सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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- ३३९ § ४४१ ] तृतीयोग्ध्यायः १७१
तैरेव लोमच्छेदैः प्रत्येकमसंख्येयवर्षकोटीसमयमात्रच्छिन्नैस्तत्पूर्णमुद्धारपल्यम् । ततः समये समये
एकैकस्मिन् रोमच्छेदेऽपकृष्यमाणे यावता कालेन तद्रिक्तं भवति तावान्काल उद्धारपल्योपमाख्यः ।
एषामुद्धारपल्यानां दशकोटीकोट्य एकमुद्धारसागरोपमम् । अर्धतृतीयोद्धारसागरोपमानां यावन्तो
रोमच्छेदास्तावन्तो द्वीपसमुद्राः । पुनरुद्धारपल्यरोमच्छेदैर्वर्षशतसमयमात्रच्छिन्नैः पूर्णमद्धापल्यम् ।
ततः समये समये एकैकस्मिन् रोमच्छेदेऽपकृष्यमाणे यावता कालेन तद्रिक्तं भवति तावान्कालो-
द्वापल्योपमाख्यः । एषामद्धापल्यानां दशकोटीकोट्य एकमद्धासागरोपमम् । दशाद्धासागरोपमकोटी-
कोट्य एकावसर्पिणी । तावत्येवोत्सर्पिणी । अनेनाद्धापल्येन नारकतैर्यग्योनानां देवमनुष्याणां च
कर्मस्थितिर्भवस्थितिरायुःस्थितिः कायस्थितिश्च परिच्छेत्तव्या । उक्ता च संग्रहगाथा—
"ववहारुद्धारद्धा पल्ला तिण्णेव होंति बोद्धव्वा ।
संखा दीव-समुद्वा कम्मट्ठिदि वण्णिदा तदिए ॥"
§ ४४०. यथैवैते^२ उत्कृष्टजघन्ये स्थिती नृणां तथैव—
तिर्यग्योनिजानां च ॥३६॥
§ ४४१. तिरश्चां योनस्तिर्यग्योनिः । तिर्यग्गतिनामकर्मोदयापादितं जन्मेत्यर्थः । तिर्यग्योनौ
जातास्तिर्यग्योनिजाः । तेषां तिर्यग्योनिजानामुत्कृष्टा भवस्थितिस्त्रिपल्योपमा । जघन्या अन्तर्मुहूर्ता ।
मध्येऽनेकविकल्पाः ।
इति तत्त्वार्थवृत्तौ सर्वार्थसिद्धिसंज्ञिकायां तृतीयोऽध्यायः ॥३॥
उतने उन लोमच्छेदोंमें-से प्रत्येक खण्ड करके उनसे दूसरे गढ़ेके भरनेपर उद्धारपल्य होता है ।
और इसमें-से प्रत्येक समयमें एक-एक रोमको निकालते हुए जितने कालमें वह गढ़ा खाली हो जाय
उतने कालका नाम उद्धार पल्योपम है । इन दस कोड़ाकोड़ी उद्धारपल्योंका एक उद्धार सागरोपम
काल होता है । तथा ढाई उद्धार सागरके जितने रोमखण्ड हों उतने सब द्वीप और समुद्र हैं ।
अनन्तर सौ वर्षके जितने समय हों उतने उद्धारपल्यके रोमखण्डोंमें-से प्रत्येकके खण्ड करके और
उनसे तीसरे गढ़ेके भरनेपर एक अद्धापल्य होता है । और इनमें-से प्रत्येक समयमें एक-एक रोमके
निकालनेपर जितने समयमें वह गढ़ा खाली हो जाय उतने कालका नाम अद्धापल्योपम है । तथा
ऐसे दस कोड़ाकोड़ी अद्धापल्योंका एक अद्धासागर होता है । दस कोड़ाकोड़ी अद्धासागरोंका एक
अवसर्पिणी काल होता है और उत्सर्पिणी भी इतना ही बड़ा होता है ।
इस अद्धापल्यके द्वारा नारकी, तिर्यञ्च, देव और मनुष्योंकी कर्मस्थिति, भवस्थिति, आयु-
स्थिति और कायस्थिति की गणना करनी चाहिए । संग्रह गाथा भी कही है—
व्यवहार, उद्धार और अद्धा ये तीन पल्य जानने चाहिए । संख्याका प्रयोजक व्यवहार पल्य
है । दूसरेसे द्वीप-समुद्रोंकी गणना की जाती है और तीसरे अद्धापल्यमें कर्मोंकी स्थितिका लेखा है ।
§ ४४०. जिस प्रकार मनुष्योंकी यह उत्कृष्ट और जघन्य स्थिति है उसी प्रकार—
तिर्यञ्चों की स्थिति भी उतनी ही है ॥३९॥
§ ४४१. तिर्यंचोंकी योनिको तिर्यग्योनि कहते हैं । इसका अर्थ तिर्यंचगति नामकर्मके उदयसे
प्राप्त हुआ जन्म है । जो तिर्यंचयोनिमें पैदा होते हैं वे तिर्यग्योनिज कहलाते हैं । इन तिर्यंचयोनिसे
उत्पन्न जीवोंकी उत्कृष्ट भवस्थिति तीन पल्य और जघन्य भवस्थिति अन्तर्मुहूर्त है । तथा बीचकी
स्थितिके अनेक विकल्प हैं ।
१. ववहारुद्धारद्धा तियपल्ला पढमंम्मि संखाओ । विदिए दीवसमुद्दा तदिए मिज्जेदि कम्मठिदी ति० प०
गा० ९४ । २. -वैते द्वे उत्कृ-आ०, दि० १, दि० २ ।
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