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सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

सिन्ध्वादयः सप्त पूर्वगा इति प्राप्तम् । नैष दोषः; द्वयोर्द्वयोरित्यभिसंबन्धात् । द्वयोर्द्वयोः पूर्वाः
पूर्वगा इति वेदितव्याः ।
§ ४०७. इतरासां दिग्भागप्रतिपत्त्यर्थमाह—
शेषास्त्वपरगाः ॥२२॥
§ ४०८. द्वयोर्द्वयोर्या अवशिष्टास्ता अपरगाः प्रत्येतव्याः । अपरसमुद्रं गच्छन्तीत्यपरगाः ।
तत्र पद्मह्रदप्रभवा पूर्वतोरणद्वारनिर्गता गङ्गा । अपरतोरणद्वारनिर्गता सिन्धुः । उदीच्यतोरणद्वार-
निर्गता रोहितास्या । महापद्मह्रदप्रभवा १अवाच्यतोरणद्वारनिर्गता रोहित् । उदीच्यतोरणद्वार-
निर्गता हरिकान्ता । तिगिञ्छह्रदप्रभवा दक्षिणतोरणद्वारनिर्गता हरित् । उदीच्यतोरणद्वारनिर्गता
सीतोदा । केसरिह्रदप्रभवा अवाच्यतोरणद्वारनिर्गता सीता । उदीच्यतोरणद्वारनिर्गता नरकान्ता ।
महापुण्डरीकह्रदप्रभवा दक्षिणद्वारनिर्गता नारी । उदीच्यतोरणद्वारनिर्गता रूप्यकूला । पुण्डरीक-
ह्रदप्रभवा अवाच्यतोरणद्वारनिर्गता सुवर्णकूला । पूर्वतोरणद्वारनिर्गता रक्ता । २प्रतीच्यतोरणद्वार-
निर्गता रक्तोदा ।
§ ४०९. तासां परिवारप्रतिपादनार्थमाह—
चतुर्दशनदीसहस्रपरिवृत्ता गङ्गासिन्ध्वादयो नद्यः ॥२३॥
§ ४१०. किमर्थं 'गङ्गासिन्ध्वादि' ग्रहणं क्रियते । नदीग्रहणार्थम् । प्रकृतास्ता अभिसंब-
शंका—पूर्वत्व किस अपेक्षासे है ? समाधान—सूत्रमें किये गये निर्देशकी अपेक्षा । शंका—यदि
ऐसा है तो गंगा, सिन्धु आदि सात नदियां पूर्व समुद्रको जानेवाली प्राप्त होती हैं ? समाधान—यह
कोई दोष नहीं, क्योंकि 'द्वयोः द्वयोः' इन पदोंका सम्बन्ध है । तात्पर्य यह है कि दो-दो नदियोंमें-से
प्रथम-प्रथम नदी बहकर पूर्व समुद्रमें मिली है ।
§ ४०७. अब इतर नदियोंके दिशाविशेषका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
किन्तु शेष नदियाँ पश्चिम समुद्रको जाती हैं ॥ २२ ॥
§ ४०८. दो-दो नदियोंमें जो शेष नदियाँ हैं वे बहकर पश्चिम समुद्रमें मिली हैं । 'अपरगाः'
पदका अर्थ अपर समुद्रको जाती हैं यह है । उनमें-से पद्म तालाबसे उत्पन्न हुई और पूर्व तोरण
द्वारसे निकली हुई गंगा नदी है । पश्चिम तोरण द्वारसे निकली हुई सिन्धु नदी है तथा उत्तर
तोरण द्वारसे निकली हुई रोहितास्या नदी है । महापद्म तालाबसे उत्पन्न हुई और दक्षिण तोरण-
द्वारसे निकली हुई रोहित नदी है तथा उत्तर तोरणद्वारसे निकली हुई हरिकान्ता नदी है। तिगिञ्छ
तालाबसे उत्पन्न हुई और दक्षिण तोरणद्वारसे निकली हुई हरित नदी है और उत्तर तोरण द्वारसे
निकली हुई सीतोदा नदी है । केसरी तालाबसे उत्पन्न हुई और दक्षिण तोरणद्वारसे निकली हुई
सीता नदी है तथा उत्तर तोरणद्वारसे निकली हुई नरकान्ता नदी है । महापुण्डरीक तालाबसे
उत्पन्न हुई और दक्षिण तोरणद्वारसे निकली हुई नारी नदी है । तथा उत्तर तोरणद्वारसे निकली
हुई रूप्यकूला नदी है । पुण्डरीक तालाबसे उत्पन्न हुई और दक्षिण तोरणद्वारसे निकली हुई
सुवर्णकूला नदी है । पूर्व तोरणद्वारसे निकली हुई रक्ता नदी है और पश्चिम तोरणद्वारसे निकली
हुई रक्तोदा नदी है ।
§ ४०९. अब इनकी परिवार-नदियोंका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
गंगा और सिन्धु आदि नदियोंको चौदह-चौदह हजार परिवार नदियाँ हैं ॥ २३ ॥
§ ४१०. शंका—'गंगा सिन्धु आदि' पदका ग्रहण किसलिए किया है ? समाधान—नदियों-
१. अपाच्यतोरण-आ० २, दि० १, दि० २, ता०, ना० । २. अपरतोरण-मु० ।

  • ३।२५ § ४१४ ] तृतीयोऽध्यायः १६१

ध्यन्ते । नैवं शङ्क्यम्; 'अनन्तरस्य विधिर्वा भवति प्रतिषेधो वा' इति अपरगाणामेव ग्रहणं स्यात् ।
गङ्गादिग्रहणमेवास्तीति चेत् । पूर्वगाणामेव ग्रहणं स्यात् । अत उभयीनां ग्रहणार्थं 'गङ्गासिन्ध्वादि'
ग्रहणं क्रियते । 'नदी'ग्रहणं द्विगुणा द्विगुणा इत्यभिसंबन्धार्थम् । गङ्गा चतुर्दशनदीसहस्रपरिवृता ।
सिन्धुरपि । एवमुत्तरा अपि नद्यः प्रतिक्षेत्रं तद्द्विगुणद्विगुणा² भवन्ति; आ विदेहान्तात् । तत उत्तरा
अर्द्धार्द्धहीनाः ।
§ ४११. उक्तानां क्षेत्राणां विष्कम्भप्रतिपत्त्यर्थमाह—
भरतः षड्विंशपञ्चयोजनशतविस्तारः षट् चैकोनविंशतिभागा योजनस्य ॥२४॥
§ ४१२. षडधिका विंशतिः षड्विंशतिः । षड्विंशतिरधिका³ येषु तानि षड्विंशानि ।
षड्विंशानि पञ्चयोजनशतानि विस्तारो यस्य षड्विंशपञ्चयोजनशतविस्तारो भरतः । किमेता-
वानेव । न; इत्याह षट् चैकोनविंशतिभागा योजनस्य विस्तारोऽस्येत्यभिसंबध्यते ।
§ ४१३. इतरेषां विष्कम्भविशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह—
तद्द्विगुणद्विगुणविस्तारा वर्षधरवर्षा विदेहान्ताः ॥२५॥
§ ४१४. ⁴ततो भरताद् द्विगुणो द्विगुणो विस्तारो येषां त इमे तद्द्विगुणद्विगुणविस्ताराः। के
ते वर्षधरवर्षाः । किं सर्वे । न; इत्याह विदेहान्ता इति ।
का ग्रहण करनेके लिए। शंका—उनका तो प्रकरण है ही, अतः 'गंगासिन्ध्वादि' पदके बिना ग्रहण
किये ही उनका सम्बन्ध हो जाता है ? समाधान—ऐसी शंका नहीं करनी चाहिए, क्योंकि 'अनन्तर-
का विधान होता है या प्रतिषेध' इस नियमके अनुसार पश्चिमकी ओर बहनेवाली नदियोंका ही
ग्रहण होता जो कि इष्ट नहीं अतः सूत्रमें 'गंगासिन्ध्वादि' पद दिया है। शंका—तो सूत्रमें 'गंगादि'
इतने पदका ही ग्रहण रहे ? समाधान—यदि 'गंगादि' इतना पदका ही ग्रहण किया जाये तो पूर्व-
की ओर बहनेवाली नदियोंका ही ग्रहण होवे जो भी इष्ट नहीं। अतः दोनों प्रकारकी नदियोंका
ग्रहण करनेके लिए 'गंगासिन्ध्वादि' पदका ग्रहण किया है। यद्यपि 'गंगासिन्ध्वादि' इतने पदके
ग्रहण करनेसे ही यह बोध हो जाता है कि ये नदियां हैं फिर भी सूत्रमें जो 'नदी' पदका ग्रहण
किया है वह 'द्विगुणा द्विगुणाः' इसके सम्बन्धके लिए किया है। गंगाकी परिवार नदियां चौदह
हजार हैं। इसी प्रकार सिन्धुकी भी परिवार नदियां चौदह हजार हैं। इस प्रकार आगेकी परिवार
नदियां विदेह क्षेत्र पर्यन्त दूनी-दूनी होती गयी हैं। और इससे आगेकी परिवार नदियां आधी-
आधी होती गयी हैं।
§ ४११. अब उक्त क्षेत्रोंके विस्तारका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
भरत क्षेत्रका विस्तार पाँच सौ छब्बीस सही छह बटे उन्नीस योजन है ॥ २४ ॥
§ ४१२. यहाँ टीकामें 'पहले 'षड्विंशपञ्चयोजनशतविस्तारः' पदका समास किया गया
है जिसका अभिप्राय यह है कि भरतवर्ष पांच सौ छब्बीस योजनप्रमाण विस्तार है ? शंका—क्या
इसका इतना ही विस्तार है ? समाधान—नहीं, क्योंकि इसका एक योजनका छह बटे उन्नीस
योजन विस्तार और जोड़ लेना चाहिए।
§ ४१३. अब इतर क्षेत्रोंके विस्तार विशेषका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
विदेह पर्यन्त पर्वत और क्षेत्रोंका विस्तार भरत क्षेत्रके विस्तारसे दूना-दूना है ॥ २५ ॥
§ ४१४. जिनका भरतसे दूना-दूना विस्तार है वे भरतसे दूने-दूने विस्तारवाले कहे गये हैं।
यहाँ 'तद्द्विगुणद्विगुणविस्ताराः' में बहुव्रीहि समास है। शंका—वे दूने-दूने विस्तारवाले क्या हैं ?
समाधान—पर्वत और क्षेत्र। शंका—क्या सबका दूना-दूना विस्तार है ? समाधान—नहीं, किन्तु
१. पा० म० मा०, पृ० ३३५ । २. -क्षेत्रं द्विगुणा द्विगुणा मु० । ३. -रधिकानि येषु मु० । ४. ततो
द्विगुणो ता०, ना० ।
२१

