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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 33, कुल 558 में से

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पृष्ठ 33

प्रस्तावना २९
वर्तमानमें हमारे सामने दिगम्बर और श्वेताम्बर जितने भी तत्त्वार्थसूत्रके टीकाग्रन्थ और सूत्रपाठ
उपस्थित हैं उनमेंसे किसीमें भी यह दूसरा पाठ उपलब्ध नहीं होता, इसलिए यह तो कहा ही नहीं जा सकता
कि इनमेंसे किसी एक टीकाग्रन्थ या सूत्रपाठके आधारसे आचार्य पूज्यपादने इस मतभेदका उल्लेख किया है।
तत्त्वार्थभाष्यकार वाचक उमास्वातिने अवश्य ही सर्वार्थसिद्धिमान्य 'अनिःसृत' पदको स्वीकार न कर उसके
स्थानमें 'अनिश्रित' पाठ स्वीकार किया है। इसलिए यह भी शंका नहीं होती कि आचार्य पूज्यपादके सामने
तत्त्वार्थभाष्य या तत्त्वार्थभाष्यमान्य सूत्रपाठ था और उन्होंने इस पाठान्तर द्वारा उसकी ओर इशारा किया
है। सम्भव यही दिखाई देता है कि सर्वार्थसिद्धि टीका लिखते समय उनके सामने जो टीका-टिप्पणियां उपस्थित
थीं उनमेंसे किन्हींमें यह दूसरा पाठ रहा होगा और उसी आधारसे आचार्य पूज्यपादने उस पाठभेदका यहाँ
उल्लेख किया है। इतना ही नहीं किन्तु किसी टीकाग्रन्थमें उसकी संगति भी बिठलायी गयी होगी। यही
कारण है कि आचार्य पूज्यपाद केवल पाठभेदका उल्लेख करके ही नहीं रह गये। किन्तु इस पाठको स्वीकार
कर लेनेपर उसकी व्याख्या दूसरे आचार्य किस प्रकार करते हैं इस बातका भी उन्होंने 'ते एवं वर्णयन्ति'
इत्यादि वाक्य द्वारा उल्लेख किया है।
२. दूसरे अध्यायका ५३ वाँ सूत्र इस प्रकार है—
'औपपादिकचरमोत्तमदेहासंख्येयवर्षायुषोऽनपवर्त्यायुषः ॥ ५३ ॥'
समें 'चरमोत्तमदेह' पाठ है। इससे यह भ्रम होता है कि क्या चरमशरीरी सभी उत्तम देहवाले
होते हैं या कोई-कोई । यदि सभी उत्तम देहवाले होते हैं तो उत्तम पदके देनेकी क्या आवश्यकता है। और
यदि कोई कोई उत्तम देहवाले होते हैं तो फिर क्या यह माना जाय कि जो चरमशरीरी उत्तम देहवाले होते
हैं केवल वे ही अनपवर्त्य आयुवाले होते हैं अन्य चरमशरीरी नहीं ? बहुत सम्भव है कि इसी दोषका
परिहार करनेके लिए किसीने 'चरमदेह' पाठ स्वीकार किया होगा। यह भी सम्भव है कि आचार्य गृद्धपिच्छने
ही 'चरमदेह' पाठ स्वीकार किया हो। जो कुछ भी हो। पूज्यपाद आचार्यके सामने दोनों पाठ थे और
उन्होंने 'चरमोत्तमदेह' पाठको सूत्रकारका मानकर स्वीकार कर लिया और 'चरमदेह' पाठका पाठान्तरके
रूपमें उल्लेख कर दिया ।
तत्त्वार्थभाष्यमान्य जो सूत्रपाठ इस समय उपलब्ध होता है उसमें 'चरमदेहोत्तमपुरुष' पाठ है। इस
परसे कुछ विद्वान् यह शंका करते हैं कि बहुत सम्भव है कि आचार्य पूज्यपादके सामने तत्त्वार्थभाष्य रहा हो
और उसके आधारसे उन्होंने सर्वार्थसिद्धिमें इस पाठान्तरका उल्लेख किया हो; किन्तु हमें उनके इस कथनमें
कुछ भी तथ्यांश नहीं दिखाई देता। कारण एक तो तत्त्वार्थभाष्यमें 'चरमदेह' पाठ ही नहीं है। उसमें
'चरमदेहोत्तमपुरुष' पाठ अवश्य ही उपलब्ध होता है किन्तु इस पाठके विषयमें भी उसकी स्थिति धुंधली है।
आचार्य सिद्धसेनने अपनी तत्त्वार्थभाष्यकी टीकामें इस प्रसंगको उठाया है और अन्तमें यही कहा है कि
हम नहीं कह सकते कि इस सम्बन्धमें वस्तुस्थिति क्या है।
दूसरे यदि आचार्य पूज्यपादके सामने तत्त्वार्थभाष्यका पाठ उपस्थित होता तो वे 'चरमदेहा¹ इति वा
१. यद्यपि वाचक उमास्वातिने 'औपपातिक' सूत्रके प्रत्येक पदका व्याख्यान करते हुए 'उत्तमपुरुष' पदका
स्वतन्त्र व्याख्यान किया है और बादमें उपसंहार करते हुए उन्होंने 'उत्तमपुरुष पदको छोड़कर शेषको ही
अनपवर्त्य आयुवाले बतलाया है, इसलिए इस परसे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि 'चरमदेहोत्तमपुरुष'
पदके समान केवल 'चरमदेह' पद भी उन्हें स्वयं इष्ट रहा है और बहुत सम्भव है कि आचार्य पूज्यपादने इसी
आधारसे पाठान्तरका सूचन किया हो। किन्तु यहाँ देखना यह है कि वाचक उमास्वातिने स्वयं सूत्रकार होते हुए
भाष्यमें ये दो पाठ किस आधारसे स्वीकार किये हैं। जब उनका यह निश्चय था कि उत्तमपुरुष भी अनपवर्त्य
आयुवाले होते हैं तब उपसंहार करते हुए अन्योंके साथ उनका भी ग्रहण करना था। किन्तु उन्होंने ऐसा नहीं
किया। इससे स्पष्ट विदित होता है कि वाचक उमास्वातिको भी दो पाठ उपलब्ध हुए होंगे और उन्होंने क्रमसे
दोनोंका व्याख्यान करना उचित समझा होगा। इस आधारसे वे सूत्रकार तो किसी हालतमें हो ही नहीं सकते।