सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें§ ४३३. अत्राह किमर्थं जम्बूद्वीपहिमवदादिसंख्या द्विरावृत्ता पुष्करार्धे कथ्यते, न पुनः
कृत्स्न एव पुष्करद्वीपे । इत्यत्रोच्यते—
प्राङ् मानुषोत्तरान्मनुष्याः ॥३५॥
§ ४३४. पुष्करद्वीपबहुमध्यदेशभागी वलयवृत्तो मानुषोत्तरो नाम शैलः। तस्मात्प्रागेव
मनुष्या न बहिरिति । ततो न बहिः पूर्वोक्तक्षेत्रविभागोऽस्ति । नास्मादुत्तरं कदाचिदपि विद्याधरा ५
ऋद्धिप्राप्ता अपि मनुष्या गच्छन्ति अन्यत्रोपपादसमुद्घाताभ्याम् । ततोऽस्यान्वर्थसंज्ञा । एवं जम्बू-
द्वीपादिष्वर्धतृतीयेषु¹ द्वीपेषु द्वयोश्च समुद्रयोर्मनुष्या वेदितव्याः । ते द्विविधाः—
आर्या म्लेच्छाश्च ॥३६॥
§ ४३५. गुणैर्गुणवद्भिर्वा अर्यन्त इत्यार्याः । ते द्विविधा ऋद्धिप्राप्तार्या अनृद्धिप्राप्तार्याश्चेति ।
अनृद्धिप्राप्तार्याः पञ्चविधाः क्षेत्रार्या जात्यार्याः कर्मार्याश्चारित्रार्या दर्शनार्याश्चेति । ऋद्धिप्राप्तार्याः १०
§ ४३३. यहां शंकाकारका कहना है कि जम्बूद्वीपमें हिमवान् आदिकी जो संख्या है उससे
हिमवान् आदिकी दूनी संख्या आधे पुष्करद्वीपमें क्यों कही जाती है पूरे पुष्कर द्वीपमें क्यों नहीं
कही जाती ? अब इस शंकाका समाधान करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
मानुषोत्तर पर्वतके पहले तक ही मनुष्य हैं ॥३५॥
§ ४३४. पुष्करद्वीपके ठीक मध्यमें चूड़ीके समान गोल मानुषोत्तर नामका पर्वत है । उसके १५
पहले-पहले ही मनुष्य हैं, उसके बाहर नहीं । इसलिए मानुषोत्तर पर्वतके बाहर पूर्वोक्त क्षेत्रोंका
विभाग नहीं है । इस पर्वतके उस ओर उपपाद जन्मवाले और समुद्घातको प्राप्त हुए मनुष्योंको
छोड़ कर और दूसरे विद्याधर या ऋद्धिप्राप्त मुनि भी कदाचित् नहीं जाते हैं इसलिए इस
पर्वतका मानुषोत्तर यह सार्थक नाम है। इस प्रकार जम्बूद्वीप आदि ढाई द्वीपोंमें और दो समुद्रों-
में मनुष्य जानना चाहिए । २०
विशेषार्थ—ढाई द्वीप और इनके मध्यमें आनेवाले दो समुद्र यह मनुष्यलोक है । मनुष्य
इसी क्षेत्रमें पाये जाते हैं । मानुषोत्तर पर्वत मनुष्यलोककी सीमापर स्थित होनेसे इसका
मानुषोत्तर यह नाम सार्थक है। मनुष्य इसी क्षेत्रमें रहते हैं उनका बाहर जाना सम्भव
नहीं, इसका यह अभिप्राय है कि गर्भमें आनेके बाद मरण पर्यन्त औदारिक शरीर या आहारक
शरीरके साथ वे इस क्षेत्रसे बाहर नहीं जा सकते । सम्मूर्च्छन मनुष्य तो इसके औदारिक शरीर २५
के आश्रयसे होते हैं इसलिए उनका मनुष्यलोकके बाहर जाना कथमपि सम्भव नहीं है। पर
इसका यह अर्थ नहीं है कि किसी भी अवस्थामें मनुष्य इस क्षेत्रके बाहर नहीं पाये जाते हैं । ऐसी
तीन अवस्थाएँ हैं जिनके होनेपर मनुष्य इस क्षेत्रके भी बाहर पाये जाते हैं, यथा—(१) जो मनुष्य
मरकर ढाई द्वीपके बाहर उत्पन्न होनेवाले हैं वे यदि मरणके पहले मारणान्तिक समुद्घात करते
हैं तो इसके द्वारा उनका ढाई द्वीपके बाहर गमन देखा जाता है । (२) ढाई द्वीपके बाहर निवास ३०
करनेवाले जो जीव मरकर मनुष्योंमें उत्पन्न होते हैं उनका मनुष्य गतिनाम कर्मका उदय होनेपर
भी ढाई द्वीपमें प्रवेश करनेके पूर्व तक इस क्षेत्रके बाहर अस्तित्व देखा जाता है । (३) केवलिसमुद्-
घातके समय उनका मनुष्यलोकके बाहर अस्तित्व देखा जाता है । इन तीन अपवादोंको छोड़कर
और किसी अवस्थामें मनुष्योंका मनुष्यलोकके बाहर अस्तित्व नहीं देखा जाता । वे मनुष्य दो
प्रकारके हैं अब ये बतलाने के लिए आगे का सूत्र कहते हैं— ३५
मनुष्य दो प्रकारके हैं—आर्य और म्लेच्छ ॥३६॥
§ ४३५. जो गुणों या गुणवालोंके द्वारा माने जाते हैं—वे आर्य कहलाते हैं। उनके दो
भेद हैं—ऋद्धिप्राप्त आर्य और ऋद्धिरहित आर्य । ऋद्धिरहित आर्य पांच प्रकारके हैं—क्षेत्रार्य,
१. –तीयेषु द्वयोश्च मु० ।