§ ४१५. अथोत्तरेषां कथमित्यत आह—
उत्तरा दक्षिणतुल्याः ॥२६॥
§ ४१६. उत्तरा ऐरावतादयो नीलान्ता भरतादिभिर्दक्षिणैस्तुल्या द्रष्टव्याः । अतीतस्य
सर्वस्यायं विशेषो वेदितव्यः । तेन ह्रदपुष्करादीनां तुल्यता योज्या ।
§ ४१७. अत्राह, उक्तेषु भरतादिषु क्षेत्रेषु मनुष्याणां किं तुल्योऽनुभवादिः१, आहोस्विदस्ति
कश्चित्प्रतिविशेष इत्यत्रोच्यते—
भरतैरावतयोर्वृद्धिह्रासौ षट्समयाभ्यामुत्सर्पिण्यवसर्पिणीभ्याम् ॥२७॥
§ ४१८. वृद्धिश्च ह्रासश्च वृद्धिह्रासौ । काभ्याम् । षट्समयाभ्यामुत्सर्पिण्यवसर्पिणीभ्याम् ।
कयोः । भरतैरावतयोः । न तयोः क्षेत्रयोर्वृद्धिह्रासौ स्तः; असंभवात् । तत्स्थानां मनुष्याणां वृद्धि-
ह्रासौ भवतः । अथवाधिकरणनिर्देशः । भरते ऐरावते च मनुष्याणां वृद्धिह्रासाविति । किंकृतौ
वृद्धिह्रासौ । अनुभवायुःप्रमाणादिकृतौ । अनुभव उपभोगः, आयुर्जीवितपरिमाणम्३, प्रमाणं
शरीरोत्सेध इत्येवमादिभिर्वृद्धिह्रासौ मनुष्याणां भवतः४ । किंहेतुकौ पुनस्तौ । कालहेतुकौ । स च
कालो द्विविधः-उत्सर्पिणी अवसर्पिणी चेति । तद्भेदाः प्रत्येकं षट् । अन्वर्थसंज्ञे चैते । अनुभवादि-
विदेह तक दूना-दूना विस्तार है ।
§ ४१५. आगेके पर्वत और क्षेत्रोंका विस्तार किस प्रकार है अब इस बात के बतलानेके लिए
आगेका सूत्र कहते हैं—
उत्तरके क्षेत्र और पर्वतोंका विस्तार दक्षिणके क्षेत्र और पर्वतोंके समान है ॥ २६ ॥
§ ४१६. 'उत्तर' इस पदसे ऐरावत क्षेत्रसे लेकर नील पर्यन्त क्षेत्र और पर्वत लिये गये हैं ।
इनका विस्तार दक्षिण दिशावर्ती भरतादिके समान जानना चाहिए । पहले जितना भी कथन कर
आये हैं उन सबमें यह विशेषता जाननी चाहिए । इससे तालाब और कमल आदिकी समानता
लगा लेनी चाहिए ।
§ ४१७. यहाँपर शंकाकार कहता है कि इन पूर्वोक्त, भरतादि क्षेत्रोंमें मनुष्योंका अनुभव आदि
क्या समान हैं या कुछ विशेषता है । इस शंकाका समाधान करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
भरत और ऐरावत क्षेत्रोंमें उत्सर्पिणीके. और अवसर्पिणीके छह समयोंकी अपेक्षा वृद्धि और
ह्रास होता रहता है ॥ २७ ॥
§ ४१८. वृद्धि और ह्रास इन दोनों पदोंमें कर्मधारय समास है । शंका—किनकी अपेक्षा
वृद्धि और ह्रास होता है ? समाधान—छह समयोंकी अपेक्षा । शंका—किनका छह समयोंकी
अपेक्षा वृद्धि और ह्रास होता है ? समाधान—भरत और ऐरावत क्षेत्रका । इसका यह
मतलब नहीं कि उन क्षेत्रोंका वृद्धि और ह्रास होता है, क्योंकि ऐसा होना असम्भव है । किन्तु
उन क्षेत्रोंमें रहनेवाले मनुष्योंका वृद्धि और ह्रास होता है । अथवा, 'भरतैरावतयोः' षष्ठी
विभक्ति न होकर अधिकरणमें यह निर्देश किया है जिससे इस प्रकार अर्थ होता है कि भरत
और ऐरावत क्षेत्रमें मनुष्योंकी वृद्धि और ह्रास होता है । शंका—यह वृद्धि और ह्रास
किंनिमित्तक होता है ? समाधान—अनुभव, आयु और प्रमाण आदि निमित्तक होता है ।
अनुभव, उपभोगको कहते हैं, जीवित रहनेके परिमाणको आयु कहते हैं । और शरीरकी
ऊँचाईको प्रमाण कहते हैं । इस प्रकार इन पूर्वोक्त कारणोंसे और अन्य कारणोंसे मनुष्योंका वृद्धि
और ह्रास होता है । शंका—ये वृद्धि-ह्रास किस निमित्तसे होते हैं ? समाधान--ये कालके निमित्त
से होते हैं । वह काल दो प्रकारका है-उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी । और इनमें-से प्रत्येकके छह
१. -तुल्योऽनुभवः आहो-ता०, ना० । २. -याभ्याम् । कयोः मु० । ३. -परिमाणम्, शरी -मु० । ४. भवतः
तयोः । किहेतु-ता०, ना० ।

  • ३।२९ § ४२१ ] तृतीयोऽध्यायः १६३

भिरुत्सर्पणशीला उत्सर्पिणी । तैरेवावसर्पणशीला अवसर्पिणी । तत्रावसर्पिणी षड्विधा—सुषमसुषमा
सुषमा सुषमदुःषमा दुःषमसुषमा दुःषमा अतिदुःषमा चेति । उत्सर्पिण्यपि अतिदुःषमाद्या सुषमसुष-
मान्ता षड्विधैव भवति । अवसर्पिण्याः परिमाणं दशसागरोपमकोटीकोट्यः । उत्सर्पिण्या अपि
तावत्य एव । सोभयी कल्प इत्याख्याते । तत्र सुषमसुषमा चतस्रः सागरोपमकोटीकोट्यः ।
तदादौ मनुष्या उत्तरकुरुमनुष्यतुल्याः । ततः क्रमेण हानौ सत्यां सुषमा भवति तिस्रः सागरोपम-
कोटीकोट्यः । तदादौ मनुष्या हरिवर्षमनुष्यसमाः । ततः क्रमेण हानौ सत्यां सुषमदुःषमा भवति
द्वे सागरोपमकोटीकोट्यौ । तदादौ मनुष्या हैमवतकमनुष्यसमाः । ततः क्रमेण हानौ सत्यां दुःषम-
सुषमा भवति एकसागरोपमकोटीकोटी द्विचत्वारिंशद्वर्षसहस्रोना । तदादौ मनुष्या विदेहजनतुल्या
भवन्ति । ततः क्रमेण हानौ सत्यां दुःषमा भवति एकविंशतिवर्षसहस्राणि । ततः क्रमेण हानौ सत्या-
मतिदुःषमा भवति एकविंशतिवर्षसहस्राणि । एवमुत्सर्पिण्यपि विपरीतक्रमा वेदितव्या ।
§ ४१९. अथेतरासु भूमिषु कावस्थेत्यत आह—
ताभ्यामपरा भूमयोऽवस्थिताः ॥२८॥
§ ४२०. ताभ्यां भरतैरावताभ्यामपरा भूमयोऽवस्थिता भवन्ति । न हि तत्रोत्सर्पिण्यव-
सर्पिण्यौ स्तः ।
§ ४२१. किं तासु भूमिषु मनुष्यास्तुल्यायुष आहोस्चित्कश्चिदस्ति प्रतिविशेष इत्यत आह—
एकद्वित्रिपल्योपमस्थितयो हैमवतकहारिवर्षकदैवकुरवकाः ॥२९॥
भेद हैं । ये दोनों काल सार्थक नामवाले हैं। जिसमें अनुभव आदिकी वृद्धि होती है वह उत्सर्पिणी
काल है । और जिसमें इनका ह्रास होता है वह अवसर्पिणी काल है। अवसर्पिणीके छह
भेद हैं—सुषमसुषमा, सुषमा, सुषमदुःषमा, दुःषमसुषमा, दुःषमा और अतिदुःषमा । इसी प्रकार
उत्सर्पिणी भी अतिदुःषमासे लेकर सुषमसुषमा तक छह प्रकारकी है। अवसर्पिणी कालका
परिमाण दस कोड़ाकोड़ी सागर है और उत्सर्पिणी भी इतना ही है। ये दोनों मिलकर एक
कल्पकाल कहे जाते हैं। इनमें-से सुषमसुषमा चार कोड़ाकोड़ी सागरका होता है। इसके
प्रारम्भमें मनुष्य उत्तरकुरुके मनुष्योंके समान होते हैं। फिर क्रमसे हानि होनेपर तीन कोड़ा-
कोड़ी सागर प्रमाण सुषमा काल प्राप्त होता है। इसके प्रारम्भमें मनुष्य हरिवर्षके मनुष्योंके
समान होते हैं। तदनन्तर क्रमसे हानि होनेपर दो कोड़ाकोड़ी सागर प्रमाण सुषमदुःषमा
काल प्राप्त होता है। इसके प्रारम्भमें मनुष्य हैमवतके मनुष्योंके समान होते हैं। तदनन्तर
क्रमसे हानि होकर ब्यालीस हजार वर्ष कम एक कोड़ाकोड़ी सागरका दुःषमसुषमा काल
प्राप्त होता है। इसके प्रारम्भमें मनुष्य विदेह क्षेत्रके मनुष्योंके समान होते हैं। तदनन्तर क्रमसे
हानि होकर इक्कीस हजार वर्षका दुःषमा काल प्राप्त होता है। तदनन्तर क्रमसे हानि
होकर इक्कीस हजार वर्षका अतिदुःषमा काल प्राप्त होता है। इसी प्रकार उत्सर्पिणी भी इससे
विपरीत क्रमसे जाननी चाहिए।
§ ४१९. इतर भूमियोंमें क्या अवस्था है अब इस बातके बतलानेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
भरत और ऐरावतके सिवा शेष भूमियां अवस्थित हैं ॥ २८ ॥
§ ४२०. सूत्रमें 'ताभ्याम्' पदसे भरत और ऐरावत क्षेत्रका ग्रहण किया है। इन दोनों
क्षेत्रोंसे शेष भूमियां अवस्थित हैं। उन क्षेत्रोंमें उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी काल नहीं हैं।
§ ४२१. इन भूमियोंमें मनुष्य क्या तुल्य आयुवाले होते हैं या कुछ विशेषता है। इस बातके
बतलानेके लिए अब आगेका सूत्र कहते हैं—
हैमवत, हरिवर्ष और देवकुरुके प्राणियोंकी स्थिति क्रमसे एक, दो और तीन पल्य
प्रमाण है ॥ २९ ॥

१६४ सर्वार्थसिद्धौ [ ३।३० § ४२२ –
§ ४२२. हैमवते भवा हैमवतका इत्येवं 'वुञि' सति मनुष्यसंप्रत्ययो भवति । एवमुत्तरयो-
रपि । हैमवतकादयस्त्रयः । एकादयस्त्रयः । तत्र यथासंख्यमभिसंबन्धः क्रियते । एकपल्योपमस्थितयो
हैमवतकाः । द्विपल्योपमस्थितयो हारिवर्षकाः । त्रिपल्योपमस्थितयो दैवकुरवका इति । तत्र पञ्चसु
हैमवतेषु सुषमदुःषमा सदावस्थिता । तत्र मनुष्या एकपल्योपमायुषो द्विधनुःसहस्रोच्छ्रिताश्चतुर्थ-
भक्ताहारा नीलोत्पलवर्णाः । पञ्चसु हरिवर्षेषु सुषमा सदावस्थिता । तत्र मनुष्या द्विपल्योपमायुष-
श्चापसहस्रोत्सेधाः षष्ठभक्ताहाराः शङ्खवर्णाः । पञ्चसु देवकुरुषु सुषमसुषमा सदावस्थिता । तत्र
मनुष्या स्त्रिपल्योपमायुषः षड्धनुःसहस्रोच्छ्राया अष्टमभक्ताहाराः कनकवर्णाः ।
§ ४२३. अथोत्तरेषु कावस्थेत्यत आह—
तथोत्तराः ॥३०॥
§ ४२४. यथा दक्षिणा व्याख्यातास्तथैवोत्तरा वेदितव्याः । हैरण्यवतका हैमवतकैस्तुल्याः ।
रम्यका हारिवर्षकैस्तुल्याः । दैवकुरवकैरौत्तरकुरवकाः समाख्याताः ।
§ ४२५. अथ विदेहेष्ववस्थितेषु का स्थितिरित्यत्रोच्यते—
विदेहेषु संख्येयकालाः ॥३१॥
§ ४२६. १सर्वेषु विदेहेषु संख्येयकाला मनुष्याः । तत्र कालः २सुषमदुष्षमान्तोपमः सदा-
§ ४२२. हैमवत क्षेत्रमें उत्पन्न हुए हैमवतक कहलाते हैं। यहां हैमवंत शब्दसे 'वुञ्' प्रत्यय
करके हैमवतक शब्द बना है जिससे मनुष्योंका ज्ञान होता है। इसी प्रकार आगेके हारिवर्षक और
दैवकुरवंक इन दो शब्दोंमें जान लेना चाहिए। हैमवतक आदि तीन हैं और एक आदि तीन हैं।
यहाँ इनका क्रमसे सम्बन्ध करते हैं जिससे यह अर्थ हुआ कि हैमवत क्षेत्रके मनुष्योंकी स्थिति एक
पल्यकी है। हरिवर्ष क्षेत्रके मनुष्योंकी स्थिति दो पल्यकी है और देवकुरुक्षेत्रके मनुष्योंकी स्थिति
तीन पल्यकी है। ढाई द्वीपमें जो पाँच हैमवत क्षेत्र हैं उनमें सदा सुषमदुषमा काल है । वहाँ
मनुष्योंकी आयु एक पल्यकी है, शरीरकी ऊँचाई दो हजार धनुष है, उनका आहार एक दिनके
अन्तरालसे होता है और शरीरका रंग नील कमलके समान है। पाँच हरिवर्ष नामके क्षेत्रोंमें सदा
सुषमा काल रहता है। वहाँ मनुष्योंकी आयु दो पल्यकी है, शरीरकी ऊँचाई चार हजार धनुष है,
उनका आहार दो दिनके अन्तरालसे होता है और शरीरका रंग शंखके समान सफेद है। पाँच
देवकुरु नामके क्षेत्रमें सदा सुषमसुषमा काल है। वहाँ मनुष्योंकी आयु तीन पल्यकी है, शरीरकी
ऊँचाई छह हजार धनुष है। उनका भोजन तीन दिनके अन्तरालसे होता है और शरीरका रंग
सोनेके समान पीला है।
§ ४२३. उत्तर दिशावर्ती क्षेत्रोंमें क्या अवस्था है इसके बतलानेके लिए अब आगेका सूत्र
कहते हैं—
दक्षिणके समान उत्तरमें है ॥ ३०॥
§ ४२४. जिस प्रकार दक्षिणके क्षेत्रोंका व्याख्यान किया उसी प्रकार उत्तरके क्षेत्रोंका
जानना चाहिए। हैरण्यवत क्षेत्रोंके मनुष्योंकी सब बातें हैमवतके मनुष्योंके समान हैं, रम्यक क्षेत्रके
मनुष्योंकी सब बातें हरिवर्ष क्षेत्रके मनुष्योंके समान हैं और देवकुरु क्षेत्रके मनुष्योंकी सब बातें
उत्तरकुरु क्षेत्रके मनुष्योंके समान हैं।
§ ४२५. पाँच विदेहोंमें क्या स्थिति है इसके बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
विदेहोंमें संख्यात वर्षकी आयुवाले प्राणी हैं ॥ ३१ ॥
§ ४२६. सब विदेहोंमें संख्यात वर्षकी आयुवाले मनुष्य होते हैं। वहाँ सुषमदुःषमा कालके
१. सर्वेषु पञ्चसु महाविदे-मु० । २. कालः दुःषमसुषमादिः सदा तां०, ना० ।

