सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 275, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ें- ३।२९ § ४२१ ] तृतीयोऽध्यायः १६३
भिरुत्सर्पणशीला उत्सर्पिणी । तैरेवावसर्पणशीला अवसर्पिणी । तत्रावसर्पिणी षड्विधा—सुषमसुषमा
सुषमा सुषमदुःषमा दुःषमसुषमा दुःषमा अतिदुःषमा चेति । उत्सर्पिण्यपि अतिदुःषमाद्या सुषमसुष-
मान्ता षड्विधैव भवति । अवसर्पिण्याः परिमाणं दशसागरोपमकोटीकोट्यः । उत्सर्पिण्या अपि
तावत्य एव । सोभयी कल्प इत्याख्याते । तत्र सुषमसुषमा चतस्रः सागरोपमकोटीकोट्यः ।
तदादौ मनुष्या उत्तरकुरुमनुष्यतुल्याः । ततः क्रमेण हानौ सत्यां सुषमा भवति तिस्रः सागरोपम-
कोटीकोट्यः । तदादौ मनुष्या हरिवर्षमनुष्यसमाः । ततः क्रमेण हानौ सत्यां सुषमदुःषमा भवति
द्वे सागरोपमकोटीकोट्यौ । तदादौ मनुष्या हैमवतकमनुष्यसमाः । ततः क्रमेण हानौ सत्यां दुःषम-
सुषमा भवति एकसागरोपमकोटीकोटी द्विचत्वारिंशद्वर्षसहस्रोना । तदादौ मनुष्या विदेहजनतुल्या
भवन्ति । ततः क्रमेण हानौ सत्यां दुःषमा भवति एकविंशतिवर्षसहस्राणि । ततः क्रमेण हानौ सत्या-
मतिदुःषमा भवति एकविंशतिवर्षसहस्राणि । एवमुत्सर्पिण्यपि विपरीतक्रमा वेदितव्या ।
§ ४१९. अथेतरासु भूमिषु कावस्थेत्यत आह—
ताभ्यामपरा भूमयोऽवस्थिताः ॥२८॥
§ ४२०. ताभ्यां भरतैरावताभ्यामपरा भूमयोऽवस्थिता भवन्ति । न हि तत्रोत्सर्पिण्यव-
सर्पिण्यौ स्तः ।
§ ४२१. किं तासु भूमिषु मनुष्यास्तुल्यायुष आहोस्चित्कश्चिदस्ति प्रतिविशेष इत्यत आह—
एकद्वित्रिपल्योपमस्थितयो हैमवतकहारिवर्षकदैवकुरवकाः ॥२९॥
भेद हैं । ये दोनों काल सार्थक नामवाले हैं। जिसमें अनुभव आदिकी वृद्धि होती है वह उत्सर्पिणी
काल है । और जिसमें इनका ह्रास होता है वह अवसर्पिणी काल है। अवसर्पिणीके छह
भेद हैं—सुषमसुषमा, सुषमा, सुषमदुःषमा, दुःषमसुषमा, दुःषमा और अतिदुःषमा । इसी प्रकार
उत्सर्पिणी भी अतिदुःषमासे लेकर सुषमसुषमा तक छह प्रकारकी है। अवसर्पिणी कालका
परिमाण दस कोड़ाकोड़ी सागर है और उत्सर्पिणी भी इतना ही है। ये दोनों मिलकर एक
कल्पकाल कहे जाते हैं। इनमें-से सुषमसुषमा चार कोड़ाकोड़ी सागरका होता है। इसके
प्रारम्भमें मनुष्य उत्तरकुरुके मनुष्योंके समान होते हैं। फिर क्रमसे हानि होनेपर तीन कोड़ा-
कोड़ी सागर प्रमाण सुषमा काल प्राप्त होता है। इसके प्रारम्भमें मनुष्य हरिवर्षके मनुष्योंके
समान होते हैं। तदनन्तर क्रमसे हानि होनेपर दो कोड़ाकोड़ी सागर प्रमाण सुषमदुःषमा
काल प्राप्त होता है। इसके प्रारम्भमें मनुष्य हैमवतके मनुष्योंके समान होते हैं। तदनन्तर
क्रमसे हानि होकर ब्यालीस हजार वर्ष कम एक कोड़ाकोड़ी सागरका दुःषमसुषमा काल
प्राप्त होता है। इसके प्रारम्भमें मनुष्य विदेह क्षेत्रके मनुष्योंके समान होते हैं। तदनन्तर क्रमसे
हानि होकर इक्कीस हजार वर्षका दुःषमा काल प्राप्त होता है। तदनन्तर क्रमसे हानि
होकर इक्कीस हजार वर्षका अतिदुःषमा काल प्राप्त होता है। इसी प्रकार उत्सर्पिणी भी इससे
विपरीत क्रमसे जाननी चाहिए।
§ ४१९. इतर भूमियोंमें क्या अवस्था है अब इस बातके बतलानेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
भरत और ऐरावतके सिवा शेष भूमियां अवस्थित हैं ॥ २८ ॥
§ ४२०. सूत्रमें 'ताभ्याम्' पदसे भरत और ऐरावत क्षेत्रका ग्रहण किया है। इन दोनों
क्षेत्रोंसे शेष भूमियां अवस्थित हैं। उन क्षेत्रोंमें उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी काल नहीं हैं।
§ ४२१. इन भूमियोंमें मनुष्य क्या तुल्य आयुवाले होते हैं या कुछ विशेषता है। इस बातके
बतलानेके लिए अब आगेका सूत्र कहते हैं—
हैमवत, हरिवर्ष और देवकुरुके प्राणियोंकी स्थिति क्रमसे एक, दो और तीन पल्य
प्रमाण है ॥ २९ ॥