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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 286, कुल 558 में से

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पृष्ठ 286

१७४ सर्वार्थसिद्धौ [ ४।३ § ४४५ -
§ ४४५. 'आदित इत्युच्यते, अन्ते मध्ये अन्यथा वा ग्रहणं मा विज्ञायोति । आदौ आदितः ।
द्वयोरेकस्य च निवृत्त्यर्थं 'त्रि'ग्रहणं क्रियते । अथ चतुर्णां निवृत्त्यर्थं कस्मान्न भवति । 'आदितः'
इति वचनात् । षड्लेश्या उक्ताः । तत्र चतसृणां लेश्यानां ग्रहणार्थं 'पीतान्त'ग्रहणं क्रियते । पीतं
तेज इत्यर्थः । पीता अन्ते यासां ताः पीतान्ताः२ । पीतान्ता लेश्या येषां ते पीतान्तलेश्याः । एतदुक्तं
भवति—आदितस्त्रिषु निकायेषु भवनवासिव्यन्तरज्योतिष्कानामसु देवानां कृष्णा नीला कापोता
पीतेति चतस्रो लेश्या भवन्ति ।
§ ४४६. तेषां निकायानामन्तर्विकल्पप्रतिपादनार्थमाह—
दशाष्टपञ्चद्वादशविकल्पाः कल्पोपपन्नपर्यन्ताः ॥३॥
§ ४४७. चतुर्णां देवनिकायानां दशादिभिः संख्याशब्दैर्यथासंख्यमभिसंबन्धो वेदितव्यः ।
दशविकल्पा भवनवासिनः । अष्टविकल्पा व्यन्तराः । पञ्चविकल्पा ज्योतिष्काः । द्वादशविकल्पा वैमा-
निका इति । सर्ववैमानिकानां द्वादशविकल्पान्तःपातित्वे प्रसक्ते ग्रैवेयकादिनिवृत्त्यर्थं विशेषणमुपा-
दीयते 'कल्पोपपन्नपर्यन्ताः' इति । अथ कथं कल्पसंज्ञा । इन्द्रादयः प्रकारा दश एतेषु कल्प्यन्त इति
§ ४४५. अन्तके तीन निकायोंका, मध्यके निकायोंका या विपरीत क्रमसे निकायोंका ग्रहण
न समझ लिया जाय इसलिए सूत्रमें 'आदितः' पद दिया है। दो और एक निकायके निराकरण
करनेके लिए 'त्रि' पदका ग्रहण किया है। शंका—'त्रि' पदसे चारकी निवृत्ति क्यों नहीं होती है ?
समाधान—सूत्रमें जो 'आदितः' पद दिया है इससे ज्ञात होता है कि 'त्रि' पद चारकी निवृत्तिके
लिए नहीं है । लेश्याएँ छह कही हैं उनमें से चार लेश्याओंके ग्रहण करनेके लिए सूत्रमें, 'पीतान्त'
पदका ग्रहण किया है। यहाँ पीतसे तेज लेश्या लेनी चाहिए। यहाँ पहले पीत और अन्त इन
शब्दोंमें और अनन्तर पीतान्त और लेश्या शब्दोंमें बहुव्रीहि समास है। इसका यह अभिप्राय है कि
आदिके भवनवासी, व्यन्तर और ज्योतिषी इन तीन निकायोंमें देवोंके कृष्ण, नील, कापोत और
पीत ये चार लेश्याएँ होती हैं।
विशेषार्थ—यों तो भवनवासी, व्यन्तर और ज्योतिषी-देवोंके एक पीत लेश्या ही होती है
किन्तु ऐसा नियम है कि कृष्ण, नील और कापोत लेश्याके मध्यम अंशसे मरे हुए कर्मभूमियाँ
मिथ्यादृष्टि मनुष्य और तिर्यंच और पीत लेश्याके मध्यम अंशसे मरे हुए भोगभूमियाँ मिथ्यादृष्टि
मनुष्य और तिर्यंच भवनत्रिकमें उत्पन्न होते हैं। अतः ऐसे कर्मभूमियां मनुष्य और तिर्यंचोंके मरते
समय प्रारम्भकी तीन अशुभ लेश्याएँ होती हैं अतः इनके मरकर भवनत्रिकोंमें उत्पन्न होनेपर वहीं
भी अपर्याप्त अवस्थामें ये अशुभ लेश्याएँ पायी जाती हैं। इसीसे इनके पीत तक चार लेश्याएँ
कही हैं। अभिप्राय यह है कि भवनत्रिकोंके अपर्याप्त अवस्थामें पीत तक चार लेश्याएँ और पर्याप्त
अवस्थामें एक पीत लेश्या होती है।
§ ४४६. अब इन निकायोंके भीतरी भेद दिखलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
वे कल्पोपपन्न देव तकके चार निकायके देव क्रमसे दस, आठ, पाँच और बारह भेद-
वाले हैं ॥३॥
§ ४४७. देव निकाय चार हैं और दश आदि संख्या शब्द चार हैं अतः इनका क्रमसे
सम्बन्ध जानना चाहिए । यथा—भवनवासी दस प्रकारके हैं, व्यन्तर आठ प्रकारके हैं, ज्योतिषी
पाँच प्रकारके हैं और वैमानिक बारह प्रकारके हैं। उपर्युक्त कथनसे सब वैमानिक बारह भेदोंमें
आ जाते हैं, अतः ग्रैवेयक आदिके निराकरण करनेके लिए सूत्रमें 'कल्पोपपन्नपर्यन्ताः' यह पद दिया
१. – च्यते अन्यथा वा ग्रह-दि० २ । –च्यते अन्ते मध्ये वा ग्रह-मु०, ता०, ना० । –च्यते अन्ते अन्यथा वा
ग्रह-आ० । २. –ताः पीतान्ता लेश्या मु०, दि० २ । ३. ज्योतिष्काणां देवा- आ०, दि० १, दि० २ ।