  • ३।३३§ ४३० ] तृतीयाऽध्यायः १६५

वस्थितः । मनुष्याश्च पञ्चधनुःशतोत्सेधाः । नित्यहाराः । उत्कर्षेणैकपूर्वकोटिस्थितिकाः ।
जघन्येनान्तर्मुहूर्तायुषः । तस्याश्च १ सम्बन्धे गाथां पठन्ति—
"पुव्वस्स दु परिमाणं सदरि खलु कोडिसदसहस्साई ।
छप्पण्णं च सहस्सा बोद्धव्वा वासकोडीणं २ ॥"
§ ४२७. उक्तो भरतस्य विष्कम्भः । पुनः प्रकारान्तरेण तत्प्रतिपत्त्यर्थमाह—
भरतस्य विष्कम्भो जम्बूद्वीपस्य नवतिशतभागः ॥३२॥
§ ४२८. जम्बूद्वीपविष्कम्भस्य योजनशतसहस्रस्य नवतिशतभागीकृतस्यैको भागो भरतस्य
विष्कम्भः । स पूर्वोक्त एव । उक्तं जम्बूद्वीपं परिवृत्य वेदिका स्थिता, ततः परो लवणोदः समुद्रो
द्वियोजनशतसहस्रवलयविष्कम्भः । ततः परो धातकीखण्डो द्वीपश्चतुर्योजनशतसहस्रवलयविष्कम्भः ।
§ ४२९. तत्र वर्षादीनां संख्यादि ३ विधिप्रतिपत्त्यर्थमाह—
द्विर्धातकीखण्डे ॥३३॥
§ ४३०. भरतादीनां द्रव्याणामिहावृत्तिर्विवक्षिता । तत्र कथं सुच् । अध्याह्रियमाण-
क्रियाभ्यावृत्तिद्योतनार्थः सुच् । यथा द्विस्तावानयं प्रासादो मीयत इति । एवं ४ द्विर्धातकीखण्डे
भरतादयो मीयन्ते इति । तद्यथा—द्वाभ्यामिष्वाकारपर्वताभ्यां दक्षिणोत्तरायताभ्यां लवणोदका-
लोदवेदिकास्पृष्टकोटिभ्यां विभक्तो धातकीखण्डः पूर्वापर इति । तत्र पूर्वस्य ५ अपरस्य च मध्ये द्वौ
अन्तके समान काल सदा अवस्थित है । मनुष्योंके शरीरकी ऊँचाई पांच सौ धनुष होती है, वे प्रति-
दिन आहार करते हैं । उनको उत्कृष्ट आयु एक पूर्वकोटि वर्षप्रमाण और जघन्य आयु अन्तर्मुहूर्त
प्रमाण है । इसके सम्बन्धमें एक गाथा कही जाती है—
“एक पूर्वकोटिका प्रमाण सत्तर लाख करोड़ और छप्पन हजार करोड़ वर्ष जानना चाहिए”
§ ४२७. भरतक्षेत्रका विस्तार पहले कह आये हैं । अब प्रकारान्तरसे उसका ज्ञान करानेके
लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
भरत क्षेत्रका विस्तार जम्बूद्वीपका एकसौ नब्बेवां भाग है ॥ ३२ ॥
§ ४२८. एक लाख योजन प्रमाण जम्बूद्वीपके विस्तारके एक सौ नब्बे भाग करनेपर जो
एक भाग प्राप्त हो उतना भरतक्षेत्रका विस्तार है जो कि पूर्वोक्त पांचसौ छब्बीस सही छह बटे
उन्नीस योजन होता है ।
§ ४२९. जो पहले जम्बूद्वीप कह आये उसके चारों ओर एक वेदिका है। इसके बाद लवण-
समुद्र है जिसका विस्तार दो लाख योजन है। इसके बाद धातकीखण्ड द्वीप है जिसका विस्तार
चार लाख योजन है। अब इसमें क्षेत्र आदिकी संख्याका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं-
धातकीखण्डमें क्षेत्र तथा पर्वत आदि जम्बूद्वीपसे दूने हैं ॥ ३३ ॥
§ ४३०. भरत आदि क्षेत्रोंकी यहाँ आवृत्ति विवक्षित है । शंका—सूत्रमें 'सुच्' प्रत्यय किस-
लिए किया है ? समाधान—वाक्य पूरा करने के लिए जो क्रिया जोड़ी जाती है उसकी आवृत्ति बत-
लानेके लिए 'सुच्' प्रत्यय किया है। जैसे 'द्विस्तावान् अयं प्रासादः' यहाँ 'सुच्' प्रत्ययके रहनेसे
है यह अनुमान किया जाता है । इसी प्रकार धातकीखण्डमें 'सुच्' से भरतादिक दूने ज्ञात हो जाते
हैं । यथा—अपने सिरेसे लवणोद और कालोदको स्पर्श करनेवाले और दक्षिणसे उत्तर तक लम्बे
इष्वाकार नामक दो पर्वतोंसे विभक्त होकर धातकीखण्ड द्वीपके दो भाग हो जाते हैं—पूर्व धातकी-
१. तस्यास्ति सम्बन्धे आं०, दि० १, दि० २ । २. -डीणं ॥ ७०५६००००००००० उक्तो मु०, ता०,
ना० । ३. संख्याविधि-मु० । ४. -त्कीषंडे ता०, ना०, दि० १, दि० २, आ० । ५. -र्वस्य चापरस्य
मध्ये मु० ।

१६६ सर्वार्थसिद्धौ [ ३।३४ § ४३१ -
मन्दरौ । तयोरुभयतो भरतादीनि क्षेत्राणि हिमवदादयश्च वर्षधरपर्वताः । एवं द्वौ भरतौ द्वौ
हिमवन्तौ इत्येवमादि संख्यानं द्विगुणं वेदितव्यम् । जम्बूद्वीपहिमवदादीनां वर्षधराणां यो विष्कम्भ-
स्तद्विगुणो धातकीखण्डे हिमवदादीनां वर्षधराणाम् । वर्षधराश्चक्राकारवदवस्थिताः । अरविवर-
संस्थानानि क्षेत्राणि । जम्बूद्वीपे यत्र जम्बूवृक्षः स्थितः, तत्र धातकीखण्डे धातकीवृक्षः सपरिवारः ।
तद्योगाद्धातकीखण्ड इति द्वीपस्य नाम प्रतीतम् । तत्परिक्षेपी कालोदः समुद्रः टङ्कोच्छिन्नतीर्थः अष्ट-
योजनशतसहस्रवलयविष्कम्भः । कालोदपरिक्षेपी पुष्करद्वीपः षोडशयोजनशतसहस्रवलयविष्कम्भः ।
§ ४३१. तत्र द्वीपान्भोनिधिविष्कम्भद्विगुणपरिक्लृप्तिवद्धातकीखण्डवर्षादिद्विगुणवृद्धिप्रसङ्गे
विशेषावधारणार्थमाह-
पुष्करार्द्धे च ॥३४॥
§ ४३२. किम् । द्विरित्यनुवर्तते । किमपेक्षा द्विरावृत्तिः । जम्बूद्वीपभरतहिमवदाद्यपेक्षयैव¹ ।
कुतः । व्याख्यानतः । यथा धातकीखण्डे हिमवदादीनां विष्कम्भस्तथा पुष्करार्धे हिमवदादीनां
विष्कम्भो द्विगुण इति व्याख्यायते । नामानि तान्येव, इष्वाकारौ मन्दरौ च पूर्ववत् । यत्रे² जम्बू-
वृक्षस्तत्र पुष्करं सपरिवारम् । तत एव तस्य³ द्वीपस्य नाम रूढं पुष्करद्वीप इति । अथ कथं
पुष्करार्द्धसंज्ञा । मानुषोत्तरशैलेन विभक्तार्धत्वात्पुष्करार्धसंज्ञा ।
खण्ड और पश्चिम धातकीखण्ड । इन पूर्व और पश्चिम दोनों खण्डोंके मध्यमें दो मन्दर अर्थात्
मेरु पर्वत हैं। इन दोनोंके दोनों ओर भरत आदि क्षेत्र और हिमवान् आदि पर्वत हैं। इस प्रकार
दो भरत दो हिमवान् इत्यादि रूपसे जम्बूद्वीपसे धातकीखण्ड द्वीपमें दूनी संख्या जाननी चाहिए ।
जम्बूद्वीपमें हिमवान् आदि पर्वतोंका जो विस्तार है धातकीखण्ड द्वीपमें हिमवान् आदि पर्वतोंका
उससे दूना विस्तार है। चक्केमें जिस प्रकार आरे होते हैं उसी प्रकार ये पर्वत क्षेत्रोंके मध्यमें
अवस्थित हैं। और चक्केमें छिद्रोंका जो आकार होता है यहाँ क्षेत्रोंका वही आकार है। जम्बूद्वीपमें
जहाँ जम्बू वृक्ष स्थित है धातकीखण्डद्वीपमें परिवार वृक्षोंके साथ वहाँ धातकी वृक्ष स्थित है ।
और इसके सम्बन्धसे द्वीपका नाम धातकीखण्ड प्रसिद्ध है। इसको घेरे हुए कालोद समुद्र है ।
जिसका घाट ऐसा मालूम देता है कि उसे टांकीसे काट दिया हो और जिसका विस्तार आठ लाख
योजन है। कालोदको घेरे हुए पुष्करद्वीप है जिसका विस्तार सोलह लाख योजन है।
§ ४३१. द्वीप और समुद्रोंका उत्तरोत्तर जिस प्रकार दूना दूना विस्तार बतलाया है उसी
प्रकार यहाँ धातकीखण्ड द्वीपके क्षेत्र आदि की संख्या दूनी प्राप्त होती है अतः विशेष निश्चय
करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं-
पुष्करार्धमें उतने ही हैं ॥३४॥
§ ४३२. यहाँ 'द्वि' इस पदकी अनुवृत्ति होती है। शंका- 'द्वि' इस पदकी किसकी अपेक्षा
अनुवृत्ति होती है ? समाधान - जम्बूद्वीपके भरत आदि क्षेत्र और हिमवान् आदि पर्वतोंकी अपेक्षा
'द्विः' इस पदकी अनुवृत्ति होती है। शंका- यह कैसे समझा जाता है ? समाधान - व्याख्यान-
से। जिस प्रकार धातकीखण्ड द्वीपमें हिमवान् आदिका विस्तार कहा है उसी प्रकार पुष्करार्धमें
हिमवान् आदिका विस्तार दूना बतलाया है। नाम वे ही हैं। दो इष्वाकार और दो मन्दर पर्वत
पहलेके समान जानना चाहिए। जहाँ पर जम्बूद्वीपमें जम्बू वृक्ष है पुष्कर द्वीपमें वहाँ अपने परि-
वार वृक्षोंके साथ पुष्करवृक्ष है। और इसीलिए इस द्वीपका पुष्करद्वीप यह नाम रूढ़ हुआ है।
शंका-इस द्वीपको पुष्करार्ध यह संज्ञा कैसे प्राप्त हुई ? समाधान - इस द्वीपके मानुषोत्तर पर्वतके
कारण दो विभाग हो गये हैं अतः आधे द्वीपको पुष्करार्ध यह संज्ञा प्राप्त हुई ।
१. -पेक्षयैव । जम्बूद्वीपात्पुष्करार्धे द्वौ भरतौ द्वौ हिमवन्तौ, इत्यादि । कुतः मु०, दि० १, दि० २, आ० ।
२. यत्र जम्बूद्वीपे जम्बू-मु०, दि०, दि० २, आ० । ३. तस्य द्वीपस्यानुरूढं पुष्करद्वीप इति नाम । अथ मु० ।

