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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 287, कुल 558 में से

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पृष्ठ 287
  • ४।४ § ४५० ] चतुर्थोऽध्यायः १७५

कल्पाः । भवनवासिषु तत्कल्पनासम्भवेऽपि रूढिवशाद्वैमानिकेष्वेव वर्तते कल्पशब्दः । कल्पेषूपपन्ना
कल्पोपपन्नाः । कल्पोपपन्नाः पर्यन्ता येषां ते कल्पोपपन्नपर्यन्ताः ।
§ ४४८. पुनरपि तद्विशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह—
इन्द्रसामानिकत्रायस्त्रिंशपारिषदात्मरक्षलोकपालानीकप्रकीर्णका-
भियोग्यकिल्विषिकाश्चैकशः ॥४॥
§ ४४९. अन्यदेवासाधारणाणिमादिगुणयोगादिन्दन्तीति इन्द्राः । आज्ञैश्वर्यवर्जितं यत्स्या-
नायुर्वीर्यपरिवारभोगोपभोगादि तत्समानं, तस्मिन्समाने भवाः सामानिका महत्तराः पितृगुरुपाध्याय-
तुल्याः । मन्त्रिपुरोहितस्थानीयास्त्रायस्त्रिंशाः । त्रयस्त्रिंशदेव त्रायस्त्रिंशाः । वयस्यपीठमर्दसदृशाः
परिषदि भवाः पारिषदाः । आत्मरक्षाः शिरोरक्षोपमानाः । अर्थचररक्षकसमानां लोकपालाः ।
लोकं पालयन्तीति लोकपालाः । पदात्यादीनि सप्त अनीकानि दण्डस्थानीयानि । प्रकीर्णकाः
पौरजानपदकल्पाः । आभियोग्या दाससमाना वाहनादिकर्मणि प्रवृत्ताः² । अन्तेवासिस्थानीयाः³
किल्विषिकाः । किल्विषं पापं येषांमस्तीति किल्विषिकाः ।
§ ४५०. एकैकस्य निकायस्य एकश एते, इन्द्रादयो दश विकल्पाश्चतुर्षु निकायेषूत्सर्गेण
प्रसक्तास्ततोऽपवादार्थमाह—
है । शंका—कल्प इस संज्ञाका क्या कारण है ? समाधान—जिनमें इन्द्र आदि दस प्रकार कल्पे
जाते हैं वे कल्प कहलाते हैं । इस प्रकार इन्द्रादिककी कल्पना ही कल्प संज्ञाका कारण है। यद्यपि
इन्द्रादिक- की कल्पना भवनवासियोंमें भी सम्भव है फिर भी रूढ़िसे कल्प शब्दका व्यवहार
वैमानिकोंमें ही किया जाता है। जो कल्पोंमें उत्पन्न होते हैं वे कल्पोपपन्न कहलाते हैं। तथा
जिनके अन्तमें कल्पोपपन्न देव हैं उन सबको कल्पोपपन्नपर्यन्त कहा है।
§ ४४८. प्रकारान्तरसे इनके भेदोंका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
उक्त दस आदि भेदोंमें-से प्रत्येक इन्द्र, सामानिक, त्रायस्त्रिंश, पारिषद, आत्मरक्ष, लोक-
पाल, अनीक, प्रकीर्णक, आभियोग्य और किल्विषिक रूप हैं ॥४॥
§ ४४९. जो अन्य देवोंमें असाधारण अणिमादि गुणोंकें सम्बन्धसे शोभते हैं वे इन्द्र कहलाते
हैं । आज्ञा और ऐश्वर्यके सिवा जो आयु, वीर्य, परिवार, भोग और उपभोग हैं वे समान कहलाते
हैं । उस समानमें जो होते हैं वे सामानिक कहलाते हैं । ये पिता, गुरु और उपाध्यायके समान
सबसे बड़े हैं जो मंत्री और पुरोहित के समान हैं वे त्रायस्त्रिंश कहलाते हैं। ये तैंतीस ही होते हैं
इसलिए त्रायस्त्रिंश कहलाते हैं। जो सभामें मित्र और प्रेमीजनोंके समान होते हैं वे पारिषद
कहलाते हैं । जो अंगरक्षकके समान हैं वे आत्मरक्ष कहलाते हैं। जो रक्षकके समान अर्थचर हैं वे
लोकपाल कहलाते हैं। तात्पर्य यह है कि जो लोकका पालन करते हैं वे लोकपाल कहलाते हैं।
जैसे यहां सेना है उसी प्रकार सात प्रकारके पदाति आदि अनीक कहलाते हैं। जो गाँव और
शहरोंमें रहनेवालोंके समान हैं उन्हें प्रकीर्णक कहते हैं। जो दासके समान वाहन आदि कर्ममें
प्रवृत्त होते हैं वे आभियोग्य कहलाते हैं। जो सीमाके पास रहनेवालों के समान हैं वे किल्विषिक
कहलाते हैं। किल्विष पापको कहते हैं इसकी जिनके बहुलता होती है वे किल्विषिक कहलाते हैं।
§ ४५०. चारों निकायोंमें-से प्रत्येक निकायमें ये इन्द्रादिक दस भेद उत्सर्गसे प्राप्त हुए अतः
जहाँ अपवाद है, उसका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—


१. -यत्समानायु-मु० । २. – वृत्ताः । अन्त्यवासि-आ०, दि० १, दि० २ । ३. –स्थानीयाः । किल्विषं
मु० । ४. – येषामस्ति ते किल्वि-मु० ।