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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 272, कुल 558 में से

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पृष्ठ 272

सिन्ध्वादयः सप्त पूर्वगा इति प्राप्तम् । नैष दोषः; द्वयोर्द्वयोरित्यभिसंबन्धात् । द्वयोर्द्वयोः पूर्वाः
पूर्वगा इति वेदितव्याः ।
§ ४०७. इतरासां दिग्भागप्रतिपत्त्यर्थमाह—
शेषास्त्वपरगाः ॥२२॥
§ ४०८. द्वयोर्द्वयोर्या अवशिष्टास्ता अपरगाः प्रत्येतव्याः । अपरसमुद्रं गच्छन्तीत्यपरगाः ।
तत्र पद्मह्रदप्रभवा पूर्वतोरणद्वारनिर्गता गङ्गा । अपरतोरणद्वारनिर्गता सिन्धुः । उदीच्यतोरणद्वार-
निर्गता रोहितास्या । महापद्मह्रदप्रभवा १अवाच्यतोरणद्वारनिर्गता रोहित् । उदीच्यतोरणद्वार-
निर्गता हरिकान्ता । तिगिञ्छह्रदप्रभवा दक्षिणतोरणद्वारनिर्गता हरित् । उदीच्यतोरणद्वारनिर्गता
सीतोदा । केसरिह्रदप्रभवा अवाच्यतोरणद्वारनिर्गता सीता । उदीच्यतोरणद्वारनिर्गता नरकान्ता ।
महापुण्डरीकह्रदप्रभवा दक्षिणद्वारनिर्गता नारी । उदीच्यतोरणद्वारनिर्गता रूप्यकूला । पुण्डरीक-
ह्रदप्रभवा अवाच्यतोरणद्वारनिर्गता सुवर्णकूला । पूर्वतोरणद्वारनिर्गता रक्ता । २प्रतीच्यतोरणद्वार-
निर्गता रक्तोदा ।
§ ४०९. तासां परिवारप्रतिपादनार्थमाह—
चतुर्दशनदीसहस्रपरिवृत्ता गङ्गासिन्ध्वादयो नद्यः ॥२३॥
§ ४१०. किमर्थं 'गङ्गासिन्ध्वादि' ग्रहणं क्रियते । नदीग्रहणार्थम् । प्रकृतास्ता अभिसंब-
शंका—पूर्वत्व किस अपेक्षासे है ? समाधान—सूत्रमें किये गये निर्देशकी अपेक्षा । शंका—यदि
ऐसा है तो गंगा, सिन्धु आदि सात नदियां पूर्व समुद्रको जानेवाली प्राप्त होती हैं ? समाधान—यह
कोई दोष नहीं, क्योंकि 'द्वयोः द्वयोः' इन पदोंका सम्बन्ध है । तात्पर्य यह है कि दो-दो नदियोंमें-से
प्रथम-प्रथम नदी बहकर पूर्व समुद्रमें मिली है ।
§ ४०७. अब इतर नदियोंके दिशाविशेषका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
किन्तु शेष नदियाँ पश्चिम समुद्रको जाती हैं ॥ २२ ॥
§ ४०८. दो-दो नदियोंमें जो शेष नदियाँ हैं वे बहकर पश्चिम समुद्रमें मिली हैं । 'अपरगाः'
पदका अर्थ अपर समुद्रको जाती हैं यह है । उनमें-से पद्म तालाबसे उत्पन्न हुई और पूर्व तोरण
द्वारसे निकली हुई गंगा नदी है । पश्चिम तोरण द्वारसे निकली हुई सिन्धु नदी है तथा उत्तर
तोरण द्वारसे निकली हुई रोहितास्या नदी है । महापद्म तालाबसे उत्पन्न हुई और दक्षिण तोरण-
द्वारसे निकली हुई रोहित नदी है तथा उत्तर तोरणद्वारसे निकली हुई हरिकान्ता नदी है। तिगिञ्छ
तालाबसे उत्पन्न हुई और दक्षिण तोरणद्वारसे निकली हुई हरित नदी है और उत्तर तोरण द्वारसे
निकली हुई सीतोदा नदी है । केसरी तालाबसे उत्पन्न हुई और दक्षिण तोरणद्वारसे निकली हुई
सीता नदी है तथा उत्तर तोरणद्वारसे निकली हुई नरकान्ता नदी है । महापुण्डरीक तालाबसे
उत्पन्न हुई और दक्षिण तोरणद्वारसे निकली हुई नारी नदी है । तथा उत्तर तोरणद्वारसे निकली
हुई रूप्यकूला नदी है । पुण्डरीक तालाबसे उत्पन्न हुई और दक्षिण तोरणद्वारसे निकली हुई
सुवर्णकूला नदी है । पूर्व तोरणद्वारसे निकली हुई रक्ता नदी है और पश्चिम तोरणद्वारसे निकली
हुई रक्तोदा नदी है ।
§ ४०९. अब इनकी परिवार-नदियोंका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
गंगा और सिन्धु आदि नदियोंको चौदह-चौदह हजार परिवार नदियाँ हैं ॥ २३ ॥
§ ४१०. शंका—'गंगा सिन्धु आदि' पदका ग्रहण किसलिए किया है ? समाधान—नदियों-
१. अपाच्यतोरण-आ० २, दि० १, दि० २, ता०, ना० । २. अपरतोरण-मु० ।