ परीषह जिनके कही गयी हैं। इस विषयको अधिक स्पष्ट करनेके लिए हम थोड़ी विस्तारके
साथ चर्चा करना इष्ट मानेंगे ।
परीषहोंका विचार छठवें गुणस्थानसे किया जाता है, क्योंकि श्रामण्य पदका प्रारम्भ यहींसे होता है,
अतः इस गुणस्थानमें सब परीषह होते हैं यह तो ठीक ही है, क्योंकि इस गुणस्थानमें प्रमादका सद्भाव रहता
है और प्रमादके सद्भावमें क्षुधादिजन्य विकल्प और उसके परिहारके लिए चित्तवृत्तिको उस ओरसे हटाकर
धर्म्यध्यानमें लगानेके लिए प्रयत्नशील होना यह दोनों कार्य बन जाते हैं। तथा सातवें गुणस्थानकी स्थिति
प्रमाद रहित होकर भी इससे भिन्न नहीं है, क्योंकि इन दोनों गुणस्थानोंमें प्रमाद और अप्रमादजन्य ही भेद
है। यद्यपि विकल्प और तदनुकूल प्रवृत्तिका नाम छठा गुणस्थान है और उसके निरोधका नाम सातवाँ
गुणस्थान है। तथापि इन दोनों गुणस्थानोंकी धारा इतनी अधिक चढ़ा-उतारकी है जिससे उनमें परीषह और
उनके जय आदि कार्योंका ठीक तरहसे विभाजन न होकर ये कार्य मिलकर दोनोंके मानने पड़ते हैं। छठे
गुणस्थान तक वेदनीयकी उदीरणा होती है आगे नहीं, इसलिए यह कहा जा सकता है कि वेदनीयके निमित्तसे
जो क्षुधादिजन्य वेदनकार्य छठे गुणस्थानमें होता है वह आगे कथमपि सम्भव नहीं । विचारकर देखने पर
बात तो ऐसी ही प्रतीत होती है और है भी वह वैसी ही, क्योंकि अप्रमत्तसंयत आदि गुणस्थानोंमें जब जीवकी
न तो बाह्यप्रवृत्ति होती है और न बाह्यप्रवृत्तिके अनुकूल परिणाम ही होते हैं तब वहाँ क्षुधादि परीषहोंका
सद्भाव मानना कहाँतक उचित है यह विचारणीय हो जाता है। इसलिए यहाँ यह देखना है कि आगेके
गुणस्थानोंमें इन परीषहोंका सद्भाव किस दृष्टिसे माना गया है।
किसी भी पदार्थका विचार दो दृष्टियोंसे किया जाता है—एक तो कार्यकी दृष्टिसे और दूसरे कारणकी
दृष्टिसे । परीषहोंका कार्य क्या है और उनके कारण क्या हैं इस विषयका साङ्गोपाङ्ग ऊहापोह शास्त्रोंमें
किया है। परीषह तथा उनके जयका अर्थ है—बाधाके कारण उपस्थित होनेपर उनमें जाते हुए अपने चित्तको
रोकना तथा स्वाध्याय ध्यान आदि आवश्यक कार्योंमें लगे रहना । परीषह और उनके जयके इस स्वरूपको
ध्यानमें रखकर विचार करने पर ज्ञात होता है कि एक प्रमत्तसंयत गुणस्थान ही ऐसा है जिसमें बाधाके कारण
उपस्थित होनेपर उनमें चित्त जाता है और उनसे चित्तवृत्तिको रोकनेके लिए यह जीव उद्यमशील होता है।
किन्तु आगेके गुणस्थानोंकी स्थिति इससे भिन्न है। वहाँ बाह्य कारणोंके रहनेपर भी उनमें चित्तवृत्तिका रंच-
मात्र भी प्रवेश नहीं होता। इतना ही नहीं, कुछ आगे चलकर तो यह स्थिति उत्पन्न हो जाती है कि जहाँ न
तो बाह्य कारण ही उपस्थित होते हैं और न चित्तवृत्ति ही शेष रहती है। इसलिए इन गुणस्थानोंमें केवल
अन्तरंग कारणोंको ध्यानमें रखकर ही परीषहोंका निर्देश किया गया है। कारण भी दो प्रकारके होते हैं—एक
बाह्य कारण और दूसरे अन्तरङ्ग कारण । बाह्य कारणोंके उपस्थित होनेका तो कोई नियम नहीं है। किन्हींको
उनकी प्राप्ति सम्भव भी है और किन्हींको नहीं भी । परन्तु अन्तरङ्ग कारण सबके पाये जाते हैं । यही कारण
है कि दिगम्बर और श्वेताम्बर दोनों परम्पराओंके ग्रन्थोंमें परीषहोंके कारणोंका विचार करते समय मुख्यरूपसे