सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें§ ४१५. अथोत्तरेषां कथमित्यत आह—
उत्तरा दक्षिणतुल्याः ॥२६॥
§ ४१६. उत्तरा ऐरावतादयो नीलान्ता भरतादिभिर्दक्षिणैस्तुल्या द्रष्टव्याः । अतीतस्य
सर्वस्यायं विशेषो वेदितव्यः । तेन ह्रदपुष्करादीनां तुल्यता योज्या ।
§ ४१७. अत्राह, उक्तेषु भरतादिषु क्षेत्रेषु मनुष्याणां किं तुल्योऽनुभवादिः१, आहोस्विदस्ति
कश्चित्प्रतिविशेष इत्यत्रोच्यते—
भरतैरावतयोर्वृद्धिह्रासौ षट्समयाभ्यामुत्सर्पिण्यवसर्पिणीभ्याम् ॥२७॥
§ ४१८. वृद्धिश्च ह्रासश्च वृद्धिह्रासौ । काभ्याम् । षट्समयाभ्यामुत्सर्पिण्यवसर्पिणीभ्याम् ।
कयोः । भरतैरावतयोः । न तयोः क्षेत्रयोर्वृद्धिह्रासौ स्तः; असंभवात् । तत्स्थानां मनुष्याणां वृद्धि-
ह्रासौ भवतः । अथवाधिकरणनिर्देशः । भरते ऐरावते च मनुष्याणां वृद्धिह्रासाविति । किंकृतौ
वृद्धिह्रासौ । अनुभवायुःप्रमाणादिकृतौ । अनुभव उपभोगः, आयुर्जीवितपरिमाणम्३, प्रमाणं
शरीरोत्सेध इत्येवमादिभिर्वृद्धिह्रासौ मनुष्याणां भवतः४ । किंहेतुकौ पुनस्तौ । कालहेतुकौ । स च
कालो द्विविधः-उत्सर्पिणी अवसर्पिणी चेति । तद्भेदाः प्रत्येकं षट् । अन्वर्थसंज्ञे चैते । अनुभवादि-
विदेह तक दूना-दूना विस्तार है ।
§ ४१५. आगेके पर्वत और क्षेत्रोंका विस्तार किस प्रकार है अब इस बात के बतलानेके लिए
आगेका सूत्र कहते हैं—
उत्तरके क्षेत्र और पर्वतोंका विस्तार दक्षिणके क्षेत्र और पर्वतोंके समान है ॥ २६ ॥
§ ४१६. 'उत्तर' इस पदसे ऐरावत क्षेत्रसे लेकर नील पर्यन्त क्षेत्र और पर्वत लिये गये हैं ।
इनका विस्तार दक्षिण दिशावर्ती भरतादिके समान जानना चाहिए । पहले जितना भी कथन कर
आये हैं उन सबमें यह विशेषता जाननी चाहिए । इससे तालाब और कमल आदिकी समानता
लगा लेनी चाहिए ।
§ ४१७. यहाँपर शंकाकार कहता है कि इन पूर्वोक्त, भरतादि क्षेत्रोंमें मनुष्योंका अनुभव आदि
क्या समान हैं या कुछ विशेषता है । इस शंकाका समाधान करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
भरत और ऐरावत क्षेत्रोंमें उत्सर्पिणीके. और अवसर्पिणीके छह समयोंकी अपेक्षा वृद्धि और
ह्रास होता रहता है ॥ २७ ॥
§ ४१८. वृद्धि और ह्रास इन दोनों पदोंमें कर्मधारय समास है । शंका—किनकी अपेक्षा
वृद्धि और ह्रास होता है ? समाधान—छह समयोंकी अपेक्षा । शंका—किनका छह समयोंकी
अपेक्षा वृद्धि और ह्रास होता है ? समाधान—भरत और ऐरावत क्षेत्रका । इसका यह
मतलब नहीं कि उन क्षेत्रोंका वृद्धि और ह्रास होता है, क्योंकि ऐसा होना असम्भव है । किन्तु
उन क्षेत्रोंमें रहनेवाले मनुष्योंका वृद्धि और ह्रास होता है । अथवा, 'भरतैरावतयोः' षष्ठी
विभक्ति न होकर अधिकरणमें यह निर्देश किया है जिससे इस प्रकार अर्थ होता है कि भरत
और ऐरावत क्षेत्रमें मनुष्योंकी वृद्धि और ह्रास होता है । शंका—यह वृद्धि और ह्रास
किंनिमित्तक होता है ? समाधान—अनुभव, आयु और प्रमाण आदि निमित्तक होता है ।
अनुभव, उपभोगको कहते हैं, जीवित रहनेके परिमाणको आयु कहते हैं । और शरीरकी
ऊँचाईको प्रमाण कहते हैं । इस प्रकार इन पूर्वोक्त कारणोंसे और अन्य कारणोंसे मनुष्योंका वृद्धि
और ह्रास होता है । शंका—ये वृद्धि-ह्रास किस निमित्तसे होते हैं ? समाधान--ये कालके निमित्त
से होते हैं । वह काल दो प्रकारका है-उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी । और इनमें-से प्रत्येकके छह
१. -तुल्योऽनुभवः आहो-ता०, ना० । २. -याभ्याम् । कयोः मु० । ३. -परिमाणम्, शरी -मु० । ४. भवतः
तयोः । किहेतु-ता०, ना० ।