§ ४३३. अत्राह किमर्थं जम्बूद्वीपहिमवदादिसंख्या द्विरावृत्ता पुष्करार्धे कथ्यते, न पुनः
कृत्स्न एव पुष्करद्वीपे । इत्यत्रोच्यते—
प्राङ् मानुषोत्तरान्मनुष्याः ॥३५॥
§ ४३४. पुष्करद्वीपबहुमध्यदेशभागी वलयवृत्तो मानुषोत्तरो नाम शैलः। तस्मात्प्रागेव
मनुष्या न बहिरिति । ततो न बहिः पूर्वोक्तक्षेत्रविभागोऽस्ति । नास्मादुत्तरं कदाचिदपि विद्याधरा ५
ऋद्धिप्राप्ता अपि मनुष्या गच्छन्ति अन्यत्रोपपादसमुद्घाताभ्याम् । ततोऽस्यान्वर्थसंज्ञा । एवं जम्बू-
द्वीपादिष्वर्धतृतीयेषु¹ द्वीपेषु द्वयोश्च समुद्रयोर्मनुष्या वेदितव्याः । ते द्विविधाः—
आर्या म्लेच्छाश्च ॥३६॥
§ ४३५. गुणैर्गुणवद्भिर्वा अर्यन्त इत्यार्याः । ते द्विविधा ऋद्धिप्राप्तार्या अनृद्धिप्राप्तार्याश्चेति ।
अनृद्धिप्राप्तार्याः पञ्चविधाः क्षेत्रार्या जात्यार्याः कर्मार्याश्चारित्रार्या दर्शनार्याश्चेति । ऋद्धिप्राप्तार्याः १०
§ ४३३. यहां शंकाकारका कहना है कि जम्बूद्वीपमें हिमवान् आदिकी जो संख्या है उससे
हिमवान् आदिकी दूनी संख्या आधे पुष्करद्वीपमें क्यों कही जाती है पूरे पुष्कर द्वीपमें क्यों नहीं
कही जाती ? अब इस शंकाका समाधान करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
मानुषोत्तर पर्वतके पहले तक ही मनुष्य हैं ॥३५॥
§ ४३४. पुष्करद्वीपके ठीक मध्यमें चूड़ीके समान गोल मानुषोत्तर नामका पर्वत है । उसके १५
पहले-पहले ही मनुष्य हैं, उसके बाहर नहीं । इसलिए मानुषोत्तर पर्वतके बाहर पूर्वोक्त क्षेत्रोंका
विभाग नहीं है । इस पर्वतके उस ओर उपपाद जन्मवाले और समुद्घातको प्राप्त हुए मनुष्योंको
छोड़ कर और दूसरे विद्याधर या ऋद्धिप्राप्त मुनि भी कदाचित् नहीं जाते हैं इसलिए इस
पर्वतका मानुषोत्तर यह सार्थक नाम है। इस प्रकार जम्बूद्वीप आदि ढाई द्वीपोंमें और दो समुद्रों-
में मनुष्य जानना चाहिए । २०
विशेषार्थ—ढाई द्वीप और इनके मध्यमें आनेवाले दो समुद्र यह मनुष्यलोक है । मनुष्य
इसी क्षेत्रमें पाये जाते हैं । मानुषोत्तर पर्वत मनुष्यलोककी सीमापर स्थित होनेसे इसका
मानुषोत्तर यह नाम सार्थक है। मनुष्य इसी क्षेत्रमें रहते हैं उनका बाहर जाना सम्भव
नहीं, इसका यह अभिप्राय है कि गर्भमें आनेके बाद मरण पर्यन्त औदारिक शरीर या आहारक
शरीरके साथ वे इस क्षेत्रसे बाहर नहीं जा सकते । सम्मूर्च्छन मनुष्य तो इसके औदारिक शरीर २५
के आश्रयसे होते हैं इसलिए उनका मनुष्यलोकके बाहर जाना कथमपि सम्भव नहीं है। पर
इसका यह अर्थ नहीं है कि किसी भी अवस्थामें मनुष्य इस क्षेत्रके बाहर नहीं पाये जाते हैं । ऐसी
तीन अवस्थाएँ हैं जिनके होनेपर मनुष्य इस क्षेत्रके भी बाहर पाये जाते हैं, यथा—(१) जो मनुष्य
मरकर ढाई द्वीपके बाहर उत्पन्न होनेवाले हैं वे यदि मरणके पहले मारणान्तिक समुद्घात करते
हैं तो इसके द्वारा उनका ढाई द्वीपके बाहर गमन देखा जाता है । (२) ढाई द्वीपके बाहर निवास ३०
करनेवाले जो जीव मरकर मनुष्योंमें उत्पन्न होते हैं उनका मनुष्य गतिनाम कर्मका उदय होनेपर
भी ढाई द्वीपमें प्रवेश करनेके पूर्व तक इस क्षेत्रके बाहर अस्तित्व देखा जाता है । (३) केवलिसमुद्-
घातके समय उनका मनुष्यलोकके बाहर अस्तित्व देखा जाता है । इन तीन अपवादोंको छोड़कर
और किसी अवस्थामें मनुष्योंका मनुष्यलोकके बाहर अस्तित्व नहीं देखा जाता । वे मनुष्य दो
प्रकारके हैं अब ये बतलाने के लिए आगे का सूत्र कहते हैं— ३५
मनुष्य दो प्रकारके हैं—आर्य और म्लेच्छ ॥३६॥
§ ४३५. जो गुणों या गुणवालोंके द्वारा माने जाते हैं—वे आर्य कहलाते हैं। उनके दो
भेद हैं—ऋद्धिप्राप्त आर्य और ऋद्धिरहित आर्य । ऋद्धिरहित आर्य पांच प्रकारके हैं—क्षेत्रार्य,
१. –तीयेषु द्वयोश्च मु० ।

१६८ सर्वार्थसिद्धौ [ ३।३६ ६ ४३५ –
सप्तविधाः; बुद्धिविक्रियातपोबलौषधरसार्क्षीणभेदात् । म्लेच्छा द्विविधाः — अन्तर्द्वीपजाः कर्मभूमिजा-
श्चेति । तत्रान्तर्द्वीपा लवणोदधेरभ्यन्तरे पार्ष्वेष्वष्टासु दिक्ष्वष्टौ । तदन्तरेषु चाष्टौ । हिमवच्छिख-
रिणोरुभयोश्च विजयार्द्धयोरन्तेष्वष्टौ । तत्र दिक्षु द्वीपा वेदिकायास्तिर्यक् पञ्चयोजनशतानि प्रविश्य
५ भवन्ति । विदिक्ष्वन्तरेषु च द्वीपाः पञ्चाशत्पञ्चयोजनशतेषु गतेषु भवन्ति । शैलान्तेषु द्वीपाः षड्-
योजनशतेषु गतेषु भवन्ति । दिक्षु द्वीपाः शतयोजनविस्ताराः । विदिक्ष्वन्तरेषु च द्वीपास्तदर्ध-
विष्कम्भाः । शैलान्तेषु पञ्चविंशतियोजनविस्ताराः । तत्र पूर्वस्यां दिश्येकोरुकाः । अपरस्यां दिशि
लाङ्गूलिनः । उत्तरस्यां दिश्यभाषकाः । दक्षिणस्यां दिशि विषाणिनः । शशकर्णशष्कुलीकर्ण-
प्रावेरणकर्णलम्बकर्णाः विदिक्षु । अश्वसिंहश्वमहिषवराहव्याघ्रकौककपामुखा अन्तरेषु । मेघमुख-
विद्युन्मुखाः शिखरिण उभयोरन्तयोः । मत्स्यमुखकालमुखा हिमवत उभयोरन्तयोः । हस्तिमुखा-
१० दर्दांमुखा उत्तरविजयार्धस्योभयोरन्तयोः । गोमुखमेषमुखा दक्षिणविजयार्धस्योभयोरन्तयोः ।
एकोरुका मृदाहारा गुहावासिनः । शेषाः पुष्पफलाहारा वृक्षवासिनः । सर्वे ते पल्योपमायुषः । तं
चतुर्विंशतिरपि द्वीपा जलतलादेकयोजनोत्सेधाः । लवणोदधेर्बाह्यपार्श्वेऽप्येवं चतुर्विंशतिर्दीपा
जात्यार्य, कर्मार्य, चारित्रार्य और दर्शनार्य । बुद्धि, विक्रिया, तप, बल, औषध, रस और अक्षीण
ऋद्धिके भेदसे ऋद्धि प्राप्त आर्य सात प्रकारके हैं। म्लेच्छ दो प्रकारके हैं—अन्तर्द्वीपज म्लेच्छ
और कर्मभूमिज म्लेच्छ । लवणसमुद्रके भीतर आठों दिशाओंमें आठ अन्तर्द्वीप हैं और उनके अन्त-
१५ रालमें आठ अन्तर्द्वीप और हैं। तथा हिमवान् और शिखरी इन दोनों पर्वतोंके अन्तमें और दोनों
विजयार्ध पर्वतोंके अन्तमें आठ अन्तर्द्वीप हैं। इनमें-से जो दिशाओंमें द्वीप हैं वे वेदिकासे तिरछे पाँचसौ
योजन भीतर जाकर हैं। विदिशाओं और अन्तरालोंमें जो द्वीप हैं वे पाँचसौ पचास योजन भीतर
जाकर हैं। तथा पर्वतोंके अन्तमें जो द्वीप हैं वे छहसौ योजन भीतर जाकर हैं। दिशाओंमें स्थित
द्वीपोंका विस्तार सौ योजन है। विदिशाओं और अन्तरालोंमें स्थित द्वीपोंका विस्तार उससे आधा
२० अर्थात् पचास योजन है। तथा पर्वतोंके अन्तमें स्थित द्वीपोंका विस्तार पच्चीस योजन है। पूर्व
दिशामें एक टाँगवाले मनुष्य हैं। पश्चिम दिशामें पूँछवाले मनुष्य हैं। उत्तर दिशामें गूँगे मनुष्य
हैं और दक्षिण दिशामें सींगवाले मनुष्य हैं। चारों विदिशाओंमें क्रमसे खरगोशके समान कानवाले,
शष्कुली अर्थात् मछली अथवा पूड़ीके समान कानवाले, प्रावरणके समान कानवाले और लम्बे
कानवाले मनुष्य हैं। आठों अन्तरालके द्वीपोंमें क्रमसे घोड़ेके समान मुखवाले, सिंहके समान मुख-
२५ वाले, कुत्तेके समान मुखवाले, भैंसाके समान मुखवाले, सुअरके समान मुखवाले, व्याघ्रके समान
मुखवाले, कौआके समान मुखवाले और बन्दरके समान मुखवाले मनुष्य हैं। —शिखरी पर्वतके
दोनों कोणोंकी सीधमें जो अन्तर्द्वीप हैं उनमें मेघके समान मुखवाले और बिजलीके समान मुखवाले
मनुष्य हैं। हिमवान् पर्वतके दोनों कोणोंकी सीधमें जो अन्तर्द्वीप हैं उनमें मछलीके समान मुखवाले
और कालके समान मुखवाले मनुष्य हैं। उत्तर विजयार्धके दोनों कोणोंकी सीधमें जो अन्तर्द्वीप हैं
३० उनमें हाथीके समान मुखवाले और दर्पणके समान मुखवाले मनुष्य हैं। तथा दक्षिण विजयार्धके
दोनों कोणोंकी सीधमें जो अन्तर्द्वीप हैं उनमें गायके समान मुखवाले और मेढ़ाके समान मुखवाले
मनुष्य हैं। इनमें-से एक टाँगवाले मनुष्य गुफाओंमें निवास करते हैं और मिट्टीका आहार करते
हैं। तथा शेष मनुष्य फूलों और फलोंका आहार करते हैं और पेड़ोंपर रहते हैं। इन सबकी आयु
१. लवणोदे अष्टासु दिक्ष्वष्टौ आ० दि० १, दि० २ । लवणोदधेरभ्यन्तरेऽष्टासु दिक्ष्वष्टौ मु० ।
३५ २. उत्तरस्यामभाषकाः आ० दि० १, दि० २ । ३. - णस्यां विषा- दि० १, दि० २ । ४. -वरणलम्ब मु० ।
५ काकवूककपि-मु० । ६. मेघविद्यु-मु० । ७. दक्षिणदिग्विण- मु० । ८. - शतिद्वितीयपक्षेऽपि उभयोस्त-
त्वेष्टचत्वारिंशद्द्बीपाः जलतला- दि० २ । ९. -त्सेधाः । तथा कालोदेऽपि आ०, दि० १ ।

