सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 273, कुल 558 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 273
  • ३।२५ § ४१४ ] तृतीयोऽध्यायः १६१

ध्यन्ते । नैवं शङ्क्यम्; 'अनन्तरस्य विधिर्वा भवति प्रतिषेधो वा' इति अपरगाणामेव ग्रहणं स्यात् ।
गङ्गादिग्रहणमेवास्तीति चेत् । पूर्वगाणामेव ग्रहणं स्यात् । अत उभयीनां ग्रहणार्थं 'गङ्गासिन्ध्वादि'
ग्रहणं क्रियते । 'नदी'ग्रहणं द्विगुणा द्विगुणा इत्यभिसंबन्धार्थम् । गङ्गा चतुर्दशनदीसहस्रपरिवृता ।
सिन्धुरपि । एवमुत्तरा अपि नद्यः प्रतिक्षेत्रं तद्द्विगुणद्विगुणा² भवन्ति; आ विदेहान्तात् । तत उत्तरा
अर्द्धार्द्धहीनाः ।
§ ४११. उक्तानां क्षेत्राणां विष्कम्भप्रतिपत्त्यर्थमाह—
भरतः षड्विंशपञ्चयोजनशतविस्तारः षट् चैकोनविंशतिभागा योजनस्य ॥२४॥
§ ४१२. षडधिका विंशतिः षड्विंशतिः । षड्विंशतिरधिका³ येषु तानि षड्विंशानि ।
षड्विंशानि पञ्चयोजनशतानि विस्तारो यस्य षड्विंशपञ्चयोजनशतविस्तारो भरतः । किमेता-
वानेव । न; इत्याह षट् चैकोनविंशतिभागा योजनस्य विस्तारोऽस्येत्यभिसंबध्यते ।
§ ४१३. इतरेषां विष्कम्भविशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह—
तद्द्विगुणद्विगुणविस्तारा वर्षधरवर्षा विदेहान्ताः ॥२५॥
§ ४१४. ⁴ततो भरताद् द्विगुणो द्विगुणो विस्तारो येषां त इमे तद्द्विगुणद्विगुणविस्ताराः। के
ते वर्षधरवर्षाः । किं सर्वे । न; इत्याह विदेहान्ता इति ।
का ग्रहण करनेके लिए। शंका—उनका तो प्रकरण है ही, अतः 'गंगासिन्ध्वादि' पदके बिना ग्रहण
किये ही उनका सम्बन्ध हो जाता है ? समाधान—ऐसी शंका नहीं करनी चाहिए, क्योंकि 'अनन्तर-
का विधान होता है या प्रतिषेध' इस नियमके अनुसार पश्चिमकी ओर बहनेवाली नदियोंका ही
ग्रहण होता जो कि इष्ट नहीं अतः सूत्रमें 'गंगासिन्ध्वादि' पद दिया है। शंका—तो सूत्रमें 'गंगादि'
इतने पदका ही ग्रहण रहे ? समाधान—यदि 'गंगादि' इतना पदका ही ग्रहण किया जाये तो पूर्व-
की ओर बहनेवाली नदियोंका ही ग्रहण होवे जो भी इष्ट नहीं। अतः दोनों प्रकारकी नदियोंका
ग्रहण करनेके लिए 'गंगासिन्ध्वादि' पदका ग्रहण किया है। यद्यपि 'गंगासिन्ध्वादि' इतने पदके
ग्रहण करनेसे ही यह बोध हो जाता है कि ये नदियां हैं फिर भी सूत्रमें जो 'नदी' पदका ग्रहण
किया है वह 'द्विगुणा द्विगुणाः' इसके सम्बन्धके लिए किया है। गंगाकी परिवार नदियां चौदह
हजार हैं। इसी प्रकार सिन्धुकी भी परिवार नदियां चौदह हजार हैं। इस प्रकार आगेकी परिवार
नदियां विदेह क्षेत्र पर्यन्त दूनी-दूनी होती गयी हैं। और इससे आगेकी परिवार नदियां आधी-
आधी होती गयी हैं।
§ ४११. अब उक्त क्षेत्रोंके विस्तारका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
भरत क्षेत्रका विस्तार पाँच सौ छब्बीस सही छह बटे उन्नीस योजन है ॥ २४ ॥
§ ४१२. यहाँ टीकामें 'पहले 'षड्विंशपञ्चयोजनशतविस्तारः' पदका समास किया गया
है जिसका अभिप्राय यह है कि भरतवर्ष पांच सौ छब्बीस योजनप्रमाण विस्तार है ? शंका—क्या
इसका इतना ही विस्तार है ? समाधान—नहीं, क्योंकि इसका एक योजनका छह बटे उन्नीस
योजन विस्तार और जोड़ लेना चाहिए।
§ ४१३. अब इतर क्षेत्रोंके विस्तार विशेषका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
विदेह पर्यन्त पर्वत और क्षेत्रोंका विस्तार भरत क्षेत्रके विस्तारसे दूना-दूना है ॥ २५ ॥
§ ४१४. जिनका भरतसे दूना-दूना विस्तार है वे भरतसे दूने-दूने विस्तारवाले कहे गये हैं।
यहाँ 'तद्द्विगुणद्विगुणविस्ताराः' में बहुव्रीहि समास है। शंका—वे दूने-दूने विस्तारवाले क्या हैं ?
समाधान—पर्वत और क्षेत्र। शंका—क्या सबका दूना-दूना विस्तार है ? समाधान—नहीं, किन्तु
१. पा० म० मा०, पृ० ३३५ । २. -क्षेत्रं द्विगुणा द्विगुणा मु० । ३. -रधिकानि येषु मु० । ४. ततो
द्विगुणो ता०, ना० ।
२१