सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६६ सर्वार्थसिद्धौ [ ३।३४ § ४३१ -
मन्दरौ । तयोरुभयतो भरतादीनि क्षेत्राणि हिमवदादयश्च वर्षधरपर्वताः । एवं द्वौ भरतौ द्वौ
हिमवन्तौ इत्येवमादि संख्यानं द्विगुणं वेदितव्यम् । जम्बूद्वीपहिमवदादीनां वर्षधराणां यो विष्कम्भ-
स्तद्विगुणो धातकीखण्डे हिमवदादीनां वर्षधराणाम् । वर्षधराश्चक्राकारवदवस्थिताः । अरविवर-
संस्थानानि क्षेत्राणि । जम्बूद्वीपे यत्र जम्बूवृक्षः स्थितः, तत्र धातकीखण्डे धातकीवृक्षः सपरिवारः ।
तद्योगाद्धातकीखण्ड इति द्वीपस्य नाम प्रतीतम् । तत्परिक्षेपी कालोदः समुद्रः टङ्कोच्छिन्नतीर्थः अष्ट-
योजनशतसहस्रवलयविष्कम्भः । कालोदपरिक्षेपी पुष्करद्वीपः षोडशयोजनशतसहस्रवलयविष्कम्भः ।
§ ४३१. तत्र द्वीपान्भोनिधिविष्कम्भद्विगुणपरिक्लृप्तिवद्धातकीखण्डवर्षादिद्विगुणवृद्धिप्रसङ्गे
विशेषावधारणार्थमाह-
पुष्करार्द्धे च ॥३४॥
§ ४३२. किम् । द्विरित्यनुवर्तते । किमपेक्षा द्विरावृत्तिः । जम्बूद्वीपभरतहिमवदाद्यपेक्षयैव¹ ।
कुतः । व्याख्यानतः । यथा धातकीखण्डे हिमवदादीनां विष्कम्भस्तथा पुष्करार्धे हिमवदादीनां
विष्कम्भो द्विगुण इति व्याख्यायते । नामानि तान्येव, इष्वाकारौ मन्दरौ च पूर्ववत् । यत्रे² जम्बू-
वृक्षस्तत्र पुष्करं सपरिवारम् । तत एव तस्य³ द्वीपस्य नाम रूढं पुष्करद्वीप इति । अथ कथं
पुष्करार्द्धसंज्ञा । मानुषोत्तरशैलेन विभक्तार्धत्वात्पुष्करार्धसंज्ञा ।
खण्ड और पश्चिम धातकीखण्ड । इन पूर्व और पश्चिम दोनों खण्डोंके मध्यमें दो मन्दर अर्थात्
मेरु पर्वत हैं। इन दोनोंके दोनों ओर भरत आदि क्षेत्र और हिमवान् आदि पर्वत हैं। इस प्रकार
दो भरत दो हिमवान् इत्यादि रूपसे जम्बूद्वीपसे धातकीखण्ड द्वीपमें दूनी संख्या जाननी चाहिए ।
जम्बूद्वीपमें हिमवान् आदि पर्वतोंका जो विस्तार है धातकीखण्ड द्वीपमें हिमवान् आदि पर्वतोंका
उससे दूना विस्तार है। चक्केमें जिस प्रकार आरे होते हैं उसी प्रकार ये पर्वत क्षेत्रोंके मध्यमें
अवस्थित हैं। और चक्केमें छिद्रोंका जो आकार होता है यहाँ क्षेत्रोंका वही आकार है। जम्बूद्वीपमें
जहाँ जम्बू वृक्ष स्थित है धातकीखण्डद्वीपमें परिवार वृक्षोंके साथ वहाँ धातकी वृक्ष स्थित है ।
और इसके सम्बन्धसे द्वीपका नाम धातकीखण्ड प्रसिद्ध है। इसको घेरे हुए कालोद समुद्र है ।
जिसका घाट ऐसा मालूम देता है कि उसे टांकीसे काट दिया हो और जिसका विस्तार आठ लाख
योजन है। कालोदको घेरे हुए पुष्करद्वीप है जिसका विस्तार सोलह लाख योजन है।
§ ४३१. द्वीप और समुद्रोंका उत्तरोत्तर जिस प्रकार दूना दूना विस्तार बतलाया है उसी
प्रकार यहाँ धातकीखण्ड द्वीपके क्षेत्र आदि की संख्या दूनी प्राप्त होती है अतः विशेष निश्चय
करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं-
पुष्करार्धमें उतने ही हैं ॥३४॥
§ ४३२. यहाँ 'द्वि' इस पदकी अनुवृत्ति होती है। शंका- 'द्वि' इस पदकी किसकी अपेक्षा
अनुवृत्ति होती है ? समाधान - जम्बूद्वीपके भरत आदि क्षेत्र और हिमवान् आदि पर्वतोंकी अपेक्षा
'द्विः' इस पदकी अनुवृत्ति होती है। शंका- यह कैसे समझा जाता है ? समाधान - व्याख्यान-
से। जिस प्रकार धातकीखण्ड द्वीपमें हिमवान् आदिका विस्तार कहा है उसी प्रकार पुष्करार्धमें
हिमवान् आदिका विस्तार दूना बतलाया है। नाम वे ही हैं। दो इष्वाकार और दो मन्दर पर्वत
पहलेके समान जानना चाहिए। जहाँ पर जम्बूद्वीपमें जम्बू वृक्ष है पुष्कर द्वीपमें वहाँ अपने परि-
वार वृक्षोंके साथ पुष्करवृक्ष है। और इसीलिए इस द्वीपका पुष्करद्वीप यह नाम रूढ़ हुआ है।
शंका-इस द्वीपको पुष्करार्ध यह संज्ञा कैसे प्राप्त हुई ? समाधान - इस द्वीपके मानुषोत्तर पर्वतके
कारण दो विभाग हो गये हैं अतः आधे द्वीपको पुष्करार्ध यह संज्ञा प्राप्त हुई ।
१. -पेक्षयैव । जम्बूद्वीपात्पुष्करार्धे द्वौ भरतौ द्वौ हिमवन्तौ, इत्यादि । कुतः मु०, दि० १, दि० २, आ० ।
२. यत्र जम्बूद्वीपे जम्बू-मु०, दि०, दि० २, आ० । ३. तस्य द्वीपस्यानुरूढं पुष्करद्वीप इति नाम । अथ मु० ।