  • ३।३७ § ४३७ ] तृतीयोऽध्यायः १६९
    विज्ञातव्याः । तथा कालोदेऽपि वेदितव्याः । त एतेऽन्तद्वीपजा म्लेच्छाः । कर्मभूमिजाश्च शक-
    यवनशबरपुलिन्दादयः ।
    § ४३६. काः पुनः कर्मभूमय इत्यत आह—
    भरतैरावतविदेहाः कर्मभूमयोऽन्यत्र देवकुरुत्तरकुरुभ्यः ॥३७॥
    § ४३७. भरता१ ऐरावता विदेहाश्च पञ्च, पञ्च, एताः कर्मभूमय इति व्यपदिश्यन्ते । तत्र ५
    'विदेह'ग्रहणाद्देवकुरूत्तरकुरुग्रहणे प्रसक्ते तत्प्रतिषेधार्थमाह—'अन्यत्र देवकुरुत्तरकुरुभ्यः' इति ।
    'अन्यत्र' शब्दो वर्जनार्थः । देवकुरव उत्तरकुरवो हैमवतो हरिवर्षो २रम्यको हैरण्यवतोऽन्तद्वीपाश्च
    भोगभूमय इति व्यपदिश्यन्ते । अथ कथं कर्मभूमित्वम् । शुभाशुभलक्षणस्य कर्मणोऽधिष्ठानत्वात् ।
    ननु सर्वं ३लोकत्रितयं कर्मणोऽधिष्ठानमेव । तत एवं ४ प्रकर्षगतिर्विज्ञास्यते, प्रकर्षेण यत्कर्मणोऽधि-
    ष्ठानमिति । तत्राशुभकर्मणस्तावत्सप्तमनरकप्रापणस्य भरतादिष्वेवार्जनम्, शुभस्य५ च सर्वार्थ- १०
    सिद्ध्यादि६स्थानविशेषप्रापणस्य कर्मण उपार्जनं तत्रैव, कृष्यादिलक्षणस्य षड्विधस्य कर्मणः
    पात्रदानादिसहितस्य तत्रैवारम्भात्कर्मभूमिव्यपदेशो वेदितव्यः । इतरास्तु दशविधकल्पवृक्षकल्पित-
    भोगानुभवनविषयत्वाद् भोगभूमय इति व्यपदिश्यन्ते ।
    एक पल्यप्रमाण है । ये चौबीसों अन्तद्वीप जलकी सतहसे एक योजन ऊँचे हैं । इसी प्रकार कालोद
    समुद्रमें भी जानना चाहिए । ये सब अन्तद्वीपज म्लेच्छ हैं । इनसे अतिरिक्त जो शक, यवन, शबर १५
    और पुलिन्दादिक हैं वे सब कर्मभूमिज म्लेच्छ हैं ।
    विशेषार्थ—षट्खण्डागममें मनुष्योंके दो भेद किये गये हैं—कर्मभूमिज और अकर्मभूमिज ।
    अकर्मभूमि भोगभूमिका दूसरा नाम है । भोगभूमिका एक भेद कुभोगभूमि है । उसमें जन्म लेनेवाले
    मनुष्य ही यहाँ अन्तद्वीपज म्लेच्छ कहे गये हैं। शेष रहे शक, यवन, शबर और पुलिन्द आदि म्लेच्छ
    कर्मभूमिज म्लेच्छ हैं । इसी प्रकार आर्य भी क्षेत्रकी अपेक्षा दो भागोंमें विभक्त हैं-कर्मभूमिज आर्य २०
    और अकर्मभूमिज आर्य । तीनों भोगभूमियोंके मनुष्य अकर्मभूमिज आर्य हैं और कर्मभूमिके आर्य
    कर्मभूमिज आर्य हैं । इनमें-से अकर्मभूमिज आर्य और म्लेच्छोंके अविरत सम्यग्दृष्टि तक चार
    गुणस्थान हो सकते हैं किन्तु कर्मभूमिज आर्य और म्लेच्छ अणुव्रत और महाव्रतके भी अधिकारी
    हैं । इनके संयमासंयम और संयमस्थानोंका विशेष व्याख्यान लब्धिसार क्षपणासारमें किया है ।
    § ४३६. कर्मभूमियां कौन-कौन हैं, अब इस बातके बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं— २५
    देवकुरु और उत्तरकुरुके सिवा भरत, ऐरावत और विदेह ये सब कर्मभूमि हैं ॥३७॥
    § ४३७. भरत, ऐरावत और विदेह ये प्रत्येक पाँच-पाँच हैं । ये सब कर्मभूमियां कही जाती
    हैं । इनमें विदेहका ग्रहण किया है इसलिए देवकुरु और उत्तरकुरुका भी ग्रहण प्राप्त होता है अतः
    उनका निषेध करनेके लिए 'अन्यत्र देवकुरुत्तरकुरुभ्यः' यह पद रखा है । अन्यत्र शब्दका अर्थ
    निषेध है । देवकुरु, उत्तरकुरु, हैमवत, हरिवर्ष, रम्यक, हैरण्यवत और अन्तद्वीप ये भोगभूमियां ३०
    कही जाती हैं । शंका—कर्मभूमि यह संज्ञा कैसे प्राप्त होती है ? समाधान—जो शुभ और अशुभ
    कर्मोंका आश्रय हो उसे कर्मभूमि कहते हैं । यद्यपि तीनों लोक कर्मका आश्रय है फिर भी इससे
    उत्कृष्ट्ताका ज्ञान होता है कि ये प्रकर्ष रूपसे कर्मका आश्रय हैं । सातवें नरकको प्राप्त करनेवाले
    अशुभ कर्मका भरतादि क्षेत्रोंमें ही अर्जन किया जाता है इसी प्रकार सर्वार्थसिद्धि आदि स्थान
    विशेषको प्राप्त करानेवाले पुण्य कर्मका उपार्जन भी यहीं पर होता है । तथा पात्रदान आदिके ३५
    साथ कृषि आदि छह प्रकारके कर्मका आरम्भ यहीं पर होता है इसलिए भरतादिकको कर्मभूमि
    १. भरतैरावतविदेहाश्च मु०, ता०, ना० । २. हरिवंशः रम्य-आ०, दि० १, दि० २ । ३. सर्वो
    लोकत्रितयः कर्म-आ०, दि० १, दि० २ । ४. एक प्रक-मु० । ५. शुभस्य सर्वा-मु० । ६. -द्ध्यादिषु
    स्थान-आ०, दि० १, दि० २ । ७. -पणस्य पुण्यकर्म-मु० ।
    २२

१७० सर्वार्थसिद्धौ [ २।३८ § ४३८ –
§ ४३८. उक्तासु भूमिषु मनुष्याणां स्थितिपरिच्छेदार्थमाह—
नृस्थिती परावरे त्रिपल्योपमान्तर्मुहूर्ते ॥३८॥
§ ४३९. त्रीणि पल्योपमानि यस्याः सा त्रिपल्योपमा । अन्तर्गतो मुहूर्तो यस्याः सा अन्त-
मुहूर्ता । यथासंख्येनभिसंबन्धः । मनुष्याणां परा उत्कृष्टा स्थितित्रिपल्योपमा । अपरा जघन्या
अन्तर्मुहूर्ता । मध्ये अनेकविकल्पाः । तत्र पल्यं त्रिविधम्—व्यवहारपल्यमुद्धारपल्यमद्धापल्यमिति ।
अन्वर्थसंज्ञा एताः । आद्यं व्यवहारपल्यमित्युच्यते; उत्तरपल्यद्वयव्यवहारबीजत्वात् । नानेन
किंचित्परिच्छेद्यमस्तीति । द्वितीयमुद्धारपल्यम् । तत उद्धृतैर्लोमकच्छेदैर्द्दीपसमुद्राः संख्यायन्त
इति । तृतीयमद्धापल्यम् । अद्धा कालस्थितिरित्यर्थः । तत्राद्यस्य प्रमाणं कथ्यते, तत्परिच्छेदनार्थ-
त्वात् । तद्यथा—प्रमाणाङ्गुलपरिमितयोजनविष्कम्भायामावगाहानि त्रीणि पल्यानि कुशूला
इत्यर्थः । एकादिसप्तान्ताराहोरात्रजाताविवालाग्राणि तावच्छिन्नानि यावद्द्वितीयं कर्तरिच्छेदं
नैवाप्नुवन्ति, तादृशैर्लोमच्छेदैः परिपूर्णं घनीकृतं व्यवहारपल्यमित्युच्यते । ततो वर्षशते वर्षशते
गते एकैक्लोमापकर्षणविधिना यावता कालेन तद्रिक्तं भवेत्तावान्कालो व्यवहारपल्योपमाख्यः ।
चाहिए । इतर क्षेत्रोंमें दस प्रकारके कल्पवृक्षोंसे प्राप्त भोगोंकी मुख्यता है इसलिए वे भोगभूमियां
कहलाती हैं।
विशेषार्थ—यह पहले ही बतला आये हैं कि भरतादि क्षेत्रोंका विभाग ढाई द्वीपमें ही है ।
जम्बूद्वीपमें भरतादि क्षेत्र एक-एक हैं और धातकीखण्ड व पुष्करार्धमें ये दो-दो हैं । इस प्रकार कुल
क्षेत्र ३५ होते हैं। उसमें भी उत्तरकुरु और देवकुरु विदेह क्षेत्रमें होकर भी अलग गिने जाते हैं,
क्योंकि यहां उत्तम भोगभूमिकी व्यवस्था है, इसलिए पांच विदेहोंके पांच देवकुरु और पांच उत्तरकुरु
इनको उक्त ३५ क्षेत्रोंमें मिलानेपर कुल ४५ क्षेत्र होते हैं। इनमें से ५ भरत, ५ विदेह और ५ ऐरावत
ये १५ कर्मभूमियां हैं और शेष ३० भोगभूमियां हैं। ये सब कर्मभूमि और भोगभूमि क्यों कहलाती
हैं इस बातको निर्देश मूल टीकामें किया ही है।
§ ४३८. उक्त भूमियोंमें स्थितिका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
मनुष्योंकी उत्कृष्ट स्थिति तीन पल्य और जघन्य अन्तर्मुहूर्त है ॥३८॥
§ ४३९. 'त्रिपल्योपमा' इस वाक्यमें 'त्रि' और 'पल्योपम' का बहुव्रीहि समास है। मुहूर्तके
भीतरके कालको अन्तर्मुहूर्त कहते हैं। पर और अपर के साथ इन दोनोंका क्रमसे सम्बन्ध है ।
मनुष्योंकी उत्कृष्ट स्थिति तीन पल्य है और जघन्य स्थिति अन्तर्मुहूर्त है। तथा मध्यकी स्थिति
अनेक प्रकारकी है। पल्य तीन प्रकारका है—व्यवहार पल्य, उद्धारपल्य और अद्धापल्य । ये तीनों
सार्थक नाम हैं। आदिके पल्यको व्यवहारपल्य कहते हैं, क्योंकि वह आगेके दो पल्योंके व्यवहारका
मूल है। इसके द्वारा और किसी वस्तुका परिमाण नहीं किया जाता। दूसरा उद्धारपल्य है।
उद्धारपल्यमें-से निकाले गये लोमके छेदोंके द्वारा द्वीप और समुद्रोंकी गिनती की जाती है। तीसरा
अद्धापल्य है। अद्धा और कालस्थिति ये एकार्थवाची शब्द हैं। इनमें-से अब प्रथम पल्यका प्रमाण
कहते हैं—जो इस प्रकार है—प्रमाणांगुलकी गणनासे एक-एक योजन लम्बे, चौड़े और गहरे तीन
गढ़ा करो और इनमें-से एकमें एक दिनसे लेकर सात दिन तक के पैदा हुए मेढ़ेके रोमोंके अग्र
भागोंको ऐसे टुकड़े करके भरो जिससे कैंचीसे उसके दूसरे टुकड़े न किये जा सकें। अनन्तर सौ-सौ
वर्षमें एक-एक रोमका टुकड़ा निकालो। इस विधिसे जितने कालमें वह गढ़ा खाली हो वह सब
काल व्यवहार पल्योपम नामसे कहा जाता है। अनन्तर असंख्यात करोड़ वर्षोंके जितने समय हों
१. -मिषु स्थिति-मु० । २. -द्वयस्य व्यव- मु० । ३. कथ्यते । तद्यथा मु० । ४. नाप्नु-मु० । ५. घनीभूतं
मु० । ६. ततो वर्षशते एकैक- मु० ।

