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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 285, कुल 558 में से

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पृष्ठ 285

अथ चतुर्थोऽध्यायः
§ ४४२. ‘भवप्रत्ययोऽवधिर्देवनारकाणाम्’ इत्येवमादिष्वसकृद्देवशब्द उक्तस्तत्र न ज्ञायते के
देवाः कतिविधा इति¹ तन्निर्णयार्थमाह—
देवाश्चतुर्णिकायाः ॥१॥
§ ४४३. देवगतिनामकर्मोदये सत्यभ्यन्तरे हेतौ बाह्यविभूतिविशेषैः द्वीपादिसमुद्रादिप्रदेशेषु
³यथेष्टं दीव्यन्ति क्रीडन्तीति देवाः । इहैकवचननिर्देशो युक्तः ‘देवश्चतुर्णिकायः’ इति⁴ । स जात्यभि-
धानाद् बहूनां प्रतिपादको भवति बहुत्वनिर्देशस्तदन्तर्गतभेदप्रतिपत्त्यर्थः । इन्द्रसामानिकादयो बहवो
भेदाः सन्ति स्थित्यादिकृताश्च तत्सूचनार्थः । देवगतिनामकर्मोदयस्य स्वकर्मविशेषापादितभेदस्य⁷
सामर्थ्यान्निचीयन्त इति निकायाः संघाता इत्यर्थः । चत्वारो निकाया येषां ते चतुर्णिकायाः । के
पुनस्ते ? भवनवासिनो व्यन्तरा ज्योतिष्का वैमानिकाश्चेति ।
§ ४४४. तेषां लेश्यावधारणार्थमुच्यते—
आदितस्त्रिषु पीतान्तलेश्याः ॥२॥
§ ४४२. ‘देव और नारकियोंके भवप्रत्यय अवधिज्ञान होता है’ इत्यादि सूत्रोंमें अनेक बार
देव शब्द आया है। किन्तु वहाँ यह न जान सके कि देव कौन हैं और वे कितने प्रकारके हैं अतः
इसका निर्णय करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
देव चार निकायवाले हैं ॥१॥
§ ४४३. अभ्यन्तर कारण देवगति नामकर्मके उदय होनेपर जो नाना प्रकारकी बाह्य
विभूतिसे द्वीपसमुद्रादि अनेक स्थानोंमें इच्छानुसार क्रीड़ा करते हैं, वे देव कहलाते हैं। शंका—
‘देवश्चतुर्णिकायः’ इस प्रकार एकवचनरूप निर्देश करना उचित था, क्योंकि जातिका कथन कर
देनेसे बहुतका कथन हो ही जाता है। समाधान—देवोंके अन्तर्गत अनेक भेद हैं इस बातका ज्ञान
करानेके लिए सूत्रमें बहुवचनका निर्देश किया है। तात्पर्य यह है कि देवोंके इन्द्र, सामानिक
आदिकी अपेक्षा अनेक भेद हैं और स्थिति आदिकी अपेक्षा भी अनेक भेद हैं अतः उनको सूचित
करनेके लिए बहुवचनका निर्देश किया है। अपने अवान्तर कर्मोंसे भेदको प्राप्त होनेवाले देवगति
नामकर्मके उदयकी सामर्थ्यसे जो संग्रह किये जाते हैं वे निकाय कहलाते हैं। निकाय शब्दका
अर्थ संघात है। ‘चतुर्णिकाय’ में बहुव्रीहि समास है, जिससे देवोंके मुख्य निकाय चार ज्ञात
होते हैं। शंका—इन चार निकायोंके क्या नाम हैं ? समाधान—भवनवासी, व्यन्तर, ज्योतिष्क
और वैमानिक ।
§ ४४४. अब इनकी लेश्याओंका निश्चय करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
आदिके तीन निकायोंमें पीत पर्यन्त चार लेश्याएँ हैं ॥२॥
१. इति वा तन्नि-मु० । २. विशेषाद् द्वीपा- मु० । ३. मुद्रादिषु प्रदे-मु० । ४. -डन्ति ते देवाः मु० । ५.
इति । जात्य- मु० । ६. ‘जात्याख्यायामेकस्मिन्बहुवचनमन्यतरस्याम् पा० १, २, ५८ । ७. स्वधर्मविशे-
मु०, ता०, ना० ।