सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- ३।३३§ ४३० ] तृतीयाऽध्यायः १६५
वस्थितः । मनुष्याश्च पञ्चधनुःशतोत्सेधाः । नित्यहाराः । उत्कर्षेणैकपूर्वकोटिस्थितिकाः ।
जघन्येनान्तर्मुहूर्तायुषः । तस्याश्च १ सम्बन्धे गाथां पठन्ति—
"पुव्वस्स दु परिमाणं सदरि खलु कोडिसदसहस्साई ।
छप्पण्णं च सहस्सा बोद्धव्वा वासकोडीणं २ ॥"
§ ४२७. उक्तो भरतस्य विष्कम्भः । पुनः प्रकारान्तरेण तत्प्रतिपत्त्यर्थमाह—
भरतस्य विष्कम्भो जम्बूद्वीपस्य नवतिशतभागः ॥३२॥
§ ४२८. जम्बूद्वीपविष्कम्भस्य योजनशतसहस्रस्य नवतिशतभागीकृतस्यैको भागो भरतस्य
विष्कम्भः । स पूर्वोक्त एव । उक्तं जम्बूद्वीपं परिवृत्य वेदिका स्थिता, ततः परो लवणोदः समुद्रो
द्वियोजनशतसहस्रवलयविष्कम्भः । ततः परो धातकीखण्डो द्वीपश्चतुर्योजनशतसहस्रवलयविष्कम्भः ।
§ ४२९. तत्र वर्षादीनां संख्यादि ३ विधिप्रतिपत्त्यर्थमाह—
द्विर्धातकीखण्डे ॥३३॥
§ ४३०. भरतादीनां द्रव्याणामिहावृत्तिर्विवक्षिता । तत्र कथं सुच् । अध्याह्रियमाण-
क्रियाभ्यावृत्तिद्योतनार्थः सुच् । यथा द्विस्तावानयं प्रासादो मीयत इति । एवं ४ द्विर्धातकीखण्डे
भरतादयो मीयन्ते इति । तद्यथा—द्वाभ्यामिष्वाकारपर्वताभ्यां दक्षिणोत्तरायताभ्यां लवणोदका-
लोदवेदिकास्पृष्टकोटिभ्यां विभक्तो धातकीखण्डः पूर्वापर इति । तत्र पूर्वस्य ५ अपरस्य च मध्ये द्वौ
अन्तके समान काल सदा अवस्थित है । मनुष्योंके शरीरकी ऊँचाई पांच सौ धनुष होती है, वे प्रति-
दिन आहार करते हैं । उनको उत्कृष्ट आयु एक पूर्वकोटि वर्षप्रमाण और जघन्य आयु अन्तर्मुहूर्त
प्रमाण है । इसके सम्बन्धमें एक गाथा कही जाती है—
“एक पूर्वकोटिका प्रमाण सत्तर लाख करोड़ और छप्पन हजार करोड़ वर्ष जानना चाहिए”
§ ४२७. भरतक्षेत्रका विस्तार पहले कह आये हैं । अब प्रकारान्तरसे उसका ज्ञान करानेके
लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
भरत क्षेत्रका विस्तार जम्बूद्वीपका एकसौ नब्बेवां भाग है ॥ ३२ ॥
§ ४२८. एक लाख योजन प्रमाण जम्बूद्वीपके विस्तारके एक सौ नब्बे भाग करनेपर जो
एक भाग प्राप्त हो उतना भरतक्षेत्रका विस्तार है जो कि पूर्वोक्त पांचसौ छब्बीस सही छह बटे
उन्नीस योजन होता है ।
§ ४२९. जो पहले जम्बूद्वीप कह आये उसके चारों ओर एक वेदिका है। इसके बाद लवण-
समुद्र है जिसका विस्तार दो लाख योजन है। इसके बाद धातकीखण्ड द्वीप है जिसका विस्तार
चार लाख योजन है। अब इसमें क्षेत्र आदिकी संख्याका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं-
धातकीखण्डमें क्षेत्र तथा पर्वत आदि जम्बूद्वीपसे दूने हैं ॥ ३३ ॥
§ ४३०. भरत आदि क्षेत्रोंकी यहाँ आवृत्ति विवक्षित है । शंका—सूत्रमें 'सुच्' प्रत्यय किस-
लिए किया है ? समाधान—वाक्य पूरा करने के लिए जो क्रिया जोड़ी जाती है उसकी आवृत्ति बत-
लानेके लिए 'सुच्' प्रत्यय किया है। जैसे 'द्विस्तावान् अयं प्रासादः' यहाँ 'सुच्' प्रत्ययके रहनेसे
है यह अनुमान किया जाता है । इसी प्रकार धातकीखण्डमें 'सुच्' से भरतादिक दूने ज्ञात हो जाते
हैं । यथा—अपने सिरेसे लवणोद और कालोदको स्पर्श करनेवाले और दक्षिणसे उत्तर तक लम्बे
इष्वाकार नामक दो पर्वतोंसे विभक्त होकर धातकीखण्ड द्वीपके दो भाग हो जाते हैं—पूर्व धातकी-
१. तस्यास्ति सम्बन्धे आं०, दि० १, दि० २ । २. -डीणं ॥ ७०५६००००००००० उक्तो मु०, ता०,
ना० । ३. संख्याविधि-मु० । ४. -त्कीषंडे ता०, ना०, दि० १, दि० २, आ० । ५. -र्वस्य चापरस्य
मध्ये मु० ।