  • ३३९ § ४४१ ] तृतीयोग्ध्यायः १७१
    तैरेव लोमच्छेदैः प्रत्येकमसंख्येयवर्षकोटीसमयमात्रच्छिन्नैस्तत्पूर्णमुद्धारपल्यम् । ततः समये समये
    एकैकस्मिन् रोमच्छेदेऽपकृष्यमाणे यावता कालेन तद्रिक्तं भवति तावान्काल उद्धारपल्योपमाख्यः ।
    एषामुद्धारपल्यानां दशकोटीकोट्य एकमुद्धारसागरोपमम् । अर्धतृतीयोद्धारसागरोपमानां यावन्तो
    रोमच्छेदास्तावन्तो द्वीपसमुद्राः । पुनरुद्धारपल्यरोमच्छेदैर्वर्षशतसमयमात्रच्छिन्नैः पूर्णमद्धापल्यम् ।
    ततः समये समये एकैकस्मिन् रोमच्छेदेऽपकृष्यमाणे यावता कालेन तद्रिक्तं भवति तावान्कालो-
    द्वापल्योपमाख्यः । एषामद्धापल्यानां दशकोटीकोट्य एकमद्धासागरोपमम् । दशाद्धासागरोपमकोटी-
    कोट्य एकावसर्पिणी । तावत्येवोत्सर्पिणी । अनेनाद्धापल्येन नारकतैर्यग्योनानां देवमनुष्याणां च
    कर्मस्थितिर्भवस्थितिरायुःस्थितिः कायस्थितिश्च परिच्छेत्तव्या । उक्ता च संग्रहगाथा—
    "ववहारुद्धारद्धा पल्ला तिण्णेव होंति बोद्धव्वा ।
    संखा दीव-समुद्वा कम्मट्ठिदि वण्णिदा तदिए ॥"
    § ४४०. यथैवैते^२ उत्कृष्टजघन्ये स्थिती नृणां तथैव—
    तिर्यग्योनिजानां च ॥३६॥
    § ४४१. तिरश्चां योनस्तिर्यग्योनिः । तिर्यग्गतिनामकर्मोदयापादितं जन्मेत्यर्थः । तिर्यग्योनौ
    जातास्तिर्यग्योनिजाः । तेषां तिर्यग्योनिजानामुत्कृष्टा भवस्थितिस्त्रिपल्योपमा । जघन्या अन्तर्मुहूर्ता ।
    मध्येऽनेकविकल्पाः ।
    इति तत्त्वार्थवृत्तौ सर्वार्थसिद्धिसंज्ञिकायां तृतीयोऽध्यायः ॥३॥
    उतने उन लोमच्छेदोंमें-से प्रत्येक खण्ड करके उनसे दूसरे गढ़ेके भरनेपर उद्धारपल्य होता है ।
    और इसमें-से प्रत्येक समयमें एक-एक रोमको निकालते हुए जितने कालमें वह गढ़ा खाली हो जाय
    उतने कालका नाम उद्धार पल्योपम है । इन दस कोड़ाकोड़ी उद्धारपल्योंका एक उद्धार सागरोपम
    काल होता है । तथा ढाई उद्धार सागरके जितने रोमखण्ड हों उतने सब द्वीप और समुद्र हैं ।
    अनन्तर सौ वर्षके जितने समय हों उतने उद्धारपल्यके रोमखण्डोंमें-से प्रत्येकके खण्ड करके और
    उनसे तीसरे गढ़ेके भरनेपर एक अद्धापल्य होता है । और इनमें-से प्रत्येक समयमें एक-एक रोमके
    निकालनेपर जितने समयमें वह गढ़ा खाली हो जाय उतने कालका नाम अद्धापल्योपम है । तथा
    ऐसे दस कोड़ाकोड़ी अद्धापल्योंका एक अद्धासागर होता है । दस कोड़ाकोड़ी अद्धासागरोंका एक
    अवसर्पिणी काल होता है और उत्सर्पिणी भी इतना ही बड़ा होता है ।
    इस अद्धापल्यके द्वारा नारकी, तिर्यञ्च, देव और मनुष्योंकी कर्मस्थिति, भवस्थिति, आयु-
    स्थिति और कायस्थिति की गणना करनी चाहिए । संग्रह गाथा भी कही है—
    व्यवहार, उद्धार और अद्धा ये तीन पल्य जानने चाहिए । संख्याका प्रयोजक व्यवहार पल्य
    है । दूसरेसे द्वीप-समुद्रोंकी गणना की जाती है और तीसरे अद्धापल्यमें कर्मोंकी स्थितिका लेखा है ।
    § ४४०. जिस प्रकार मनुष्योंकी यह उत्कृष्ट और जघन्य स्थिति है उसी प्रकार—
    तिर्यञ्चों की स्थिति भी उतनी ही है ॥३९॥
    § ४४१. तिर्यंचोंकी योनिको तिर्यग्योनि कहते हैं । इसका अर्थ तिर्यंचगति नामकर्मके उदयसे
    प्राप्त हुआ जन्म है । जो तिर्यंचयोनिमें पैदा होते हैं वे तिर्यग्योनिज कहलाते हैं । इन तिर्यंचयोनिसे
    उत्पन्न जीवोंकी उत्कृष्ट भवस्थिति तीन पल्य और जघन्य भवस्थिति अन्तर्मुहूर्त है । तथा बीचकी
    स्थितिके अनेक विकल्प हैं ।
    १. ववहारुद्धारद्धा तियपल्ला पढमंम्मि संखाओ । विदिए दीवसमुद्दा तदिए मिज्जेदि कम्मठिदी ति० प०
    गा० ९४ । २. -वैते द्वे उत्कृ-आ०, दि० १, दि० २ ।
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१७२ सर्वार्थसिद्धौ [ ३।३९ § ४४१ -
विशेषार्थ—स्थिति दो प्रकारकी होती है—भवस्थिति और कायस्थिति । एक पर्यायमें
रहनेमें जितना काल लगे वह भवस्थिति है। तथा विवक्षित पर्यायके सिवा अन्य पर्यायमें उत्पन्न न
होकर पुनः पुनः उसी पर्यायमें निरन्तर उत्पन्न होनेसे जो स्थिति प्राप्त होती है वह कायस्थिति
है। यहां मनुष्यों और तिर्यंचोंकी भवस्थिति कही गयी है। इनकी जघन्य कायस्थिति जघन्य
भवस्थिति प्रमाण है; क्योंकि एक बार जघन्य आयुके साथ भव पाकर उसका अन्य पर्यायमें जाना
सम्भव है। मनुष्योंकी उत्कृष्ट कायस्थिति पूर्वकोटिपृथक्त्व अधिक तीन पल्य है। पृथक्त्व यह
रौढिक संज्ञा है। मुख्यतः इसका अर्थ तीनसे ऊपर और नौसे नीचे होता है। यहां बहुत अर्थमें
पृथक्त्व शब्द आया है। तिर्यंचोंकी उत्कृष्ट कायस्थिति अनन्तकाल है जो असंख्यात पुद्गल
परिवर्तनोंके बराबर है। यहं तिर्यंचगति सामान्यकी अपेक्षा उनकी कायस्थिति कही है। यदि अन्य
गतिसे आकर कोई जीव निरन्तर तिर्यंचगतिमें परिभ्रमण करता रहता है तो अधिकसे अधिक
इतने काल तक वह तिर्यंचगति में रह सकता है। इसके बाद वह नियमसे अन्य गतिमें जन्म लेता
है। वैसे तिर्यंचोंके अनेक भेद हैं इसलिए उन भेदोंकी अपेक्षा उनकी कायस्थिति जुदी-जुदी है।
इस प्रकार सर्वार्थसिद्धि नामवाली तत्त्वार्थवृत्तिमें तीसरा अध्याय समाप्त हुआ ॥३॥

अथ चतुर्थोऽध्यायः
§ ४४२. ‘भवप्रत्ययोऽवधिर्देवनारकाणाम्’ इत्येवमादिष्वसकृद्देवशब्द उक्तस्तत्र न ज्ञायते के
देवाः कतिविधा इति¹ तन्निर्णयार्थमाह—
देवाश्चतुर्णिकायाः ॥१॥
§ ४४३. देवगतिनामकर्मोदये सत्यभ्यन्तरे हेतौ बाह्यविभूतिविशेषैः द्वीपादिसमुद्रादिप्रदेशेषु
³यथेष्टं दीव्यन्ति क्रीडन्तीति देवाः । इहैकवचननिर्देशो युक्तः ‘देवश्चतुर्णिकायः’ इति⁴ । स जात्यभि-
धानाद् बहूनां प्रतिपादको भवति बहुत्वनिर्देशस्तदन्तर्गतभेदप्रतिपत्त्यर्थः । इन्द्रसामानिकादयो बहवो
भेदाः सन्ति स्थित्यादिकृताश्च तत्सूचनार्थः । देवगतिनामकर्मोदयस्य स्वकर्मविशेषापादितभेदस्य⁷
सामर्थ्यान्निचीयन्त इति निकायाः संघाता इत्यर्थः । चत्वारो निकाया येषां ते चतुर्णिकायाः । के
पुनस्ते ? भवनवासिनो व्यन्तरा ज्योतिष्का वैमानिकाश्चेति ।
§ ४४४. तेषां लेश्यावधारणार्थमुच्यते—
आदितस्त्रिषु पीतान्तलेश्याः ॥२॥
§ ४४२. ‘देव और नारकियोंके भवप्रत्यय अवधिज्ञान होता है’ इत्यादि सूत्रोंमें अनेक बार
देव शब्द आया है। किन्तु वहाँ यह न जान सके कि देव कौन हैं और वे कितने प्रकारके हैं अतः
इसका निर्णय करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
देव चार निकायवाले हैं ॥१॥
§ ४४३. अभ्यन्तर कारण देवगति नामकर्मके उदय होनेपर जो नाना प्रकारकी बाह्य
विभूतिसे द्वीपसमुद्रादि अनेक स्थानोंमें इच्छानुसार क्रीड़ा करते हैं, वे देव कहलाते हैं। शंका—
‘देवश्चतुर्णिकायः’ इस प्रकार एकवचनरूप निर्देश करना उचित था, क्योंकि जातिका कथन कर
देनेसे बहुतका कथन हो ही जाता है। समाधान—देवोंके अन्तर्गत अनेक भेद हैं इस बातका ज्ञान
करानेके लिए सूत्रमें बहुवचनका निर्देश किया है। तात्पर्य यह है कि देवोंके इन्द्र, सामानिक
आदिकी अपेक्षा अनेक भेद हैं और स्थिति आदिकी अपेक्षा भी अनेक भेद हैं अतः उनको सूचित
करनेके लिए बहुवचनका निर्देश किया है। अपने अवान्तर कर्मोंसे भेदको प्राप्त होनेवाले देवगति
नामकर्मके उदयकी सामर्थ्यसे जो संग्रह किये जाते हैं वे निकाय कहलाते हैं। निकाय शब्दका
अर्थ संघात है। ‘चतुर्णिकाय’ में बहुव्रीहि समास है, जिससे देवोंके मुख्य निकाय चार ज्ञात
होते हैं। शंका—इन चार निकायोंके क्या नाम हैं ? समाधान—भवनवासी, व्यन्तर, ज्योतिष्क
और वैमानिक ।
§ ४४४. अब इनकी लेश्याओंका निश्चय करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
आदिके तीन निकायोंमें पीत पर्यन्त चार लेश्याएँ हैं ॥२॥
१. इति वा तन्नि-मु० । २. विशेषाद् द्वीपा- मु० । ३. मुद्रादिषु प्रदे-मु० । ४. -डन्ति ते देवाः मु० । ५.
इति । जात्य- मु० । ६. ‘जात्याख्यायामेकस्मिन्बहुवचनमन्यतरस्याम् पा० १, २, ५८ । ७. स्वधर्मविशे-
मु०, ता०, ना० ।

१७४ सर्वार्थसिद्धौ [ ४।३ § ४४५ -
§ ४४५. 'आदित इत्युच्यते, अन्ते मध्ये अन्यथा वा ग्रहणं मा विज्ञायोति । आदौ आदितः ।
द्वयोरेकस्य च निवृत्त्यर्थं 'त्रि'ग्रहणं क्रियते । अथ चतुर्णां निवृत्त्यर्थं कस्मान्न भवति । 'आदितः'
इति वचनात् । षड्लेश्या उक्ताः । तत्र चतसृणां लेश्यानां ग्रहणार्थं 'पीतान्त'ग्रहणं क्रियते । पीतं
तेज इत्यर्थः । पीता अन्ते यासां ताः पीतान्ताः२ । पीतान्ता लेश्या येषां ते पीतान्तलेश्याः । एतदुक्तं
भवति—आदितस्त्रिषु निकायेषु भवनवासिव्यन्तरज्योतिष्कानामसु देवानां कृष्णा नीला कापोता
पीतेति चतस्रो लेश्या भवन्ति ।
§ ४४६. तेषां निकायानामन्तर्विकल्पप्रतिपादनार्थमाह—
दशाष्टपञ्चद्वादशविकल्पाः कल्पोपपन्नपर्यन्ताः ॥३॥
§ ४४७. चतुर्णां देवनिकायानां दशादिभिः संख्याशब्दैर्यथासंख्यमभिसंबन्धो वेदितव्यः ।
दशविकल्पा भवनवासिनः । अष्टविकल्पा व्यन्तराः । पञ्चविकल्पा ज्योतिष्काः । द्वादशविकल्पा वैमा-
निका इति । सर्ववैमानिकानां द्वादशविकल्पान्तःपातित्वे प्रसक्ते ग्रैवेयकादिनिवृत्त्यर्थं विशेषणमुपा-
दीयते 'कल्पोपपन्नपर्यन्ताः' इति । अथ कथं कल्पसंज्ञा । इन्द्रादयः प्रकारा दश एतेषु कल्प्यन्त इति
§ ४४५. अन्तके तीन निकायोंका, मध्यके निकायोंका या विपरीत क्रमसे निकायोंका ग्रहण
न समझ लिया जाय इसलिए सूत्रमें 'आदितः' पद दिया है। दो और एक निकायके निराकरण
करनेके लिए 'त्रि' पदका ग्रहण किया है। शंका—'त्रि' पदसे चारकी निवृत्ति क्यों नहीं होती है ?
समाधान—सूत्रमें जो 'आदितः' पद दिया है इससे ज्ञात होता है कि 'त्रि' पद चारकी निवृत्तिके
लिए नहीं है । लेश्याएँ छह कही हैं उनमें से चार लेश्याओंके ग्रहण करनेके लिए सूत्रमें, 'पीतान्त'
पदका ग्रहण किया है। यहाँ पीतसे तेज लेश्या लेनी चाहिए। यहाँ पहले पीत और अन्त इन
शब्दोंमें और अनन्तर पीतान्त और लेश्या शब्दोंमें बहुव्रीहि समास है। इसका यह अभिप्राय है कि
आदिके भवनवासी, व्यन्तर और ज्योतिषी इन तीन निकायोंमें देवोंके कृष्ण, नील, कापोत और
पीत ये चार लेश्याएँ होती हैं।
विशेषार्थ—यों तो भवनवासी, व्यन्तर और ज्योतिषी-देवोंके एक पीत लेश्या ही होती है
किन्तु ऐसा नियम है कि कृष्ण, नील और कापोत लेश्याके मध्यम अंशसे मरे हुए कर्मभूमियाँ
मिथ्यादृष्टि मनुष्य और तिर्यंच और पीत लेश्याके मध्यम अंशसे मरे हुए भोगभूमियाँ मिथ्यादृष्टि
मनुष्य और तिर्यंच भवनत्रिकमें उत्पन्न होते हैं। अतः ऐसे कर्मभूमियां मनुष्य और तिर्यंचोंके मरते
समय प्रारम्भकी तीन अशुभ लेश्याएँ होती हैं अतः इनके मरकर भवनत्रिकोंमें उत्पन्न होनेपर वहीं
भी अपर्याप्त अवस्थामें ये अशुभ लेश्याएँ पायी जाती हैं। इसीसे इनके पीत तक चार लेश्याएँ
कही हैं। अभिप्राय यह है कि भवनत्रिकोंके अपर्याप्त अवस्थामें पीत तक चार लेश्याएँ और पर्याप्त
अवस्थामें एक पीत लेश्या होती है।
§ ४४६. अब इन निकायोंके भीतरी भेद दिखलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
वे कल्पोपपन्न देव तकके चार निकायके देव क्रमसे दस, आठ, पाँच और बारह भेद-
वाले हैं ॥३॥
§ ४४७. देव निकाय चार हैं और दश आदि संख्या शब्द चार हैं अतः इनका क्रमसे
सम्बन्ध जानना चाहिए । यथा—भवनवासी दस प्रकारके हैं, व्यन्तर आठ प्रकारके हैं, ज्योतिषी
पाँच प्रकारके हैं और वैमानिक बारह प्रकारके हैं। उपर्युक्त कथनसे सब वैमानिक बारह भेदोंमें
आ जाते हैं, अतः ग्रैवेयक आदिके निराकरण करनेके लिए सूत्रमें 'कल्पोपपन्नपर्यन्ताः' यह पद दिया
१. – च्यते अन्यथा वा ग्रह-दि० २ । –च्यते अन्ते मध्ये वा ग्रह-मु०, ता०, ना० । –च्यते अन्ते अन्यथा वा
ग्रह-आ० । २. –ताः पीतान्ता लेश्या मु०, दि० २ । ३. ज्योतिष्काणां देवा- आ०, दि० १, दि० २ ।

