सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७० सर्वार्थसिद्धौ [ २।३८ § ४३८ –
§ ४३८. उक्तासु भूमिषु मनुष्याणां स्थितिपरिच्छेदार्थमाह—
नृस्थिती परावरे त्रिपल्योपमान्तर्मुहूर्ते ॥३८॥
§ ४३९. त्रीणि पल्योपमानि यस्याः सा त्रिपल्योपमा । अन्तर्गतो मुहूर्तो यस्याः सा अन्त-
मुहूर्ता । यथासंख्येनभिसंबन्धः । मनुष्याणां परा उत्कृष्टा स्थितित्रिपल्योपमा । अपरा जघन्या
अन्तर्मुहूर्ता । मध्ये अनेकविकल्पाः । तत्र पल्यं त्रिविधम्—व्यवहारपल्यमुद्धारपल्यमद्धापल्यमिति ।
अन्वर्थसंज्ञा एताः । आद्यं व्यवहारपल्यमित्युच्यते; उत्तरपल्यद्वयव्यवहारबीजत्वात् । नानेन
किंचित्परिच्छेद्यमस्तीति । द्वितीयमुद्धारपल्यम् । तत उद्धृतैर्लोमकच्छेदैर्द्दीपसमुद्राः संख्यायन्त
इति । तृतीयमद्धापल्यम् । अद्धा कालस्थितिरित्यर्थः । तत्राद्यस्य प्रमाणं कथ्यते, तत्परिच्छेदनार्थ-
त्वात् । तद्यथा—प्रमाणाङ्गुलपरिमितयोजनविष्कम्भायामावगाहानि त्रीणि पल्यानि कुशूला
इत्यर्थः । एकादिसप्तान्ताराहोरात्रजाताविवालाग्राणि तावच्छिन्नानि यावद्द्वितीयं कर्तरिच्छेदं
नैवाप्नुवन्ति, तादृशैर्लोमच्छेदैः परिपूर्णं घनीकृतं व्यवहारपल्यमित्युच्यते । ततो वर्षशते वर्षशते
गते एकैक्लोमापकर्षणविधिना यावता कालेन तद्रिक्तं भवेत्तावान्कालो व्यवहारपल्योपमाख्यः ।
चाहिए । इतर क्षेत्रोंमें दस प्रकारके कल्पवृक्षोंसे प्राप्त भोगोंकी मुख्यता है इसलिए वे भोगभूमियां
कहलाती हैं।
विशेषार्थ—यह पहले ही बतला आये हैं कि भरतादि क्षेत्रोंका विभाग ढाई द्वीपमें ही है ।
जम्बूद्वीपमें भरतादि क्षेत्र एक-एक हैं और धातकीखण्ड व पुष्करार्धमें ये दो-दो हैं । इस प्रकार कुल
क्षेत्र ३५ होते हैं। उसमें भी उत्तरकुरु और देवकुरु विदेह क्षेत्रमें होकर भी अलग गिने जाते हैं,
क्योंकि यहां उत्तम भोगभूमिकी व्यवस्था है, इसलिए पांच विदेहोंके पांच देवकुरु और पांच उत्तरकुरु
इनको उक्त ३५ क्षेत्रोंमें मिलानेपर कुल ४५ क्षेत्र होते हैं। इनमें से ५ भरत, ५ विदेह और ५ ऐरावत
ये १५ कर्मभूमियां हैं और शेष ३० भोगभूमियां हैं। ये सब कर्मभूमि और भोगभूमि क्यों कहलाती
हैं इस बातको निर्देश मूल टीकामें किया ही है।
§ ४३८. उक्त भूमियोंमें स्थितिका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
मनुष्योंकी उत्कृष्ट स्थिति तीन पल्य और जघन्य अन्तर्मुहूर्त है ॥३८॥
§ ४३९. 'त्रिपल्योपमा' इस वाक्यमें 'त्रि' और 'पल्योपम' का बहुव्रीहि समास है। मुहूर्तके
भीतरके कालको अन्तर्मुहूर्त कहते हैं। पर और अपर के साथ इन दोनोंका क्रमसे सम्बन्ध है ।
मनुष्योंकी उत्कृष्ट स्थिति तीन पल्य है और जघन्य स्थिति अन्तर्मुहूर्त है। तथा मध्यकी स्थिति
अनेक प्रकारकी है। पल्य तीन प्रकारका है—व्यवहार पल्य, उद्धारपल्य और अद्धापल्य । ये तीनों
सार्थक नाम हैं। आदिके पल्यको व्यवहारपल्य कहते हैं, क्योंकि वह आगेके दो पल्योंके व्यवहारका
मूल है। इसके द्वारा और किसी वस्तुका परिमाण नहीं किया जाता। दूसरा उद्धारपल्य है।
उद्धारपल्यमें-से निकाले गये लोमके छेदोंके द्वारा द्वीप और समुद्रोंकी गिनती की जाती है। तीसरा
अद्धापल्य है। अद्धा और कालस्थिति ये एकार्थवाची शब्द हैं। इनमें-से अब प्रथम पल्यका प्रमाण
कहते हैं—जो इस प्रकार है—प्रमाणांगुलकी गणनासे एक-एक योजन लम्बे, चौड़े और गहरे तीन
गढ़ा करो और इनमें-से एकमें एक दिनसे लेकर सात दिन तक के पैदा हुए मेढ़ेके रोमोंके अग्र
भागोंको ऐसे टुकड़े करके भरो जिससे कैंचीसे उसके दूसरे टुकड़े न किये जा सकें। अनन्तर सौ-सौ
वर्षमें एक-एक रोमका टुकड़ा निकालो। इस विधिसे जितने कालमें वह गढ़ा खाली हो वह सब
काल व्यवहार पल्योपम नामसे कहा जाता है। अनन्तर असंख्यात करोड़ वर्षोंके जितने समय हों
१. -मिषु स्थिति-मु० । २. -द्वयस्य व्यव- मु० । ३. कथ्यते । तद्यथा मु० । ४. नाप्नु-मु० । ५. घनीभूतं
मु० । ६. ततो वर्षशते एकैक- मु० ।