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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 276, कुल 558 में से

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पृष्ठ 276

१६४ सर्वार्थसिद्धौ [ ३।३० § ४२२ –
§ ४२२. हैमवते भवा हैमवतका इत्येवं 'वुञि' सति मनुष्यसंप्रत्ययो भवति । एवमुत्तरयो-
रपि । हैमवतकादयस्त्रयः । एकादयस्त्रयः । तत्र यथासंख्यमभिसंबन्धः क्रियते । एकपल्योपमस्थितयो
हैमवतकाः । द्विपल्योपमस्थितयो हारिवर्षकाः । त्रिपल्योपमस्थितयो दैवकुरवका इति । तत्र पञ्चसु
हैमवतेषु सुषमदुःषमा सदावस्थिता । तत्र मनुष्या एकपल्योपमायुषो द्विधनुःसहस्रोच्छ्रिताश्चतुर्थ-
भक्ताहारा नीलोत्पलवर्णाः । पञ्चसु हरिवर्षेषु सुषमा सदावस्थिता । तत्र मनुष्या द्विपल्योपमायुष-
श्चापसहस्रोत्सेधाः षष्ठभक्ताहाराः शङ्खवर्णाः । पञ्चसु देवकुरुषु सुषमसुषमा सदावस्थिता । तत्र
मनुष्या स्त्रिपल्योपमायुषः षड्धनुःसहस्रोच्छ्राया अष्टमभक्ताहाराः कनकवर्णाः ।
§ ४२३. अथोत्तरेषु कावस्थेत्यत आह—
तथोत्तराः ॥३०॥
§ ४२४. यथा दक्षिणा व्याख्यातास्तथैवोत्तरा वेदितव्याः । हैरण्यवतका हैमवतकैस्तुल्याः ।
रम्यका हारिवर्षकैस्तुल्याः । दैवकुरवकैरौत्तरकुरवकाः समाख्याताः ।
§ ४२५. अथ विदेहेष्ववस्थितेषु का स्थितिरित्यत्रोच्यते—
विदेहेषु संख्येयकालाः ॥३१॥
§ ४२६. १सर्वेषु विदेहेषु संख्येयकाला मनुष्याः । तत्र कालः २सुषमदुष्षमान्तोपमः सदा-
§ ४२२. हैमवत क्षेत्रमें उत्पन्न हुए हैमवतक कहलाते हैं। यहां हैमवंत शब्दसे 'वुञ्' प्रत्यय
करके हैमवतक शब्द बना है जिससे मनुष्योंका ज्ञान होता है। इसी प्रकार आगेके हारिवर्षक और
दैवकुरवंक इन दो शब्दोंमें जान लेना चाहिए। हैमवतक आदि तीन हैं और एक आदि तीन हैं।
यहाँ इनका क्रमसे सम्बन्ध करते हैं जिससे यह अर्थ हुआ कि हैमवत क्षेत्रके मनुष्योंकी स्थिति एक
पल्यकी है। हरिवर्ष क्षेत्रके मनुष्योंकी स्थिति दो पल्यकी है और देवकुरुक्षेत्रके मनुष्योंकी स्थिति
तीन पल्यकी है। ढाई द्वीपमें जो पाँच हैमवत क्षेत्र हैं उनमें सदा सुषमदुषमा काल है । वहाँ
मनुष्योंकी आयु एक पल्यकी है, शरीरकी ऊँचाई दो हजार धनुष है, उनका आहार एक दिनके
अन्तरालसे होता है और शरीरका रंग नील कमलके समान है। पाँच हरिवर्ष नामके क्षेत्रोंमें सदा
सुषमा काल रहता है। वहाँ मनुष्योंकी आयु दो पल्यकी है, शरीरकी ऊँचाई चार हजार धनुष है,
उनका आहार दो दिनके अन्तरालसे होता है और शरीरका रंग शंखके समान सफेद है। पाँच
देवकुरु नामके क्षेत्रमें सदा सुषमसुषमा काल है। वहाँ मनुष्योंकी आयु तीन पल्यकी है, शरीरकी
ऊँचाई छह हजार धनुष है। उनका भोजन तीन दिनके अन्तरालसे होता है और शरीरका रंग
सोनेके समान पीला है।
§ ४२३. उत्तर दिशावर्ती क्षेत्रोंमें क्या अवस्था है इसके बतलानेके लिए अब आगेका सूत्र
कहते हैं—
दक्षिणके समान उत्तरमें है ॥ ३०॥
§ ४२४. जिस प्रकार दक्षिणके क्षेत्रोंका व्याख्यान किया उसी प्रकार उत्तरके क्षेत्रोंका
जानना चाहिए। हैरण्यवत क्षेत्रोंके मनुष्योंकी सब बातें हैमवतके मनुष्योंके समान हैं, रम्यक क्षेत्रके
मनुष्योंकी सब बातें हरिवर्ष क्षेत्रके मनुष्योंके समान हैं और देवकुरु क्षेत्रके मनुष्योंकी सब बातें
उत्तरकुरु क्षेत्रके मनुष्योंके समान हैं।
§ ४२५. पाँच विदेहोंमें क्या स्थिति है इसके बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
विदेहोंमें संख्यात वर्षकी आयुवाले प्राणी हैं ॥ ३१ ॥
§ ४२६. सब विदेहोंमें संख्यात वर्षकी आयुवाले मनुष्य होते हैं। वहाँ सुषमदुःषमा कालके
१. सर्वेषु पञ्चसु महाविदे-मु० । २. कालः दुःषमसुषमादिः सदा तां०, ना० ।