  • ४।४ § ४५० ] चतुर्थोऽध्यायः १७५

कल्पाः । भवनवासिषु तत्कल्पनासम्भवेऽपि रूढिवशाद्वैमानिकेष्वेव वर्तते कल्पशब्दः । कल्पेषूपपन्ना
कल्पोपपन्नाः । कल्पोपपन्नाः पर्यन्ता येषां ते कल्पोपपन्नपर्यन्ताः ।
§ ४४८. पुनरपि तद्विशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह—
इन्द्रसामानिकत्रायस्त्रिंशपारिषदात्मरक्षलोकपालानीकप्रकीर्णका-
भियोग्यकिल्विषिकाश्चैकशः ॥४॥
§ ४४९. अन्यदेवासाधारणाणिमादिगुणयोगादिन्दन्तीति इन्द्राः । आज्ञैश्वर्यवर्जितं यत्स्या-
नायुर्वीर्यपरिवारभोगोपभोगादि तत्समानं, तस्मिन्समाने भवाः सामानिका महत्तराः पितृगुरुपाध्याय-
तुल्याः । मन्त्रिपुरोहितस्थानीयास्त्रायस्त्रिंशाः । त्रयस्त्रिंशदेव त्रायस्त्रिंशाः । वयस्यपीठमर्दसदृशाः
परिषदि भवाः पारिषदाः । आत्मरक्षाः शिरोरक्षोपमानाः । अर्थचररक्षकसमानां लोकपालाः ।
लोकं पालयन्तीति लोकपालाः । पदात्यादीनि सप्त अनीकानि दण्डस्थानीयानि । प्रकीर्णकाः
पौरजानपदकल्पाः । आभियोग्या दाससमाना वाहनादिकर्मणि प्रवृत्ताः² । अन्तेवासिस्थानीयाः³
किल्विषिकाः । किल्विषं पापं येषांमस्तीति किल्विषिकाः ।
§ ४५०. एकैकस्य निकायस्य एकश एते, इन्द्रादयो दश विकल्पाश्चतुर्षु निकायेषूत्सर्गेण
प्रसक्तास्ततोऽपवादार्थमाह—
है । शंका—कल्प इस संज्ञाका क्या कारण है ? समाधान—जिनमें इन्द्र आदि दस प्रकार कल्पे
जाते हैं वे कल्प कहलाते हैं । इस प्रकार इन्द्रादिककी कल्पना ही कल्प संज्ञाका कारण है। यद्यपि
इन्द्रादिक- की कल्पना भवनवासियोंमें भी सम्भव है फिर भी रूढ़िसे कल्प शब्दका व्यवहार
वैमानिकोंमें ही किया जाता है। जो कल्पोंमें उत्पन्न होते हैं वे कल्पोपपन्न कहलाते हैं। तथा
जिनके अन्तमें कल्पोपपन्न देव हैं उन सबको कल्पोपपन्नपर्यन्त कहा है।
§ ४४८. प्रकारान्तरसे इनके भेदोंका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
उक्त दस आदि भेदोंमें-से प्रत्येक इन्द्र, सामानिक, त्रायस्त्रिंश, पारिषद, आत्मरक्ष, लोक-
पाल, अनीक, प्रकीर्णक, आभियोग्य और किल्विषिक रूप हैं ॥४॥
§ ४४९. जो अन्य देवोंमें असाधारण अणिमादि गुणोंकें सम्बन्धसे शोभते हैं वे इन्द्र कहलाते
हैं । आज्ञा और ऐश्वर्यके सिवा जो आयु, वीर्य, परिवार, भोग और उपभोग हैं वे समान कहलाते
हैं । उस समानमें जो होते हैं वे सामानिक कहलाते हैं । ये पिता, गुरु और उपाध्यायके समान
सबसे बड़े हैं जो मंत्री और पुरोहित के समान हैं वे त्रायस्त्रिंश कहलाते हैं। ये तैंतीस ही होते हैं
इसलिए त्रायस्त्रिंश कहलाते हैं। जो सभामें मित्र और प्रेमीजनोंके समान होते हैं वे पारिषद
कहलाते हैं । जो अंगरक्षकके समान हैं वे आत्मरक्ष कहलाते हैं। जो रक्षकके समान अर्थचर हैं वे
लोकपाल कहलाते हैं। तात्पर्य यह है कि जो लोकका पालन करते हैं वे लोकपाल कहलाते हैं।
जैसे यहां सेना है उसी प्रकार सात प्रकारके पदाति आदि अनीक कहलाते हैं। जो गाँव और
शहरोंमें रहनेवालोंके समान हैं उन्हें प्रकीर्णक कहते हैं। जो दासके समान वाहन आदि कर्ममें
प्रवृत्त होते हैं वे आभियोग्य कहलाते हैं। जो सीमाके पास रहनेवालों के समान हैं वे किल्विषिक
कहलाते हैं। किल्विष पापको कहते हैं इसकी जिनके बहुलता होती है वे किल्विषिक कहलाते हैं।
§ ४५०. चारों निकायोंमें-से प्रत्येक निकायमें ये इन्द्रादिक दस भेद उत्सर्गसे प्राप्त हुए अतः
जहाँ अपवाद है, उसका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—


१. -यत्समानायु-मु० । २. – वृत्ताः । अन्त्यवासि-आ०, दि० १, दि० २ । ३. –स्थानीयाः । किल्विषं
मु० । ४. – येषामस्ति ते किल्वि-मु० ।

१७६ सर्वार्थसिद्धौ [ ४।५ § ४५१ -
त्रायस्त्रिंशलोकपालवर्ज्या व्यन्तरज्योतिष्काः ॥५॥
§ ४५१. व्यन्तरेषु ज्योतिष्केषु च त्रायस्त्रिंशांल्लोकपालांश्च वर्जयित्वा इतरेऽष्टौ विकल्पा
द्रष्टव्याः ।
§ ४५२. अथ तेषु निकायेषु किमेकैक इन्द्र उतान्यः प्रतिनियमः कश्चिदस्तीत्यत आह—
पूर्वयोर्द्वीन्द्राः ॥६॥
§ ४५३. पूर्वयोर्निकाययोर्भवनवासिव्यन्तरनिकाययोः । कथं द्वितीयस्य पूर्वत्वम् । सामी-
प्यात्पूर्वत्वमुपचर्योक्तम् । ‘द्वीन्द्राः’ इति अन्तर्नीतवीप्सार्थः । द्वौ द्वौ इन्द्रौ येषां ते द्वीन्द्रा इति ।
यथा सप्तपर्णोऽष्टापद इति । तद्यथा—भवनवासिषु तावदसुरकुमाराणां द्वाविन्द्रौ चमरौ वैरोचनश्च ।
नागकुमाराणां धरणो भूतानन्दश्च । विद्युत्कुमाराणां हरिसिंहो हरिकान्तश्च । सुपर्णकुमाराणां
वेणुदेवो वेणुधारी च । अग्निकुमाराणामग्निशिखोऽग्निमाणवश्च । वातकुमाराणां वैलम्बः
प्रभञ्जनश्च । स्तनितकुमाराणां सुघोषो महाघोषश्च । उदधिकुमाराणां जलकान्तो जलप्रभश्च ।
द्वीपकुमाराणां पूर्णो वसिष्ठश्च । दिक्कुमाराणाममितगतिरमितवाहनश्चेति । व्यन्तरेष्वपि
किन्नराणां द्वाविन्द्रौ किन्नरः किम्पुरुषश्च । किम्पुरुषाणां सत्पुरुषो महापुरुषश्च २। महोरगाणा-
मतिकायो महाकायश्च । गन्धर्वाणां गीतरतिर्गीतयशश्च । यक्षाणां पूर्णभद्रो मणिभद्रश्च ।
राक्षसानां भीमो महाभीमश्च । भूतानां प्रतिरूपोऽप्रतिरूपश्च । पिशाचानां कालो महाकालश्च ।
किन्तु व्यन्तर और ज्योतिष्क देव त्रायस्त्रिंश और लोकपाल इन दो भेदों से रहित हैं ॥५॥
§ ४५१. व्यन्तर और ज्योतिषियोंमें त्रायस्त्रिंश और लोकपाल इन दो भेदोंके सिवा शेष
आठ भेद जानना चाहिए ।
§ ४५२. उन निकायोंमें क्या एक-एक इन्द्र है या और दूसरा कोई नियम है, इस बातके
बतलानेके लिए अब आगेका सूत्र कहते हैं ।
प्रथम दो निकायोंमें दो दो इन्द्र हैं ॥६॥
§ ४५३. पूर्व दो निकायोंसे भवनवासी और व्यन्तर ये दो निकाय लेना चाहिए । शंका—
दूसरे निकायको पूर्व कैसे कहा जा सकता है ? समाधान—प्रथमके समीपवर्ती होनेसे दूसरे निकाय
को उपचारसे पूर्व कहा है । ‘द्वीन्द्राः’ इस पदमें वीप्सा रूप अर्थ गर्भित है अतः इसका विग्रह इस
प्रकार हुआ कि ‘द्वौ द्वौ इन्द्रौ येषां ते द्वीन्द्राः’ जैसे सप्तपर्ण और अष्टापद । तात्पर्य यह है जिस प्रकार
सप्तपर्ण और अष्टापद इन पदोंमें वीप्सारूप अर्थ गर्भित है उसी प्रकार प्रकृतमें जानना चाहिए ।
खुलासा इस प्रकार है—भवनवासियोंमें असुरकुमारोंके चमर और वैरोचन ये दो इन्द्र हैं । नाग
कुमारोंके धरण और भूतानन्द ये दो इन्द्र हैं । विद्युत्कुमारोंके हरिसिंह और हरिकान्त ये दो इन्द्र हैं ।
सुपर्णकुमारोंके वेणुदेव और वेणुधारी ये दो इन्द्र हैं । अग्निकुमारोंके अग्निशिख और अग्निमाणव ये
दो इन्द्र हैं । वातकुमारोंके वैलम्ब और प्रभंजन ये दो इन्द्र हैं । स्तनितकुमारोंके सुघोष और महा-
घोष ये दो इन्द्र हैं । उदधिकुमारोंके जलकान्त और जलप्रभ ये दो इन्द्र हैं । द्वीपकुमारोंके पूर्ण और
विशिष्ट ये दो इन्द्र हैं । तथा दिक्कुमारोंके अमितगति और अमितवाहन ये दो इन्द्र हैं । व्यन्तरोंमें
भी किन्नरोंके किन्नर और किम्पुरुष ये दो इन्द्र हैं । किम्पुरुषोंके सत्पुरुष और महापुरुष ये दो
इन्द्र हैं । महोरगोंके अतिकाय और महाकाय ये दो इन्द्र हैं । गन्धर्वों के गीतरति और गीतयश
ये दो इन्द्र हैं । यक्षोंके पूर्णभद्र और मणिभद्र ये दो इन्द्र हैं । राक्षसोंके भीम और महाभीम ये
दो इन्द्र हैं । भूतोंके प्रतिरूप और अप्रतिरूप ये दो इन्द्र हैं । तथा पिशाचोंके काल और महाकाल
ये दो इन्द्र हैं ।
१. -वर्ज्या व्य- ता०, ना०, । २. - रुषश्चेति महो-मु० ।

