सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रस्तावना ३५
है। उन्होंने तत्त्वार्थसूत्रके जिन सूत्रोंमें 'काल' शब्द आया है वहाँ तो उनकी व्याख्या करते हुए 'काल' शब्दका
ही उपयोग किया है किन्तु जिन सूत्रोंमें 'काल' शब्द नहीं आया है और वहाँ 'काल'का उल्लेख करना उन्होंने
आवश्यक समझा तो 'काल' शब्दका प्रयोग न कर 'अद्धासमय'¹ 'शब्दका ही प्रयोग किया है।
तत्त्वार्थभाष्य और उस मान्य सूत्रपाठकी ये दो स्थितियाँ हैं जो हमें इस निष्कर्षपर पहुँचानेमें सहा-
यता करती हैं कि प्रारम्भमें तो 'कालश्च' इस प्रकारके सूत्रका ही निर्माण हुआ होगा किन्तु बादमें वह बदल-
कर 'कालश्चेत्येके' यह रूप ले लेता है।
यहाँ प्रसंगसे सूत्र रचनाकी शैलीके विषयमें भी दो शब्द कहने हैं। सर्वार्थसिद्धिमान्य सूत्रपाठको देखते
हुए तो यह कहा जा सकता है कि परिशेषन्यायसे उसमें कोई भी बात नहीं कही गयी है। वह सीधी सूत्र और
उनके पदोंकी व्याख्या करते हुए आगे बढ़ती है। इसके विपरीत दूसरी ओर जब हम तत्त्वार्थभाष्यको देखते
हैं तो उसमें हमें कोई एक निश्चित शैलीके दर्शन नहीं होते हैं। कहीं वे परिशेषन्यायको स्वीकार करते हैं और
कहीं नहीं। जैसे 'शेषाणां संमूर्छनम्' और 'अशुभः पापस्य' ये दो सूत्र परिशेषन्यायसे नहीं कहे जाने चाहिए
थे फिर भी उन्होंने इनको स्वतन्त्र सूत्र मान लिया है और 'शेषास्त्रिवेदाः' तथा 'अतोऽन्यत्पापम्' इनको छोड़
दिया। ऐसी अवस्थामें यह कहना कि आचार्य पूज्यपादने तत्त्वार्थभाष्यको देखकर इन्हें स्वतन्त्र सूत्रोंका रूप
दिया है युक्तियुक्त प्रतीत नहीं होता। वस्तुतः तत्त्वार्थभाष्यकार अपनेको ऐसी स्थितिमें नहीं रख सके हैं जिससे
उनके विषयमें कोई निश्चित रेखा खींची जा सके। एक दूसरे अध्याय के शरीर प्रकरणको ही लीजिए। उसमें
वैक्रियिक शरीरकी उत्पत्तिके दोनों प्रकार तो सूत्रोंमें दिखा दिये किन्तु जब तैजस शरीरका प्रसंग आया तो
उसकी उत्पत्तिके प्रकारको सूत्रमें दिखलाना उन्होंने आवश्यक नहीं समझा। क्या इस प्रकरणको देखते हुए यह
कहा जा सकता है कि यह असंगति मूलसूत्रकारको रुचिकर प्रतीत रही होगी। तत्त्वार्थभाष्यके अन्य सूत्रोंमें
भी ऐसी असंगतियाँ दीख पड़ती हैं। चौथे अध्यायमें लौकान्तिक देवोंका प्रतिपादक सूत्र आता है। उसमें
लौकान्तिक देवोंके भेदोंका प्रतिपादन करते समय नौ भेद दर्शाये हैं किन्तु तत्त्वार्थभाष्यमें 'एते सारस्वता-
दयोऽष्टविधा देवाः' इन शब्दों द्वारा वे आठ ही रह गये हैं।
वे भी ऐसे उदाहरण हैं जो तत्त्वार्थभाष्यमान्य सूत्रपाठकी स्थितिमें सन्देह उत्पन्न करते हैं और यह
माननेके लिए बाध्य करते हैं कि बहुत सम्भव है कि सर्वार्थसिद्धिमान्य सूत्रपाठ पुराना हो और उसमें ऐच्छिक
परिवर्तन कर तत्त्वार्थभाष्यमान्य सूत्रपाठकी रचना की गयी हो।
पौर्वापर्यविचार—पिछले प्रकरणसे यद्यपि सर्वार्थसिद्धि और तत्त्वार्थभाष्यकी स्थिति बहुत कुछ स्पष्ट
हो जाती है। तथापि कुछ अत्युपयोगी विषयोंपर प्रकाश डालना आवश्यक प्रतीत होता है; क्योंकि अन्तमें
हमें यह देखना है कि इनकी रचनाकी आनुपूर्वी क्या है। इस प्रकरणको विशेष स्फुट करनेके लिए सर्व-प्रथम
हम समान स्थलोंका ऊहापोह करेंगे और उसके बाद उन स्थलोंको स्पर्श करेंगे जिससे इनके पौर्वापर्यके ऊपर
प्रकाश पड़ता है; क्योंकि सर्वप्रथम हमें यह दिखलाना है कि इन दोनों ग्रन्थोंकी स्थिति ऐसी है कि किसी
एकको सामने रखकर दूसरा लिखा गया है और अन्तमें यह विचार करना है कि यह अनुसरणकी प्रवृत्ति
किसमें स्वीकार की गयी है।
सर्वप्रथम प्रथम अध्यायका प्रथम सूत्र ही लीजिए। इसमें सर्वार्थसिद्धिमें यह वाक्य आता है—
एतेषां स्वरूपं लक्षणतो विधानतश्च पुरस्ताद्विस्तरेण निर्देश्यामः ।
यही वाक्य तत्त्वार्थभाष्यमें कुछ शब्दोंके हेर-फेरके साथ इन शब्दों द्वारा स्फुट किया गया है—
तं पुरस्ताल्लक्षणतो विधानतश्च विस्तरेणोपदेक्ष्यामः ।
१. अ० ५ सू० १ ।