सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६८ सर्वार्थसिद्धौ [ ३।३६ ६ ४३५ –
सप्तविधाः; बुद्धिविक्रियातपोबलौषधरसार्क्षीणभेदात् । म्लेच्छा द्विविधाः — अन्तर्द्वीपजाः कर्मभूमिजा-
श्चेति । तत्रान्तर्द्वीपा लवणोदधेरभ्यन्तरे पार्ष्वेष्वष्टासु दिक्ष्वष्टौ । तदन्तरेषु चाष्टौ । हिमवच्छिख-
रिणोरुभयोश्च विजयार्द्धयोरन्तेष्वष्टौ । तत्र दिक्षु द्वीपा वेदिकायास्तिर्यक् पञ्चयोजनशतानि प्रविश्य
५ भवन्ति । विदिक्ष्वन्तरेषु च द्वीपाः पञ्चाशत्पञ्चयोजनशतेषु गतेषु भवन्ति । शैलान्तेषु द्वीपाः षड्-
योजनशतेषु गतेषु भवन्ति । दिक्षु द्वीपाः शतयोजनविस्ताराः । विदिक्ष्वन्तरेषु च द्वीपास्तदर्ध-
विष्कम्भाः । शैलान्तेषु पञ्चविंशतियोजनविस्ताराः । तत्र पूर्वस्यां दिश्येकोरुकाः । अपरस्यां दिशि
लाङ्गूलिनः । उत्तरस्यां दिश्यभाषकाः । दक्षिणस्यां दिशि विषाणिनः । शशकर्णशष्कुलीकर्ण-
प्रावेरणकर्णलम्बकर्णाः विदिक्षु । अश्वसिंहश्वमहिषवराहव्याघ्रकौककपामुखा अन्तरेषु । मेघमुख-
विद्युन्मुखाः शिखरिण उभयोरन्तयोः । मत्स्यमुखकालमुखा हिमवत उभयोरन्तयोः । हस्तिमुखा-
१० दर्दांमुखा उत्तरविजयार्धस्योभयोरन्तयोः । गोमुखमेषमुखा दक्षिणविजयार्धस्योभयोरन्तयोः ।
एकोरुका मृदाहारा गुहावासिनः । शेषाः पुष्पफलाहारा वृक्षवासिनः । सर्वे ते पल्योपमायुषः । तं
चतुर्विंशतिरपि द्वीपा जलतलादेकयोजनोत्सेधाः । लवणोदधेर्बाह्यपार्श्वेऽप्येवं चतुर्विंशतिर्दीपा
जात्यार्य, कर्मार्य, चारित्रार्य और दर्शनार्य । बुद्धि, विक्रिया, तप, बल, औषध, रस और अक्षीण
ऋद्धिके भेदसे ऋद्धि प्राप्त आर्य सात प्रकारके हैं। म्लेच्छ दो प्रकारके हैं—अन्तर्द्वीपज म्लेच्छ
और कर्मभूमिज म्लेच्छ । लवणसमुद्रके भीतर आठों दिशाओंमें आठ अन्तर्द्वीप हैं और उनके अन्त-
१५ रालमें आठ अन्तर्द्वीप और हैं। तथा हिमवान् और शिखरी इन दोनों पर्वतोंके अन्तमें और दोनों
विजयार्ध पर्वतोंके अन्तमें आठ अन्तर्द्वीप हैं। इनमें-से जो दिशाओंमें द्वीप हैं वे वेदिकासे तिरछे पाँचसौ
योजन भीतर जाकर हैं। विदिशाओं और अन्तरालोंमें जो द्वीप हैं वे पाँचसौ पचास योजन भीतर
जाकर हैं। तथा पर्वतोंके अन्तमें जो द्वीप हैं वे छहसौ योजन भीतर जाकर हैं। दिशाओंमें स्थित
द्वीपोंका विस्तार सौ योजन है। विदिशाओं और अन्तरालोंमें स्थित द्वीपोंका विस्तार उससे आधा
२० अर्थात् पचास योजन है। तथा पर्वतोंके अन्तमें स्थित द्वीपोंका विस्तार पच्चीस योजन है। पूर्व
दिशामें एक टाँगवाले मनुष्य हैं। पश्चिम दिशामें पूँछवाले मनुष्य हैं। उत्तर दिशामें गूँगे मनुष्य
हैं और दक्षिण दिशामें सींगवाले मनुष्य हैं। चारों विदिशाओंमें क्रमसे खरगोशके समान कानवाले,
शष्कुली अर्थात् मछली अथवा पूड़ीके समान कानवाले, प्रावरणके समान कानवाले और लम्बे
कानवाले मनुष्य हैं। आठों अन्तरालके द्वीपोंमें क्रमसे घोड़ेके समान मुखवाले, सिंहके समान मुख-
२५ वाले, कुत्तेके समान मुखवाले, भैंसाके समान मुखवाले, सुअरके समान मुखवाले, व्याघ्रके समान
मुखवाले, कौआके समान मुखवाले और बन्दरके समान मुखवाले मनुष्य हैं। —शिखरी पर्वतके
दोनों कोणोंकी सीधमें जो अन्तर्द्वीप हैं उनमें मेघके समान मुखवाले और बिजलीके समान मुखवाले
मनुष्य हैं। हिमवान् पर्वतके दोनों कोणोंकी सीधमें जो अन्तर्द्वीप हैं उनमें मछलीके समान मुखवाले
और कालके समान मुखवाले मनुष्य हैं। उत्तर विजयार्धके दोनों कोणोंकी सीधमें जो अन्तर्द्वीप हैं
३० उनमें हाथीके समान मुखवाले और दर्पणके समान मुखवाले मनुष्य हैं। तथा दक्षिण विजयार्धके
दोनों कोणोंकी सीधमें जो अन्तर्द्वीप हैं उनमें गायके समान मुखवाले और मेढ़ाके समान मुखवाले
मनुष्य हैं। इनमें-से एक टाँगवाले मनुष्य गुफाओंमें निवास करते हैं और मिट्टीका आहार करते
हैं। तथा शेष मनुष्य फूलों और फलोंका आहार करते हैं और पेड़ोंपर रहते हैं। इन सबकी आयु
१. लवणोदे अष्टासु दिक्ष्वष्टौ आ० दि० १, दि० २ । लवणोदधेरभ्यन्तरेऽष्टासु दिक्ष्वष्टौ मु० ।
३५ २. उत्तरस्यामभाषकाः आ० दि० १, दि० २ । ३. - णस्यां विषा- दि० १, दि० २ । ४. -वरणलम्ब मु० ।
५ काकवूककपि-मु० । ६. मेघविद्यु-मु० । ७. दक्षिणदिग्विण- मु० । ८. - शतिद्वितीयपक्षेऽपि उभयोस्त-
त्वेष्टचत्वारिंशद्द्बीपाः जलतला- दि० २ । ९. -त्सेधाः । तथा कालोदेऽपि आ०, दि० १ ।