– ४१८ § ४५७ ] चतुर्थोऽध्यायः १७७
§ ४५४. अथैषां देवानां सुखं कीदृशमित्युक्ते सुखावबोधनार्थमाह—
कायप्रवीचारा आ ऐशानात् ॥७॥
§ ४५५. प्रवीचारो मैथुनोपसेवनम् । कायेन प्रवीचारो येषां ते कायप्रवीचाराः । आङ्
अभिविध्यर्थः । असंहितया निर्देशः असंदेहार्थः । एते भवनवास्यादय ऐशानान्ताः संक्लिष्टकर्म-
त्वान्मनुष्यवत्स्त्रीविषयसुखमनुभवन्तीत्यर्थः ।
§ ४५६. अवधिग्रहणादितरेषां सुखविभागेऽनिश्चिते तत्प्रतिपादनार्थमाह—
शेषाः स्पर्शरूपशब्दमनःप्रवीचाराः ॥८॥
§ ४५७. उक्तावशिष्टग्रहणार्थं 'शेष' ग्रहणम् । के पुनरुक्तावशिष्टाः । कल्पवासिनः । स्पर्शश्च
रूपं च शब्दश्च मनश्च स्पर्शरूपशब्दमनांसि, तेषु प्रवीचारो येषां ते स्पर्शरूपशब्दमनःप्रवीचाराः ।
कथमभिसंबन्धः । आर्षाविरोधेन । कुतः पुनः 'प्रवीचार'ग्रहणम् । इष्टसंप्रत्ययार्थमिति । कः
पुनरिष्टोऽभिसंबन्धः । आर्षाविरोधी—सानत्कुमारमाहेन्द्रयोर्देवा देवाङ्गनाङ्गस्पर्शमात्रादेव परां
प्रीतिमुपलभन्ते, तथा देव्योऽपि । ब्रह्मब्रह्मोत्तरलान्तवकापिष्ठेषु देवा दिव्याङ्गनानां शृङ्गाराकार-
विलासचतुरमनोज्ञवेषरूपावलोकनमात्रादेव परमसौख्यमाप्नुवन्ति । शुक्रमहाशुक्रशतारसहस्रारेषु देवा
देववनितानां मधुरसंगीतमुद्धसितललितकथितभूषणरवश्रवणमात्रादेव परां प्रीतिमास्कन्दन्ति ।
आनतप्राणतारणाच्युतकल्पेषु देवा स्वाङ्गनामनःसंकल्पमात्रादेव परं सुखमाप्नुवन्ति ।
§ ४५४. इन देवोंका सुख किस प्रकारका होता है ऐसा पूछने पर सुखका ज्ञान करानेके
लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
ऐशान तकके देव कायप्रवीचार अर्थात् शरीरसे विषय-सुख भोगनेवाले होते हैं ॥७॥
§ ४५५. मैथुनके उपसेवनको प्रवीचार कहते हैं । जिनका कायसे प्रवीचार है वे कायप्रवी-
चारवाले कहे जाते हैं । कहां तक कायसे प्रवीचारकी व्याप्ति है इस बातके बतलानेके लिए सूत्रमें
‘आङ्’ का निर्देश किया है । सन्देह न हो इसलिए ‘आ ऐशानात्’ इस प्रकार सन्धिके बिना निर्देश
किया है । तात्पर्य यह है कि ऐशान स्वर्ग पर्यन्त ये भवनवासी आदि देव संक्लिष्ट कर्मवाले होनेके
कारण मनुष्योंके समान स्त्रीविषयक सुखका अनुभव करते हैं ।
§ ४५६. ऊपरके सूत्रमें कायसे प्रवीचारकी मर्यादा कर दी है इसलिए इतर देवोंके सुखका
विभाग नहीं ज्ञात होता है, अतः इसके प्रतिपादन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
शेष देव स्पर्श, रूप, शब्द और मनसे विषय-सुख भोगनेवाले होते हैं ॥८॥
§ ४५७. पहले जिन देवोंका प्रवीचार कहा है उनसे अतिरिक्त देवोंके ग्रहण करनेके लिए
'शेष' पदका ग्रहण किया है । शंका—उक्त देवोंसे अवशिष्ट और कौन देव हैं ? समाधान—
कल्पवासी । यहाँ स्पर्श, रूप, शब्द और मन इनका परस्पर द्वन्द्व समास करके अनन्तर प्रवीचार
शब्दके साथ बहुव्रीहि समास किया है । शंका—इनमें-से किन देवोंके कौन-सा प्रवीचार है इसका
सम्बन्ध कैसे करना चाहिए ? समाधान—इसका सम्बन्ध जिस प्रकार आर्षमें विरोध न आवे उस
प्रकार कर लेना चाहिए । शंका—पुनः ‘प्रवीचार' शब्दका ग्रहण किसलिए किया है ? समाधान—
इष्ट अर्थका ज्ञान करानेके लिए । शंका—जिसमें आर्षसे विरोध न आवे ऐसा वह इष्ट अर्थ क्या है ?
समाधान—सानत्कुमार और माहेन्द्र स्वर्गके देव देवांगनाओंके स्पर्श मात्रसे परम प्रीतिको प्राप्त
होते हैं और इसी प्रकार वहाँकी देवियां भी । ब्रह्म, ब्रह्मोत्तर, लान्तव और कापिष्ठ स्वर्गके देव
देवांगनाओंके शृंगार, आकृति, विलास, चतुर और मनोज्ञ वेष तथा मनोज्ञ रूपके देखने मात्रसे ही
परम सुखको प्राप्त होते हैं । शुक्र, महाशुक्र, शतार और सहस्रार स्वर्गके देव देवांगनाओंके मधुर
१. ‘आङ् मर्यादाभिविध्योः ।’ पा० २, १, १३ । २. -ङ्गाकास्पर्श-मु० ।
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१७८ सर्वार्थसिद्धौ [ ४।९ § ४५८ -
§ ४५८. अथोत्तरेषां किंप्रकारं सुखमित्युक्ते तन्निश्चयार्थमाह—
परेऽप्रवीचाराः ॥६॥
§ ४५९. 'पर'ग्रहणमितराशेषसंग्रहार्थम् । 'अप्रवीचार'ग्रहणं परमसुखप्रतिपत्त्यर्थम् ।
प्रवीचारो हि वेदनाप्रतिकारः । तदभावे तेषां परमसुखमनावरतं भवति ।
§ ४६०. उक्ता ये आदिनिकायदेवा दशविकल्पा इति तेषां सामान्यविशेषसंज्ञाविज्ञापनार्थ-
मिदमुच्यते—
भवनवासिनोऽसुरनागविद्युत्सुपर्णाग्निवातस्तनितोदधिद्वीप दिक्कुमाराः ॥१०॥
§ ४६१. भवनेषु वसन्तीत्येवंशीला भवनवासिनः । आदिनिकायस्येयं सामान्यसंज्ञा ।
असुरादयो विशेषसंज्ञा विशिष्टनामकर्मोदयापादितवृत्तयः सर्वेषां देवानामनवस्थितवयःस्वभावत्वेऽपि
वेषभूषायुधयानवाहनक्रीडनादिकुमारवद्वेषामाभासत इति भवनवासिषु कुमारव्यपदेशो रूढः । स
प्रत्येकं परिसमाप्यते असुरकुमारा इत्येवमादि । क्व तेषां भवनानीति चेत् । उच्यते—रत्नप्रभायाः
पङ्कबहुलभागेऽसुरकुमाराणां भवनानि । खरपृथिवीभागे उपर्यधश्च एकैकयोजनसहस्रं वर्जयित्वा
शेषनवानां कुमाराणामावासाः ।
§ ४६२. द्वितीय निकायस्य सामान्यविशेषसंज्ञावधारणार्थमाह—
संगीत, कोमल हास्य, ललित कथा और भूषणोंके कोमल शब्दोंके सुननेमात्रसे ही परम प्रीतिको
प्राप्त होते हैं। तथा आनत, प्राणत, आरण और अच्युत कल्पके देव अपनी अंगनाका मनमें संकल्प
करनेमात्रसे ही परम सुखको प्राप्त होते हैं ।
§ ४५८. अब आगेके देवोंका किस प्रकारका सुख है ऐसा प्रश्न करनेपर उसका निश्चय
करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
बाकीके सब देव विषय-सुख से रहित होते हैं ॥९॥
§ ४५९. शेष सब देवोंका संग्रह करनेके लिए सूत्रमें 'पर' शब्दका ग्रहण किया है। परम
सुखका ज्ञान करानेके लिए अप्रवीचार पदका ग्रहण किया है। प्रवीचार वेद

– ४।१२ § ४६५ ] चतुर्थोऽध्यायः १७९

व्यन्तराः किंनरकिंपुरुषमहोरगगन्धर्वयक्षराक्षसभूतपिशाचाः ॥११॥
§ ४६३. विविधदेशान्तराणि येषां निवासास्ते 'व्यन्तराः' इत्यन्वर्था सामान्यसंज्ञेयमष्टा-
नामपि विकल्पानाम् । तेषां व्यन्तराणामष्टौ विकल्पाः किंनरादयो वेदितव्या नामकर्मोदयविशेषा-
पादिताः । क्व पुनस्तेषामावासा इति चेत् । उच्यते—अस्माज्जम्बूद्वीपादसंख्येयान् द्वीपसमुद्रानतीत्य
उपरिष्टे¹ खरपृथिवीभागे सप्तानां व्यन्तराणांवासाः । राक्षसानां पङ्कबहुलभागे ।
§ ४६४. तृतीयस्य निकायस्य सामान्यविशेषसंज्ञासंकीर्तनार्थमाह—
ज्योतिष्काः सूर्याचन्द्रमसौ ग्रहनक्षत्रप्रकीर्णकतारकाश्च ॥१२॥
§ ४६५. ज्योतिस्स्वभावत्वादेषां पञ्चानामपि 'ज्योतिष्काः' इति सामान्यसंज्ञा अन्वर्था ।
सूर्यादयस्तद्विशेषसंज्ञा नामकर्मोदयप्रत्ययाः । 'सूर्याचन्द्रमसौ' इति पृथग्ग्रहणं प्राधान्यख्यापनार्थम् ।
किंकृतं पुनः प्राधान्यम् । प्रभावादिकृतम् । क्व पुनस्तेषामावासाः । इत्यत्रोच्यते, अस्मात्समाद्
भूमिभागादूर्ध्वं सप्तयोजनशतानि नवत्युत्तराणि² उत्पत्य सर्वज्योतिषामधोभागविन्यस्तास्तारका-
श्चरन्ति । ततो दशयोजनान्युत्पत्य सूर्यश्चरन्ति । ततोऽशीतियोजनान्युत्पत्य चन्द्रमसो भ्रमन्ति ।
ततै³श्चत्वारि योजनान्युत्पत्य नक्षत्राणि । ततश्च⁴त्वारि योजनान्युत्पत्य बुधाः । ततस्त्रीणि योजना-
न्युत्पत्य शुक्राः । ततै⁵स्त्रीणि योजनान्युत्पत्य बृहस्पतयः । ततस्त्रीणि⁶ योजनान्युत्पत्याङ्गारकाः ।
व्यन्तर देव आठ प्रकारके हैं—किन्नर, किम्पुरुष, महोरग, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, भूत और
पिशाच ॥११॥
§ ४६३. जिनका नानाप्रकारके देशोंमें निवास है वे व्यन्तर देव कहलाते हैं। यह सामान्य
संज्ञा सार्थक है जो अपने आठों ही भेदोंमें लागू है। इन व्यन्तरोंके किन्नरादिक आठों भेद विशेष
नामकर्मके उदयसे प्राप्त होते हैं ऐसा जानना चाहिए। शंका—इन व्यन्तरोंके आवास कहां हैं ?
समाधान—इस जम्बूद्वीपसे असंख्यात द्वीप और समुद्र लांघकर ऊपरके खर पृथिवी भागमें सात
प्रकारके व्यन्तरोंके आवास हैं। तथा पंकबहुल भागमें राक्षसोंके आवास हैं।
§ ४६४. अब तीसरे निकायकी सामान्य और विशेष संज्ञाका कथन करनेके लिए आगेका
सूत्र कहते हैं—
ज्योतिषी देव पांच प्रकारके हैं—सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह, नक्षत्र और प्रकीर्णक तारे ॥१२॥
§ ४६५. ये सब पांचों प्रकारके देव ज्योतिर्मय हैं इसलिए इनकी ज्योतिषी यह सामान्य
संज्ञा सार्थक है। तथा सूर्य आदि विशेष संज्ञाएं विशेष नामकर्मके उदयसे प्राप्त होती हैं। सूर्य और
चन्द्रमाकी प्रधानताको दिखलानेके लिए 'सूर्याचन्द्रमसौ' इस प्रकार इन दोनोंका अलगसे ग्रहण
किया है। शंका—इनमें प्रधानता किस निमित्तसे प्राप्त होती है ? समाधान—इनमें प्रभाव आदिक-
की अपेक्षा प्रधानता प्राप्त होती है। शंका—इनका आवास कहांपर है ? समाधान—इस समान
भूमिभागसे सातसौ नब्बे योजन ऊपर जाकर तारकाएं विचरण करती हैं जो सब ज्योतिषियोंके
अधोभागमें स्थित हैं। इससे दस योजन ऊपर जाकर सूर्य विचरण करते हैं। इससे अस्सी योजन
ऊपर जाकर चन्द्रमा परिभ्रमण करते हैं। इससे चार योजन ऊपर जाकर नक्षत्र हैं। इससे चार
योजन ऊपर जाकर बुध हैं। इससे तीन योजन ऊपर जाकर शुक्र हैं। इससे तीन योजन ऊपर
जाकर बृहस्पति हैं। इससे तीन योजन ऊपर जाकर मंगल हैं। इससे तीन योजन ऊपर
१. -तीत्य परिष्टे आ०, ता०, ना०, दि० १, दि० २ । २. -त्तराणि ७९० उत्प-मु० । ३. ततस्त्रीणि
योज-ता०, ना०, । तत्त्वा० । ४. ततस्त्रीणि योज-ता०, ना०, तत्त्वा० । ५. ततश्चत्वारि योज-ता०, ना०,
तत्त्वा० । ६. ततश्चत्वारि योज-ता०, ना०, तत्त्वा० ।